Thursday, February 6, 2014

आज अमर उजाला में प्रकाशित एक व्यंग्य... सच बता, किसकी भैंस है तू

ओए, तू किसकी भैंस है बोल! ऐ, रुक कहां जाती है? बेचारे सिपाही कभी भैंस को ढूंढेंगे, कभी कुत्तों को। देश की भैंस जाए पानी में, हमको क्या। हां, मंत्री जी की भैंस का सवाल है, भैया। भैंस न हुई, फिल्म की हीरोइन हो गई, जो कभी टीवी, तो कभी अखबार की सुर्खियां बन गई। आखिर सबको नाकों चने चबवा कर मिल भी गई।

कौन जाने! चोरी हुई या भाग गई थी। जैसे अमेरिकी जेल से कैदी भाग गए थे और सर्दी के मारे वापस आ गए जेल में। लेकिन इन भैंसों के चक्कर में बेचारे दो सिपाहियों की भैंस तो गई पानी में। यों कहें कि दोनों को लाइन हाजिर कर दिया गया, कि उनके रहते भैंस चोरी हुई, तो कैसे हुई। अब कोई यह बताए कि बेचारे सिपाही कैसे पहचानेंगे कि ये भैंस जो बीच रास्ते में घूम रही हैं, मंत्री जी की हैं। भैंस की भी कोई पहचान है भैया, भैंस तो बस भैंस है। मंत्री जी की भैंस पर क्या मंत्री जी का पोस्टर चस्पां था? या मंत्री जी की फोटो लटकी थी गले में, जो कोई पहचान पाता?

सबसे सच्ची बात, भैंस कहलाना किसे पसंद है? भैंस शब्द सुनते ही काली डरावनी विशालकाय आकृति आंखों के सामने कौंध जाती है। क्या आपने कभी सोचा है कि भैंस को कितना बुरा लगता होगा? भैंस बेचारी ब्यूटी पार्लर जाकर भी अपना रूप संवार नही पाती। ऐसे में भैंस जो कोई मंत्री जी की हो, तो काहे सुनेगी बेकार की बातें? इसका दूध पी-पीकर मंत्री जी जवान हुए हैं, इसका खालिस दूध पीकर ही कुशलता पूर्वक पदभार संभाल पाते हैं। लेकिन इस नेकदिल दूध पिलाने वाली भैंस माता को खिलाते क्या हैं- भूसा! सुलाते कहां हैं-तबेले में! क्या भैंस को यह अच्छा लगता होगा? आप सोएं मखमल पर और भैंस माता सोए तबेले में। एक खटिया भी लगा देते, तो क्या बिगड़ जाता। अरे घर का कुत्ता तक मंत्री जी के सोफे पर चढ़कर सोता होगा। चार लोग गोद में उठाए घूमते होंगे।

अच्छा चलो, भाग गई या भगा ली गई। भैंस की मर्जी। सारे के सारे पुलिस वाले भैंस को ढूंढने में लग गए। अब सोचने वाली बात है कि हमारे देश की पुलिस करे, तो क्या करे? अपराधियों को पकड़े या भैंस पकड़े। अच्छा होता, मंत्री जी भैंस के गले में भी आधार कार्ड टंगवा देते। ताकि सड़क पार करते वक्त हर सिपाही रोककर आधार कार्ड तो देख ही लेगा कि किसकी भैंस किसके खेत में चर रही हैं। बेचारा सिपाही पूछता भी तो किससे पूछता कि ऐ भैंस, तू कहां जा रही है।

सुनीता शानू

Tuesday, January 28, 2014

एक लाइक तो बनता है न जी ( नव भारत में प्रकाशित)



 सुनीता शानू

ज्यादा मत सोचिए। कोई लड़की या लड़के की फोटो को शादी के लिए लाइक करने की बात नहीं हो रही है। यहां सवाल बस एक लाइक का है। लाइक बोले तो- अंगेजी का ये लाइक चेहरे की किताब पर पसंद का एक चटका लगाना है- कि फलां की तस्वीर खूबसूरत है, तो फलां ने एक शेर लिख डाला है और चाहता है कि आप जरा लाइक का चटका लगा दें। ज्यादा नहीं, बस एक छोटी सी ख्वाहिश ही तो करता है हर फेसबुकिया कि आप आएं और एक लाइक का चटका लगाएं। सुबह शर्मा जी प्रोफाइल पर एक तस्वीर लगा आए थे। तब से बीस बार कंप्यूटर खोल कर देख चुके हैं कि किसी ने लाइक किया कि नहीं। अब सारे घर वाले तो लाइक कर ही चुके हैं दूसरा न करे तो क्या किया जाए?

वैसे एक लाइक में जाता क्या है, कर ही दो आप भी। कौन आप शादी के लिए पसंद कर रहे हो। जरा सा माउस घुमाया, क्लिक किया- हो गया लाइक। सारे दोस्तों को फोन करने पूछ चुके हैं, लाइक किया कि नहीं। यार एक लाइक का सवाल है बस। सोशल मीडिया की मानें तो 4.5 अरब लोग फेसबुक पर लाइक का चटका लगाते हैं। औसतन एक व्यक्ति 20 मिनट तक फेसबुक पर रहता है। तो क्या पांच हजार फेसबुकिया फ्रेंड्स में से पचास से भी लाइक की उम्मीद न की जाए। अरे, लोग तो किसी के बाप के मरने की खबर पर भी ऐसे लाइक का चटका लगाते हैं कि तेरा बाप मरा तो मरा। सामने वाला भी सोचता रह जाता है कि इसे मेरे बाप के मरने की खबर भी पसंद आ गई, कमाल है!

