Tuesday, August 22, 2017

हरिद्वार ऋषिकेश यात्रा एक एड्वेंचर...





सबसे पहली बात तो यही आश्चर्य करती है कि हरिद्वार, ऋषिकेश जैसे तीर्थ स्थल पर एडवेंचर्स जैसा क्या होगा, जब भी किसी से पूछा था कि तुम चलोगे बस एक ही जवाब मिला, हमारी उम्र नहीं है जी हरिद्वार जाने की, या हमें तो मरने के बाद हमारे बच्चे ले जायेंगे और गंगा में बहा आयेंगें... बहरहाल जो लोग चलने को तैयार हुये उनमें मेरे ऑफ़िस के बच्चे भी थे, कुल मिलाकर हम सत्रह लोगों का ग्रुप लेकर निकल पड़े हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा पर... यात्रा शुरू हुई सरायरोहिल्ला से, गाड़ी के  आने से पहले ही घुमक्कड़ी एकत्र होने लग गये, कुछ ही देर में पूरा ग्रुप एक जगह एकत्र हो गया, रात दस बजे टेम्पो ट्रेवलर के द्वारा हम सबने यात्रा प्रारम्भ कर दी।
सुबह के पाँच बजे होटल पहुंच कर सामान रखा और निकल पड़े गंगा स्नान के लिये... गंगा का पानी एकदम रेतीला हो गया था, लेकिन स्नान करने का लोभ कुछ भी नही देख पाया, और सब कूद गये हर-हर गंगे का जयघोष करते हुये, गंगा स्नान ने सफ़र की सारी थकान खत्म कर दी थी, हल्की-हल्की बूँदा-बाँदी में ही हमने घूमने का प्लॉन बना डाला, मुझे नहीं लगता कि घुमक्कड़ियों के लिये बरसात कोई रूकावट बन पाती है, हाँ ग्रुप साथ होने से बार-बार रुकना भी पड़ा। पहले दिन हरिद्वार में ही सप्तऋषि घाट , भारत माता मंदिर,वैष्णव माता मंदिर,


शांति कुंज आश्रम, इंडियन टैम्पल, दक्ष मंदिर, सती घाट आदि दर्शनीय स्थल देखने के बाद गंगा जी की भव्य आरती का लुत्फ़ उठाया गया। ऎसा मनोरम दृश्य देखने के लिये गंगा घाट पर इतनी भीड़ थी कि पैर रखने की जगह भी नहीं मिल पा रही थी। आरती के बाद सब लोग बाजार घूमने निकल गये और अंत में रात का भोजन कर सो गये।
दूसरे दिन की सुबह फिर गंगा घाट पर नहाने पहुंच गये, और उसके बाद मनसा माता के दर्शन के लिये लम्बी कतार में लग गये|

उड़न खटोले के लिये भी कतार थी, बाहर से यह कतार जितनी अनुशासन में लग रही थी, भीतर जाते ही गाय-भैंसों का रेला सा बन गई थी, न बच्चों का ख्याल था न बूढ़ों का, धक्का-मुक्की के बीच माता का चेहरा दूर तक नजर नहीं आ रहा था, हाँ द्वार पर एक पंडित प्रसाद चढ़ाने के साथ हर भक्त की पीठ पर एक थाप जरूर लगाता जा रहा था। देखकर बहुत ही अज़ीब लगा जब वह उसी तेज़ी से किसी बुजुर्ग की पीठ पर भी थाप लगा देता था, मै जल्दी ही वहाँ से निकल जाना चाहती थी। जल्दी ही हम ऋषिकेश के लिये रवाना हो गये।
 
यूँ तो ऋषिकेश का रास्ता सीधा सा है लेकिन हमने चीला जंगल से जाने का प्लॉन बनाया, करीब बीस मिनिट में हम राजाजी नेशनल पार्क पहुंच गये, कुछ फोटो ग्राफ़ी भी की...इसके बाद चीला डैम ऋषिकेश मार्ग द्वारा ही आगे बढ चले, यूँ तो यह मार्ग दूसरे मार्ग से ज्यादा दूरी तय करता है लेकिन खूबसूरत नजारों को देखते हुये और साथ बहती गंगा नदी को देखते हुये दिल करता था ये दूरी खत्म ही न हो और ये मनोरम दृश्य आँखों से ओँझल न हो जायें...  आधे घंटे के अन्दर-अन्दर ही हम चीला डैम पहुंच गये,और वहाँ से पहुंचे लक्ष्मण झूला, जिसे पार करते ही  नजर आया फोर्टीन फ्लोरी टैम्पल जिसे त्रियम्बकेश्वर मन्दिर भी कहते हैं यहीं पर त्रिवेणी घाट भी है, लक्षमण झूला से आगे बढे तो परमार्थ आश्रम पहुंच गये, जिसे देख कर वहाँ से लौटने का मन ही नही कर रहा था, लेकिन पटना वॉटर फ़ाल को जानने की उत्सुकता इतनी थी कि जल्दी से वहाँ पहुंच जाना चाहते थे।
नीलकंठ मार्ग से होते हुये हम पटना गाँव की ओर चले, तब तक शाम हो चली थी, पटना वॉटर फ़ॉल की दुर्गम चढ़ाई थी जो लगभग दो किलोमीटर थी, चिकने पत्थर बार-बार रेत से फ़िसलता पैर यूँ लगता था कि हमें लौट जाना चाहिये, लेकिन एक मन जो हार नहीं मान रहा था, आखिरकार हम चढते चले गये, सड़क से झरने की दूरी तकरीबन 1.5 किलोमीटर थी, ऊपर पहुंचकर जो दृश्य देखा तो देखते ही रह गये, झरने के पानी में नहाते-नहाते समय कैसे बीता खयाल ही नहीं रहा, अचानक कुछ-कुछ अँधेरा होने की आशंका हुई और ग्रुप के लोगों ने वापसी के लिये चलना शुरू किया, अंत में मै और मेरे कुछ सहयोगी ही बचे थे, अंधेरा पूरे चरम पर था, कारण की वो अमावस्या की रात थी, हमने अपने-अपने मोबाइल की टॉर्च जलाई और एक दूसरे को आवाज लगाते हुये उतरने लगे, उतरते हुये अहसास हुआ कि पहाड़ से उतरना अधिक जोखिम का कार्य है, कई बार पत्थर चुभे, पाँव फ़िसला, एक तरफ़ खाई तो दूसरी तरफ़ पत्थरों पर जमी काई, ऎसे दुर्गम स्थान से होते हुये, भोले शंकर को पुकारते-पुकारते हमने पटना वॉटर फ़ॉल का ट्रैक पार कर ही लिया।

अब दिल्ली की ओर रवानगी शुरू हुई तो रात ग्यारह बजे के लगभग खाना खाने हम एक होटल पर रुके, और आँख जब खुली तो हमारी गाड़ी दिल्ली की सड़क पर दौड़ रही थी।
मुझे लगता है मेरा हाल पढ़कर आप भी जाना चाहेंगे हम घुमक्कडियों के साथ तो सबसे पहले चलने का हौसला पैदा करें और निकल लें,... हरिद्वार ऋषिकेश सिर्फ़ धार्मिक स्थल ही नही है एक रोमाचंक पर्यटक स्थल है जहाँ बार-बार जाने का मन करेगा।
सुनीता शानू

