Tuesday, June 16, 2009

यंगिस्तान में बुजुर्गों की जगह कहाँ है(अमर उजाला पर प्रकाशित)





भारत की युवा आबादी को देखते हुए ही इसे भविष्य की एक ताकत के रूप में आंका जा रहा है।लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है की युवा होते भारत में बुजुर्ग दयनीय और उपेक्षित जीवन बिताने को मजबूर हो रहे हैं।अब तो वैश्विक संस्थाएं भी इसकी तसदीक करने लगी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक ताज़ा रिपोर्ट बताती है किभारत में बुर्जुग सिर्फ अपनों की उपेक्षा, मानसिक-आर्थिक तनाव ही नहीं झेलते कानूनी ज्यादातियों का सामना भी करते हैं। देश में इस समय 7 करोड़ 70 लाख बुर्जुग है, जो आने वाले 25 बरसों में 17 करोड़ 70 लाख होगी। बढ़ती औसत आयु के परिप्रेक्ष्य में बूढ़ों की तादाद भी बढ़ती जा रही हैं और उनकी मुश्किलें भी। देश यंगिस्तान की बात कर रहा है। ये बूढ़े जो घर के दरवाजे की सांकल होने का महत्व रखते थे, उनके बारे में कुछ करने की बात अलग, लोग सोचने को तैयार नहीं है। डब्लूएचओ की रिपोर्ट पुरूष और स्त्री बुजुर्गो की समस्याओं को अलग-अलग और संयुक्त रूप से भी देखने की दृष्टि देती है। निम्न मध्य वर्ग के बुर्जग स्वास्थ्य और आर्थिक संकट से, मध्य वर्ग के बुजुर्ग आर्थिक संकट से और उच्च वर्ग के बुजुर्ग मानसिक तनाव से लगातार जूझते रहते हैं।

डब्लूएचओ की एक और रिपोर्ट पर उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार और सामाजिक संगठन और दूसरी इकाईयां कुछ गंभीरता दिखाएंगी। यह रिपोर्ट वर्ल्ड एल्डर एब्यूज अवेयरनेस डे के आसपास आई है, इसलिए इसे एक सकारात्मक शुरूआत की नींव के तौर पर देखा जा सकता है । आईएनपीईए (इंटरनेशनल नेटवर्क फार द प्रिवेंशन आफ एल्डर एब्यूज) की तरफ से 2006 में 15 जून को वर्ल्ड एल्डर एब्यूज एवेयरनेस डे के नाम से घोषित कर दिया जिसका संयुक्त राज्य तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पूर्ण समर्थन किया। ऐसे में कम से कम एक दिन तो हुआ जब हम पिछली गलतियों पर सोचने की और नए संकल्प की शुरूआत कर सकते हैं।

आईएनपीए ने भी डब्लूएचओ की ताजा रिपोर्ट के पहले एक अपनी रिपोर्ट जारी की। उसके सर्वेक्षण के तथ्य भी भयावहता की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। बुजुर्गों के लिए इस एक दिन के हवाले से ही उन पर गौर करने की पहल शुरू होनी चाहिए। आईएनपीए के मुताबिक भारत में 47.3 प्रतिशत ऐसे हैं जो अपने परिवार की तरफ़ से नफऱत के पात्र बन जाते हैं। देश में 48 प्रतिशत बुजुर्ग ऐसे हैं जो आर्थिक और भावनात्मक रूप से अपमानित होते हैं।उन्हे अपने ही बनाये आशियाने में रहने को जगह नही मिल पाती। ज्यादातर देखा जाता है कि इस उम्र में बुजुर्गों को अलग-थलग एक कोठरी में रखा जाता है, और वे अकेलापन महसूस करने लगते हैं, खुद-ब-खुद बड़बड़ाना शुरू हो जाता है या दीवारों से बाते करने लगते हैं। दरअसल 58 से 60 साल की उम्र से ही बुजुर्गों को मदद की आवश्यकता होने लगती है। परन्तु इसी समय बड़े हो गए उनके बच्चों की दुनिया में बुजुर्ग गैर जरूरी हो जाते हैं। अधिकतर मामलों में देखा गया है कि बच्चे अपने बुजुर्गों को अनदेखा करने लगते हैं, उनकी सेहत के बारे में चिन्ता करने और समय देने की तो बात ही अलग है।

