Saturday, March 14, 2020

ये दिल्ली के मेले, कभी कम न होंगे.... -----


 

दिल्ली डायरी में जब प्रगति मैदान शामिल होने जा रहा था, तब अनायास ही डायरी के पन्नों पर लिखने-पढऩे का सबसे बड़ा मेला नजर आने लगा। इस साल के शुरुआती दिनों में यानी 4 से 12 जनवरी के बीच यहां विश्व पुस्तक मेला यानी वल्र्ड बुक फेयर का आयोजन नजर आया।
-----
- सुनीता शानू

दिल्ली देश का दिल है तो यहां मेल-मिलाप-मेले तो होंगे ही। दिल्ली में मेलों की रौनकें कल भी थी, आज भी हैं और लग रहा है आने वाले समय में भी यूं ही बनी रहेगी। क्योंकि, दिल्ली दिल्ली कल भी सैलानियों को आकर्षित करने के लिए जगमगाती थी, और आज भी दिल्ली में मेलों की जगमग रहती है। यूं यह कहें तो हरगिज़ गलत नहीं होगा कि दिल्ली हमेशा से व्यापारिक दृष्टि से श्रेष्ठ रही है।
अब बात आती है खरीदारी की। तो मेले में खरीदारी का शौक तो सबको ही रहता है। लेकिन दिल्ली आने वालों में एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी नजऱ आती है जो सिफऱ् खरीदारी करने के उद्देश्य से ही नहीं आते हैं। वरन अपना सामान बेचने भी आते हैं। हां,  यह भी सच है कि दिल्ली ने छोटे-बड़े सभी व्यापारियों को कारोबार दिया है। जो लोग एक बार दिल्ली आकर बस जाते हैं और यहांं से बाहर जाने का नाम भी नहीं लेते हैं। कमोबेश यही वजह है कि दिल्ली को दिल वालों की नगरी भी कहा जाता है।
अब इस दिल वालों की नगरी में आकर भी आप यदि यहां का बाजार नहीं घूम पाए तो हमेशा मलाल ही रहेगा। वैसे खरीदारी का शौक कुछ खास लोगों का तो होता ही है। परन्तु आम आदमी भी खुदरा बाजार देखते ही सुविधानुसार खरीदारी कर लेता है।
इन्हीं बाज़ारों में घूमते लोगों को देखते हुए ही शायद शायर अरशद अली खान ने कहा है,
"खऱीदारी-ए-जिंस-ए-हुस्न पर रग़बत दिलाता है।
बना है शौक़-ए-दिल दल्लाल बाज़ार-ए-मोह्ब्बत का।।
हमारा दिल जब किसी चीज पर आ जाता है तो न जेब देखता है न वक्त देखता है। बस खरीदवा कर ही दम लेता है। ऐसे में दिल्ली के इन बाज़ारों की रंगीनियां अपनी ओर खींचती है। बाजारों की बात चली तो आपको बताते चलें। दिल्ली के प्रसिद्ध बाजारों में चांदनी चौक, पालिका बाज़ार, कनॉट प्लेस, बल्ली मारान, दिल्ली हाट, प्रगति मैदान और बेगम सामरु का महल( फ़ुटकर का सामान) शुमार है। हालांकि यह कुछ बानगी भर है, लेकिन यहां आने वालों के लिए खरीददारी की दृष्टि से जरूरत का सब कुछ मिल ही जाता है।
लेकिन आज की हमारी दिल्ली डायरी जिस खास मुकाम पर  पहुंचने वाली है, वह स्थान मेलों के लिए जगप्रसिद्ध है। आप सही समझे, वह स्थान दिल्ली का प्रगति मैदान ही है।
 आम तौर पर प्रगति मैदान प्रदर्शनकारियों के लिए एक प्रदर्शनी स्थल है। यह एशिया के सर्वोत्तम प्रगति स्थलों में से एक माना जाता है। करीब 149 एकड़ में फैला एक विशाल मैदान, जिसमें 54,685 वर्ग मीटर में फैले 15 विशाल प्रदर्शनी स्थल और राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र, द हॉल ऑफ़ नेशनल, अद्भुत हस्त शिल्प संग्रहालय एवं स्टेट्स पवेलियन, नेहरू पवेलियन एवं डिफैंस पवैलियन को अपने आप में समेटे निसंदेह प्रगति का सूचक तो है की दुनिया भर में सर्वश्रेष्ठ में शुमार होने के काबिल भी है।
प्रगति मैदान में इन सबके अलावा 10000 वर्ग मीटर का खुला क्षेत्र है। जहां भारतीय व्यापार प्रोत्साहन संस्थान समय-समय पर देशी-विदेशी व्यापार मेले आयोजित करता रहता है। ये मेले व्यापारिक एवं ओद्योगिक जगत में बहुत खासे महत्व रखने वाले और लोकप्रिय हैं। इन मेलों से टेक्नोलॉजी आदान-प्रदान के लिए एक प्रभावी माध्यम उपलब्ध होता है। इस प्रकार के मेले जनसम्पर्क का भी प्रमुख केंद्र होते हैं। प्रगति मैदान में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। जिसके लिए यहां दो सभागृह शकुंतलम् एवं फलकनुमा  कलाकारों और कद्रदानों के स्वागत के लिए अपनी बाहें फैलाए नजर आते हैं।
----
दिल्ली डायरी में जब प्रगति मैदान शामिल होने जा रहा था, तब अनायास ही डायरी के पन्नों पर लिखने-पढऩे का सबसे बड़ा मेला नजर आने लगा। इस साल के शुरुआती दिनों में यानी 4 से 12 जनवरी के बीच यहां विश्व पुस्तक मेला यानी वल्र्ड बुक फेयर का आयोजन नजर आया।
केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन 1957 में स्थापित एक प्रकाशन विभाग राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट) ने इस मेले का आयोजन किया। वैेसे भी नेशनल बुक ट्रस्ट के मुख्य कामों में प्रकाशन, 2) पुस्तक पठन को प्रोत्साहन, विदेशों में भारतीय पुस्तकों को प्रोत्साहन, लेखकों और प्रकाशकों को सहायता, बाल साहित्य को बढावा देना और विभिन्न श्रेणियों के अन्तर्गत हिंदी, अंग्रेजी तथा अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं एवं ब्रेल लिपि में पुस्तकें प्रकाशित करना है। हर साल लगने वाले यह बुक फेयर एशिया और अफ्रीका का सबसे बड़ा पुस्तक मेला तो ही है। मेला खत्म होते ही पुस्तक प्रकाशकों-प्रेमियों को अगले साल का बेसब्री से इंतजार शुरू हो जाता है।
 प्रगति मैदान मैट्रो की ब्लू लाइन से जुड़ा हुआ है। मेट्रो से यहां पहुंचना सुगम है।क्योंकि प्रगति मैदान एक मैट्रो स्टेशन का नाम है। हालांकि इस जनवरी माह से इसका नाम सुप्रीम कोर्ट मैट्रो स्टेशन बदल दिया गया है। अब इसी स्टेशन पर उतर कर प्रगति मैदान पहुंचा जा सकेगा। इस बार मेले में पहुंचने का समय प्रतिदिन 11 बजे से रात 8.00 बजे तक था और प्रवेश टिकिट वयस्कों के लिए 30 रुपए, बच्चों के लिए 20 रुपये रखा गया। स्कूल यूनीफ़ॉर्म में आने वाले बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यागों के लिए प्रवेश निशुल्क था। मेले में प्रवेश सिफऱ् गेट नम्बर 1 तथा गेट नम्बर 10 से ही किया जा सकता है। टिकिट खिडक़ी भी गेट नम्बर 1 व 10 पर ही उपलब्ध थी। भैरों मार्ग प्रगति मैदान पर पार्किंग की व्यवस्था भी है। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा गाड़ी की व्यवस्था भी की गई है, जो सभी पुस्तक प्रेमियों को गेट से मेले तक श््राटल बस के रूप में सचालित की गई।