Monday, August 15, 2016

वीर सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी





कलम की ताकत कभी तलवार से कम नहीं रही है, आज हम बात कर रहे हैं गणेश शंकर विद्यार्थी की, जिन्होनें अपनी कलम की ताकत से अंग्रेज़ी शासन की नींव हिला दी थी।

26 अक्टूबर 1890 तीर्थराज प्रयाग में जन्में गणेशशंकर विद्यार्थी बचपन से ही राष्ट्रभक्त थे, पिता से हिंदी पढ़ते-पढ़ते उन्हें हिंदी से बेहद लगाव हो गया था, उनका मानना था कि आज़ादी की इस जंग में हिंदी का सारे राष्ट्र की भाषा होना भी जरूरी है।

इन्होनें सरस्वती,कर्मयोगी,स्वराज्य,अभ्युदय, तथा प्रभा अखबारों में कलम से क्रान्ति लाने की कोशिश की।
9 नवम्बर 1913 में प्रताप नामक समाचार पत्र का प्रकाशन किया, जिसमें उन्होनें साफ़ लिख दिया कि वह इसमें राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिये, अपने हक व अधिकार के लिये संघर्ष करेंगे। जिसे पढ़कर अंग्रेज़ो ने इन्हें ज़ेल भेज दिया और प्रताप का प्रकाशन भी बंद करवा दिया।

लेकिन गणेश शंकर विद्यार्थी ने लोगों की मदद से प्रकाशन फ़िर से शुरू किया, और अंग्रेज़ों के खिलाफ़ खुलकर जंग छेड़ दी। यही प्रताप आजादी की लड़ाई का मुख्य-पत्र साबित हुआ।

गणेश शकंर विद्यार्थी ने प्रताप के माध्यम से ही भगत सिंह आज़ाद के कारनामें, रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा, गाँधी जी के सत्याग्रह व सभी क्रांतिकारियों के विचारों को लोगों तक पहुंचाया।

जलियावाला प्रकरण कोई भी अखबार नही लिख पा रहा था लेकिन इन्होनें बेखौफ़ अंग्रेज़ों की निर्दयता के खिलाफ़ कलम उठाई। इनकी इस बेबाकी ने कई बार जेल की हवा भी खिलवा दी। लेकिन इनका विरोध करना खत्म नहीं हुआ।


23 मार्च जब भगत सिंह को फ़ाँसी दी गई, चारों तरफ़ दंगे छिड़ गये, उसी दौरान सैंकड़ों हिंदू-मुसलमानों को बचाते हुये 25 मार्च 1931 को यह कलमवीर साम्प्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ गया।

सरदार वल्लभ भाई पटेल को हमारा कोटि-कोटि प्रणाम



आज हम उस लौह पुरूष की बात कर रहे हैं जो राष्ट्रीय एकता के अद्भुत शिल्पी थे, जिनके ह्रुदय में भारत बसता था,जो किसान की आत्मा कहे जाते थे... जी हाँ ऎसे थे स्वतंत्र भारत के पहले उप प्रधानमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल । इनका जन्म 31 अक्टूबर सन 1875 में गुजरात में हुआ था।

स्वतंत्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला योगदान ’खेड़ा संघर्ष’ था, जब गुजरात भयंकर सूखे की चपेट में आ गया था, तब उन्होनें किसानों के नेतृत्व में अंग्रेज़ सरकार से कर में राहत की मांग की थी, एक वकील के रूप में सरदार पटेल ने कमज़ोर मुक़दमे को सटीकता से प्रस्तुत करते हुये पुलिस के गवाहों तथा अंग्रेज़ न्यायाधीशों को चुनौती देकर विशेष स्थान अर्जित किया था।

सरदार वल्लभ भाई पटेल को 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान तीन महीने की जेल भी हुई। उन्होनें राष्ट्रीय आंदोलन में भाग  लेकर भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद क़रीब पाँच सौ से भी ज़्यादा देसी रियासतों का एकीकरण एक सबसे बड़ी समस्या थी। कुशल कूटनीति और जरूरत पड़ने पर सैन्य हस्तक्षेप के जरिए सरदार पटेल ने अधिकांश रियासतों को तिरंगे के तले लाने में सफलता प्राप्त की। उनकी इसी नीतिगत दृढ़ता के लिए ही महात्मा गाँधी  ने उन्हें 'सरदार' और 'लौह पुरुष' की उपाधि दी थी।

सरदार पटेल के ऎतिहासिक कार्यों में सोमनाथ मंदिर का पुनः निर्माण, गाँधी स्मारक निधि की स्थापना और कमला नेहरू अस्पताल की रूपरेखा आदि कार्य सदैव स्मरण किये जाते रहेंगे।

सरदार पटेल को मरणोपरांत वर्ष 1991 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया।
उस अदम्य साहस के धनी, देशप्रेमी को हम सदैव याद करते रहेंगें।
 जय-हिंद।

वीर सेनानी मंगल पांडे



आज हम जिन्हें याद कर रहे हैं उन वीर सेनानी को 1857 की क्रांति का पहला शहीद सिपाही कहा जाता है। भारत की आज़ादी की पहली लड़ाई छेड़ने वाला ये वीर बहादुर सिपाही कोई और नहीं शहीद मंगल पांडे के नाम से जाना जाता है। इनका जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गाँव में हुआ था।

जब अंग्रेजो ने गाय और सूअर की चर्बी से बने कारतूस देकर हिंदू और मुसलमान दोनों का धर्म भ्रष्ट करना चाहा। तब मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में विद्रोह की ज्वाला जगाई। उन्होनें अपने सैनिकों को अंग्रेज़ हुकुमत के खिलाफ़ ऎसे ललकारा कि उनमें अंग्रेजो के प्रति विद्रोह उत्पन्न हो गया। जैसे ही अंग्रेजों को इस विद्रोह का पता लगा उन्होनें मंगल पांडे की गिरफ़्तारी का हुक्म दे दिया।

29 मार्च 1857 का वह दिन सचमुच अंग्रेजो के दुर्भाग्य का दिन था, जब मंगल पांडे की बंदूक से निकली गोली ने सार्जेंट-मेजर जेम्स थार्नटन ह्यूसन और लेफ़्टिनेंट-अडजुटेंट बेंम्पडे हेनरी वाग को खत्म कर अंग्रेज़ी हुकुमत को हिलाकर रख दिया था। एक तीस वर्षीय जां बाज़ से अंग्रेज़ इस कदर घबरा गये की उन्हें सेना बुलवानी पड़ी।

अंगेज़ी सेना ने घेराबंदी कर मंगल पांडे को गिरफ़्तार कर लिया और उन पर कोर्ट मार्शल का आदेश दे दिया गया। 8 मार्च 1857 को कोलकाता से चार जल्लाद बुलवाकर उन्हें फ़ाँसी दे दी गई। मंगल पांडे की कुर्बानी ने बैरकपुर छावनी ही नहीं सम्पूर्ण भारतवर्ष में आज़ादी का बिगुल बजा दिया।
जय हिंद