कितनी अजीब सी बात है दोस्तो, ये लाइक का चटका एक पल में बता देता है कि आप किसी को कितना पसंद करते हैं, जब आप किसी की हर बात पर चटका लगाते हैं। देखा जाए तो आपका कुछ खर्च भी नहीं हो रहा। वो कहते हैं न 'हींग लगी न फिटकरी रंग भी चोखो आवै।' किसी के मन को शांति मिलती है, कोई ये सोच-सोच कर खुश है कि इतने लोग उसे पसंद कर रहे हैं। और ये आप के लिए भी सही है। वैसे भी जब खाली बैठे हों तो करना ही क्या होगा। एक तो लॉगिन करो। दूसरे की प्रोफाइल देखो, इतना टाइम खोटा करो तो कम से कम सामने वाले को चटका लगा के बता भी तो कि देख आज मैं आया हूं कल यही चटका लगाने तुझे भी आना है। इस धंधे में बेइमानी बर्दाश्त नहीं होती दोस्तो। उसूलन तू मेरी पीठ खुजला मैं तेरी खुजलाऊं।

कुछ लोगों को तो इस लाइक का ऐसा बुखार होता है कि महिला हो या पुरुष, अपनी जवानी के टाइम की ऐसी तस्वीर चस्पा कर लेते हैं कि खुद घर वाले गच्चा खा जाएं। एक महिला काफी समय से अपने बचपन की तस्वीर लगाए थी। उसकी लिस्ट में दुनिया भर के स्कूल के बच्चे शामिल हो गए। एक बच्चा तो उसके चक्कर में ही पड़ गया। और कमेंट करने लगा-साड़ी के फॉल सा मैच किया रे...। बस एक लाइक के चक्कर में बालक पागल हुआ जा रहा था और दादी मन ही मन बोल रही थी-मुए मै तेरी दादी हूं, नासपिटे फेसबुक पर ये काम करता है। अब बताओ बच्चे को इस चेहरे में दादी दिखाई कैसे दे! वसीम वरेलवी लिखते हैं :

अपने चेहरे से जो जाहिर है छुपाएं कैसे 
 तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे।

बार - बार लाइक करने पर भी जब कोई लाइक न करे तो आदमी विक्षिप्त सा हो जाता है। इसी पागलपन के दौरे में वो नई पोस्ट लिखता है - मैं ऐसे लोगों को अपनी प्रोफाइल से डिलीट कर रहा हूं जो संवेदनशील नहीं हैं। अब ये भी कोई बात हुई , बार - बार एक ही बात सुनते आए हैं कि पुलिस ऎसे इलाकों में कर्फ्यू लगा देती है जो संवेदनशील होते हैं। फेसबुक पर कब कर्फ्यू लग जाए मालूम नहीं।

इंट्रो : एक लाइक में जाता क्या है , कर ही दो आप भी। कौन सा आप शादी के लिए पसंद कर रहे हो ! जरा सा माउस घुमाया , क्लिक किया - हो गया लाइक।


बकरी को चाहिए उसका खोया हुआ सम्मान (नवभारत टाइम्स में प्रकाशित)




बकरी को चाहिए उसका खोया हुआ सम्मान
बतरस
सुना है कि डेंगू के कई मरीज बकरी के दूध से स्वस्थ हो गए। इससे डॉक्टर भी हैरान हैं। बकरी के महत्व को फिर से समझना होगा। समाज के हित में ऐसा करना जरूरी है।


यदि आप सोचते हैं कि दिवाली के पटाखों के साथ ही मच्छरों का भी सफाया हो गया यानी कि डेंगू का भी अंत हो गया, तो ऐसा नहीं है। डेंगू के मामले कम जरूर हुए हैं पर पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। देश भर में उसका खतरा अब भी बना हुआ है।

कुछ दिन पहले चर्चा फैल गई कि बकरी का दूध पीने से डेंगू ठीक हो जाता है। अचानक बकरी के दूध के दाम बढ़ गए। बेचारे डॉक्टर्स परेशान हैं। सोच रहे हैं कि क्या वे बकरी पर पीएचडी कर लें/

कल तक जिस बकरी की कोई औकात नहीं थी वह आज खड़ी मुस्करा रही है। गांधी जी ने बकरी को उसकी गरिमा दिलाई थी, पर उनके जाते ही हम उनके साथ-साथ बकरी को भी भूल गए। बकरी का दूध पीना लोगों ने छोड़ दिया।

मुझे याद है बचपन में कभी बकरी गुस्से में आकर सींग मार देती थी तो उसे चुड़ैल कह देते थे। बकरी की तो शक्ल ही चुड़ैल सी नजर आती थी। गाय सींग मारे या पूंछ, फिर भी माता कहकर पूजी जाती थी, बकरी की आवाज एकदम चेपू किस्म की है न! तो हम स्कूल में अक्सर दोस्तों को चिढ़ाने में एक दूसरे को बकरी की गाली देते थे कि क्या बकरी की तरह में-में लगा रखी है।