पुस्तक मेले की खासियत और जुनून वरिष्ठ पत्रकार विनोद कुमार गौड़ के शब्दों में सुनिए-‘जो एक बार यहां विजिट कर गया, अगले सालों में उसे यहां आना ही पड़ेगा।’ वे आगे बताते हैं- ‘यह सच है कि पुस्तक मेला साहित्य प्रेमियों का एक ऐसा त्योहार है, जिसकी तैयारी में वर्ष भर लेखक, प्रकाशक के साथ-साथ पाठक भी लगे होते हैं। सभी को साल भर तक इस मेले का इंतजार रहता है। और इंतजार किया जाता है दूर से आने वाले दोस्तों का, पुस्तक मेले में जितनी खुशी पुराने दोस्तों से मिलकर होती है, उतनी ही खुशी अजनबी और नए लोगों से दोस्ती होने पर होती है। ये मेले दोस्तों से मिलने का माध्यम भी रहते हैं।’
इसीलिए तो मीर हसन फऱमाते हैं -
"फिरते हैं हम तो तेरे ही दर पे कुछ
रस्ते से है न काम न बाज़ार से गऱज़।
दरअसल, पुस्तक मेले का मुख्य उद्देश्य लोगों में पुस्तकों के प्रति रुचि पैदा करना है। तथा इसका एक लाभ यह भी है कि पाठकों को एक ही स्थान पर हर विषय की पुस्तकें मिल ही जाती है, वहीं प्रकाशकों को भी अपनी पुस्तकों का प्रदर्शन करने के लिए मंच उपलब्ध हो जाता है। पुस्तक मेलों में होने वाली गोष्ठियों और चर्चाओं से भी पाठकों और नए लेखकों को सीखने को मिलता है।
अब नवीन चौधरी को ही लीजिए। छात्रजीवन, छात्र राजनीति से लेकर जातिवादी राजनीति के दांवपेंचों को समेटे उपन्यास ‘जनता स्टोर’ के लेखक नवीन बुक फेयर के अधिकांश दिनों में मौजूद रहे। उन्होंने अपने पाठकों-सोशल मीडिया के माध्यम से बने मित्रों से गर्मजोशी से मुलाकात की, किताब पर ऑटोग्राफ दिए। उनका कहना था कि लेखकों के लिए मार्केटिंग का अवसर तो है ही, साथ ही अपने पाठकों से रूबरू मिलने का मौका भी। उन्होंने बुक फेयर में आए अपने मित्रों, पाठकों को निराश नहीं किया और भरपूर ऊर्जा से मिले, सेल्फी ली।
पुस्तक मेले में भूगोल, इतिहास,विज्ञान,साहित्य,यात्रा,भाषा, संस्मरण, लोककथाएं, मनोरंजन, स्वास्थय, सिनेमा, धर्म आदि विषयों पर पुस्तकें मिल जाती हैं। नए लेखकों की किताबों का जब विमोचन व किताब पर चर्चा होती है तो वह भी चर्चा में आते हैं, तथा किताबों का प्रचार भी होता है। नि: संदेह पुस्तकें ही हमारी सबसे अच्छी मित्र होती हैं। जो हमारा मार्ग प्रशस्त करती हैं और हमें मार्गदर्शन देती हैं। पुस्तकों से हमें ज्ञान प्राप्त होता है। वेद, पुराण, उपनिषद,गीता,रामायण  का अध्ययन करके हमें प्राचीन संस्कृति का ज्ञान तो होता ही है, साथ ही उन महान लोगों के जीवन चरित्र को सालों साल सहेज कर रखना पुस्तकों के माध्यम से ही हो पाया है।
इस साल 4 जनवरी 2020 को प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले का उद्घाटन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के ने किया। इस बार मेले की थीम ‘गांधी लेखकों के लेखक थी। इस थीम को ध्यान में रखकर एक विशेष मंडप भी पुस्तक मेले में लगाया गया, जिसमें गांधी जी के व्यक्तित्व व कृतित्व को लेकर अलग-अलग भाषाओं में 500 से अधिक किताबों की प्रदर्शनी की गई। पुस्तक मेले में 600 से ज्यादा प्रकाशकों ने 1300 स्टालों के जरिए पुस्तकों का प्रदर्शन किया।
लेखक मंच भी पुस्तकों के विमोचनों और लेखकों से बातचीत का एक केंद्र नजर आ रहा था। बाहर से आने वालों के लिए तथा दिन भर मेले में रहने वालों के लिए, मेले में खाने पीने सम्बंधी सुविधाएं भी रखी गई है, ताकि दिन भर मेले में घूमने पर आप कुछ देर सुस्ता कर चाय कॉफ़ी भी पी सकते हैं।
चारों तरफ़ किताबें ही किताबें, और बड़े-बड़े झोले उठाये पाठक वर्ग नजऱ आ रहा था। कुछ प्रकाशकों ने स्टॉल के कोने में लेखकों के बैठने तथा लोकार्पण व चर्चा के लिए स्थान बना रखा था। फूलों की खुशबू और मिठाई के डिब्बों के साथ जैसे ही किसी पुस्तक का लोकार्पण होता, सबके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ जाती। तालियों की  गडग़ड़ाहट के साथ ही वरिष्ठ लेखकों व प्रशंसकों द्वारा पुस्तक पर विचार व्यक्त करते नजर आए।
मेले में वरिष्ठ लेखकों की एक अपनी ही जमात दिखाई देती है। मेले में ऐसे वरिष्ठ लेखक भी नजऱ आ जाते हैं जिनके दर्शन भी दुर्लभ होते हैं या जो चलने फिरने में असमर्थ होते हैं। यहां आने वाले लेखक तथा पाठक जरूरी नहीं किताब खरीदने या विमोचन करने ही आते हैं। पुस्तक मेला सच पूछिए तो वर्षों से बिछड़े दोस्तों के मिलने का माध्यम भी होता है। चारों तरफ़ एक दूसरे के चेहरे देखते लेखक पाठक इस तरह घूम रहे होते हैं, जैसे कुंभ के मेले में किसी अपने की तलाश में हों।
इन सबके बीच एक और खतरे की तरफ़ भी ध्यान गया।प्रगति मैदान में प्रगति की ओर बढ़ते इन नए लेखको के कदम अनायास ही एक ऐसी दिशा की ओर उठ रहे हैं, जहां से अगर निराशा मिली तो उनकी भावनात्मक कविता के बिगड़ जाने का खतरा रहता है। एक कवि मित्र अपने सभी मित्रों से एक ही बात कह रही थी, देखिए-कैसे सौभाग्य की बात है, आज आप आए और आज ही मेरी पुस्तक मेले में आई है। तमाम दोस्त अपनी दोस्त का मुस्कुराता चेहरा देखते और तुरंत उनका हाथ अपनी जेब की ओर बढ़ जाता। और मिल जाती लेखिका की हस्ताक्षरित एक कॉपी। कौन पागल होगा जो अपने दोस्त की क्लॉज अप सी मुस्कुराहट को खोना चाहेगा। तमाम नए लेखक जो अपने किताब रूपी सपने को हाट बाज़ार में सब्जी-भाजी की तरह बेचने को आतुर थे। अपने इष्ट मित्रों को हांक भी लगा रहे थे।
अब यह सचमुच सोचने वाली ही बात है क्या हमें प्रगति मैदान का ये मेला प्रगति की ओर ही ले जा रहा है। जहां अंधाधुंध दौड़ते जा रहे हैं अपनी भावनाओं की किताब पर कल्पनाओं की स्याही से उकेरे कुछ स्वप्न दोस्तों में बेचने।
आखिर में एक बात और। मेले में एक दुनिया सपने बेच रही है, फुटपाथ पर भी... जहां तमाम बड़े छोटे लेखकों की किताबे उपलब्ध है। वहीं पर प्रगति की राह में आगे बढ़ाता एक बोर्ड लगा है किताबें सौ रुपये किलो। सचमुच यह भी सोचनीय है।