कहते हैं जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, बचपन लौट आता है, माता-पिता भी कई बार बच्चों की सी हरकते या हँसी मजाक करने लगते हैं, और बच्चे उन्हे सठियाने का नाम देकर अपमानित करते हैं। बार-बार अपनों से अपमानित हो उनमें असुरक्षा की भावना घर कर लेती हैं,और यही भावना बुढ़ापे को एक बीमारी का नाम दे देती है। टरटियरी केयर हास्पिटल के एक सर्वे कहा गया है कि 85 प्रतिशत बुजुर्ग अपनो से प्यार की कामना करते हैं,केवल 10 प्रतिशत ऐसे हैं जो जैसा माहौल मिले रहने को तैयार हैं, और 4 प्रतिशत ऐसे है जो वृध्दाश्रम में जाने को तैयार हैं, 1 प्रतिशत वे भी हैं जो इस विषय में कुछ भी कहने को तैयार नही। ये वो लोग हैं, जो ये समझते हैं कि उनके शिकायत करने से उन्ही के बच्चों की बदनामी होगी।

बड़े-बूढ़े सिर्फ अपनों की उपेक्षा के शिकार हों ऐसा नहीं है। तरह-तरह की कानूनी ज्यादातियां भी उनके हिस्से आती है। जेंडर ह्यूमन राइट्स सोसायटी के अनुसार धारा 498-ए के तहत 58000 मामले दर्ज किये जाते हैं। एक लाख से भी ज्यादा लोग झूठे मामलो में गिरफ़्तार होते है । हर 4 मिनिट में एक पुरूष पर दहेज प्रताडऩा का झूठा आरोप लगा दिया जाता है, व हर 2 घंटे 40 मिनट में एक बुजुर्ग नागरिक को दहेज की माँग के झूठे आरोप में फ़ंसा दिया जाता है। अलग-अलग सामाजिक संगठनों से इस संबंध में आवाज उठी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस संबंध में पड़ताल करके रिपोर्ट जारी की है।

डब्लूएचओ की रिपोर्ट एक आधार बनी जिसके चलते सन 2007 में एक बिल पारित हुआ जो बुजुर्गों की देखभाल व कल्याण के लिये था,जिसका मुख्य उद्देश्य था, बुजुर्गों की सहायता करना व उनके सम्मान की रक्षा करना था। सर्वोच्च न्यायालय ने भी निर्देश दिए कि संतान को मां-बाप की देखभाल करनी ही होगी। इस कानूनी मजबूती से बुजुर्गों के पक्ष में एक रास्ता तो बना, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में कितने बुजुर्ग अपनी औलादों के खिलाफ अदालतों में खड़े मिलेगें। कितने अजीबो-गरीब बात है कि देश के हर सरकारी दफ्तर में तबादले के लिए दिए जाने वाले आवेदन में एक खास मजमून लिखा होता है कि फलां की मां की तबियत खराब रहती है या पिता अतिवृद्ध हैं और उनकी देखभाल की जरूरत है। लेकिन हकीकत क्या है, इसको विश्व स्वास्थ्य संगठन और दूसरी रिपोर्टस बताती हैं। भारतीय परंपरा के किस्सों और बुजुर्गो के सम्मान से भरे साहित्य के बीच मौजूदा हकीकत से साक्षात करने का साहस हम कब जुटाएंगे।

Tuesday, December 30, 2008

घर मां बुलाईके जूता लगाईके अहा!

वो क्या है न कि हमारे यहाँ प्रथा हैं मशहूर होने की, कि कैसे अपनी टी आर पी बढ़ाई जाये, सो जो आ जाये लपेट में लपेट ही लो, कितना अच्छा युग्म है हमारा कि कोई कार्टून बना रहा है तो कोई जूता लगा रहा है, और एक हम शालीनता से श्रोता बन सब देख सुन रहे हैं, मगर करें तो क्या करें यही तो ब्लॉगरी एकता है हमारी, वो राजेंद्र यादव जाने क्या सोच कर हमारा आतिथ्य स्वीकार करे थे, शायद हमारे बारे में जानते नही..हम ब्लॉगर हैं भैया...किसी को नही छोड़ते।

अब क्या हुआ तिरासी साल का एक बुजुर्ग आदमी पूरे तीन घण्टे बैठा रहा, कभी इधर कभी उधर करवट बदलता रहा, हम कवियों की कविता झेलता रहा, अरे अगर जवान होता, घुटनों में दर्द भी न होता, अगर उसके हाथ में सहारे के लिये छड़ी भी न होती, तो हम बताते कि महिलाओं के सामने धुँआ छोड़ने का क्या अंजाम होता है... लेकिन हम मन मसोस कर रह गये, कि वह बाहर जाकर भी नही पी सकते, और अगर औरों की तरह वो च्विंगम चबा लेते या एक पान खा लेते तो क्या बिगड़ जाता? लेकिन भैया सबकी अपनी-अपनी आदत।
क्या वो हमारी सच्ची ब्लॉगरी को...बिलकुल भी नही जानते थे, जो दो कश... हाँ भई ज्यादा से ज्यादा तीन कश मार लिये और वो भी डरते-डरते....अब ये तो आप जानते हीं हैं! हम महिलाओं से कौन नही डरता, वैसे भी हमें ही ज्यादा परेशानी होती है, भई अब ये पीना पिलाना अपने बस की तो बात है नही, कोई दूसरा पीये वो भी वह जिसे हमने खुद बुलाया हो कैसे मुमकिन है बताईये जरा?

