Saturday, March 14, 2020

ये दिल्ली के मेले, कभी कम न होंगे.... -----


 

दिल्ली डायरी में जब प्रगति मैदान शामिल होने जा रहा था, तब अनायास ही डायरी के पन्नों पर लिखने-पढऩे का सबसे बड़ा मेला नजर आने लगा। इस साल के शुरुआती दिनों में यानी 4 से 12 जनवरी के बीच यहां विश्व पुस्तक मेला यानी वल्र्ड बुक फेयर का आयोजन नजर आया।
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- सुनीता शानू

दिल्ली देश का दिल है तो यहां मेल-मिलाप-मेले तो होंगे ही। दिल्ली में मेलों की रौनकें कल भी थी, आज भी हैं और लग रहा है आने वाले समय में भी यूं ही बनी रहेगी। क्योंकि, दिल्ली दिल्ली कल भी सैलानियों को आकर्षित करने के लिए जगमगाती थी, और आज भी दिल्ली में मेलों की जगमग रहती है। यूं यह कहें तो हरगिज़ गलत नहीं होगा कि दिल्ली हमेशा से व्यापारिक दृष्टि से श्रेष्ठ रही है।
अब बात आती है खरीदारी की। तो मेले में खरीदारी का शौक तो सबको ही रहता है। लेकिन दिल्ली आने वालों में एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी नजऱ आती है जो सिफऱ् खरीदारी करने के उद्देश्य से ही नहीं आते हैं। वरन अपना सामान बेचने भी आते हैं। हां,  यह भी सच है कि दिल्ली ने छोटे-बड़े सभी व्यापारियों को कारोबार दिया है। जो लोग एक बार दिल्ली आकर बस जाते हैं और यहांं से बाहर जाने का नाम भी नहीं लेते हैं। कमोबेश यही वजह है कि दिल्ली को दिल वालों की नगरी भी कहा जाता है।
अब इस दिल वालों की नगरी में आकर भी आप यदि यहां का बाजार नहीं घूम पाए तो हमेशा मलाल ही रहेगा। वैसे खरीदारी का शौक कुछ खास लोगों का तो होता ही है। परन्तु आम आदमी भी खुदरा बाजार देखते ही सुविधानुसार खरीदारी कर लेता है।
इन्हीं बाज़ारों में घूमते लोगों को देखते हुए ही शायद शायर अरशद अली खान ने कहा है,
"खऱीदारी-ए-जिंस-ए-हुस्न पर रग़बत दिलाता है।
बना है शौक़-ए-दिल दल्लाल बाज़ार-ए-मोह्ब्बत का।।
हमारा दिल जब किसी चीज पर आ जाता है तो न जेब देखता है न वक्त देखता है। बस खरीदवा कर ही दम लेता है। ऐसे में दिल्ली के इन बाज़ारों की रंगीनियां अपनी ओर खींचती है। बाजारों की बात चली तो आपको बताते चलें। दिल्ली के प्रसिद्ध बाजारों में चांदनी चौक, पालिका बाज़ार, कनॉट प्लेस, बल्ली मारान, दिल्ली हाट, प्रगति मैदान और बेगम सामरु का महल( फ़ुटकर का सामान) शुमार है। हालांकि यह कुछ बानगी भर है, लेकिन यहां आने वालों के लिए खरीददारी की दृष्टि से जरूरत का सब कुछ मिल ही जाता है।
लेकिन आज की हमारी दिल्ली डायरी जिस खास मुकाम पर  पहुंचने वाली है, वह स्थान मेलों के लिए जगप्रसिद्ध है। आप सही समझे, वह स्थान दिल्ली का प्रगति मैदान ही है।
 आम तौर पर प्रगति मैदान प्रदर्शनकारियों के लिए एक प्रदर्शनी स्थल है। यह एशिया के सर्वोत्तम प्रगति स्थलों में से एक माना जाता है। करीब 149 एकड़ में फैला एक विशाल मैदान, जिसमें 54,685 वर्ग मीटर में फैले 15 विशाल प्रदर्शनी स्थल और राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र, द हॉल ऑफ़ नेशनल, अद्भुत हस्त शिल्प संग्रहालय एवं स्टेट्स पवेलियन, नेहरू पवेलियन एवं डिफैंस पवैलियन को अपने आप में समेटे निसंदेह प्रगति का सूचक तो है की दुनिया भर में सर्वश्रेष्ठ में शुमार होने के काबिल भी है।