Wednesday, February 5, 2020

कथा "मीराँबाई पर विशेष"



कभी-कभी कुछ चीज़े विशेष होती हैं, और आपसे लिखवाकर ही दम लेती हैं, ज़िक्र होना भी चाहिए, किसी भी रचना को लिखने के बाद, या पुस्तक के प्रकाशन के बाद उस पर पाठक का हक़ हो जाता है, अतः उसी पाठकीय धर्म को निभाते हुए मै आपको एक ऎसे विशेषांक से रु-ब-रु करवाने जा रही हूँ जिसका सम्पादन करना आसान तो कतई नहीं था, अपितु नए विवादों को खड़ा भी कर सकता था, विशेषांक को पढ़कर आप संपादक की सजगता और  कार्यकुशलता का अंदाजा लगा सकते हैं।

तो मै आपको बताना चाहूँगी कि आज मैने कथा पत्रिका का मीराँबाई विशेषांक पढा, यह मार्कण्डेय जी के देहावसान के बाद वर्ष 2012 में प्रकाशित हुआ था, इस अंक का सम्पादन डॉ अनुज के द्वारा हुआ था।
यदि आप इस अंक को पढ़ेंगे तो समझ पाएंगे मीराँ बाई पर लिखा गया यह एक दुर्लभ अंक हैं इसमें  30 लेखकों के लेख भी शामिल है, जो मैं धीरे-धीरे पढूंगी। अभी मैंने सबसे पहले सम्पादकीय और यात्रा संस्मरण पढ़ा। जिससे यह पता चला कि इस अंक को निकालने के लिए अनुज को कितनी सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। डॉ अनुज ने मीराँबाई अंक को निकालने के लिए खुद यात्राएं की, उन यात्राओं में मीराँबाई से संबंधित हर सामग्री एकत्र की, लोगों से मुलाक़ातें की, लेखक ने मीराँबाई पर लिखने से पहले जिस तरह से दर-दर भटककर मीराँ को समझने की कोशिश की है, मीराँ की हर पीड़ा को आत्मसात किया है उससे इस अंक की गुणवत्ता का सीधे-सीधे पता लगता है।

इंटरनेट के समय में जबकि सब कुछ आसानी से उपलब्ध हो जाता है, कितने संपादक हैं ऐसे जो किसी भी पत्रिका को निकालने के लिए पूरी तरह ईमानदार रहते हैं, यह सच है कोई भी पत्रिका हो या अखबार उसकी गुणवत्ता का पता संपादक की ईमानदारी पर निर्भर करता है। यदि पुराने तथ्यों के आधार पर मीराँबाई विशेषांक निकाला जाता तो मुझे नहीं लगता कि यह इतना विशेष बन पाता।

लेखक ने यात्रा संस्मरण में मीराँबाई के जन्मस्थल से लेकर अंतिम पड़ाव तक तथ्यों की खोज की। अब तक ना जाने कितने लोग मीराँबाई को भक्ति काल की एक कवयित्री ही मानते रहे होंगे। लेकिन आप इस विशेषांक को पढ़ेंगे तो समझ पाएंगे मीराँबाई एक कवयित्री ही नहीं एक समाज सुधारक, एक विद्रोही स्वर थी। वह जानती थी कि सीधे-सीधे किसी भी सामाजिक प्रथा का विरोध करना मुश्किल होगा, अशिक्षित व धर्मांध जनता ऊंच-नीच के फेर से निकल नहीं पाएगी,  सबको एक ही जगह एकत्र करने का एक मात्र तरीका कृष्ण भक्ति ही थी। अतः मीराँबाई ने बहुत सोच समझ कर भक्ति मार्ग को चुना था।

 डॉ अनुज ने अपनी बात में पाठकों के सामने कई सवाल रख छोड़े हैं, यदि मीरा बस एक भक्त ही होती तो उसे राजमहल छोड़ना क्यूं पड़ता, मीरा को मारना तो बहुत आसान होता, तो क्यों सांप या ज़हर के द्वारा खत्म करने की साज़िश की गई।
आपने यह भी सुना होगा कि मीराँ अंत में कृष्ण में लीन हो गई थी। लेख में इस बात को भी पूरी तरह से नकारते हुए लिखा है कि मीराँ की बढ़ती हुई लोकप्रियता से घबराकर ही सत्ता ने उनकी हत्या करवाई होगी, और उनका शरीर भी गायब कर ऐसी कहानी बना दी गई होगी, जिससे धर्मभीरू जनता में राजसत्ता के विरुद्ध विद्रोह न भड़के।
यह अंक सचमुच पाठक को सोचने के लिए विवश कर देता है, भाषा की सरलता पठनीयता को बनाए रखती है और अंत तक मीराँबाई को जानने समझने की उत्सुकता बनी रहती है।
मीराँबाई विशेषांक आपको भी पढ़ना चाहिए और मीराँ के जीवनकाल के पन्नों को एक बार फिर पलटना और समझना चाहिए। ताकि मीराँबाई सिर्फ पदों और भजनों में न रह जाए, समाज के लिए दिया गया उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियां भी जरूर समझ पाएं। इस विशेषांक के लिए सम्पादक को बहुत-बहुत बधाई। आशा है इस तरह की सामग्री को किताब के रूप में रखा जाए ताकि पाठ्यक्रम में भी उपयोग हो और आने वाली पीढ़ी को सच्चाई से अवगत कराया जा सके।
लिखना अभी और भी है बाकि फिर कभी...

सुनीता शानू


Sunday, December 1, 2019

दोस्ती जब भी कीजिए...




दोस्ती जब भी किसी से की जाए, पहले जांच परख ली जाए, जांच लिया जाए कि आपने जिससे दोस्ती की है उसे आप पर भरोसा है भी कि नहीं, यह भी देख लिया जाए कि वह आपकी निस्वार्थ दोस्ती को आपकी मतलबपरस्ती तो नहीं मान बैठेगा, आपको जानना पड़ेगा आपके दोस्त के दोस्त कैसे हैं, इंसान किसी की न सुनता हो मगर हर वक्त कान के पास आने वाली आवाजें दिमाग में घर बना लिया करती हैं।
आपको देखना होगा मौकापरस्त  दोस्तो की दोस्त को पहचान है भी की नहीं ? और कहीं वह कान का कच्चा हुआ तो ऐसे में दोस्ती कभी भी टूट सकती है, यदि आप सचमुच किसी को दोस्त मानते हैं, और उसका हित चाहते हैं, तो चुपचाप ऐसे लोगों से किनारा कर लेना चाहिए, दोस्ती हमेशा एक दिल, एक दिमाग़ और एक ही सोच वाले लोगों के साथ निभ पाती है...
किसी ने सच ही कहा है 

 "A best friend is that who knows all about you and still loves you." 


यदि आप सोचते हैं मेरा दोस्त कभी मेरे लिए ग़लत सोच ही नहीं सकता, आंखें ग़लत देख सकती हैं, कान ग़लत सुन सकते हैं, लेकिन मेरा दिल यह जानता है कि वह मेरा बुरा सोच ही नहीं सकता।तो यकीन मानिये आपने एक अच्छा दोस्त पा ही लिया है। यदि इतना भरोसा है तो दोस्ती क़ायम है वरना आपके आगे पीछे कुकुरमुत्तों की फौज इकठ्ठी है जो कभी भी कान से बहरा, आंख से अंधा बनाए रख सकती है। लोग कभी भी दो लोगों की दोस्ती बर्दाश्त नहीं कर पाते, और तिल का ताड़ बनाते हैं, जो जिंदा है उसकी ख़बर कोई नहीं रखता, लेकिन गड़े मुर्दे उखाड़ने में सर खपाते हैं...।
 तो जिंदगी के चार पल सुकून से जिए जा सकें, इसके लिए राहत इंदौरी साहब ने कहा है...

 दोस्ती जब किसी से की जाए
दुश्मनों की भी राय ली जाए

सुनीता शानू

Tuesday, September 10, 2019

दिल्ली वाले दिल हार आए... उज्जैन यात्रा






कालों के काल महाकाल की नगरी उज्जैन जाने का अवसर मिला। यूं तो ज्ज्जैन के कई नाम हैं मुख्यरूप से उज्जैन को उज्जयिनी के नाम से पुकारते हैं। उज्जैन आज भी भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को बचाए हुए हैं, यहाँ लगने वाला कुम्भ का मेला जग प्रसिध्द है। इसे सिंहस्थ महापर्व के नाम से जाना जाता है। उज्जैन नगरी को अच्छी तरह से देखने समझने के लिए एक महीना भी कम है, लेकिन मेरे पास तो सिर्फ़ दो ही दिन थे,इन दो दिन में उज्जैन घूम पाना नामुमकिन था, कारण एक और भी था, वह था उज्जैन जाने का मकसद। मुझे उज्जैन में चल रहे पुस्तक मेले का निमन्त्रण मिला राष्ट्रीय पुस्तक न्यास भारत की तरफ़ से, यह मेरे लिए एक खुशी की बात थी, कि मुझे महाकाल की नगरी में जाकर व्यंग्य पाठ करना था,  लेकिन दो दिन का जाना भी मेरे रोमांच को कम नहीं कर पाया था...