ये ठीक है भई कानून बनते है तोड़ने के लिये , लेकिन हम कानून के पूरे रक्षक है भैया, हम तोड़ने वाले को छोड़ेंगे नही, हमारा बस चलता तो कल के हर अखबार की यही हैडिंग होती... काले चश्में के पीछे एक देशद्रोही...हाँ जो कानून तोड़े , हमारी हिन्दी की बेईज्जती करे हुआ की नही देशद्रोही, हम तो ऎसा ही सोचते है।

लेकिन हम क्या करें हमारी हिंदी आजकल बुढिया गई है, इसीलिये तो मेहमान ने पुराने ग्रंथों को संग्रहालय में स्थान देने को कह दिया और यह भी कहा की जिसे उन्हे पढ़ना हो वह वहाँ जाये और पढ़ ले, अब यह भी कोई बात हुई हम अपने बच्चों को पुराना साहित्य कैसे पढ़वायेंगे? यदि उन्हे सहेज कर रख दिया तो उन्हे कैसे बतायेंगे की मुंशी प्रेमचंद ने कितने उपन्यास लिखे थे, गीता रामायण पढ़नी तो सचमुच में मुश्किल हो जायेगी...हम तो ये सोच कर परेशान हैं कि अब बच्चों को क्या दिखा कर टीवी पर आने वाला सीरियल रोड़ी छुड़वायेंगे?

वैसे बच्चे...बच्चे तो हमारी बात सुनते ही नही, हम कह-कह कर थक गये कि बेटा चंदा मामा है, इसमें एक बुढ़ी माई बैठी चरखा कात रही हैं लेकिन वो मानते ही नही कहते हैं क्या बात करती हो माँ लगता है आपको मालूम नही चाँद पर भी जीवन है, और आप जिसे बुढी माई कह कर बहला रही हो वह चाँद पर ढलाने और घाटियां हैं,... हमारा किताबी ज्ञान बच्चों के ज्ञान के आगे तुच्छ हो गया है फ़िर भी कोई न कोई ठोस कदम उठाना की होगा, वो हमारे देश की संस्कृति भूलते जा रहे हैं उनकी यह जिंस पैंट छुड़वा कर धोती पहनवानी ही होगी।

वैसे हम एक बात तो कहना ही भूल गये, हमने अपने अतिथी को अपने रंग में रंग लिया है, अब हिंद युग्म के सपांदक महोदय उन्हे ब्लॉगरी सिखा कर आयेंगे, फ़िर तो क्या कहने हम उनके ब्लॉग पर जा जाकर खूब भड़ास निकालेंगे, और उन्हे दिखा देंगे कि....

बड़ी आसानी से मशहूर किया है खुद को,
हमने अपने से बड़े लोगो को गाली दी है... (डॉक्टर जमील अहसन का शेर है यह)

सुनीता शानू

Wednesday, December 10, 2008

बिल्ली के गले में घण्टी बाँधेगा कौन?

इ तो पहिले से छपी गया हिन्दी- मीडिया पर अपुन को तो पताईच नही चला...:)

हिन्दी-मीडिया


कब मिटेंगे आतंक के साये हर रोज यही सवाल बेचैन करता रहता है? जब कभी घर के किसी सदस्य को चोट लग जाती है हम परेशान हो जाते हैं, देखो सम्भलकर चलना कहीं ठोकर न लग जाये, जल्दी घर लौटना, किसी अजनबी से बात मत करना। न जाने कितनी ही हिदायतें हम बच्चों को दिया करते हैं, किन्तु यह बताना नही भूल पाते जब कभी आतंकी हमला हो जाये बेटा चुपके से छुप जाना या फ़िर भाग आना। चाहे कितने ही लोग पकड़ लिये गये हों तुम्हारी जान बहुत कीमती है, तुम हमारे घर के चिराग हो तुम्हारे बिना हम जी नही सकेंगे। क्या देश पर जो कुर्बान हो गये वो किसी के बेटे नही थे, किसी के पति नही थे? मगर नही हम बस खुद के बारे में सोचते हैं, मुम्बई का ब्लॉस्ट इतना गहरा नही था, अगर यही दिल्ली में होता तो शायद ज्यादा असर करता हम पर, और अगर उस ब्लॉस्ट में हमारे अपने भी शामिल होते तो कितनी गालियाँ निकालते इस भ्रष्ट राजनीति को की हम बता नही सकते। सारा दोष ही इस भ्रष्ट शासन प्रणाली का है। मुझे समझ नही आता ये नेता क्या घास काटते रहते हैं, मेरे ख्याल से इन्हें खाकी वर्दी पहन कर रात को गश्त लगानी चाहिये...जागते रहो...हाँ जागते रहो का नारा ही ठीक रहेगा।