बकरी ये सब देख-देख कर थक गई थी। जाने कितने दिनों का अवसाद पाले हुए थी। आखिर एक दिन बकरी गुस्से में आकर डेंगू के मच्छर से मिली और बोली- ये इंसान हमारी कद्र कभी नहीं करेगा। तुझ पर मिट्टी का तेल डलवा देगा, ऑल आऊट से भगवा देगा और मेरा तो हमेशा से शोषण हो रहा है।

जरा सी घास डाली और दूध निकाल लिया। किसी भी पेड़ के पत्ते हों यहां तक की नीम के पत्ते, पपीते के पत्ते, सब मुझे खिला देते हैं और दूध निकाल लेते हैं। हालांकि छोटे बच्चे को दूध मेरा पिलाते हैं, दवा के रूप में भी मेरा ही दूध काम आता है लेकिन माता गाय को बताते हैं। अरे मुझे बहन ही कह देते। या मौसी कह सकते थे।

मेरे सामने ही मेरे बच्चे को मार कर खा जाते हैं। तुम्हीं बताओ भैया आखिर कब तक मैं बेइज्जती सहन करूं/ बकरी ने डेंगू के मच्छर राजा से विनती की और डेंगू के मच्छर ने रक्षाबंधन के दिन वचन दिया कि हे बहना, जब-जब ये मनुष्य मेरे क्रोध की चपेट में आएगा इनकी सारी पुश्तें तुम्हें याद करेंगी। तब इन्हें छठी का दूध नहीं तुम्हारा ही दूध याद आएगा। और यह मूर्ख मनुष्य खुद नीम, पपीते के पत्ते ही खाएगा जो इसने तुम्हें खिलाए हैं। सुनकर बकरी बहुत प्रसन्न हुई और मच्छर भाई अंतर्ध्यान हो गए। इसलिए इस साल संपूर्ण भारतवर्ष में डेंगू के मच्छर ने जब उत्पात मचाया, तो मच्छर के काटे रोगी को पपीते तथा नीम का रस पिलाया गया। साथ ही सुबह- शाम प्रसाद के रूप में मरीज को बकरी का दूध पिलाया गया। कई जगहों पर बकरी का दो घूंट दूध पचास रुपये तक में बिका है जबकि इतने में गाय का एक किलो दूध मिलता है। आज कई लोग बकरी पालने की सोच रहे हैं। बकरी को अच्छा-अच्छा खाने को मिल रहा है।

अब ये सब देख कर तो ऎसा लगता है कि हमें बकरी से हाथ मिला लेना चाहिए। गाय की जगह बकरी पर निबंध बच्चों से लिखवाया जाए और उसके दूध पर पीएचडी कर ली जाए ताकि आने वाले समय में डेंगू के मच्छर से छुटकारा मिल सके। सरकार को भी इस पर ध्यान देना होगा। पशुपालन विभाग को चाहिए कि वह बकरी पालन के महत्व को प्रचारित करे। इस तरह का कार्यक्रम गांधी जयंती पर शुरू किया जा सकता है।

सुनीता शानू

Wednesday, December 25, 2013

ड्रोन आएगा डाक लाएगा ( अमर उजाला में प्रकाशित एक टिप्पणी)




कल मैंने दादी मां को बताया कि भविष्य में आपके लिए ड्रोन से सामान भिजवाएंगे। दादी मां घबरा गई, ऐसा कैसे संभव है? सोच-विचार कर काम करना चाहिए, ड्रोन तो एक राक्षस है बिटवा। आए दिन खबर सुनती हूं, आज यहां हमला, कल वहां हमला।

अमेरिकी ड्रोन ने पाकिस्तान पर कितने हमले किए हैं, तुम्हें कुछ पता भी है! हमारे इस पड़ोसी देश में लोग ड्रोन का नाम सुनकर ही कांप उठते हैं। पता नहीं, वहां इसने आतंकवादियों के साथ कितने निर्दोषों की जान ली है। ऐसा शक्तिशाली ड्रोन सामान उठाएगा? ड्रोन अंग्रेजी का शब्द है, जिसे हिंदी में नर मधुमक्खी कहते हैं। मधुमक्खी के छत्ते में हाथ न ही डालो, तो अच्छा।

लेकिन वह दिन दूर नहीं, जब बच्चे चिल्लाते नजर आएंगे, ड्रोन आया डाक लाया। आप भी कहती नजर आएंगी, ऐ ड्रोन, चल आलू-प्याज ला।

आपको क्या लगता है कि ड्रोन थैला उठाकर बाजार जाएगा? हमें तो इस पर यकीन नहीं होता। लेकिन दिग्गज ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी अमेजन कह रही है कि अब ड्रोन यह करेगा, ड्रोन वह करेगा। जबकि ड्रोन का नाम सुन-सुनकर हमें डर लगता है कि न जाने कब, कहां हमला कर दे। इसे रडार भी देख नहीं पाता। फिर क्या पता चलेगा कि फलां ड्रोन के पास राशन है और फलां ड्रोन के पास बम।