 शुक्रवार का दिन था, मालवा सुपरफ़ास्ट  कुछ ज्यादा ही फ़ास्ट थी, सब दोस्तों ने आगाह किया कि समय पर पहुंचना मुश्किल होगा, मालवा दस से बारह घंटे तक लेट हो जाती है, खैर वही तो होगा जो ईश्वर को मंजूर होगा,मेरी भोपाल में रह रहे मित्र आनंदकृष्ण  से बात हुई, आनंद ने कहा मै हर हाल में तुम्हे भोपाल स्टेशन पर मिलूंगा, आनंद का जन्म दिन भी था तो सोचा एक साथ दो काम होंगे, लेट होते-होते करीब सुबह के साढे नौ बजे ट्रेन भोपाल जंकशन पहुंची, मै ट्रेन से नीचे उतर आनंद का इंतजार करने लगी, तकरीबन बीस मिनिट ही बीते होंगे ट्रेन के सायरन की आवाज आने लगी, साथ ही आनंद का फोन कि तुम कहाँ हो, मै स्टेशन पहुंच गया हूँ, मै चारों तरफ़ देख रही थी दोस्त को एक झलक भी देख पाती, कि ट्रेन चल पड़ी, मै जल्दी से ट्रेन में चढ़ गई, आनंद दूर खड़ा जाती हुई ट्रेन को देख रहा था, और हाथ में पकड़े था नाश्ते का डिब्बा। हम भारतीय भी न इन्ही सब उलझनों में उलझे रहते हैं उसने खाना खाया कि नहीं, उसने पानी पिया की नहीं, भूल जाते हैं दोस्त से मिलकर भूख-प्यास जैसी चीज़े महसूस नहीं होती।

खैर मेरी ट्रेन भोपाल से रवाना हो चुकी थी और अब बारी थी उज्जैन जंक्शन की, न्यास प्रभारी हिंदी संपादक डॉ ललित किशोर मंडोरा हर थोड़ी देर के बाद पता कर रहे थे ट्रेन कहाँ तक पहुंची, मेरे बार-बार यह कहने पर कि  मै खुद पहुंच जाऊंगी, उन्होने कहा कि यह उनका कर्तव्य है आपको लेने गाड़ी आयेगी। हुआ भी वही स्टेशन पर ठीक समय गाड़ी आई और मै पहुंची शिप्रा रेजिडेंसी...

शिप्रा रेजिडेंसी मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग के अंतर्गत आता है, जो स्टेशन जाने वाली सड़क पर ही बना है, इसमें सभी साहित्यकारों के रुकने की व्यवस्था थी, होटल साफ-सुथरा और खूबसूरत था, खाना भी बेहद लजीज था, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की तरफ़ से हमेशा से ही साहित्यकारों के स्वागत में कोई कमी नहीं रखी जाती है।

स्वागत में  ललित किशोर मंडोरा तथा व्यंग्य महारथी अरविंद तिवारी जी के साथ चाय पानी लिया गया, कुछ देर आराम किया गया,  शाम पाँच बजे पुस्तक मेले में अरविंद तिवारी जी तथा मुझे लेकर  गाड़ी पुस्तक मेले के लिए निकली। उज्जैन की साफ़-सुथरी सड़को को देखकर बहुत अच्छा लगा, धार्मिक स्थल होने के बावजूद कहीं कोई गंदगी नजर नहीं आ रही थी।

होटल से कुछ ही दूरी पर कालिदास संस्कृत अकादमी परिसर में पुस्तक मेला लगा हुआ था। जैसे ही भीतर प्रवेश किया चारों तरफ़ किताबों की खुशबू बटोरते लेखक, पाठक नज़र आए, मन खुशी से भर गया, चेहरे पर खुशी अपने-आप आ गई, जैसे एक ही बिरादरी के लोग अपने लोगों को देखकर खुश हो जाते हैं, मेरी नजरे उन अनजान लोगों में कोई जाना-पहचाना सा चेहरा ढूँढने लगी, प्रकाशन स्टॉल जरूर जाने पहचाने से थे, लेकिन प्रकाशक कम ही पहचाने जा रहे थे, फिर भी खुशी लिपटी रही कि एक बिरादरी के तो हैं ही ...
थोड़ा और चलते ही लेखक मंच नजर आया, कुछ जाने-पहचाने से चेहरे थे, तो कुछ अपनेपन का अहसास दिला रहे थे, स्वागत पिलकेंद्र अरोरा जी ने किया, एक बेहद मिलनसार और हंसमुख व्यक्तित्व, पास ही छुपे-छुपे, सहमे-सहमे से खड़े थे हरीश जी, मुझे लगा शायद ये कोई और हैं, वह भी शायद मुझे पहचान नहीं पा रहे थे, कुछ ही देर में सबको मंच पर बुलाया गया तब पता चला यह तो हरीश सिंह ही है मेरे पुराने मित्र। अब व्यंग्य का सत्र शुरु हुआ तो सबकी हालत देखने लायक थी, आठ व्यंग्यकार मंच पर थे, और सामने बैठे निरीह श्रोतागण, देखकर लग रहा था कब कौनसा बाण किधर से चलेगा यह अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे हैं, मुझे लगता है जनता व्यंग्यकारों को कोई अच्छा प्राणी नहीं समझती है, हाँ समझ भी ले यदि व्यंग्यकार कुछ हॉस्य में लिपटी हुई रचनाए सुना दे... जैसे की पिलकेंद्र अरोरा जी का संचालन था, देखकर उनके मंजे होने का पूरा विश्वास हो गया था।

कार्यक्रम की शुरूआत में इंदौर आये सौरभ जैन के व्यंग्य से की गई थी। सौरभ उम्र में छोटे जरूर हैं मगर उन्होनें व्यंग्यकारों ही नहीं कवियों के मंच की चकाचौंध पर भी तीर चला दिए, इसके बाद आये दिनेश दिग्गज जिन्होनें अपने हंसमुख अंदाज में कुछ छोटे-छोटे व्यंग्य सुनाकर श्रोताओ को आकर्षित किया, अभी श्रोताओं में चहल-पहल हो ही रही थी कि उज्जैन के ही व्यंग्यकार हरीश सिंह जी ने को व्यंग्यपाठ के लिए आमंत्रित किया गया, हरीश जी ने नजरों पर एक बेहद शानदार व्यंग्य सुनाया, अब भला किसकी नजर किस पर है, कौन किसकी नज़र में है यह एक व्यंग्यकार से कैसे बच सकता था, सो सबकी नज़रों के कारनामें खोल कर खूब तालिया बटोरी हरीश जी ने,इसके बाद मुकेश जोशी जी ने हिन्दी पखवाड़े पर करारा वार किया, अभी श्रोता संभल भी नहीं पाए थे कि पिलकेंद्र जी ने मंच पर आसीन इकलौती व्यंग्यकार यानि की मुझे व्यंग्य सुनाने के लिये आमंन्त्रित किया, मै बहुत देर से देख रही थी, श्रोताओं की भीड हो या मंच पर बैठे व्यंग्यकार मोबाइल से दूर हो ही नहीं पा रहे थे, यदि मै दस तक गिनती करूं तो दस में से चार बार मोवाइल पर कोई मैसेज चमकता था, और सुनना छोड़ आंखें मैसेज पढ़ने में लग जाती थी, कुछ तो ऎसे भी थे जो बार-बार यह चेक कर रहे थे, मोबाइल की न लाइट जली न घंटी बजी, कुशल तो है न... खैर मैने मोबाइल की पीड़ा से लिपटी रचना सुना डाली, अब यह किसी को सहन कैसे हो पाती, भला ऎसे व्यंग्यबाण आजकल के बच्चे तो सह ही नहीं पाते, खैर चुनाव भी आने ही वाले हैं और हम ठहरे दिल्ली से तो सोचा फिर कब आना होगा उज्जैन तो एक रचना और सुना ही देते हैं, संचालक की आज्ञा लेकर चुनावी गालियों की आँनलाइन शॉपिंग करवा डाली, मेरे खयाल से सबने गालियों की सुविधानुसार ऑनलाइन बुकिंग भी कर ही दी होगी।  मेरे बाद आये ललित किशोर मंडोरा उर्फ़ लालित्य ललित उन्होने आते ही विलायती राम पांडेय और उनके सारे किरदारों के साथ ऎसा समा बाँधा कि उज्जैन के लोग अभी तक उसी देविका गजोधर को ही ढूँढ रहे होंगें। मंच का संचालन कर रहे पिलकेंद्र अरोरा का जब नंबर आया तो सबकी निगाह उनकी तरफ़ थी, उन्होनें काव्यात्मक लहजे में व्यंग्य की शुरूआत की आह बाबा वाह बाबा... सुनकर सबको बहुत मजा आया, ये एक ऎसा व्यंग्य था जो हंसी-हंसी में बाबाओं की जीवन शैली पर, बाबाओं के गलत तरीको पर प्रहार कर गया, और उनसे बचने की सलाह भी दे गया... अब अंतिम वक्ता के रूप में वरिष्ठ व्यंग्यकार अरविंद तिवारी जी को बुलाया गया। अरविंद जी का व्यंग्य पढ़ने का अलग ही अंदाज़ था, उन्होने विश्व पुस्तक मेले पर अपनी रचना सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। व्यंग्य पाठ का दिन सचमुच यादगार रहा।
वापस आते वक्त हल्की सी बूंदा बांदी शुरू हो गई... हम सब लौटकर होटल आ गए, रात्रि भोजन किया और विश्राम किया गया।