एक ओर हम मंत्रियों से ये सवाल करते हैं की देश में आतंकवादी कैसे घुस गये, दूसरी तरफ़ हम खुद सरकार से चोरी छिपे कई काम कर जाते हैं, अगर कहीं पकड़े गये अमुक मंत्री या ऑफ़िसर का हवाला देकर या पुलिस को हजार-पाँच सौ देकर अपना पिंड छुड़ाते हैं। कितनी ही बार जाली लाईसेंस या जाली पासपोर्ट यहाँ तक की जाली साइन तक कर लेते हैं, हाँ जी आज नकली पुलिस का कार्ड, प्रेस का कार्ड, रखना हमारी शान हो गई है। यह कार्ड ही तो हमे हर चेकिंग से बचा ले ते हैं। जब हम यह सब बेफ़िक्री से कर पाते हैं तो हमारे देश में घुसपैठ क्योंकर न होगी?जो काम बार-बार हमारे देश की सेना को करना पड़ता है हम क्यों नही कर पाते? क्यों चंद आतंकियों को देख कर दहशत में आ जाते है और बस खुद को बचाने की सोचते हैं, हमारे देश की सेना को ही शायद देश पर कुर्बान होने की कसम दी जाती है, यह भी सही है उनको कुर्बानी की कीमत जो मिलती है, यह तो उनकी ड्यूटी है भैया, हमारा काम है मोमबत्ती जलाना या दो मिनिट का मौन करना, हम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से जानते हैं।

बड़ी मुश्किल से आज मीडिया यहाँ तक पहुँची है कि हमे देश के हालात का पता चल पाता है। दंगे-फ़साद कल भी इतने ही होते थे, मगर एक आम नागरिक को अपराध और अपराधी की झलक नही मिल पाती थी। किन्तु मीडिया ने यह कर दिखाया है। क्या जरूरत थी दीपक चौरसिया को कारगिल पर जाकर हमारे देश के सिपाहियों का हाल बताने की। क्या जरूरत थी मुम्बई काण्ड में छत्तीस घंण्टे से लेकर साठ घण्टे तक इन नौजवानो को दहशत में रहने की? क्या जरूरत थी रिपोर्टर्स को नजदीक से उस आतंक को देखने की? हमने तो नही कहा था ऎसा करने के लिये, कहीं एक बंदूक की गोली या एक धमाका उनकी जिंदगी ले लेता, और उनके परिवार को क्या मिलता? रिपोर्टिंग के लिये शहीद होने पर कुछ पैसा या पदक? लेकिन अभी भी लगता है ये सब टी. आर. पी. का ही चक्कर है? लेकिन क्या हममे से कोई वहाँ जा सकता था? या हम किसी अपने को वहाँ मदद के लिये भेज सकते थे? हम घर बैठे सब कुछ देख रहे थे। और देख रहे थे कि इन मरने वालो या बंधकों की भीड़ में हमारा अपना तो कोई नही? कितने घायल हुए कितने शहीद हुए...हम लम्हा रौंगटे खड़े करने वाला था। ऎसा जान पड़ता था कि आतंक के काले बादल हमारे घर पर छाये हुए हैं,फ़िर भी हम खा पी रहे थे। क्योंकि हम अपने घर में सुरक्षित थे।