सुना है कि यह विमान एक बार ईंधन भरने के बाद आधी दुनिया का चक्कर लगा सकता है और 18,000 मीटर की ऊंचाई पर उड़ते हुए बादल छाए रहने के बावजूद एक-एक व्यक्ति पर निगरानी रख सकता है। अब बताओ, एक-एक आदमी की निगरानी की क्या आवश्यकता है भला! इससे तो अच्छा था कि इसे पतियों की जासूसी के लिए प्रयोग में लाया जाता।

कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी, थ्री इडियट्स। उसमें भी ड्रोन रूपी एक ऐसा उपकरण दिखाया गया था, जो रिमोट द्वारा उड़ाया जा रहा था। उसकी जासूसी देखकर सब सहम गए थे। खासकर महिलाएं तो उसे देखकर डर ही गई थीं। हमें सावधान होने की जरूरत है। यह ड्रोन हमारे ऊपर बिन बुलाई आफत के रूप में आने वाला है। पहले कबूतर उड़ते थे डाक लिए, उसके बाद संदेश वाहक आए, बेतार के तार टेलीग्राम, फिर हवाई जहाज, रेलगाड़ियों द्वारा डाक आई और आने वाले दिनों में ड्रोन को डाकिया बना डालने की तैयारी है। आगे-आगे देखिए, होता है क्या!

सुनीता शानू

Thursday, October 24, 2013

अमर उजाला में प्रकाशित एक व्यंग्य टिप्पणी...

सोना नहीं, तो सोना नहीं

No sleeping without gold
उन्नाव जिले के डौंडिया खेड़ा में आजकल दिल्ली के शनि बाजार जैसा माहौल है। लोग कुदाल-फावड़ों के साथ अपने दैनिक रोजगार का साज-ओ-सामान लेकर आ धमके हैं। ये लोग दिन भर चाट-पकौड़े और गरमा-गरम जलेबियों का आनंद उठाते हैं और रात-भर जागकर सोने की तलाश में सारा किला खोद डालते हैं। संन्यासी सोने के चक्कर में हवन कर रहे हैं, तो कहीं-कहीं चोर-डाकुओं ने भी रात के अंधेरे में चुपचाप खुदाई का काम चालू कर दिया है। क्या पता, सोना डौंडिया खेड़ा की जगह कहीं और मिल जाए। एक जगह तो कुछ लोगों ने मंदिर के पुजारी को कैद कर मंदिर के अंदर का भाग ही खोद डाला।

शोभन सरकार की भविष्यवाणी पर सोना मिलेगा या नहीं, यह तो मालूम नहीं, लेकिन उन्नाव में त्योहार जैसी हलचल मच गई है। देश के नेता हों या अभिनेता, सभी की दिलचस्पी है इस सोने में। कुछ लोगों का मानना है कि पूरे देश में अनेक स्थानों पर खजाना दबा पड़ा है, बस जमीन को खोदने की जरूरत है। कहा भी गया है कि जिन खोदा तिन पाइयां...। उपकार फिल्म का गाना, मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती भी शायद किसी खजाने की खुदाई से प्रेरित होकर ही बना होगा।

पुरातत्व विभाग का मानना है कि खुदाई में एक महीना लग सकता है। तो क्या सब लोग एक महीना वहीं तंबू तानकर इंतजार करें कि कब धरती माता सोना उगलेगी और कब उनके दिन बहुरेंगे। एक महीने तक वहां बैठे रहकर साधु-संतों के भजन सुनकर दिन बिताना तो कठिन है। ऐसे में यह भी हो सकता है कि लोग गुस्से में आकर कुदाल-फावड़े लेकर ऐसी खुदाई कर दें, जो एक महीना क्या, एक दिन में पूरी हो जाए। सबकी नजर उन्नाव पर टिकी है।

चाहे कुछ भी हो जाए, खुदाई होगी। आखिर साधु बाबा की जुबान है। भई, सोना न मिला, तो गर्दन कटवा लेंगे, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। कुछ मॉडर्न कथावाचकों की पोल खुलने के कारण लोगों का साधु-संतों से भले ही विश्वास उठ जाए, पर सोने के लिए खुदाई करने में आखिर क्या जाता है!

अभी तक तो खुदाई में किले की दीवार ही निकली है। खुदाई करते-करते अंत में महाराज के सोने का पलंग निकल आया, तो क्या कर लेंगे? बाबा कहेंगे, यही तो है। इसी की बात कर रहा था मैं। लो, जितना सोना चाहो सो लो...और मेरी तरह स्वप्न देखो सोने के।

Thursday, October 10, 2013

अपना प्रधानमंत्री खुद चुने “ उपयोगी टिप्स”