रात ही संजय जोशी भैया का फोन आया कि वह सुबह मुझसे मिलने आ रहे हैं, सुनकर बहुत अच्छा लगा, कि कोई रतलाम से चलकर आपसे मिलने आ रहा है। सुबह मै जल्दी ही उठ जाती हूँ, संजय भैया सुबह साढे सात बजे रतलामी सेव के साथ होटल पहुंच गए, उनके स्वागत में ललित जी ने चाय नाश्ते का प्रबंध किया, खूब बातें की मैने अपनी किताबें संजय भैया को भेंट की, अरविंद जी ने भी अपनी किताब भेंट की, उन्होनें हम तीनों को रतलामी सेव भेंट की। साथ ही हमने फोटो भी खींच ली,  संजय भैया एक अच्छे लेखक ही नहीं सचमुच एक सरल हृदय रचनाकार भी हैं, उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। महसूस ही नहीं हुआ कि यह हमारी पहली मुलाकात थी।

संजय भैया को विदा करके हम सभी व्यंग्यकार पिलकेंद्र अरोरा जी के आतिथ्य में हाजिर हुए, पिलकेंद्र अरोरा और उनकी धर्मपत्नी का अतिथि सत्कार सचमुच भावविहल करने वाला था, जलेबी, पोहा, ढोकला, पकौड़े और चाय के साथ सबने व्यंग्य सुनाए, कविताएं सुनी, समय कैसे बीता पता ही नहीं चला। आसमान का बरसना तो कम नहीं हुआ, लेकिन हमें उठना पड़ा।

ललित जी को होटल छोड़ कर मै और अरविंद जी हरीश जी की गाड़ी में घूमने निकल गए, हरीश जी जितने अच्छे व्यंग्यकार हैं उतने अच्छे मित्र भी हैं, पूरे शहर की परिक्रमा करते हुए हम मंदिर और गुरुद्वारे के दर्शन करते रहे, हरीश जी बोलते हुए, सड़क और मंदिरों का परिचय देते रहे, बीच-बीच में अरविंद जी अपने अनुभव बताते रहे... माँ हर सिध्दी देवी मंदिर तथा गढ़कालिका माता मंदिर के दर्शन करने के बाद कुछ तस्वीरे शिप्रा नदी के घाट की भी खींच ली, इतने में ललित जी का फोन आ गया, आप तैयार रहें शाम को आप सबको लेने गाड़ी आयेगी, पांच बजे से काव्यपाठ का आयोजन है। बरसात बढ़ती जा रही थी, अरविंद जी रास्ते में ही एक होटल पर रुक गए, और हरीश जी ने मुझे होटल छोड़ दिया।  

शाम का वक्त था, बारिश ने उज्जैन में रैड अलर्ट कर दिया था, हम पुस्तक मेले पहुंचे तो देखा न लेखको की संख्या में फ़र्क था, न ही पाठकों की संख्या में, बल्कि आज पहले की अपेक्षा अधिक भीड़ थी, और महिलाओं की संख्या बहुत अधिक थी, बाद में पता चला कि यह सब तो इंदौर और उज्जैन नगरी से आई कवियित्रियाँ हैं जो काव्यपाठ के लिए आई थी, और साथ में थे उनके पति बच्चे, सास-ससुर, माता-पिता, बहन-बहनोई, अड़ौसी-पड़ौसी... यूं कहें तो गलत नहीं होगा कि आज मंच पर भी भीड थी तो श्रोता भी भारी संख्या में रहे... सभी ने एक से बढ़कर एक ,कविता, गीत, तथा ग़ज़ल सुनाई, चित्रा जी का संचालन भी गजब रहा,शुरुआत हुई सुषमा व्यास जी की सरस्वति वंदना के द्वारा, इसके बाद अदिति भदौरिया ने पिता पर बेहद संवेदनशील कविता सुनाई, प्रेम शीला जी ने मुक्तको से समा बाँध दिया, क्षमा सिसोदिया की ग़ज़ल और पुष्पा चौरसिया जी की काविता मन संयासी हो जाता है सुनकर श्रोताओं ने खूब तालियां बजाई,सुषमा व्यास ने कविता के अलग ही रंग दिखाए, कभी वह शब्दों को चाँद तक ले गई तो कभी माँ के पल्लू में रुपया अट्ठन्नी चवन्नी के रूप में बाँध आई, सीमा जोशी जी के गीतों के साथ सभागार में सभी गुनगुनाने लगे, बेहद सुरीली मीठी आवाज में उन्होने मालवी गीत भी सुनाया, जो मुझे समझ नहीं आया लेकिन स्थानीय लोगों ने खूब प्रशंसा की। इसके बाद डॉ पांखुरी जोशी की धारदार कविताएं किसी व्यंग्य से कम नहीं थी, इसके बाद चित्रा जैन ने  बेहद खूबसूरत कविता सुनाई जीना चाहता हूँ, चित्रा जी के बाद वंदना गुप्ता जी की कविता की भी सराहना हुई और अंत में नंबर आया मेरा, मुझे विशिष्ट अतिथि के रूप में बिठा दिया गया था, मैने भी दो गीतों का पाठ किया, और दिल वालों की नगरी दिल्ली की तरफ़ से उज्जयनी को संदेश दिया कि वस्तुतः दिल वाले तो महाकाल की नगरी उज्जैन में ही रहते हैं।

कार्यक्रम के अंत में सभी रचनाकारों ने न्यास तथा ललित किशोर मंडोरा का आभार व्यंक्त किया, इस मौके पर उन्हे शॉल उढाई और मोतियों की माला पहनाई गई। सभी की आँखें नम थी, करीब तीस सैंकिंड तक सबने करतल ध्वनि में अपना प्रेम प्रदर्शित किया। कुल मिलाकर उज्जैन पुस्तक मेला एक यादगार अमिट छाप छोड़ गया है, वहाँ हम दिल्ली वाले सचमुच दिल हार कर आ गए...।

सुनीता शानू


Saturday, August 11, 2018

कोमल बचपन पर कठोर होती दुनिया...








कोमल बचपन पर कठोर होती दुनिया...

हर 8 वें मिनिट में एक बच्चा गायब हो रहा है...नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) का यह आँकड़ा हमें डराता है, सावधान करता है और यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपने बच्चों का ख्याल रखने में नाकामयाब रहे हैं। 
हमारे लिये यह बेहद शर्मनाक बात है कि देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों का भविष्य हम सुरक्षित नहीं रख पाते हैं। एन सी आर बी की रिपोर्ट बताती है कि गायब होने वाले बच्चों मे 55 फीसदी लड़कियां होती हैं और सबसे डरावनी और खौफ़नाक बात यह है कि 45 फीसदी बच्चों का कुछ पता नहीं चल पाता। इन बच्चों के साथ क्या होता है मार दिये जाते हैं या ज़िंदगी भर के लिये किसी ऎसी जगह बेच दिये जाते हैं जहाँ से इनका कोई सुराग नहीं मिल पाता।
लापता होने वाले बच्चों में ज्यादातर झुग्गी-बस्तियों, विस्थापितों, रोजगार की तलाश में दूर-दराज के गाँवों से शहरों में आ बसे परिवारों, छोटे कस्बों और गरीब व कमजोर तबकों के बच्चे होते हैं। ऎसे बच्चों को गायब करना बेहद आसान होता है। कुछ माता-पिता अशिक्षित होते हैं जिन्हें मूर्ख बना कर या लालच देकर मानव तस्करी के गिरोह बच्चे गायब कर देते हैं। शर्मिंदगी उन माता-पिता को देखकर होती है, जो गरीबी और पैसे के लालच में अपने मासूम बच्चों को  बेच देंतें हैं।
जहाँ एक और बचपन बचाओ आंदोलन किये जा रहे हैं, दूसरी तरफ़  बाल श्रमिकों  की संख्या में दिनों-दिन इजाफ़ा हो रहा है। (ILO) अंतर्राष्ट्रीय  श्रम संगठन के मुताबिक दुनियाभर में लगभग बीस करोड़ बच्चे अपनी उम्र से ज्यादा श्रम वाला काम करते हैं और यह जानकर आश्चर्य होता है कि 14 साल से कम उम्र के सबसे ज्यादा बाल श्रमिक हमारे देश भारत में ही हैं।
आये दिन बच्चा उठाने वाले गिरोह पकड़े  जा रहे है फ़िर भी बच्चों के गायब होने का सिलसिला बड़ता ही जा रहा है। लगभग 900 संगठित गिरोह ऎसे हैं जो बच्चों को यौन व्यापार में धकेलने तथा बंधुआ मजदूरी के लिए मजबूर करने का काम करते है। बच्चों के अंग-भंग कर उनसे भीख मंगवाते है,  अपहृत बच्चों के अंगों को प्रत्यारोपण के लिए निकालने के बाद उन्हें अपने हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट यह भी बताती है कि विश्व में करीब दस करोड़ से अधिक लड़कियां विभिन्न खतरनाक उद्योग-धंधों में काम कर रही हैं।  