सचमुच उन जाँबाज पुलिस अफ़सरों, उन वतनपरस्त देशभक्तों का और अपनी जान की परवाह न करके रिपोर्टिंग करने वालो का हमें शुक्रिया करना चाहिये, जिन्होने सारा ऑपरेशन हमे लाइव दिखा कर हमारे अंदर देशभक्ति का जज्बा पैदा किया और हम उन नेताओं को कुर्सी से हटा पाये जो सही चोकीदारी नही कर रहे थे? और अब उन रिपोर्टर्स को भी मूर्ख, अशिक्षित बता पायेंगे जो वहाँ खड़े नही, पड़े रह कर( चाहे गोली उनके सिर के ऊपर से चली जाती) रिपोर्टिंग कर रहे थें। और उन शहीद जवानों को तो सलामी मिलनी ही चाहिये जो निस्वार्थ भाव से देश की रक्षा के लिये कूद पड़े। अब ये और बात है कि किसी को उनकी कुर्बानी में भी राजनीति की रोटियां सेकने की मोहलत मिल गई।खैर इस बात का शुक्र मनाओ हम तो बच गये, हमला पडौस की मुम्बई में हुआ दिल्ली में नही। लेकिन सोचो जरा कब तक? चार-पाँच महिने बाद अगर फ़िर कोई धमाका हुआ। फ़िर कोई हमारा अपना शहीद हुआ। किसे कुर्सी से हटायेंगे? किसे गाली निकालेंगे? या फ़िर हम भी उन लाखों करोडो की तरह आँसू बहायेंगे।और इस बार इन पागल रिपोर्टरो ने भी हमे न बताया न लाइव दिखाया कि हमले में हमारा कोई अपना तो नही, हम तो कहीं के न रहे न। और अगर हमला हम पर ही हुआ तो क्या इस बार हमारा फ़ोटो टीवी पर भी नही आ पायेगा। मोमबत्ती कौन-कौन जलायेगा कैसे पता चलेगा? चलो हम भी आतंकवाद के खिलाफ़ एक मुहिम चलायें, लेकिन पहले हम ये सुनिश्चित कर ले की बिल्ली के गले में घण्टी बाँधेगा कौन?

Wednesday, December 3, 2008

शेयर का शेर






















शेयर का शेर

आजकल शेयर का शेर पड़ौस वाले शुक्ला जी के घर में घुस गया है और उसने वहाँ ऎसी उठा-पटक मचाई है कि घर के सभी सदस्यों को अपने शिकंजे में कस लिया है। न ढ़ंग से नाश्ता मिलता है न खाना, सुबह के दस बजे से लेकर दोपहर के चार बजे तक घर के सभी सदस्य टी वी के सामने बारी-बारी से घात लगा कर बैठे रहते है कि आज शेयर का शेर क्या गुल खिलाने वाला है। और तो और मोबाईल पर भी शेयर का ही हाल चाल पूछा जाता है ।
जब से शेयर का शेर आकर बैठा है, सबकी नींद हराम हो गई है, इन्हे दीन-दुनिया की कोई खबर ही नही है। न किसी के पास जाना न किसी को बुलाना, कोई भूला भटका दोस्त आ भी जाता है तो उसके सामने भी घर के सभी सदस्य शेयर्स के मोल भाव करने लगते हैं। बेचारा दोस्त भी कुछ देर शेयर्स की खरीद फ़रोख्त में शामिल हो जाता हैं, अंत में शेर का शिकार हो ही जाता है।


घर का हर सदस्य शेयर्स के बारे में जानकारी देता हुआ खुद को वॉरेन बूफ़े समझने लगा है। बच्चों की चाहत है पापा रिलायंस खरीदो, पत्नी कहती है जो भी हो उसे तो जल्दी से जल्दी इस दीपावली पर चूड़ीया चाहिये, ऎसा शेयर खरीदो जो रातो रात दुगना मुनाफ़ा दे जाये। दादी अम्मा भी इस कर्म-काण्ड से अछूती नही हैं, पूजा-पाठ कर्म-धर्म छोड़ बस लगी है बेटे-बहू के साथ इसी बिजनेस में कि कब शेयर के शेर का रंग लाल हो रहा है कब हरा। अब ये तो वो जान गई हैं कि लाल होने पर भाव घटता है और हरे रंग से बढ़ता है। अब चाहे शेयर्स की जानकारी हो या न हो।


जबसे सास,बहू और सेंसेक्स नामक फ़िल्म देखी है,सब को शेयर्स खरीद कर अमीर बनने का भूत सवार हो गया है, कुछ शेयर्स खरीद कर घर के लोग खुद को कम्पनी का बादशाह समझने लगे है। और क्यूँ न समझें? एकता कपूर ने अपने सीरियल में बताया था कि कैसे कम्पनी के 50 प्रतिशत से ज्यादा शेयर खरीद कर मालिक बना जा सकता है। अब जितने पर्सेंट के शेयर्स है उतने के मालिक तो हुए ही न।


शुक्ला जी की छोडिये आज जमाना ही बदल गया है, सास बहू को मायके के ताने नही देती बल्कि पूछती है कि बहू जरा देख कर बताओ आज सेंसेक्स कहाँ अटका? एक चैनल पर शेयर्स की जानकारी देते हुए एक सास से बातचीत हो रही थी,"आपको शेयर खरीदने की सलाह किसने दी?" सास ने बड़े फ़क्र से कहा,"उसकी बहू ने कहा था और उसने खरीद लिये।" लगता हैं शेयर्स ने रिश्तों में भी समकालीन मिठास घोल दी है लेकिन वो दिन दूर नही जब शेयर का शेर बच्चे-बच्चे को जन्म-घूटी की तरह पिलाया जायेगा। ऎसा न हो कि वो बड़ा होने के साथ ही सट्टे बाज़ी करना शुरू कर दें।


सुनीता शानू

Thursday, October 30, 2008

बीड़ी कहाँ जलइले!