प्रगति मैदान में इन सबके अलावा 10000 वर्ग मीटर का खुला क्षेत्र है। जहां भारतीय व्यापार प्रोत्साहन संस्थान समय-समय पर देशी-विदेशी व्यापार मेले आयोजित करता रहता है। ये मेले व्यापारिक एवं ओद्योगिक जगत में बहुत खासे महत्व रखने वाले और लोकप्रिय हैं। इन मेलों से टेक्नोलॉजी आदान-प्रदान के लिए एक प्रभावी माध्यम उपलब्ध होता है। इस प्रकार के मेले जनसम्पर्क का भी प्रमुख केंद्र होते हैं। प्रगति मैदान में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। जिसके लिए यहां दो सभागृह शकुंतलम् एवं फलकनुमा  कलाकारों और कद्रदानों के स्वागत के लिए अपनी बाहें फैलाए नजर आते हैं।
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दिल्ली डायरी में जब प्रगति मैदान शामिल होने जा रहा था, तब अनायास ही डायरी के पन्नों पर लिखने-पढऩे का सबसे बड़ा मेला नजर आने लगा। इस साल के शुरुआती दिनों में यानी 4 से 12 जनवरी के बीच यहां विश्व पुस्तक मेला यानी वल्र्ड बुक फेयर का आयोजन नजर आया।
केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन 1957 में स्थापित एक प्रकाशन विभाग राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट) ने इस मेले का आयोजन किया। वैेसे भी नेशनल बुक ट्रस्ट के मुख्य कामों में प्रकाशन, 2) पुस्तक पठन को प्रोत्साहन, विदेशों में भारतीय पुस्तकों को प्रोत्साहन, लेखकों और प्रकाशकों को सहायता, बाल साहित्य को बढावा देना और विभिन्न श्रेणियों के अन्तर्गत हिंदी, अंग्रेजी तथा अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं एवं ब्रेल लिपि में पुस्तकें प्रकाशित करना है। हर साल लगने वाले यह बुक फेयर एशिया और अफ्रीका का सबसे बड़ा पुस्तक मेला तो ही है। मेला खत्म होते ही पुस्तक प्रकाशकों-प्रेमियों को अगले साल का बेसब्री से इंतजार शुरू हो जाता है।
 प्रगति मैदान मैट्रो की ब्लू लाइन से जुड़ा हुआ है। मेट्रो से यहां पहुंचना सुगम है।क्योंकि प्रगति मैदान एक मैट्रो स्टेशन का नाम है। हालांकि इस जनवरी माह से इसका नाम सुप्रीम कोर्ट मैट्रो स्टेशन बदल दिया गया है। अब इसी स्टेशन पर उतर कर प्रगति मैदान पहुंचा जा सकेगा। इस बार मेले में पहुंचने का समय प्रतिदिन 11 बजे से रात 8.00 बजे तक था और प्रवेश टिकिट वयस्कों के लिए 30 रुपए, बच्चों के लिए 20 रुपये रखा गया। स्कूल यूनीफ़ॉर्म में आने वाले बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यागों के लिए प्रवेश निशुल्क था। मेले में प्रवेश सिफऱ् गेट नम्बर 1 तथा गेट नम्बर 10 से ही किया जा सकता है। टिकिट खिडक़ी भी गेट नम्बर 1 व 10 पर ही उपलब्ध थी। भैरों मार्ग प्रगति मैदान पर पार्किंग की व्यवस्था भी है। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा गाड़ी की व्यवस्था भी की गई है, जो सभी पुस्तक प्रेमियों को गेट से मेले तक श््राटल बस के रूप में सचालित की गई।