लापता बच्चों की खोज के लिये सरकार ने कई अभियान भी चलाये हैं 
ऑपरेशन स्माइली...
गुमशुदा बच्चों को तलाश कर उनके उनके माता-पिता तक पहुंचाने के लिये ऑपरेशन स्माइल का निर्माण किया गया था। सबसे पहले गाजियाबाद में  ऑपरेशन स्माइली का प्रोग्राम चलाया गया था। जो कि रेलवे स्टेशनों,बस अड्डों, छोटे-छोटे ढ़ाबों और खाने पीने की दुकानों और घरों में काम करने वाले नाबालिग बच्चों को ढूँढकर अपने परिवार तक पहुंचाने का कार्य करता था।
 गाजियाबाद में इसकी कामयाबी होते ही पूरे उत्तर प्रदेश में यह अभियान चला दिया गया।
 ताजा आँकड़ों के हिसाब से-- 
फरवरी 2015 ---490 गुमशुदा बच्चे बरामद--- 354 लड़कियाँ,और 136 लड़के थे।
 मार्च 2015  में 710 गुमशुदा बच्चे बरामद---- 516 लड़कियाँ और 194 लड़के थे। 
पुलिस मुख्यालय से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में अभी भी लगभग साढ़े 3 हजार बच्चे गायब हैं, इनमें ढाई हजार से अधिक लड़कियां हैं। 
ट्रैक चाइल्ड वेब पोर्टल-  
यह वेब पोर्टल 2011-12 में शुरू किया गया लेकिन यह पुलिस के द्वारा ही संचालित की जा सकती है। इसे किसी भी नागरिक को चलाने का या देखने का अधिकार नहीं होता। पुलिस को देश के किसी भी कौने में गुम हुये बच्चे का इस वेबसाइट से पता लग जाता है, क्योंकि सभी अलग-अलग राज्यों की पुलिस ही इस वेबसाइट को  चलाती है। फ़रवरी 2016 में बाल संरक्षण समीति की बैठक में इस पोर्टल को अपडेट किये जाने की बात की गई। साथ ही डी डी सी सुनील कुमार नें अनाथ, बेसहारा, गुमशुदा, घर छोड़कर भागे गये बच्चो को कानूनी रूप से गोद लेनें तथा बालगृह में रह रहे 65 बच्चों के पठन-पाठन तथा नियमित जाँच के निर्देश दिये।
खोया पाया पोर्टल
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय तथा इलेक्ट्रॉनिक एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से 2 जून 2015 को 'खोया-पाया' पोर्टल जारी किया। इसमें लापता बच्चों की खोज के लिये बच्चे का ब्योरा और फोटो 'खोया-पाया' पोर्टल पर डालना होता है। इस पोर्टल पर कोई भी नागरिक गुमशुदा या कहीं मिले बच्चे अथवा वयस्क की सूचना अपलोड कर सकता है। यह पोर्टल ऐसे साधनहीन लोगों की मदद करता है जो गरीब हैं और जिन्हें बच्चों के खो जाने पर रोकर चुप  बैठ जाना पड़ता है। लापता बच्चे की सूचना आदान-प्रदान करने वाला 'खोया-पाया' एप्प मुफ्त में मोबाइल पर भी डाउनलोड किया जा सकता है। इसलिए यह दूर दराज के गांवों में भी कारगर साबित हुआ है। इस पोर्टल से पुलिस सहायता और बाल सहायता वेबसाइट भी जोड़ दी गई है।
इन सब वेब पोर्टल के अलावा, कई पुलिस थानों में अलग-अलग तरह के अभियान चलाये जा रहे हैं और लापता बच्चों की खोजबीन की जा रही है।  फ़ेसबुक तथा व्हाट्स एप्प भी गुमशुदा बच्चों को ढूँढने में सहायक सिध्द हो रही है।
आई सी एम ई सी ( इंटेरनेशनल सेंटर फ़ार मिसिंग एंड एक्स्प्लोईटेड चिल्ड्रन) की रिपोर्ट के अनुसार हर साल लापता बच्चों की संख्या—
सयुंक्त राज्य-467000
जर्मनी-100000  
दक्षिणी कोरिया-31425
अर्जेंटिना-29500
भारत- 70000
स्पेन- 20000
कनाडा- 40100
युनाइटेड किंगडम(U K)-140000

एन सी एम ई की रिपोर्ट के अनुसार युनाईटेड स्टेट्स में तकरीबन 8000000 बच्चे हर साल गुम होते हैं जिसमें 203000 बच्चे अपहरण के शिकार होते हैं।
पाकिस्तान में हर साल गायब होने वाले बच्चों की संख्या 3 हजार है, जबकि हमसे अधिक आबादी वाले चीन में 1 साल में 10 हजार बच्चे गायब होते हैं।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के मुताबिक विभिन्न राज्यों में जनवरी 2012 से फरवरी 2016 के बीच गायब हुए बच्चों की संख्यां कुल 1,94,213 , जिनमें से 1,29,270 बच्चों को  बरामद कर लिया लेकिन  64,943 बच्चों का कुछ  पता नहीं चल पाया। 
नंवबर 2014 से लेकर 30 जून 2015 के बीच प्रति महीने 2,154 नाबालिग लड़के, 2,325 नाबालिग लड़कियां  गायब हुई हैं, जबकि हर माह 2,036 नाबालिग लड़के, 2,251 नाबालिग लड़कियों को खोज लिया गया है। यानि कि आठ महीनों में  35,841 नाबालिग बच्चे गुम हुए हैं, जिनमें से 34,292 बरामद कर लिए गए हैं, 1,549 नाबालिग बच्चों का कोई सुराग नहीं लग पाया है। 
लापता होने वाले बच्चों की संख्या में महाराष्ट्र अव्व्ल नंबर पर है, जहां पिछले 3 साल में 50 हजार बच्चे गायब हुए। उसके बाद मध्यप्रदेश से 24,836 बच्चे गायब हुए। दिल्ली में 19,948 और आंध्रप्रदेश 18,540 का नंबर क्रमशः तीसरा और चौथा है।


सुनीता शानू

Tuesday, August 22, 2017

हरिद्वार ऋषिकेश यात्रा एक एड्वेंचर...





सबसे पहली बात तो यही आश्चर्य करती है कि हरिद्वार, ऋषिकेश जैसे तीर्थ स्थल पर एडवेंचर्स जैसा क्या होगा, जब भी किसी से पूछा था कि तुम चलोगे बस एक ही जवाब मिला, हमारी उम्र नहीं है जी हरिद्वार जाने की, या हमें तो मरने के बाद हमारे बच्चे ले जायेंगे और गंगा में बहा आयेंगें... बहरहाल जो लोग चलने को तैयार हुये उनमें मेरे ऑफ़िस के बच्चे भी थे, कुल मिलाकर हम सत्रह लोगों का ग्रुप लेकर निकल पड़े हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा पर... यात्रा शुरू हुई सरायरोहिल्ला से, गाड़ी के  आने से पहले ही घुमक्कड़ी एकत्र होने लग गये, कुछ ही देर में पूरा ग्रुप एक जगह एकत्र हो गया, रात दस बजे टेम्पो ट्रेवलर के द्वारा हम सबने यात्रा प्रारम्भ कर दी।
सुबह के पाँच बजे होटल पहुंच कर सामान रखा और निकल पड़े गंगा स्नान के लिये... गंगा का पानी एकदम रेतीला हो गया था, लेकिन स्नान करने का लोभ कुछ भी नही देख पाया, और सब कूद गये हर-हर गंगे का जयघोष करते हुये, गंगा स्नान ने सफ़र की सारी थकान खत्म कर दी थी, हल्की-हल्की बूँदा-बाँदी में ही हमने घूमने का प्लॉन बना डाला, मुझे नहीं लगता कि घुमक्कड़ियों के लिये बरसात कोई रूकावट बन पाती है, हाँ ग्रुप साथ होने से बार-बार रुकना भी पड़ा। पहले दिन हरिद्वार में ही सप्तऋषि घाट , भारत माता मंदिर,वैष्णव माता मंदिर,