Tuesday, August 2, 2016

ज्ञान जी को एक पत्र


आज ज्ञान चतुर्वेदी जी का जन्म-दिन है, उनके जन्म-दिवस पर सब कुछ न कुछ उपहार स्वरूप लिख रहे हैं, मैने बस उन्हें एक पत्र लिखा है... आजकल खुले पत्र का रिवाज़ सा बन गया है, छुप-छुप कर लिखे जाने वाले प्रेम पत्र ही पत्रिकाओं में छपने लग गये हैं तो यह बहुत साधारण सी बात है कि मैने ज्ञान भाई जी को क्या लिखा है आप भी पढ़ियेगा


02-08-2016
आदरणीय ज्ञान चतुर्वेदी जीसादर-प्रणाम।

सबसे पहले जन्म-दिवस पर आपको ढेर सारी शुभकामनायेंआपकी कलम निरंतर चलती रहे और समाज की कुरूतियों पर प्रहार करती रहे। हम आपको पढ़ते रहें और आपका अनुकरण करते रहें।

आपके जन्म दिन पर सभी कुछ लिख रहे हैंमै खुद को इस योग्य नहीं समझती कि आप पर कुछ लिख पाऊँबस इसीलिये पत्र के माध्यम से कुछ बातें करना चाहूंगी। यूं तो कई बार मुलाकात हुई आपसे लेकिन बहुत अधिक बात कभी नहीं हो पाई। आपके बारे में मुझे सबसे पहले तब पता चला था जब 2008 में मेरा पहला व्यंग्य सबसे सुखी गरीब” अमर उजाला में छपा था। उस वक्त मुझे मेरे प्रिय मित्र ने कहा था यदि बहुत अच्छा लिखना चाहती हो तो परसाई जीशरद जीऔर ज्ञान चतुर्वेदी जी को पढ़ो... इन तीन नामों के अतिरिक्त मै किसी को जानती नहीं थी। इसके बाद शुरू हुआ वो दौर जब मैने इन तीनों को पढ़ना शुरू कियालगातार लिखाऔर सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपा भी,लेकिन दिल पर एक छवि उकेरी गई थीज्ञान चतुर्वेदी जी से एक बार मिलना जरूर है।

फिर वक्त ने एक मौका दिया जब मेरी पुस्तक फिर आया मौसम चुनाव का” प्रभात प्रकाशन से आई,दिल ने कहा कि ज्ञान भाई जी का आशीर्वाद मिल जाये बस और क्या चाहियेबहुत उम्मीद के साथ आपको फोन कियाउधर से आपकी आवाज आईऔर मेरी जुबान तालु से चिपक गईजैसे-तैसे आपसे आग्रह किया कि मेरी पुस्तक को आपका आशीर्वाद चाहिये... आपने बहुत ही विनम्रता से कहा कि मुझे खुशी होती लिखकरलेकिन बेटे की शादी के चक्कर में फ़ंसा हुआ हूँ... दिल तो टूट गया थालेकिन आपकी शुभकामनायें और विनम्रता के सामने आज भी नतमस्तक हूँ...

सच कहूं तो हम बच्चों को आपसे एक नई ऊर्जा मिलती हैजबलपुर से एक मित्र ने आपका वक्तव्य रिकार्ड करके भेजासुनकर ऎसा लगा कि हाँ इसी टॉनिक की तो हमें जरूरत थीमेरी कलम को आपने एक दिशा दिखाई और वह अलग हट कर चलने लगी।

हाँ एक बात और आपको ज्ञान भाई जी कहना मुझे बहुत पसंद हैकुछ मित्रों ने कहा कि यह क्या भाई-भाई लिख देती होलेकिन आपको भाई लिखते हुये... सचमुच के भाई की सी फ़िलिंग आती है,आप माने या न माने कुछ व्यंग्यकारों की टेड़ी चाल को सीधी करने के लिये व्यंग्य क्षेत्र में भी एक भाई की जरूरत है J

हाँ सपाटबयानी को लेकर मुझे भी संशय थालेकिन व्यंग्योदय में छपे आपके आलेख सपाटबयानी व्यंग्य की बड़बड़ाहट है” ने सारे सारे संशय मिटा दिये...

कुछ लोग जो अच्छे हैं अच्छे ही लगते हैंउन्हें किसी तमगे की जरूरत नहीं है... आपकी यह अच्छाई हमेशा कायम रहे। बस एक इच्छा है आपसे कुछ देर लम्बी बातचीत करना चाहती हूँ। जो भी प्रश्न करने हैं बस आपके समक्ष ही करूंगी... वक्त आने पर। शायद अभी वक्त नहीं आया है।

सादर

सुनीता शानू
http://samvedan-sparsh.blogspot.in/2016/08/3.html?spref=fb शुक्रिया राहुल भैया मेरे पत्र को अपने ब्लॉग पर स्थान देने के लिये...