पुस्तक मेले की खासियत और जुनून वरिष्ठ पत्रकार विनोद कुमार गौड़ के शब्दों में सुनिए-‘जो एक बार यहां विजिट कर गया, अगले सालों में उसे यहां आना ही पड़ेगा।’ वे आगे बताते हैं- ‘यह सच है कि पुस्तक मेला साहित्य प्रेमियों का एक ऐसा त्योहार है, जिसकी तैयारी में वर्ष भर लेखक, प्रकाशक के साथ-साथ पाठक भी लगे होते हैं। सभी को साल भर तक इस मेले का इंतजार रहता है। और इंतजार किया जाता है दूर से आने वाले दोस्तों का, पुस्तक मेले में जितनी खुशी पुराने दोस्तों से मिलकर होती है, उतनी ही खुशी अजनबी और नए लोगों से दोस्ती होने पर होती है। ये मेले दोस्तों से मिलने का माध्यम भी रहते हैं।’
इसीलिए तो मीर हसन फऱमाते हैं -
"फिरते हैं हम तो तेरे ही दर पे कुछ
रस्ते से है न काम न बाज़ार से गऱज़।
दरअसल, पुस्तक मेले का मुख्य उद्देश्य लोगों में पुस्तकों के प्रति रुचि पैदा करना है। तथा इसका एक लाभ यह भी है कि पाठकों को एक ही स्थान पर हर विषय की पुस्तकें मिल ही जाती है, वहीं प्रकाशकों को भी अपनी पुस्तकों का प्रदर्शन करने के लिए मंच उपलब्ध हो जाता है। पुस्तक मेलों में होने वाली गोष्ठियों और चर्चाओं से भी पाठकों और नए लेखकों को सीखने को मिलता है।
अब नवीन चौधरी को ही लीजिए। छात्रजीवन, छात्र राजनीति से लेकर जातिवादी राजनीति के दांवपेंचों को समेटे उपन्यास ‘जनता स्टोर’ के लेखक नवीन बुक फेयर के अधिकांश दिनों में मौजूद रहे। उन्होंने अपने पाठकों-सोशल मीडिया के माध्यम से बने मित्रों से गर्मजोशी से मुलाकात की, किताब पर ऑटोग्राफ दिए। उनका कहना था कि लेखकों के लिए मार्केटिंग का अवसर तो है ही, साथ ही अपने पाठकों से रूबरू मिलने का मौका भी। उन्होंने बुक फेयर में आए अपने मित्रों, पाठकों को निराश नहीं किया और भरपूर ऊर्जा से मिले, सेल्फी ली।
पुस्तक मेले में भूगोल, इतिहास,विज्ञान,साहित्य,यात्रा,भाषा, संस्मरण, लोककथाएं, मनोरंजन, स्वास्थय, सिनेमा, धर्म आदि विषयों पर पुस्तकें मिल जाती हैं। नए लेखकों की किताबों का जब विमोचन व किताब पर चर्चा होती है तो वह भी चर्चा में आते हैं, तथा किताबों का प्रचार भी होता है। नि: संदेह पुस्तकें ही हमारी सबसे अच्छी मित्र होती हैं। जो हमारा मार्ग प्रशस्त करती हैं और हमें मार्गदर्शन देती हैं। पुस्तकों से हमें ज्ञान प्राप्त होता है। वेद, पुराण, उपनिषद,गीता,रामायण  का अध्ययन करके हमें प्राचीन संस्कृति का ज्ञान तो होता ही है, साथ ही उन महान लोगों के जीवन चरित्र को सालों साल सहेज कर रखना पुस्तकों के माध्यम से ही हो पाया है।
इस साल 4 जनवरी 2020 को प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले का उद्घाटन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के ने किया। इस बार मेले की थीम ‘गांधी लेखकों के लेखक थी। इस थीम को ध्यान में रखकर एक विशेष मंडप भी पुस्तक मेले में लगाया गया, जिसमें गांधी जी के व्यक्तित्व व कृतित्व को लेकर अलग-अलग भाषाओं में 500 से अधिक किताबों की प्रदर्शनी की गई। पुस्तक मेले में 600 से ज्यादा प्रकाशकों ने 1300 स्टालों के जरिए पुस्तकों का प्रदर्शन किया।