कल टीवी पर “कौन बनेगा करोड़पति” देखते-देखते ये खयाल आया कि क्यों न प्रधानमंत्री का चुनाव भी इसी तरह हो जाये! है न लाजवाब सोच! अब देखिये कितने उम्मीदवार खड़े हैं लाइन में। कोई हाथ दिखाता है तो कोई हाथी। कोई ट्रैक्टर लेकर आ गया तो कोई साईकिल। आम आदमी तो झाड़ू लेकर आ गया हैं।
मुझे लगता है देश की जनता से भी पूछ लेना चाहिये था कि प्रधानमंत्री किसे बनाना चाहिये। या तो अमिताभ बच्चन हॉट सीट पर बैठ कर सभी उम्मीदवारों में से क्विज़ कॉंटेस्ट द्वारा चुने। ताकि देश की जनता को इस बात का तो विश्वास हो ही जायेगा कि हमारा प्रधानमंत्री अपनी काबिलीयत से बना है, खुद कॉन्टेस्ट जीता है। वरना अँधेर नगरी चौपट राजा। रबड स्टैम्प तो भैया किसी को भी बना दो।
ये देश का अहम फैसला है जी इसमें महिलाओं की भी राय लेनी चाहिये। यदि आप मुझसे पूछते तो मै आपको सही और उत्तम राय ही देती। क्योंकि प्रधानमंत्री सिर्फ़ देखने के लिये या कुर्सी तोड़ने के लिये ही नही होता। देश का बेड़ा पार करने के लिये भी होता है। इसके लिये कुछ जायज शर्तें तय होनी चाहिये ताकि देश का प्रधानमंत्री चुना जा सके। चलिये आपको भी बता ही दिया जाये कि हमारी "आम औरत पार्टी" ने क्या सोचा है। सबसे पहली बात प्रधान मंत्री की उम्र चालिस से पैंतालिस के बीच होनी चाहिये। प्रधान मंत्री को दुनियादारी की पूरी पहचान होनी चाहिये। किसकी बेटी का किससे साथ चक्कर है, कब कौन किसके साथ भागने वाली है, और किसकी बीवी किसे धोखा दे रही है। किसके मुह में आसाराम है...और किसकी बगल में शिल्पी छुरी है। अब इन सब बातों का पता होगा तो पहले से ही बचने-बचाने का जुगाड़ किया जायेगा।
अब मुद्दा ये उठता है कि ऎसा शातिर दिमाग किस इंसान के पास होगा। इंसान से तात्पर्य इंसान ही है, यहाँ कृपया उन सम्बोधनों पर ध्यान न दिया जाये जो गधा, उल्लू या कोल्हू के बैळ की श्रेणी में आते हैं। हाँ तो मै कह रही थी कि जो देश-विदेश की खबरों के साथ घर की खबरें भी रखे। जहाँ तक मेरा चालीस साल का तजुर्बा कहता है तो भैया ये सब बातें तो एक नारी ही ढँग से बता पायेगी।
अब अपने मोहन को ही ले लो... चुपचाप खड़ा मुस्कुराता रहता है। उसके पीछे एक औरत न होती तो देश का क्या हाल होता... आप सब जानते हैं। तो भाई लोगों सबसे पहली बात तो यही है कि प्रधानमंत्री किसी महिला को ही बनाया जाये। क्यूँ?... क्या मै गलत बोल रही हूँ?  घर को चलाना यहाँ तक की पति को चलाना देवता बनाना पूजना और काम भी करवाना। ये सारे गुण एक नारी में उपलब्ध हैं। उपलब्ध क्या है कूट-कूट कर भरे हैं जी। नारी शक्ति का मुकाबला तो देवता तक नही कर पाये हैं जिन्होने अंजाने में इसका आविष्कार कर दिया था। हम अपने घर के साथ-साथ अड़ौस-पड़ौस सबकी खोज खबर रख लेते हैं तो देश भर की क्यों नही ले सकते बताओ?
...तो भाई लोगों हमारा नेता कैसा हो...... जैसा हो। अरे.. रे मै अपने लिये नही कह रही की मुझे प्रधानमंत्री बनना ही नही है। मेरे पास तो फ़ुर्सत ही नही है। क्या करुं वरना आपका आग्रह ठुकरा दूँ ऎसी मै नही हूँ।....
लेकिन हाँ आप ऎक बार बस इमेजिन करके देखिये तो मै ये वादा करती हूँ कि मै इस बात का पर्दाफाश कर दूँगी कि तेरी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद कैसे?  ये मेरा पक्का वादा है  आपसे कि मै पूरे देश को हिला कर रख दूँगी। रुपया नीचे गिरेगा नही और डॉलर ऊपर उठेगा नही। प्याज़ भी यूँ इतरायेगा नही क्योंकि पूरे शहर में सड़क किनारे बस प्याज़ ही प्याज़ उगाये जायेंगें कि जानवर भी नही खायेंगें। रही बात डिज़ल, पैट्रोल या रसोई गैस की तो कोई न कोई विदेशी फ़ार्मूला चुरा कर डिजल पैट्रोल और गैस तो बचा ही लूंगी। हम भारतीयों को बिजली चुराने की, टैक्स चुराने की, इधर का सामान उधर करने की बचपन से आदत होती है। तो दोस्तों चाहे जो हो जाये मै हर वादा जो मैने किया है या किया नही है कुर्सी मिलने तक हर हाल में पूरा करुंगी। मैने हर परेशानी से निबटने की तरकीबें सोच निकाली है। मेरे देश के समझदार नागरिकों आप सबकी यही मर्जी है तो मै आप सब के लिये ये कुर्बानी देने को भी तैयार हूँ। वैसे ये सच है बस फ़ुर्सत ही नही है मेरे पास।