अमर उजाला पर प्रकाशित एक व्यंग्य


सार्वजनिक स्थानों पर स्मोकिंग पर प्रतिबंध लगते ही सिगरेट पीने वालों के सिर पर पहाड़ टूट पड़ा है। ऑफिस में स्मोकिंग जोन नहीं है, और बाहर सिगरेट पीने पर पुलिस पकड़ लेगी। एक मशहूर फिल्म में देव आनंद साहब सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए गाना गाते हैं, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया। वह फिल्म देखकर हर सिगरेट पीने वाला खुशी-खुशी सिगरेट का कश भरता और अपने चारों तरफ धुएं का गुबार छोड़ता हुआ यही गुनगुनाता था। यह और बात है कि कुछ महीनों या सालों के बाद न वह रहता और न उसकी परेशानियां।
कई चेन स्मोकर सिगरेट ऐसे पीते हैं, जैसे सांस उस पाइप से ही आ-जा रही हों। एक सज्जन ने सिगरेट का अंगरेजी में संधि-विच्छेद करते हुए इसे शी ग्रेट कहा, तो मुझे इसका धुआं उड़ाए बिना ही चक्कर आने लगा। सिगरेट सचमुच तुम कितनी महान हो। ऊंचे लोगों की ऊंची पसंद हो। ऊंची पसंद से याद आया। हमारे स्वास्थ्य मंत्री अंबूमणि रामदास की नजर अब तंबाकू पर भी पड़ गई है। ऐसे में, वह यूपी-बिहार से कोई पंगा तो नहीं ले रहे? एक फिल्म में अमिताभ बच्चन पर गाना फिल्माया गया था, अस्सी चुटकी नेब्बे ताल, रगड़ के खैनी मुंह में डाल, फिर खैनी का देख कमाल। अब ये कमाल देखने के लिए तो खैनी को मुंह में डालना ही होगा न? और सबसे बड़ी बात यह कि जो अमिताभ भैया के फैन चारों तरफ टंगे हुए हैं, वे तो ऐसा करेंगे ही।
कुछ लोग अपने बच्चों से सिगरेट मंगवाते हैं। ऐसे बच्चे आंखें बचाकर कभी-कभी खुद भी एकाध कश खींच ही लेते हैं। उन्हें लगता है, इस तरह वे जल्दी ही बड़े बन जाएंगे। और तो और, सीधे-सादे और संजीदा लगने वाले गुलजार साहब के भी मन में न जाने क्या बात आई कि उन्होंने बीड़ी सुलगाई। अब बच्चे भी गाने लगे हैं, बीड़ी जलइले...जिगर से पिया, जिगर मा बड़ी आग है। अब इन बच्चों के जिगर की आग बुझाने के लिए स्वास्थ्य मंत्री को कोई न कोई कानून बनाना ही होगा।
कल मैंने सिगरेट के लगातार कश लगाते एक ट्रैफिक पुलिस के जवान को देखकर पूछा, आप क्यों परेशान हैं? सिगरेट पीने वालों को कैसे पकड़ेंगे, क्या यही सोच रहे हैं? उसने कहा, नहीं जी, मैं तो यह सोचकर परेशान हूं कि अब सिगरेट कैसे और कहां पी जाएगी?
पान की दुकान पर कांटे फिल्म का गाना बज रहा था, सिगरेट के धुएं का छल्ला बना के, सोचना है क्या, जो होना है होगा, चल पड़े है फिक्र यार, धुएं में उड़ा के।अब सरकार को तो फिक्र है अपने नागरिकों के सेहत की, सो उसने इस तरह के धुएं को गैरकानूनी बता दिया है।
कई लोग पूछते हैं, सिगरेट, बीड़ी, तंबाकू बनाने वाली कंपनियां कब तक बंद होंगी? बंद किसलिए भैया? असली मुनाफा तो नशे से ही होता है। इसका मजा ही कुछ और है। एक बार पीकर तो देखो। सारी फिक्र भूल जाओगे।

सुनीता शानू

बम तू कहाँ नहीं...