शांति कुंज आश्रम, इंडियन टैम्पल, दक्ष मंदिर, सती घाट आदि दर्शनीय स्थल देखने के बाद गंगा जी की भव्य आरती का लुत्फ़ उठाया गया। ऎसा मनोरम दृश्य देखने के लिये गंगा घाट पर इतनी भीड़ थी कि पैर रखने की जगह भी नहीं मिल पा रही थी। आरती के बाद सब लोग बाजार घूमने निकल गये और अंत में रात का भोजन कर सो गये।
दूसरे दिन की सुबह फिर गंगा घाट पर नहाने पहुंच गये, और उसके बाद मनसा माता के दर्शन के लिये लम्बी कतार में लग गये|

उड़न खटोले के लिये भी कतार थी, बाहर से यह कतार जितनी अनुशासन में लग रही थी, भीतर जाते ही गाय-भैंसों का रेला सा बन गई थी, न बच्चों का ख्याल था न बूढ़ों का, धक्का-मुक्की के बीच माता का चेहरा दूर तक नजर नहीं आ रहा था, हाँ द्वार पर एक पंडित प्रसाद चढ़ाने के साथ हर भक्त की पीठ पर एक थाप जरूर लगाता जा रहा था। देखकर बहुत ही अज़ीब लगा जब वह उसी तेज़ी से किसी बुजुर्ग की पीठ पर भी थाप लगा देता था, मै जल्दी ही वहाँ से निकल जाना चाहती थी। जल्दी ही हम ऋषिकेश के लिये रवाना हो गये।
 
यूँ तो ऋषिकेश का रास्ता सीधा सा है लेकिन हमने चीला जंगल से जाने का प्लॉन बनाया, करीब बीस मिनिट में हम राजाजी नेशनल पार्क पहुंच गये, कुछ फोटो ग्राफ़ी भी की...इसके बाद चीला डैम ऋषिकेश मार्ग द्वारा ही आगे बढ चले, यूँ तो यह मार्ग दूसरे मार्ग से ज्यादा दूरी तय करता है लेकिन खूबसूरत नजारों को देखते हुये और साथ बहती गंगा नदी को देखते हुये दिल करता था ये दूरी खत्म ही न हो और ये मनोरम दृश्य आँखों से ओँझल न हो जायें...  आधे घंटे के अन्दर-अन्दर ही हम चीला डैम पहुंच गये,और वहाँ से पहुंचे लक्ष्मण झूला, जिसे पार करते ही  नजर आया फोर्टीन फ्लोरी टैम्पल जिसे त्रियम्बकेश्वर मन्दिर भी कहते हैं यहीं पर त्रिवेणी घाट भी है, लक्षमण झूला से आगे बढे तो परमार्थ आश्रम पहुंच गये, जिसे देख कर वहाँ से लौटने का मन ही नही कर रहा था, लेकिन पटना वॉटर फ़ाल को जानने की उत्सुकता इतनी थी कि जल्दी से वहाँ पहुंच जाना चाहते थे।
नीलकंठ मार्ग से होते हुये हम पटना गाँव की ओर चले, तब तक शाम हो चली थी, पटना वॉटर फ़ॉल की दुर्गम चढ़ाई थी जो लगभग दो किलोमीटर थी, चिकने पत्थर बार-बार रेत से फ़िसलता पैर यूँ लगता था कि हमें लौट जाना चाहिये, लेकिन एक मन जो हार नहीं मान रहा था, आखिरकार हम चढते चले गये, सड़क से झरने की दूरी तकरीबन 1.5 किलोमीटर थी, ऊपर पहुंचकर जो दृश्य देखा तो देखते ही रह गये, झरने के पानी में नहाते-नहाते समय कैसे बीता खयाल ही नहीं रहा, अचानक कुछ-कुछ अँधेरा होने की आशंका हुई और ग्रुप के लोगों ने वापसी के लिये चलना शुरू किया, अंत में मै और मेरे कुछ सहयोगी ही बचे थे, अंधेरा पूरे चरम पर था, कारण की वो अमावस्या की रात थी, हमने अपने-अपने मोबाइल की टॉर्च जलाई और एक दूसरे को आवाज लगाते हुये उतरने लगे, उतरते हुये अहसास हुआ कि पहाड़ से उतरना अधिक जोखिम का कार्य है, कई बार पत्थर चुभे, पाँव फ़िसला, एक तरफ़ खाई तो दूसरी तरफ़ पत्थरों पर जमी काई, ऎसे दुर्गम स्थान से होते हुये, भोले शंकर को पुकारते-पुकारते हमने पटना वॉटर फ़ॉल का ट्रैक पार कर ही लिया।

अब दिल्ली की ओर रवानगी शुरू हुई तो रात ग्यारह बजे के लगभग खाना खाने हम एक होटल पर रुके, और आँख जब खुली तो हमारी गाड़ी दिल्ली की सड़क पर दौड़ रही थी।
मुझे लगता है मेरा हाल पढ़कर आप भी जाना चाहेंगे हम घुमक्कडियों के साथ तो सबसे पहले चलने का हौसला पैदा करें और निकल लें,... हरिद्वार ऋषिकेश सिर्फ़ धार्मिक स्थल ही नही है एक रोमाचंक पर्यटक स्थल है जहाँ बार-बार जाने का मन करेगा।
सुनीता शानू

Monday, August 15, 2016

वीर सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी





कलम की ताकत कभी तलवार से कम नहीं रही है, आज हम बात कर रहे हैं गणेश शंकर विद्यार्थी की, जिन्होनें अपनी कलम की ताकत से अंग्रेज़ी शासन की नींव हिला दी थी।

26 अक्टूबर 1890 तीर्थराज प्रयाग में जन्में गणेशशंकर विद्यार्थी बचपन से ही राष्ट्रभक्त थे, पिता से हिंदी पढ़ते-पढ़ते उन्हें हिंदी से बेहद लगाव हो गया था, उनका मानना था कि आज़ादी की इस जंग में हिंदी का सारे राष्ट्र की भाषा होना भी जरूरी है।

इन्होनें सरस्वती,कर्मयोगी,स्वराज्य,अभ्युदय, तथा प्रभा अखबारों में कलम से क्रान्ति लाने की कोशिश की।
9 नवम्बर 1913 में प्रताप नामक समाचार पत्र का प्रकाशन किया, जिसमें उन्होनें साफ़ लिख दिया कि वह इसमें राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिये, अपने हक व अधिकार के लिये संघर्ष करेंगे। जिसे पढ़कर अंग्रेज़ो ने इन्हें ज़ेल भेज दिया और प्रताप का प्रकाशन भी बंद करवा दिया।

लेकिन गणेश शंकर विद्यार्थी ने लोगों की मदद से प्रकाशन फ़िर से शुरू किया, और अंग्रेज़ों के खिलाफ़ खुलकर जंग छेड़ दी। यही प्रताप आजादी की लड़ाई का मुख्य-पत्र साबित हुआ।

गणेश शकंर विद्यार्थी ने प्रताप के माध्यम से ही भगत सिंह आज़ाद के कारनामें, रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा, गाँधी जी के सत्याग्रह व सभी क्रांतिकारियों के विचारों को लोगों तक पहुंचाया।

जलियावाला प्रकरण कोई भी अखबार नही लिख पा रहा था लेकिन इन्होनें बेखौफ़ अंग्रेज़ों की निर्दयता के खिलाफ़ कलम उठाई। इनकी इस बेबाकी ने कई बार जेल की हवा भी खिलवा दी। लेकिन इनका विरोध करना खत्म नहीं हुआ।


23 मार्च जब भगत सिंह को फ़ाँसी दी गई, चारों तरफ़ दंगे छिड़ गये, उसी दौरान सैंकड़ों हिंदू-मुसलमानों को बचाते हुये 25 मार्च 1931 को यह कलमवीर साम्प्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ गया।

सरदार वल्लभ भाई पटेल को हमारा कोटि-कोटि प्रणाम



आज हम उस लौह पुरूष की बात कर रहे हैं जो राष्ट्रीय एकता के अद्भुत शिल्पी थे, जिनके ह्रुदय में भारत बसता था,जो किसान की आत्मा कहे जाते थे... जी हाँ ऎसे थे स्वतंत्र भारत के पहले उप प्रधानमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल । इनका जन्म 31 अक्टूबर सन 1875 में गुजरात में हुआ था।