सुनीता शानू

Tuesday, September 24, 2013

अमर उजाला में प्रकाशित एक व्यंग्य टिप्पणी...

http://www.amarujala.com/news/samachar/reflections/vyang/satire-on-aam-aadmi-party/

चकला-बेलन भी ले जाएंगे

satire on aam aadmi party
अलसुबह पार्क जाने के लिए बाहर निकली, तो हैरान रह गई। मेरे घर की खिड़की, दरवाजे यहां तक कि गाड़ी पर भी कोई झाड़ू के पोस्टर लगा गया था। सामने ही झाड़ू वाली झाड़ू लगाती हुई बड़-बड़ किए जा रही थी। मैंने पूछा, क्या हुआ, तो वह बोली, का बताएं बीबी जी, औ ससुर का नाती हमार झाड़ू पर हाथ साफ कर गया। ऐकै ही झाड़ू खरीदे रहे, ओकू भी कल आम आदमी पार्टी मा लेकर झण्डा फहराए रहे। आए तो झाड़ू सै मार-मार के ऊ का समझाई दें।

हां, सही तो कह रही है झाड़ू वाली कि झाड़ू ही लेकर चला गया उसका मर्द नारे लगाने, अब करे तो वह क्या करे? घर से निकलते समय झाड़ू वाली झाड़ू लगाती नजर आया करती थी, लेकिन आज तो सारे रास्ते भर झाड़ू के पोस्टर ही पोस्टर नजर आए।

वो झाड़ू, जो गृहणी के हाथ में होती थी। जिस झाड़ू को हम महिलाएं बदमाशों को मार-मार कर सुधारने के लिए प्रयोग में लाती थीं। आज उसी झाड़ू को सरे बाजार आसमान में चढ़ते देखा। यहां तक कि जो मौजीराम पंडित भी झाड़ू छू जाने पर दोबारा नहाकर आता था, आज वही झाड़ू उसके घर के दरवाजे पर टंगी उसे चिढ़ा रही है, कि जा नहा ले कितनी बार नहाएगा।

वाह भई वाह, आम आदमी की ये झाड़ू न जाने कितनों के माथे का तिलक बन जाएगी। पहले झाड़ू वाले को देख कर सब दूर-दूर भागा करते थे। आज आम आदमी पार्टी का हर आदमी झाड़ू उठाकर चल रहा है। खुद को आम आदमी बता रहा है। और तो और टी शर्ट कंपनियों ने झाड़ू के टैटू बना डाले हैं। यह भी हो सकता है कि किसी झाड़ू कंपनी ने सिफारिश की हो, ताकि विज्ञापन भी हो जाए, सारी झाड़ू भी बिक जाए।

ये भी तो हो सकता है कि पुरुषों ने महिलाओं को खुश करने की यह तरकीब निकाली हो। या कोई पुरुष झाड़ू खा-खाकर इतना परेशान हो गया हो कि उसने पार्टी में इसी को चुनाव चिह्न बनाने की सिफारिश की हो, वरना आम आदमी पार्टी को झाड़ू ही क्यों नजर आई, कुछ और नजर क्यों नही आया?

दोस्तो, अटकलें लगा-लगाकर मन में सांय-सांय होने लगी है। ऐसा लगता है कि कोई हमारी नारी सत्ता में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है। आज झाड़ू ली है, कल चकला, बेलन, चिमटा सभी ले लिए गए तो? यही तो हथियार है हमारे गिने चुने। इन्हीं पर कुदृष्टि डाली गई, तो हमारा क्या होगा।

टैग्स

» sunita shanuaam aadmi party

Monday, July 8, 2013

नटखट तुम कब सुधरोगे




आप सोच रहे होंगे किस नटखट की बात हो रही है। नटखट का तो बस एक ही नाम होता है नटखट कृष्ण को भी कहते थे। लेकिन मै उन बच्चों को कहती हूँ जो अपनी हाज़िर जवाबी से सामने वाले को चुप कर देते हैं।
अभी कुछ समय पहले की ही बात है मै गार्डन में घास पर चक्कर लगा रही थी कि एक बच्चा दूसरे बच्चे से बोला... अच्छा आँखें तेज़ कर रही है। सुनकर गुस्सा तो आया ही हँसी भी आई कि बच्चे इतनी आसानी से ऎसा कैसे बोल देते हैं।
बच्चों मे निडरता का गुण मेरे ख्याल से परवरिश से ही आता है। कल की ही बात है मै ऑफ़िस के बाहर कोरिडोर में खड़ी फ़ोन पर बात कर रही थी कि मेरे कान में आवाज़ आई। डर मत मै हूँ न। नन्ही सी वो आवाज़ मुझे अपनी ओर खींच रही थी मैने बाहर झाँक कर देखा तो पता चला कि एक पाँच साल का बच्चा अपने से भी छोटे बच्चे को कह रहा था। चल मै चलता हूँ तेरे साथ तूं डर मत मै हूँ न। सुनकर ही बहुत अच्छा लग रहा था। दिल चाहा कि उसे चूम लूं थोड़ा सा गाल खींचू जो बचपन में बड़े हमारे साथ करते थे। मैने बाहर आकर उसे प्यार से पूछा कहाँ जा रहे हो बेटा। वो बोला आपको कहाँ चलना है। एकदम से झंन्नाटेदार थप्पड़ की सी आवाज़ आई। मै साहस करके बोली अभी तो आप इसे कह रहे थे कि चल मेरे साथ डर मत वही पूछ रही हूँ आप कहाँ जा रहे हो। वो फ़िर उसी टोन में बोला... पहले आप बताईये आपको चलना कहाँ है... कुछ देर बाद रुक कर बोला अच्छा सोच कर बता देना कि आपको चलना कहाँ हैं। मै उसे देख कर ठगी सी खड़ी रह गई ऎसा लगा जैसे वो बड़ा है और मै उसका बच्चा और मेरे गाल खींच कर परेशान कर रहा है। आखिर उससे पीछा छुड़ाना मुश्किल लगा तो मैने उसके घर को हथियार बनाया और पूछा तुम इसी पास वाले घर में रहते हो न सुनते की वो सर पर पैर रख कर भाग गया। 
किस्से तो और बहुत हैं जो इन नटखटों की नटखटी बातों से मन में घर कर गये हैं। ऎसा ही एक नटखट कल राँझना मूवी मे देखा जो छुटपन में ही एक मुस्लिम लड़की का आशिक हो गया। लो कर लो बात।

