Monday, November 23, 2009

घूरना मना है (नई दुनिया के संपादकीय पृष्ठ पर)



राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी क्या शुरू हुई कि जिधर देखो उधर उथल-पुथल मच गई।दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। उन दिनों कुछ खास है,जैसे अब कहीं गाय भगाई जा रही है तो कहीं कुत्ता, कहीं एमसीडी वाले बंदर के पीछे उछल रहे हैं तो कहीं सूअर भगा रहे हैं। बाकी सब तो ठीक है मगर मच्छरजी को कैसे भगाया जाए। उन्होंने तो लगता है, राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेने की ठान ली है।


कॉमनवेल्थ गेम्स का एक फायदा तो है हमारी दिल्ली भी साफ-सुथरी, सुंदर हो जाएगी और सड़कें चौड़ी होंगी, फ्लाईऑवर बनेंगे, नई इमारतें, नए स्टेडियम। अरे भैया! हम कोई खयाली पुलाव नहीं पका रहे हैं, बाकायदा कागजी नक्शा तैयार किए हैं। अब तो हमारे देश का पूरी तरह से नवीनीकरण होकर रहेगा। मजाक नहीं है भई, क्या हुआ जो महँगाई ने मुँह खोल रखा है। हम दिल्ली वाले दिल भी तो बड़ा रखते हैं जी। यह और बात है कि देश के सारे भिखारियों को और रिक्शे वालों को दिल्ली से हटा देंगे। आखिर कॉमनवेल्थ गेम्स में कॉमन मैन का क्या काम?

विदेशियों का स्वागत करने में कोई कसर न रह जाए इसलिए तरह-तरह के ट्रेनिंग सेंटर भी खुल गए हैं। रेलवे ने भी अपने स्टेशनों का हुलिया बदलने की ठान ली है। इसके साथ ही रेलवे ट्रेनिंग सेंटर में कुलियों को सिखा रहे हैं कि कैसे अँगरेजी में बात की जाए। अरे उन्हें अँगरेजी ही आती तो वे कुलीगिरी करते ही क्यूँ?

देखा-देखी पुलिस प्रशासन को भी जाने क्या हो गया है। पचास हजार से भी ज्यादा पुलिसकर्मियों को सारा काम-धंधा छोड़कर यही सीखने में लगा रखा है कि किस प्रकार विदेशी मेहमानों से पेश आया जाए। अब विदेशी चाहे जैसी हरकत करें, हमें अपने क्रोध को वश में रखना है। मुझे लगता है, बाबा रामदेव ही उनकी क्लास ले रहे होंगे। रोगों से छुटकारा, तनाव से मुक्ति, क्रोध पर काबू इत्यादि।

सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात तो यह है कि घूरने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अब भला यह भी कोई बात हुई? कोई यह बताए कि घूरना भी कोई अपराध हुआ भला। मेरे खयाल से हमारे देश में कम से कम दस प्रतिशत दस साल के बच्चे, तीस प्रतिशत नौजवान और साठ प्रतिशत बुढ़ऊ नौजवान से हैं, जो घूरा-घूरी में लगे रहते हैं। और नित्यप्रति घूरन प्रक्रिया द्वारा आई टॉनिक लेने का उनका नियम बना हुआ है। अब ये आई टॉनिक पर भी रोक लग गई तो सोचिए देश की आँखों का क्या होगा। और यदि सुरक्षा कर्मचारी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लेंगे यानी कि पर्यटको को घूरेंगे नहीं तो देश की सुरक्षा कैसे होगी? उनमें से किसी के पास बम निकल गया तो क्या होगा? यह अत्यंत गहन चिंतन का विषय है।


सुनीता शानू

12 comments:

  1. कुछ तो मजा मिलाना ही चाहियें......
    राष्ट्र मंडल खेलों का......
    लेकिन ऐसा सोचा न था.....

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  2. घूरना मना है पढ़कर सोचने को मजबूर हूँ......लोकतंत्र में खेलो के नाम पर ऐसी पाबंदी उचित नहीं कही जा सकती है . उदाहरण के लिए कोई देख रहा है और सामने वाला आरोप लगा दे की ये आदमी घूर कर देख रहा है तो उसके ऊपर क्या कानूनी कार्यवाही की जावेगी. निगाहों का क्या कुसूर ......... इन खेलो के साए में निगाहों पर नजर रखना ...कही सबको खेलो के दौरान गांधारी की तरह काली पट्टी न बंधना पड जाए . दिल्लीवासियो के लिए मुसीबत का सबब हैं .

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  3. अजी जरुर घुरे लेकिन आंखो पर महेंदर जी की तरह से काला चशमा लगा कर, क्यो ना सभी घुरने वालो को काला चश्मा दे दिया जाये:)फ़िर तो पता ही नही चलेगा कि कोन किसे घुर रहा है

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  4. दिल्ली वालों से सहानुभूति है। हम तो यहाँ सब कुछ करने के लिए स्वतंत्र हैं।

    प्रमोद ताम्बट
    भोपाल
    www.vyangya.blog.in
    www.vyangyalok.blogspot.com

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  5. धन्य भये...सही है...बधाई हो जी!!

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  6. घूरने पर रोक के खिलाफ लड़ाई लड़ी जाएगी

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  7. सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात तो यह है कि घूरने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अब भला यह भी कोई बात हुई? कोई यह बताए कि घूरना भी कोई अपराध हुआ भला। मेरे खयाल से हमारे देश में कम से कम दस प्रतिशत दस साल के बच्चे, तीस प्रतिशत नौजवान और साठ प्रतिशत बुढ़ऊ नौजवान से हैं, जो घूरा-घूरी में लगे रहते हैं।

    ये अच्छा किया.:)

    रामराम.

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  8. di...sach mein is post ne bahut sochne pe majboor bhi kya aur mazaa bhi aaya....

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  9. कोई घूरेगा नहीं तो पता कैसे चलेगा कि‍ असलि‍यत क्‍या है ?

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  10. अब यह भी बता देते कि घूरने पर कौनसी धारा लगती है तो..... ।

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  11. मुन्नाभाई सर्किट की ब्लोग चर्चा
    सुनीता शानु जी
    घूरना के सन्दर्भ मुन्नभाई का कहना है दिल खोल के घूरा जाऎ. टेशन लेनेका नाही, टेशन देने का.
    आभार....

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  12. ek commonwealth game mumbai me bhi kara diziye...

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