कुछ समय पहले लिखा हुआ एवं प्रकाशित

"बीबी जी कल से मै काम पर नही आ पाऊँगी", क्यों ? क्या हुआ! मैने कामवाली से पूछा' वह बोली, आप देख नही न रही हैं, रोज टी.वी.पर बतला रहे हैं, रोज धमाका होत है, बा पुलिसवा को आप रोजही देख रहीन, किसी की तलाशी न लेत है, मुआ रोज गुटखा खात रहे, हमरी तलाशी लेना तो दूर हमको देखबे भी न है, कहो तो किसके भरोसे रहे हम दिल्ली मा, हम कौनो जान-माल का खतरा न लेबे, हम गाँव चले जाईबे...
सचमुच ठीक तो कह रही है यह, किसके भरोसे रहें दिल्ली में? मैने कहा, "पागल है क्या तेरा ही घर मिला है बम विस्फ़ोट के लिये, तू क्या कलाम या क्रिकेटर की श्रेणी में आती है? या तेरा घर संसद भवन में है" वो बोली, "बीबी जी आतंकवादियों का कोई दीन-ईमान नही होत, और फ़िर क्या बम पर कौन्हू नाम लिखा होता है, और खबर जे है कि इस धमाकें में कुछ छोटे बच्चन कै बम लिपटाईके धमाका होत है, मैने कहा "अरे घबरा मत हमारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जी ने अश्वासन दिया है, कि वो आतंकवादियों को बड़ी से बड़ी सजा दिलायेंगें, जल्द ही आतंकवादी भी पकड़े ही जायेंगे".
मैने उसे आश्वासन तो दे दिया, किन्तु एक ही चिन्ता सताती रही , क्या सचमुच कभी इसका अन्त होगा? घबराकर मैने टीवी चालू किया, छब्बीस मिनिट में पाँच धमाके, बैंगलूर और अहमदाबाद के बाद अब दिल्ली दहल उठी, पाँच बम फ़टे व चार निष्क्रिय कर दिये गये, करोल बाग,कनॉट प्लेस ,ग्रेटर कैलास में बम ब्लास्ट से 24 की मौत 100 घायल, हाई अलर्ट के बावजूद पुलिस की लापरवाही, ओह ! खबरे तो घर बैठे ही बम विस्फ़ोट कर रही हैं, आदमी इतना दहशत में आ जाता है कि बचाव की बात सोचने कि बजाय भागना ही पसंद करता है, देख कर दिल घबराने लगा, मैने कामवाली की तरफ़ देखा सचमुच वो बुरी तरह से डर गई थी, ऎसी दिल दहला देने वाली खबरें देख कर कौन नही दहशत में आ जायेगा , किन्तु क्या यही सिलसिला बार-बार नही चलता, क्या ऐसा ही हर बार नही होता है कितनी बार बम फ़टते है सब काम-धाम छोड़ मंत्री जी विदेश दौरे पर निकलते हैं, प्रधान मंत्री, गृह मंत्री, और कई राज नेता घटना स्थल का दौरा करते हैं, और मरने वालो के परिवारों की आर्थिक सहायता करने का आश्वासन देते हैं, तीन दिन तक पुलिस अलर्ट होती है फ़िर सब कुछ जैसे का तैसा और फ़िर इन्तजार होता है अगले बम ब्लास्ट का...सब कुछ फ़िल्मी फ़ंडा, एसा तो फ़िल्मों में मिलता है देखने को, लगता है फ़िल्में आजकल रीएलिटी शो बन गई है, आतंकवादी पहले फ़िल्म देखते है फ़िर एक्शन लेते है हाल ही में आई फ़िल्म कान्ट्रेक्ट में भी ऐसा ही बम विस्फ़ोट दिखाया गया है जैसा कि अहमदाबाद में किया गया, लो जी आतंकवादी भी फ़िल्म देखने लग गये, अगर यूँ ही सिलसिलेवार विस्फ़ोट होते रहें, तो एक दिन सामने खड़े आदमी पर भी शक होने लग जायेगा कि यह मानव बम तो नही? घर आये मेहमान के झोले में आर.डी.एक्स तो नही? होटलों में लगे सी सी कैमरे क्या बाथरूम की भी शोभा बढ़ायेंगे? लगता है इन शहरों से तो गाँव ही ठीक है, सोचती हूँ...गाँव ही चली जाऊँ.

सुनीता शानू

Friday, September 5, 2008

गुनाहगारों की रिएलिटी एक व्यंग्य...