Friday, April 12, 2013

आओ मोटे लोगों आदोंलन करें... मोटापा ज़िंदाबाद

आज नवभारत में
 


पिछले दिनों एक खबर सुनने में आई कि समोआ एयरलाइंस मोटे लोगों से दोगुना किराया वसूलती है। यह कंपनी अमेरिकी समोआ द्वीप के लिए हवाई सेवा उपलब्ध कराती है। उसमें यात्रा के लिए एक किलो ग्राम वजन के लिए एक से 4.16 डॉलर तक अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। इस यात्रा के दौरान यात्री के सामान और उसके अपने वजन में कोई फर्क नहीं किया जाता। तो क्या मोटे लोगों का वजन उठाते-उठाते रिक्शे वालों की तरह हवाई जहाज वाले भी उकता गए हैं? हद हो गई भैया। मोटे बेचारे हर जगह लूटे जा रहे हैं। एक तो मोटापे की वजह से खाना ज्यादा पड़ता है। कपड़ा ज्यादा लगता है। दूसरे इस महंगाई ने जान निकाल कर रख दी है। जो लोग चार लोगों का अकेले खाते हैं, उन पर तो कहर टूट पड़ा है।
अब पार्टियां या शादियां रोज-रोज तो होती नहीं जो काम चल सके। महाकाय शरीर छुपाये छुपता भी नहीं है। मेजबान संदेह की दृष्टि से देखता है कि यह दूसरी प्लेट खा रहा है या चौथी? मोटे लोगों के खिलाफ हर जगह साजिश हो रही है। ब्रिटेन के एक ट्रस्ट ने तो मोटापा कम करने पर इनाम की घोषणा कर दी। लेकिन बात यहीं तक नहीं रही। अब ब्रिटेन ने एक और योजना बना डाली है जिसके मुताबिक मोटे लोगों के अंतिम संस्कार के लिए 40 पाउंड का अतिरिक्त कर देना पड़ेगा। क्या इससे मोटापा कम हो जाएगा? ये तो भैया और भी जटिल समस्या हो गई कि बेचारे मोटे लोग जीते जी ही जेब ढीली नहीं करें वरन मरते-मरते घरवालों की जेब से वसूली भी करवा के जाएं।
अमेरिका की भारोत्तोलक हॉली मैनगोल्ड को इस बात पर गहरी आपत्ति है कि मीडिया और जनता उन्हें मोटी कहती है जबकि वो एक अच्छी एथलीट हैं। अब वजन का कांटा उनके चढ़ते ही 150 को पार कर जाए तो उनका क्या कसूर? उन्हें तो अपने मोटापे पर गर्व है। वह इस बात को गलत बताती हैं कि खेलकूद के लिए छरहरी काया होनी चाहिए। बिल्कुल ठीक कहती हैं वह। शरीर क्या होता है, जज्बा होना चाहिए।
वैसे अमिताभ बच्चन जी ने गाया भी है कि जिसकी बीवी मोटी उसका भी बड़ा नाम है। पर लगता है कि यह गाना समोआ एयरलाइंस ने नहीं सुना। उन्होंने शायद वह हरियाणवी गीत सुन लिया होगा-जिसकी बीवी मोटी उसकी आफत होरी सै दरवाजे में फंस गई तो खिचम खाची होरी सै। इसलिए हवाई जहाज वालों ने क्लीयर बोल दिया है, भैया कि एयरलाइनें सीटों पर नहीं चलती हैं, वे वजन पर चलती हैं। जैसे हम अतिरिक्त वजन नहीं चढ़ाते वैसे ही भारी यात्रियों को नहीं चढ़ाएंगे या उनसे ज्यादा वसूलेंगे। लो जी कर लो बात, आदमी न हुआ सब्जी-भाजी, सूटकेस हो गया। यह तो मनुष्यता का अपमान है। उसकी स्वतंत्रता पर रोक है कि भैया यह मत खाओ, यह मत पीओ। इतना मत सोओ। फिर इस जिंदगी का मतलब क्या रह जाएगा। ऐसा सोचने वाले क्या चाहते हैं कि कोई चैन भर नींद भी न ले? आखिर नींद और आलस्य भी तो प्रकृति की ही देन है। और चटोरापन भी तो प्रकृति ने ही दिया है न।
अब जल्दी ही स्लिम बनाने के लिए नई - नई तिकड़में शुरू हो जाएंगी। कोई स्लिम टी पिएगा , तो कोई कैप्सूल खाएगा कि जल्दी से जल्दी पतला हो जाऊं। इंग्लैंड में वैज्ञानिकों ने एक ' बुद्धिमान ' इलेक्ट्रॉनिक माइक्रोचिप बनाया है जिससे मोटापा घटाया जा सकेगा। अब यह प्रकृति के काम में हस्तक्षेप तो नहीं तो और क्या है। लेकिन मोटे लोगों की ओर से अभी तक इसका कोई विरोध नहीं हो रहा है। समझ में नहीं आता कि उनमें इतनी हीन भावना क्यों है। वे क्यों नहीं पूरे आत्मविश्वास के साथ संगठित होते हैं ? उन्हें भी ग्रीन पार्टी की तर्ज पर ओबेस पार्टी या किसी और नाम से पार्टी बना ही लेनी चाहिए। एक बार वे संगठित हो जाएं तो फिर किसी भी देश की सरकार या कंपनी की मजाल नहीं कि वह कोई मोटापा विरोधी कदम उठा सके।