Thursday, July 7, 2016

साहित्य अमृत में प्रकशित-- पर उपदेश कुशल बहुतेरे


साहित्य अमृत के नये अंक में पढिये मेरा एक व्यंग्य... पर उपदेश कुशल बहुतेरे, 

नसीहतबाज़ कहें या पर-उपदेशक इन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता, आजकल ये सारे के सारे उपदेशानन्द व्हाट्स एप्प और फ़ेसबुक बाबा के घर बैठे नजर आते हैं, सुबह जैसे ही मोबाइल ओपन किया तपाक से एक नसीहत दे मारी, रात को भी इनकी बत्ती जलती ही रहती है, ये न सूरज़ निकलने का इंतजार करते हैं न ही डूबने का, बस अपनी नसीहतों की टोकरी लादकर बैठे दिखाई देते हैं, कभी-कभी लगता है शायद चैन से सो भी नहीं पाते होंगे कि कैसे जनमानस की दिनचर्या में घुसपैठ मचायें। सोने के बिस्तर से लेकर खाने की टेबल तक इनका प्रभुत्व रहता है। कुछ तो लम्बी-लम्बी नसीहत भरी पोस्ट ग्रुप बना कर या टैग करके ऎसे ठेलते हैं कि लगता है सत्संग के लिये भीड़ जुटा रहे हों। इनकी पोस्ट को सभी अनुयायी फ़ॉरवर्ड करते हुए ऎसे प्रतीत होते हैं जैसे उपदेश सुनते-सुनते, सुनने वाले भी उपदेशक बन जाते हैं, दवा बेचने वाले धीरे-धीरे झोला छाप डॉक्टर बन जाते है। और छोटी-छोटी टिप्पणी करते-करते महान व्यंग्यकार, कहानीकार बन जाते हैं।
एक समय था जब ये नसीहतबाज़ हर घर, गली, मुहल्ले, पान की दूकान पर, मंचों पर तथा टी वी चैनलों पर ही उपदेश देते दिखाई देते थे, लेकिन आज फ़ेसबुक और व्हाट्स एप्प के जरीये सिर पर सवार रहते हैं। 
इन सब बातों के इतर वो लोग भी हैं जो इंटेरनेट की दुनिया से जुड़े नहीं हैं, आजकल इनके चेहरे लुटे-पिटे से दिखाई देते हैं। इनके अंदर का विदूषक बहुत बेचैन है, बाहर आने को छटपटा रहा है, परेशानी बस इतनी सी है कि मुफ़्त में उपदेश कोई भी सुनना नहीं चाहता। या तो उपदेशक चाय-नाश्ते का इंतजाम करके भीड़ इकठ्ठी करे और अपनी भड़ांस निकाले या चुपचाप अपने ज्ञान की गंगा में आत्ममुग्ध हुआ पड़ा रहे। ये उपदेशक इमोशनल बहुत होते हैं, यदि कोई सुनना नहीं चाहता तो भैया उसकी मर्ज़ी है, लेकिन इनके दिल पर तो ऎसा घाव हो जाता है जैसे इस दुनिया में इनकी जरूरत नहीं या ये दुनिया ये महफ़िल इनके काम की ही नहीं। अब ये दुख की चादर ओढ़ दुनिया भर में कभी अपनी किस्मत को तो कभी उपदेश न सुनने वाले को कोसते फ़िरते हैं कि आजकल की औलादें तो भैया बड़ों की बातें सुनती ही नहीं है...वगैरह-वगैरह...
कभी-कभी उपदेशक को मुँह की खानी पड़ती है, जब लोग सीधा ही तमाचा जड़ देते हैं कि भैया नसीहत देने से पहले अपने गिरेबान में भी झाँक लिया करो। यह बात तो सारे उपदेशक जानते हैं कि उपदेश देना सबसे खतरनाक काम है, और तब जब कोई लेना ही नहीं चाहता हो, ऎसे में औरों को नसीहत खुद मियाँ फ़जीहत वाली बात हो जाती है, लेकिन जिसे भी उपदेश देने का भूत सवार हो जाता है, वो उपदेश दिये बिना रहता नही हैं, मान न मान मै तेरा मेहमान बन कर वह दूसरों की ज़िंदगी में ऎसे घुसपैठ मचा देता हैं जैसे कि इनसे बड़ा शुभचिंतक कोई दूसरा होगा ही नहीं, और जब कभी उपदेशक मियाँ को सुनने वाले सच्चे भक्त मिल जाते हैं तो अपने ज्ञान की गंगा में दो चार लोगों को डुबकी लगवा कर ही चैन से बैठ पाते हैं।
आप इन्हें समझाने की कोशिश भी करेंगे तो कहेंगे हम तो भैया वसुधैव कुटुम्बकम की भावना रखते हैं, हमारे पास जो कुछ है सब दूसरों का है, इतने त्यागवान उपदेशक देते भी हैं तो सिर्फ़ उपदेश...ये संख्या में असंख्य हैं, इनके रूप कई हैं, नेता, अभिनेता, साधु-संत, अध्यापक, दादी-नानी, ताई चाची, सच्चा हितैषी आपका पड़ौसी, ले देकर आपके चारों तरफ़ आठ दस उपदेशक तो हर वक्त मंडराते ही रहते हैं, जो आपके तन और मन को पकाने की पूरी कोशिश में लगे रहते हैं...
कुछ ऎसे भी हैं जिन्हें मालूम होता है किसका लड़का किसके साथ भाग गया है, कौन पढ़ाई में फ़ेल हो गया था, कौन बेंगन खरीद कर लाया लेकिन घर में गोभी पकी, कभी-कभी तो इनके दिमाग का कीड़ा इस कदर कुलबुलाता है कि ये अपने बच्चे के फ़ेल हो जाने का ठीकरा पड़ौसी के बच्चे के सिर पर फ़ोड़ देने से भी नहीं चूकते हैं। कुछ यहाँ तक कह देते हैं मै तो इसके पूरे खानदान को जानता हूँ सारे के सारे पढ़ने में चोर हैं, अब भला उसके बेटे के फ़ेल हो जाने का पड़ौस के खानदान से क्या ताल्लुक। इससे यह भी लगता है कि उपदेशक ज्योतिष विधा में भी पारंगत होता है। 
एक उपदेशक महोदय कहते हैं कि देखिये मै आपको अपने अनुभव की बात बताता हूँ आप माने या न माने आपकी मर्ज़ी, अरे भई जब मानने न मानने की शंका हो तो जरूरत ही क्या है बताने की, एक महाशय तो इतने परोपकारी निकले की कहने लगे, उपदेश देनें में मेरा क्या फ़ायदा है, आप समझें तो आपका ही भला होगा, एक चिल्लाते हुये से बोले,” देखिये मैने ये बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये हैं, जैसे की बाकी लोगों ने धूप में सफ़ेद किये होंगें। जैसे-तैसे हम जनाब के उपदेश सुन भी लेते हैं तो तुर्रा यह कि मेरा तो फ़र्ज़ था समझाना,तुम्हारी मर्ज़ी सुनो तो सुनो। सचमुच कुछ लोग तो पैदा ही उपदेशक के रूप में हुये थे, जब तक दूसरों को उपदेश न दे दें तब तक इनके पेट का खाना हजम ही नहीं होता। आज उपदेशक को उपदेश सुनाने के लिये बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। क्योंकि किसी के पास समय नही है उपदेश सुनने का, लोग मुफ़्त में कुछ लेना नही चाहते, मुफ़्त और सस्ती चीजों पर कोई विश्वास नही करता। बेचारे उपदेशक को चाय-नाश्ते का लालच देकर लोगों को बुलाना पड़ता है। इसके बाद भी आये हुए लोग उपदेश सुनायेंगे या खुद ही देकर चले जायेंगे कोई नहीं जानता।