हिंदी मीडिया पर प्रकाशित

बिग बॉस बड़ा अच्छा शो है, एक साथ इतने सारे अजनबी लोगो का साथ-साथ परिवार की तरह रहना, वाह मज़ा आ गया! श्रीमान जी चहक कर बोले

अजनबी!! सबको तो जानते हो, नया कौन है भला ? ये अहसान कुरैशी कितनी बार कविता सुना-सुना कर हँसाता रहा है सबको। और रेवती बहन आ रा रा रा इसे नही पहचानते, सास भी कभी बहू में थी न, और ये राहुल महाजन जाने कब तक इस पर मुकदमा चलता रहा और टी वी पर दिखाते रहें हैं, मोनिका बेदी भी चेहरा छुपा-छुपा टीवी पर रोती रही है, श्रीमती जी ने अचूक बाण फ़ेंका।

हाँ-हाँ ठीक है बाबा! परन्तु अलग-अलग जगहों से आये लोगों को अजनबी ही तो कहेंगें, इसमें कुछ गलत नही है, तुम्हे तो बेकार कमी निकालने की आदत है,इनमें से कोई सेलिब्रिटी तुम्हें मिल जाता न तो तुम झट सारी बातें भूल कर कह रही होती ऑटोग्राफ़ प्लीज, काश मै भी जा पाता, इस रियलिटी शो में।

हुँह मै सबकी तरह मूर्ख नही हूँ और रियलिटी शो किसे कह रहे है आप? कोरी बकवास है यह, पर्दे पर और वह भी जब इंसान को पता है कि उसे कैमरे से देखा जा रहा है, उसकी हर गति-विधि पर पूरी नजर रखी जा रही है,क्या वह अपनी असली जिन्दगी जी पायेगा, क्या सचमुच इसे रियलिटी शो कहा जायेगा? श्रीमती जी तैश में आ गई।

और नही तो क्या पुलिस भी तो पूरी मुस्तैदी से बिग बॉस पर नजरे गढ़ाए हुए है, मोनिका बेदी और राहुल महाजन की सारी गतिबिधि देख रही है पुलिस। क्या पता कोई सुराग हाथ लग जाये।वाह रे मेरे देश की भोली-भाली पुलिस, अभी देखना मोनिका बेदी डॉन के बारे में सब कुछ बता ही देगी, और हाँ राहुल महाजन भी शायद अपने गुनाह यहीं कबूल करेगा। आप भी न कितने भोले हैं, जानते नही टी वी के पर्दे पर सब नाटक है सच्चाई नही। कह कर श्रीमती जी ने टी वी बंद कर दिया गया।

अरे! ,मुझे तो देखने दो! तुम्हे पसंद नही तो मत देखना। मुझे तो अच्छा लग रहा है, कैसे एक साथ रहेंगे सबके सब, कम से कम यह बात एकता की भावना ही पैदा करती है। तुम तो एकता कपूर के नाटक देख-देख कर नारी सशक्तीकरण के उपाय ढूँढती रहती हो बस, श्रीमान जी गुस्से मे झल्लाए।

तो क्या हुआ, आप क्या बच पायेंगे एकताजी से, एकता कपूर अपने भाई तुषार कपूर के साथ आ रही है बिग बॉस में,अब नया फ़ंडा होने वाला है, चलो अच्छा है एकता जी की लाईफ़ की रियलिटी भी पता चल जायेगी, कैसे वो इतने सारे सीरियल एक साथ बना पाती हैं,अच्छा सुनो ! मोनिका बेदी की शक्ल देख कर तो बहुत मासूम नजर आती है, मुझे तो इस बेचारी पर तरस आता है, शायद यह सच ही कह रही है, इसको पता नही होगा कि जिससे यह प्यार करती है, वह अंडरवर्ड का सरगना है। सुना है डॉन मोनिका को टीवी पर देख कर और बेचैन हो गया है, अब तो कुछ न कुछ जरूर पुलिस के हाथ लग ही जायेगा, कहकर श्रीमान जी मुस्कुराये।

बस ! यही एक कसर बाकी थी, अब इस एक टीवी शो को देख कर आपने कह दिया की मोनिका अपराधी नही हालात की शिकार होगी, थोड़ी देर में कहोगे की राहुल महाजन भी बेगुनाह है, क्या अब सजा-याफ़्ता मुजरिम भी वी आई पी कहे जायेंगे? अगर आधी से ज्यादा जनता यही सोचने लगी तो जानते हैं क्या होगा, टी वी सीरियल ही अदालत का रूप इख्तियार कर लेंगें, और पुलिस अपराधी को पकड़ने के लिये सब काम-धाम छोड़ टीवी पर नजरे गढ़ाए बैठी रहेगी, और अपराधी मज़े से चैनल की शोभा बढ़ा रहे होंगें।