स्वतंत्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला योगदान ’खेड़ा संघर्ष’ था, जब गुजरात भयंकर सूखे की चपेट में आ गया था, तब उन्होनें किसानों के नेतृत्व में अंग्रेज़ सरकार से कर में राहत की मांग की थी, एक वकील के रूप में सरदार पटेल ने कमज़ोर मुक़दमे को सटीकता से प्रस्तुत करते हुये पुलिस के गवाहों तथा अंग्रेज़ न्यायाधीशों को चुनौती देकर विशेष स्थान अर्जित किया था।

सरदार वल्लभ भाई पटेल को 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान तीन महीने की जेल भी हुई। उन्होनें राष्ट्रीय आंदोलन में भाग  लेकर भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद क़रीब पाँच सौ से भी ज़्यादा देसी रियासतों का एकीकरण एक सबसे बड़ी समस्या थी। कुशल कूटनीति और जरूरत पड़ने पर सैन्य हस्तक्षेप के जरिए सरदार पटेल ने अधिकांश रियासतों को तिरंगे के तले लाने में सफलता प्राप्त की। उनकी इसी नीतिगत दृढ़ता के लिए ही महात्मा गाँधी  ने उन्हें 'सरदार' और 'लौह पुरुष' की उपाधि दी थी।

सरदार पटेल के ऎतिहासिक कार्यों में सोमनाथ मंदिर का पुनः निर्माण, गाँधी स्मारक निधि की स्थापना और कमला नेहरू अस्पताल की रूपरेखा आदि कार्य सदैव स्मरण किये जाते रहेंगे।

सरदार पटेल को मरणोपरांत वर्ष 1991 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया।
उस अदम्य साहस के धनी, देशप्रेमी को हम सदैव याद करते रहेंगें।
 जय-हिंद।

वीर सेनानी मंगल पांडे



आज हम जिन्हें याद कर रहे हैं उन वीर सेनानी को 1857 की क्रांति का पहला शहीद सिपाही कहा जाता है। भारत की आज़ादी की पहली लड़ाई छेड़ने वाला ये वीर बहादुर सिपाही कोई और नहीं शहीद मंगल पांडे के नाम से जाना जाता है। इनका जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गाँव में हुआ था।

जब अंग्रेजो ने गाय और सूअर की चर्बी से बने कारतूस देकर हिंदू और मुसलमान दोनों का धर्म भ्रष्ट करना चाहा। तब मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में विद्रोह की ज्वाला जगाई। उन्होनें अपने सैनिकों को अंग्रेज़ हुकुमत के खिलाफ़ ऎसे ललकारा कि उनमें अंग्रेजो के प्रति विद्रोह उत्पन्न हो गया। जैसे ही अंग्रेजों को इस विद्रोह का पता लगा उन्होनें मंगल पांडे की गिरफ़्तारी का हुक्म दे दिया।

29 मार्च 1857 का वह दिन सचमुच अंग्रेजो के दुर्भाग्य का दिन था, जब मंगल पांडे की बंदूक से निकली गोली ने सार्जेंट-मेजर जेम्स थार्नटन ह्यूसन और लेफ़्टिनेंट-अडजुटेंट बेंम्पडे हेनरी वाग को खत्म कर अंग्रेज़ी हुकुमत को हिलाकर रख दिया था। एक तीस वर्षीय जां बाज़ से अंग्रेज़ इस कदर घबरा गये की उन्हें सेना बुलवानी पड़ी।

अंगेज़ी सेना ने घेराबंदी कर मंगल पांडे को गिरफ़्तार कर लिया और उन पर कोर्ट मार्शल का आदेश दे दिया गया। 8 मार्च 1857 को कोलकाता से चार जल्लाद बुलवाकर उन्हें फ़ाँसी दे दी गई। मंगल पांडे की कुर्बानी ने बैरकपुर छावनी ही नहीं सम्पूर्ण भारतवर्ष में आज़ादी का बिगुल बजा दिया।
जय हिंद



Tuesday, August 2, 2016

ज्ञान जी को एक पत्र


आज ज्ञान चतुर्वेदी जी का जन्म-दिन है, उनके जन्म-दिवस पर सब कुछ न कुछ उपहार स्वरूप लिख रहे हैं, मैने बस उन्हें एक पत्र लिखा है... आजकल खुले पत्र का रिवाज़ सा बन गया है, छुप-छुप कर लिखे जाने वाले प्रेम पत्र ही पत्रिकाओं में छपने लग गये हैं तो यह बहुत साधारण सी बात है कि मैने ज्ञान भाई जी को क्या लिखा है आप भी पढ़ियेगा


02-08-2016
आदरणीय ज्ञान चतुर्वेदी जीसादर-प्रणाम।

सबसे पहले जन्म-दिवस पर आपको ढेर सारी शुभकामनायेंआपकी कलम निरंतर चलती रहे और समाज की कुरूतियों पर प्रहार करती रहे। हम आपको पढ़ते रहें और आपका अनुकरण करते रहें।

आपके जन्म दिन पर सभी कुछ लिख रहे हैंमै खुद को इस योग्य नहीं समझती कि आप पर कुछ लिख पाऊँबस इसीलिये पत्र के माध्यम से कुछ बातें करना चाहूंगी। यूं तो कई बार मुलाकात हुई आपसे लेकिन बहुत अधिक बात कभी नहीं हो पाई। आपके बारे में मुझे सबसे पहले तब पता चला था जब 2008 में मेरा पहला व्यंग्य सबसे सुखी गरीब” अमर उजाला में छपा था। उस वक्त मुझे मेरे प्रिय मित्र ने कहा था यदि बहुत अच्छा लिखना चाहती हो तो परसाई जीशरद जीऔर ज्ञान चतुर्वेदी जी को पढ़ो... इन तीन नामों के अतिरिक्त मै किसी को जानती नहीं थी। इसके बाद शुरू हुआ वो दौर जब मैने इन तीनों को पढ़ना शुरू कियालगातार लिखाऔर सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपा भी,लेकिन दिल पर एक छवि उकेरी गई थीज्ञान चतुर्वेदी जी से एक बार मिलना जरूर है।

फिर वक्त ने एक मौका दिया जब मेरी पुस्तक फिर आया मौसम चुनाव का” प्रभात प्रकाशन से आई,दिल ने कहा कि ज्ञान भाई जी का आशीर्वाद मिल जाये बस और क्या चाहियेबहुत उम्मीद के साथ आपको फोन कियाउधर से आपकी आवाज आईऔर मेरी जुबान तालु से चिपक गईजैसे-तैसे आपसे आग्रह किया कि मेरी पुस्तक को आपका आशीर्वाद चाहिये... आपने बहुत ही विनम्रता से कहा कि मुझे खुशी होती लिखकरलेकिन बेटे की शादी के चक्कर में फ़ंसा हुआ हूँ... दिल तो टूट गया थालेकिन आपकी शुभकामनायें और विनम्रता के सामने आज भी नतमस्तक हूँ...

सच कहूं तो हम बच्चों को आपसे एक नई ऊर्जा मिलती हैजबलपुर से एक मित्र ने आपका वक्तव्य रिकार्ड करके भेजासुनकर ऎसा लगा कि हाँ इसी टॉनिक की तो हमें जरूरत थीमेरी कलम को आपने एक दिशा दिखाई और वह अलग हट कर चलने लगी।

हाँ एक बात और आपको ज्ञान भाई जी कहना मुझे बहुत पसंद हैकुछ मित्रों ने कहा कि यह क्या भाई-भाई लिख देती होलेकिन आपको भाई लिखते हुये... सचमुच के भाई की सी फ़िलिंग आती है,आप माने या न माने कुछ व्यंग्यकारों की टेड़ी चाल को सीधी करने के लिये व्यंग्य क्षेत्र में भी एक भाई की जरूरत है J

हाँ सपाटबयानी को लेकर मुझे भी संशय थालेकिन व्यंग्योदय में छपे आपके आलेख सपाटबयानी व्यंग्य की बड़बड़ाहट है” ने सारे सारे संशय मिटा दिये...

कुछ लोग जो अच्छे हैं अच्छे ही लगते हैंउन्हें किसी तमगे की जरूरत नहीं है... आपकी यह अच्छाई हमेशा कायम रहे। बस एक इच्छा है आपसे कुछ देर लम्बी बातचीत करना चाहती हूँ। जो भी प्रश्न करने हैं बस आपके समक्ष ही करूंगी... वक्त आने पर। शायद अभी वक्त नहीं आया है।

सादर

सुनीता शानू
http://samvedan-sparsh.blogspot.in/2016/08/3.html?spref=fb शुक्रिया राहुल भैया मेरे पत्र को अपने ब्लॉग पर स्थान देने के लिये...