कई बार उपदेशको को उल्टी मार खानी पड़ जाती है, मेरे मुहल्ले की झन्नो चाची ने जब सविता को कहा कि थोड़ा कम खाया कर, चावल खाना बंद कर दे तो सविता ने तुनक कर कहा, भैंस को अपना रूप रंग तो दिखता नहीं छाते को देख कर बिदकती है। अब छन्नों चाची को समझ आई दूसरों के फ़टे में टांग अड़ाने का नतीज़ा क्या होता है, सविता की माँ ने भी मुहल्ले भर में बदनाम कर दिया सौ अलग, ये मुह मैसूर की दाल, चली है मेरी बेटी को नसीहत देने, खुद तो पतली हो जाये।
आज उपदेशक ज्यादा हो गये हैं और सुनने वाले बहुत कम,क्योंकि बच्चे हर उपदेश को पहले तर्क के तराजू पर तौलने लगते हैं, सबसे गहरा और कटु सवाल तो यही होता है, जब बच्चों को पढ़ने की अच्छे नम्बर लागे की नसीहत दी जाती है, बच्चे पूछने लगते हैं,” अच्छा मम्मी ये बताओं पापा के कितने नम्बर आया करते थे? अगर कहीं गलती से मम्मी पापा की मार्कशीट उनके हाथ लग जाती तो उपदेश शुरू हो जाते, इतने कम नम्बर! अरे दादाजी कुछ नहीं कहते थे क्या,... ह्म्म्म आप कहना नहीं मानते होंगे।
एक बार नानी का घर आना हो गया, और बच्चों के पौ बारह, नानी बताओं मम्मी आपको कितना परेशान करती थी, नानी मम्मी सुबह उठती थी क्या? पढ़ती थी क्या ? हर सवाल ऎसा होता था जो उन्हें समझाई गई बातों को तर्क के तराजू पर तौलता परखता सा प्रतीत होता था। ताकि गलत साबित होने पर मम्मी के उपदेशों का खंडन किया जा सके। वैसे भी नानी घर आ जाये तो बच्चों को पूरा सपोर्ट मिल जाता है मम्मी की खींचाई करने का।
अक्सर हम बच्चों को बच्चा कहकर बड़ों की बातें सुनने की मनाई कर देते हैं, लेकिन कोई भी काम देते वक्त डाँट देते हैं कि इतने बड़े हो गये हो कर नही सकते, बच्चे परेशान हो जाते हैं कि वो किस गिनती मे है बड़े हैं कि छोटे? ऎसे में हमारी कहीं बातों पर उन्हें सदेंह बना रहता है। 
इंटेरनेट के हो जाने पर बच्चा-बच्चा उपदेशक बन गया है, कुछ भी कहने से पहले चार बार सोचना पड़ता है कि इन्हें कहा जाये या नहीं वरना खुद मियां फ़जीहत करवाओ... आज बच्चे भी यही कहते हैं प्लीज़ मम्मी अब उपदेश मत देने लग जाना, आपको उपदेश देने की बहुत आदत है, जरा-जरा सी बात का इश्यू बना लेते हो। यानि की माँ की सारी नसीहतें बच्चों के लिये एक बड़ी टंशन बन जाती है।
जैसे-तैसे बच्चों को दूध पीने की आदत डाली, हरी पत्तेदार सब्जियाँ कच्ची या पकी खाने को कहा, घर का खाना खाओ खूब पानी पियो, सुबह गार्डन में घूम कर आओ न जाने कितनी मुश्किल से समझा-समझा कर बचपन में ही बच्चों को स्वास्थ्य सम्बंधी उपदेश दे डाले,... लेकिन आज सब उल्टा हो गया जब डॉक्टर ने कहा दूध से बीमारियाँ होती है, न आप पीये न बच्चों को दें, आटा कम खायें, वातारण में प्रदूषण बहुत है कोशिश करें बचने की, गार्डन जाना बन्द करें आजकल पोलेन नामक बीमारी सबको हो गई है, आये दिन अखबारों में सब्जियों से होने वाली इतनी बीमारियां बता दी जा रही हैं कि सोचना पड़ रहा है बच्चों को कौनसी बात कहें ताकि वजनदार हो और उसके बाद उनके पास कोई तर्क न हो। अन्यथा तो उपदेश देना छोड़ कर आज की जनरेशन का अनुयायी ही बनना पड़ जायेगा कि बेटा जरा नेट पर देखकर बुजुर्गों का डाईट प्लान बता देना, और तब सातंवी क्लास का बच्चा बतायेगा, माँ ये खाओ ये नहीं, ऎसा करो ऎसा नहीं, और मुझे चुपचाप सुनना ही पड़ेगा, वरना उसे दो मिनिट नही लगेगी यह कहते हुए कि आप तो कुछ नहीं जानती, आपका जमाना चला गया है, अब बड़े बच्चों को मूर्ख नहीं बना सकते शेर आया, भूत आया कह कर डरा नहीं सकते क्योंकि उन्हें पता है शेर या तो जंगल में मिलेगा या चिडियाघर में। भूत-भविष्य-वर्तमान के उपदेशक अपने पास सारा लेखा जोखा रखते हैं, ये सुनना पसंद नहीं करते, क्योंकि इनकी तार्किक शक्ति गुगल रिसर्च में बस एक क्लिक की दूरी तक है। आपके हर सवाल का जवाब है इनके पास है। वैसे भी टी वी और इंटेरनेट ने तमाम उपदेशको को नाकों चने चबवा दिये हैं, किसी भी चैनल को खोल कर देखिये, ढेरों उपदेशक मिल जायेंगें, लेकिन सुनना कौन चाहता है उपदेशक दूसरे का उपदेश कभी सहन नहीं कर पाते, तभी तो किसी भी साधू संत को उपदेश देते देखकर दादी कहती, ये पाखंडी साधू हैं, बादाम का शर्बत पीते हैं और नीति उपदेश देते हैं, अब भला नीति उपदेश के साथ बादाम के शर्बत का क्या कुसूर? खैर घर-घर में कहानी घर-घर की चलती नजर आयेगी कोई भी उपदेश सुनता नजर नहीं आता। वैसे सच कहूं तो हम भी कहाँ सुनना चाहते थे? वो तो अम्मा जी लड्डू का लालच देकर अपनी भड़ास निकाल लिया करती थी और हम बस लड्डू के लालच में गोल-मोल हो जाते थे। 
कुछ समझदार टाइप के उपदेशको ने इंसान की नब्ज को पकड़ लिया है, और काऊंसलिंग की दूकान खोल कर बैठ गये हैं। अब तो उपदेशक के दोनों हाथों में लड्डू है, या यूं कहिये चारों उंगलियाँ घी में मुह शक्कर में क्योंकि अब उपदेशक प्रति घंटा मिनिट के हिसाब से मोटी-मोटी फ़ीस लेकर आपको नसीहत का पाठ पढ़ाते हैं, और आपको इनकी नसीहते ध्यान से सुननी पड़ती है, अमल में लानी भी पड़ती है। 
माँ भी यही कहती है कि पैसा खर्च करके उपदेश सुन आते हो हम मुफ़्त में बतायें तो भी दिक्कत। 
कल ही एक डॉक्टर से मैने भी काऊंसलिंग ली ज्यादा नहीं बस तीन हजार रूपये लगे, डॉक्टर ने कहा कि तनाव से दूर रहो, खाओं पियों, खुश रहो। घर आकर पति महोदय को बताया तो भड़क गये कि जो बात मै तुम्हें मुफ़्त में कहता रहता हूँ उसने तीन हज़ार लेकर कही तो समझ आ गई। 
तर्क के लिये कोई मुद्दा नहीं बचा था बस इतना ही कहा गया, जब तक चीज़ अटेस्टेड नहीं होती खरी नहीं मानी जाती, मुफ़्त में सलाह भी मत दिया कीजिये।... शायद अब उपदेशको को अपनी नसीहत की कीमत समझ आ जाये और वे मुफ़्त बाँटना बंद कर दें।
सुनीता शानू
 +Sunita Shanoo 