लेखक मंच भी पुस्तकों के विमोचनों और लेखकों से बातचीत का एक केंद्र नजर आ रहा था। बाहर से आने वालों के लिए तथा दिन भर मेले में रहने वालों के लिए, मेले में खाने पीने सम्बंधी सुविधाएं भी रखी गई है, ताकि दिन भर मेले में घूमने पर आप कुछ देर सुस्ता कर चाय कॉफ़ी भी पी सकते हैं।
चारों तरफ़ किताबें ही किताबें, और बड़े-बड़े झोले उठाये पाठक वर्ग नजऱ आ रहा था। कुछ प्रकाशकों ने स्टॉल के कोने में लेखकों के बैठने तथा लोकार्पण व चर्चा के लिए स्थान बना रखा था। फूलों की खुशबू और मिठाई के डिब्बों के साथ जैसे ही किसी पुस्तक का लोकार्पण होता, सबके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ जाती। तालियों की  गडग़ड़ाहट के साथ ही वरिष्ठ लेखकों व प्रशंसकों द्वारा पुस्तक पर विचार व्यक्त करते नजर आए।
मेले में वरिष्ठ लेखकों की एक अपनी ही जमात दिखाई देती है। मेले में ऐसे वरिष्ठ लेखक भी नजऱ आ जाते हैं जिनके दर्शन भी दुर्लभ होते हैं या जो चलने फिरने में असमर्थ होते हैं। यहां आने वाले लेखक तथा पाठक जरूरी नहीं किताब खरीदने या विमोचन करने ही आते हैं। पुस्तक मेला सच पूछिए तो वर्षों से बिछड़े दोस्तों के मिलने का माध्यम भी होता है। चारों तरफ़ एक दूसरे के चेहरे देखते लेखक पाठक इस तरह घूम रहे होते हैं, जैसे कुंभ के मेले में किसी अपने की तलाश में हों।
इन सबके बीच एक और खतरे की तरफ़ भी ध्यान गया।प्रगति मैदान में प्रगति की ओर बढ़ते इन नए लेखको के कदम अनायास ही एक ऐसी दिशा की ओर उठ रहे हैं, जहां से अगर निराशा मिली तो उनकी भावनात्मक कविता के बिगड़ जाने का खतरा रहता है। एक कवि मित्र अपने सभी मित्रों से एक ही बात कह रही थी, देखिए-कैसे सौभाग्य की बात है, आज आप आए और आज ही मेरी पुस्तक मेले में आई है। तमाम दोस्त अपनी दोस्त का मुस्कुराता चेहरा देखते और तुरंत उनका हाथ अपनी जेब की ओर बढ़ जाता। और मिल जाती लेखिका की हस्ताक्षरित एक कॉपी। कौन पागल होगा जो अपने दोस्त की क्लॉज अप सी मुस्कुराहट को खोना चाहेगा। तमाम नए लेखक जो अपने किताब रूपी सपने को हाट बाज़ार में सब्जी-भाजी की तरह बेचने को आतुर थे। अपने इष्ट मित्रों को हांक भी लगा रहे थे।
अब यह सचमुच सोचने वाली ही बात है क्या हमें प्रगति मैदान का ये मेला प्रगति की ओर ही ले जा रहा है। जहां अंधाधुंध दौड़ते जा रहे हैं अपनी भावनाओं की किताब पर कल्पनाओं की स्याही से उकेरे कुछ स्वप्न दोस्तों में बेचने।
आखिर में एक बात और। मेले में एक दुनिया सपने बेच रही है, फुटपाथ पर भी... जहां तमाम बड़े छोटे लेखकों की किताबे उपलब्ध है। वहीं पर प्रगति की राह में आगे बढ़ाता एक बोर्ड लगा है किताबें सौ रुपये किलो। सचमुच यह भी सोचनीय है।

4 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (16-03-2020) को 'दंभ के आगे कुछ नहीं दंभ के पीछे कुछ नहीं' (चर्चा अंक 3642) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव

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  2. बहुत खूब।
    कभी तो दूसरों के ब्लॉग पर भी अपनी टिप्पणी दिया करो।

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    1. जी हां शास्त्री जी आप ठीक कहते हैं 18 के बाद सबको पढ़ूंगी और टिप्पणी भी दूंगी।

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