अँधेरे का मध्य बिंदु उपन्यास की समीक्षा

अँधेरे से उजाले की ओर ले जाती प्रेम-कहानी



"अँधेरे का मध्य बिंदु " वंदना गुप्ता का प्रथम उपन्यास है । इससे पहले उनकी पहचान एक कवयित्री और एक ब्लॉगर के रूप में ही थी...
सबसे पहली बात मेरे मन में जो आती है वह ये है कि जिस विषय पर हमारा समाज कभी बात करना पसंद नहीं करता, जिसे नई पीढी की उच्छंखलता, गैरजिम्मेदाराना हरकत, या पाश्चात्य समाज की नकल कह कर नक्कार दिया गया है, उसी विषय को उठाकर सामाजिक बेडियां तोड़ते हुए कलम चलना कोई मामूली बात नहीं है। शायद पाठक यह नहीं जानते कि लेखिका के मन में समाज में फैली बुराइयों के प्रति आक्रोश के बीज बहुत समय पहले से ही पनप चुके थे, जिन्हें वह अपनी कविताओं के माध्यम से कई बार समाज के सामने लेकर आई भी हैं, इसी समाज को, और सदियों से चले आ रहे वैवाहिक बंधनों को चुनौती देता यह उपन्यास वाकई काबिले तारीफ़ कहा जायेगा।
वन्दना गुप्ता के उपन्यास का नाम है, “अंधेरे का मध्य बिंदु” उपन्यास के प्रथम अध्याय में पाठक यह विचार लगातार करता है कि कहीं कुछ ऎसा मिले जिससे यह ज्ञात हो कि इसका नाम अँधेरे का मध्य बिंदु ही क्यों रखा गया है, तो सम्पूर्ण उपन्यास पढ़ने के उपरान्त ही आप भली-भांति इस बात से परीचित भी हो जायेंगें, कि सिर्फ़ विवाह के बंधन में बंध जाने से ही ज़िंदगी में उजाला नही आता, रिश्तों में दोहरापन, शक, और अभिमान ऎसे मुद्दे हैं जिनके रहते विवाह के बाद भी जीवन में अँधकार छाया रहता है, एक दूसरे के प्रति प्रेम,विश्वास और समर्पण द्वारा ही जीवन में खुशियाँ लाई जा सकती है तथा समाज में फैले अज्ञानता के अंधेरे को दूर करना ही इस उपन्यास का मकसद है...।
मै यह नहीं कहूँगी कि वन्दना का यह उपन्यास पूरी तरह से अपनी बात कह पाया है, या इसमें कोई कमी नहीं है, लेकिन यह अवश्य कहूँगी कि यह वन्दना गुप्ता का प्रथम उपन्यास है, इस नाते कुछ सामान्य गलतियों अथार्त दोहराव को नक्कारा जा सकता है, जैसे पूरे उपन्यास में एक शब्द “मानो” का प्रयोग अत्यधिक किया गया है, जिसे कम किया जा सकता है। इन छोटी-मोटी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते हुए हम कह सकते हैं कि वन्दना गुप्ता अपनी बात कहने में सफ़ल रही है। उपन्यास में निहित उनके तमाम विचार जनसाधारण को आकर्षित करते है। भाषा का फूहड़पन कहीं पर भी परिलक्षित नहीं होता है, न ही सपाट बयानी नजर आती है, वरन उपन्यास पढ़ते हुए वंदना गुप्ता की कल्पनाशक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है।
विवाह चाहे अरेंज हो या प्रेम विवाह दोनों में ही प्रेम, विश्वास, और स्वतंत्रता का होना जरूरी है, वन्दना उपन्यास के माध्यम से यह संदेश देना चाहती है कि कोई भी किसी दूसरे को जबरन रिश्तों में बाँधकर नहीं रख सकता, अगर रिश्तों में परस्पर प्रेम, विश्वास तथा स्वतंत्रता बनी रहेगी तो वह रिश्ता अधिक टिकाऊ होगा, और ज़िंदगी खुशी-खुशी जी जायेगी, वरना ज़िंदगी भर यही रोना चलता रहेगा कि विवाह करके गलती की, या प्रेम करके गलती की। उपन्यास में बहुत से उदाहरणों द्वारा वंदना ने लीव इन रिलेशन के हानिकारक परिमाणों की ओर इशारा किया है, जिन्हें पढ़कर लगता है कि वह सब सच्ची घटनायें है, इसके साथ ही कुछ ऎसे उदाहरण भी आपको पढ़ने को मिल जायेंगे जहाँ शादी-शुदा जोड़े एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते हुए जीवन जीने पर मज़बूर हैं... इन सभी बातों को रखते हुए वंदना की उपन्यास को रोचक बनाने की मेहनत साफ़ दिखाई दे रही है।
अंधेरे के मध्य बिंदु के नायक-नायिका विवाह जैसे बंधन में नहीं बँधना चाहते हैं वह चाहते हैं कि उनका रिश्ता एक दूसरे के प्रति प्रेम-समर्पण तथा विश्वास का रिश्ता हो, जिसमें कोई भी एक दूसरे से किसी प्रकार की अपेक्षाऎं न रखें वरन ज़िंदगी की जिम्मेदारियों को दोनों ही मिलकर उठायें। उपन्यास में नायक-नायिका के प्रेम-समर्पण-विश्वास को इतना अधिक दिखाया गया है कि पाठक जब स्वयं की ज़िंदगी से तुलना करने लगता है तो उसे यह सब महज़ एक कल्पना सी लगती है, क्योंकि पाठक अपने आप को नायक-नायिका की तरह नहीं देख पाता है, उसकी स्थिती “लोग क्या कहेंगे” में आकर अटक जाती है, इसी समस्या को एक सोशल वर्कर के रूप में शीना को दिखाते हुए लेखिका ने हल किया है, साथ की एड्स जैसे रोग को बड़ी सावधानी के साथ उपन्यास का एक महत्वपूर्ण अंश बनाते हुए कारण-निवारण तक समझा दिये हैं।
अंत में वंदना गुप्ता को उनके प्रथम उपन्यास पर मै शुभकामनायें देते हुए इतना ही कहना चाहूंगी कि उनकी कलम रूकनी नहीं चाहिये, साथ ही यह आशा करती हूँ कि वे जल्द ही पाठकों को एक और नया उपन्यास देगीं...

सुनीता शानू


Wednesday, May 25, 2016

मातॄ दिवस पर ...

प्यारी बेटी सुगंधा,

ढेर सारा प्यार एवं शुभाशीष

तुम जानती हो मेरे लिये तुम्हारा होना क्या मायने रखता है,  तुम्हारे होने से मै खुद को भरा-भरा महसूस करती हूँ, मुझे याद है जब तुम इस घर से विदा हुई थी कितना रोई थी, उस वक्त तुम्हारा रोना हम सबको कई हफ़्तों तक रुलाता रहा था, रातों को अचानक नींद खुल जाती थी... कहीं तुम अब भी रो तो नहीं रही हो, लेकिन ससुराल से लौट कर तुमने सास-ससुर, ननद और पति की इतनी बातें की कि तुम्हारी खुशी सारे घर की घबराहट को एक पल में भुला गई थी।
 सच कहूँ तो मै बहुत खुश हूँ तुमने ससुराल में सबके दिलों में अपना घर बना लिया है, तुम अपनी दुनिया में खुश हो, तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है, तुम्हारे लौटकर आने पर सारे घर में हंसी की लहर फैल गई थी, मै चाहती थी तुम कुछ दिन रुक जाओ, लेकिन तुमने कहा माँ मुझे जाना होगा, ससुर जी मेरे हाथ की ही चाय पीते हैं, सासु माँ मेरे बिना मंदिर नहीं जाती होगी, इनको तो यह भी नहीं मालूम कि इनकी जुराबे कहाँ रखी है? मै चुपचाप तुम्हारा चेहरा देख रही थी कि तुम कितनी जल्दी पिता की जरूरत को भूल गई कि वो तुम्हारे बिना एक कदम भी नहीं चल पाते हैं, मुझे भी खड़े रहने में दिक्कत होती है। तुम कितनी जल्दी भूल गई कि इस घर में तुमने उन्नीस साल बिताये थे, आज जल्दी जाने की जल्दी मची थी, लेकिन इसमें तुम्हारा कुसूर नहीं था, तुम्हारे जन्म के साथ ही यह निश्चित हो गया था कि एक दिन तुम हम सबको छोड़कर किसी और का घर बसाने चली जाओगी। मुझे याद है, मैने कहा था हम औरतों की ज़िंदगी में यही होता है, हमें अपने प्यार की खुशबू पूरे गुलशन में बिखेरनी होती है,
तुम्हें याद होगा कितना अच्छा लगता था जब तुम सब बहन भाई घर भर में हुड़दंग मचाया करते थे, और पूरे घर को अस्त-व्यस्त कर दिया करते थे। तुम्हें यह भी याद होगा जब तुमने अपनी गुड़ियों के लिये मेरी नई साड़ी के टुकडे-टुकड़े कर दिये थे, तब मैने तुम्हें बहुत डाँटा था, और तुमने खाना नही खाया था, बाद में अपने हाथ से मैने तुम्हे खाना खिलाया था। तुम्हारा हँसना-रोना, रूठना-मनाना बहुत याद आता है बेटी।
मै जानती हूँ तुम मेरा ही प्रतिबिम्ब हो, ज़िंदगी की हर मुश्किल का हँसते हुए सामना कर लोगी। बचपन में जब तुम नई-नई कवितायें-कहानियाँ सुनाकर इनाम जीत कर लाया करती थी, तुम्हारे चेहरे की खुशी देखते बनती थी, एक बार पन्ना धाँय के नाटक में तुमने माँ का अभिनय किया था, जिसे देखकर मै भी रो पड़ी थी, तुम किस कदर उस किरदार में खो गई थी, उसे देख कर लगता था, यह मात्र अभिनय नहीं था शायद तुम अपने भीतर उस किरदार को जी रही हो। तुम्हारा हर काम में डूब जाना ही तुम्हारी शक्ति था सुगंधा। 
मै यह भी जानती हूँ तुम बचपन से बहुत महत्वाकांक्षी रही हो, उस वक्त मै तुम्हारे पंखों को उड़ान नहीं दे पाई थी, लेकिन आज भी कुछ नहीं बिगड़ा है, मै चाहती हूँ, तुम अपने सपनों में नये रंग भरो। अपने परो को एक नई उड़ान दो, मेरी बेटी कुछ करने के लिये उम्र कभी बाधा नहीं बन सकती। तुम आज भी वह सब कर सकती हो, वह मुकाम हासिल कर सकती हो, जो कर नहीं पाई थी। 
तुम्हारे पिता और मैने तुम्हारे लिये बहुत सारे सपने देखे थे,,आज वक्त आ गया है, अपनी व्यस्तता में से अपने लिये वक्त निकाल कर अपने सपनों को आकार दो। तुम भी अपनी बेटी को मेरी बेटी जैसे संस्कार दो, ताकि उसे तुम्हारी बेटी होने का गर्व हो, माँ बनकर ही माँ की गरिमा को मै समझ पाई थी, ईश्वर से प्रार्थना है कि तुम्हारी बेटी तुम्हारा प्रतिबिम्ब नजर आये।

तुम्हारी माँ 

महानगरों में माँ बनने के मायने बदले

महानगरों में माँ बनने के मायने किस तरह बदल गये हैं, आप भी पढ़ कर अपनी राय अवश्य दें, नई दुनियां की नायिका पत्रिका में प्रकाशित एक आर्टिकल...।
मैट्रो में माँ बनने के मायने बदले
निदा फ़ाजली साहब का एक शेर है...
बाँट के अपना चेहरा, माथा, आँखें, जाने कहाँ गई
फ़टे पुराने एक एलबम में, चंचल लड़की जैसी माँ...
एक माँ की आँखों से देखती हूँ, तो लगता है कि माँ के भीतर छुपी वो चंचल लड़की जाग गई है, जिस उम्र में माँ ने बच्चों को जन्म दिया था, वह उम्र आज की लड़कियों के आसमान को छूने की है। आज लड़कियाँ अपने पैरों पर खड़ी हैं, लड़कियाँ ऊँचे-ऊँचे सपने देखती हैं, और उन सपनों में रंग भरने का जज्बा भी रखती हैं, आज लड़कियाँ यह बात अच्छे से जान गई हैं कि उनका काम विवाह करके सिर्फ़ बच्चे पैदा करना ही नहीं है, लड़कियाँ ही नहीं लड़के भी ऎसा ही जीवन साथी पसंद करते हैं, जो उनके साथ कदम से कदम मिला कर चले। उनके लिये विवाह करना और माता-पिता कहलाने से जरूरी ज़िंदगी को अच्छे से जीना है, आज जज्बात या संस्कारों की दुहाई देकर हम बच्चों के निर्णय को नहीं बदल सकते हैं...।
सेंट्रल एडॉप्शन रिसर्च अथॉरिटी( सी ए आर ए) की एक रिपोर्ट के मुताबिक पच्चास हजार बच्चे अनाथ हैं लेकिन एडॉप्शन ऎजेंसियों की लापरवाही से अथॉरिटी के पास कुल 1200 बच्चों का ही लेखाजोखा है जबकि नौ हजार भारतीय ऎसे हैं जिन्हें बच्चे गोद लेने हैं। 2015 में 1368 बच्चों को नया घर दिया गया है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गाँधी का कहना है कि कार्य प्रणाली में सुधार करके हर साल 15000 बच्चों को ऎडाप्ट किया जायेगा ताकी बच्चों का भविष्य सुदृड़ किया जा सके।
यह कहना भी गलत नहीं होगा कि आजकल की लड़कियाँ पढ़ी-लिखी और समझदार होती हैं, वे माँ बनने और बच्चों के भविष्य को लेकर हमेशा सावधान रहती हैं। एम्स की डॉ अर्चना धवन का भी यही मानना है कि आज जल्दी विवाह करने और जल्दी संतान पैदा होने की समस्या कम हो गई है क्योंकि उनके क्लिनिक में आने वाली लड़कियां बीस से चालीस साल की होती हैं जो नौकरीपेशा, पड़ी-लिखी हैं जो बच्चे को जन्म देने से पहले खुद को मजबूत करना चाहती हैं, ये वो लड़कियां हैं जो अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं हैं। डॉ धवन कहती हैं कि अधिकतर ऎसे पति-पत्नी होते हैं जिनके बच्चे नहीं हो रहे होते हैं, कुछ लड़कियाँ विवाह तो कर लेती हैं लेकिन अपना कैरियर बचाये रखने के लिये माँ बनना पसंद नहीं करती हैं, उनमें बढ़ती उम्र के कारण शारीरिक सरंचनाओं में परिवर्तन होने लगता है और हार्मोन संबंधी कई समस्यायें मातृत्व में बाधक बन जाती हैं। ऎसे में क्लिनिक में कृत्रिम विकल्पों द्वारा बच्चे पैदा किये जाने के साधन उपलब्ध हैं। उन महिलाओं को आई वी एफ़ तथा एब्रियोएडॉप्शन तकनीक द्वारा माँ बनने का सुख प्राप्त हो पाता है। कुछ स्त्री-पुरुष ऎसे भी होते हैं जो माता-पिता बनने के लिये खुद को तैयार महसूस नहीं करते, ज्यादातर ऎसी लड़कियाँ है जो विवाह तो कर लेती हैं लेकिन चालिस से पहले माँ नहीं बनना चाहती, वे एक लम्बे समय के लिये अण्ड और शुक्राणुओं को सरंक्षित करवा देते हैं, जिससे बड़ी उम्र में भी वह इच्छानुसार माँ बन सकती हैं। एक वजह सोशल मीडिया, फ़िल्म सिटी का प्रभाव भी कह सकते हैं जिसमें लड़कियाँ फ़िल्म की अभिनेत्रियों की तरह विवाह करना या माँ बनना समय की बर्बादी समझती हैं। कुछ को फ़िक्र रहती है अपने फ़िगर खराब हो जाने की, तो कुछ खुद को जिम्मेदारियों में बाँधना नहीं चाहती हैं।
यह सब देख सुन कर काफ़ी हद तक आप कह सकते हैं कि उस माँ की छवि धुँधली होती जा रही है, जिसके पाँच से सात बच्चे होने पर भी माथे पर शिकन नहीं आया करती थी, जो बच्चों को डाँटते, दुलारते अपने माँ होने पर फूली न समाती थी, एक ऎसी माँ जो बच्चों का होना पहली जरूरत समझा करती थी, मै याद करती हूँ तो आज भी माँ का नाम लेने पर मुझे वही सर पर आँचल ओढे एक चेहरा नजर आता है जो हर पल साये की हमारे साथ रहा करता था, जो हम बच्चों के जागने से पहले जाग जाता था, हमारी जरूरत की हर चीज़ उसके पास होती थी, कभी-कभी माँ हमे जादू का पिटारा सी लगती थी, बड़े भाई-बहनों के कपड़े छोटे और उनके पुराने कपड़े घर के डस्टर बन जाया करते थे, लेकिन घर में किसी भी चीज़ का अभाव माँ महसूस ही नहीं करने देती थी।
आज देखती हूँ तो घर से उस माँ का साया भी आँचल की तरह उड़ गया है, सर दर्द होने पर माथे पर माँ का हाथ नहीं होता न तेल ही मलने का समय हो पाता है, बच्चे नहीं जानते कि भारतीय व्यंजन कितने प्रकार के होते हैं, क्योंकि पकवान बनाना तो दूर, भोजन में फ़ास्ट फ़ूड का समावेश अधिक हो गया है, आये दिन होटल का खाना खाने से स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है, घर- परिवार, बच्चों की जिम्मेदारी से कतराते बच्चे एकांत चाहते हैं इसका एक दुष्परिणाम संयुक्त परिवारों का विघटन भी है, बच्चे दादा-दादी, नाना-नानी के दुलार से वंचित रह जाते हैं, आज चार-पाँच बच्चों की देखभाल तो दूर एक बच्चे की देखभाल का समय भी माँ के पास नही होता, बच्चे या तो आया के पास पलते हैं या क्रैच में पल रहे होते हैं। इससे बच्चों में घर के बड़ो के प्रति सेवा भाव नहीं पनप पाता, और धीरे-धीरे भारतीय संस्कारों का ह्वास भी हो रहा है।
इन सब बातों के बावजूद एक बहुत अच्छा पहलू भी है, वह यह कि बच्चे के जन्म से पहले ही माता-पिता अपनी संतान का भविष्य सुनिश्चित कर लेते हैं, ताकि बड़े होने पर बच्चों को परेशानी का सामना न करना पड़े। एक और अच्छी बात यह है कि भारत जैसे घनी आबादी के देश में जहाँ बहुत से बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं है वहीं अधिकतर लड़के-लड़कियाँ अनाथ बच्चों को गोद लेकर उन्हें पालने-पोसने में विश्वास करते हैं, एक तरह से देखा जाये तो यह सबसे अच्छा काम है, जिन बच्चों को समाज नाजायज या अनाथ कह कर प्रताड़ित करता आ रहा था, उन बच्चों को नया घर मिलने की सम्भावना बढ़ गई है।
मुझे लगता है बदलते परिवेश में नई पीढ़ी द्वारा अनाथ बच्चों को पढ़ाना लिखाना, माता-पिता का प्यार देना, एक नया घर देना ही सच्चे मातृत्व का सुख है।

सुनीताशानू

Friday, January 8, 2016

अतुल्य भारत अभियान का स्वप्न

पहरेदारी मुल्क की सौंप हमारे हाथ ..
सारा भारत चैन से सोये सारी रात .

भारतीय सेना के एक ऑफ़िसर विजेंद्र शर्मा की यह पंक्तियाँ बरबस ही याद आ रही हैं, आप भी सोचिये इस विषय में। हमारे बुजूर्ग कहा करते थे, "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" यानि जिनकी कथनी और करनी में फ़र्क होता है उनकी बात कोई मायने नहीं रखती।

आप समझ गये होंगे मै क्या कहना चाहती हूँ, दिल्ली सरकार द्वारा आमिर खान को हटा कर अमिताभ बच्चन को 'अतुल्य भारत' का ब्रांड एम्बेसडर बना देना कुछ लोगों को गलत लग रहा है, लेकिन सोचिये जो इंसान हिंदुस्तान में रहने से आतंकित है, और जिसकी हिंदुस्तानी पत्नी भी देश छोड़कर जाना चाहती है तो वो कैसा भारत निर्माण करेंगे? क्या संदेश देंगें?

जिस देश को हम माँ कहकर पुकारा करते हैं उसे आतंकवादियों के डर से मुसीबत में छोड़ सकते हैं? क्या अपनी माँ के साथ भी ऎसा ही सोचा जा सकता है?
मुझे लगता है एेसा ख़्याल आना भी देशद्रोह से कम नहीं है। 


आप भी यदि अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर देश छोड़ देना चाहते हैं तो उन लाखों वीर जवानों के परिवारों का क्या होगा जो देश की रक्षा में खुद को झोंक रहे हैं, आमिर खान और उसकी पत्नी सरीखे न जाने कितने परिवारों की सुरक्षा का दायित्व उठाये हुये हमारे देश के वीर कहीं जाने की नहीं सोचते, सच्चा भारत निर्माण इन्हीं से है, मुझे लगता है सरकार को किसी अभिनेता की अपेक्षा यह संदेश देने के लिये उन वीर सैनिकों को आगे लाना चाहिये, जिनकी बातों में ही नहीं खून में भी देशभक्ति का जज्बा होता है, ताकि हर देश वासी में देश के प्रति देशभक्ति पैदा हो न की मुसीबत में भाग खड़े होने की बातें हो।

जयहिंद