Friday, April 5, 2013

घूरने वालों ने दी कुर्बानी ( एक व्यंग्य टिप्पणी)


हिंदुस्तान के सम्पादकीय पृष्ठ पर नश्तर कॉलम में प्रकाशित ( देखते देखते चले गये देखने वाले)

सुना है घूरे के दिन भी फिरते हैं तो भला घूरने वालों के दिन क्यों नही फिरेंगें? सरकार ने जबसे ये नियम लागू किया गया है कि घूरने वालों या पीछा करने वालों पर गैर जमानती कार्यवाही की जायेगी तब से तमाम ब्यूटी पार्लरो का चलना कम हो गया है। हाँ पुरुष पार्लर पूरे जोर-शोर से चल रहे हैं। पुरुष कभी बाल सैट करवाते हैं कभी मूँछे सैट करवा कर इतराते हैं। कि अब हमें देखो तुम्हें देखने वाला कोई नही। यह भी कोई बात हुई भला जब देखने वाला ही कोई नही तो हम महिलाओं का तो बहुत ही बुरा हाल हो गया है, अब सारी की सारी महिलाये हॉलीवुड स्टार मेगन फॉक्स तो हैं नही जो घूरे जाने से नफ़रत करती होँ। हमारे देश में तो एक्ट्रैस नई-नई स्टाइल के कपड़े पहनती ही इसलिये है कि अधिक से अधिक उनके फ़ैन हों और फैन तो भैय्या तभी बनेंगे जब किसी अदाकारा को घूर-घूर कर निहार कर न देख लें। 
 अधिकतरों घरों मे अल्ताफ़ राजा का गाना सुनाई दे रहा है मै कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किसके लिये। जैसे कि बाल बनाना सुन्दर कपड़े पहनना ही पडौसी के लिये किया जाता है कि आप पड़ौसी घूरो हमें। सही भी है साड़ी के साथ कुछ भी मैचिंग लगा कर श्रीमान जी से पूछो कि मै कैसी लग रही हूँ बोलते हैं अरे हमेशा जैसी लग रही हो या ठीक है यार तुम अच्छी ही लगती हो। जबकि पडौस वाले शर्मा जी बड़ी पारखी नज़र रखते हैं जब भी देखते हैं कहे बिना नही रहते हैं, ओह्ह भाभी यू आर लुकिंग गोर्जियस... या ये साड़ी तो गज़ब लग रही है... या आपको पहनने का सलीका आता है, सबके बस की बात नही। सोचिये ये अमृत-तुल्य वाक्य अब कौन बोलेगा। पर कहते हैं न अपना सिक्का खोटा हो तो दोष दूसरे को क्या दें। या तो ये श्रीमान जी की करतूत है जब भी शर्मा जी तारीफ़ करते थे उनसे चिढ़ जाते थे या विदेशी ताकतों का हाथ है जो न तो मुन्नी को बदनाम होते देख पाये न शीला को जवान।

एक ब्रिटिश संस्था कोडैक लेन्स विजन ने १८ से ५० साल के लोगों की राय को आधार बनाकर रिसर्च
की तो पता चला पुरुष अपनी ज़िंदगी का पूरा एक साल लड़कियों को घूरने में कुर्बान कर देता है। दिन भर में एक-दौ नही तकरीबन दस लड़कियों को घूर लेता है। ४३ मिनिट तक महिलाओं या लड़कियों को आँखें फ़ाड़ कर देखने या निहारने में हर दिन लगाता है। जबकि महिलायें पूरी ज़िंदगी के ६ महिने पुरुषों को घूरने या निहारने में लगाती हैं। लेकिन लगाती तो है ही।  मै पूछती हूँ सरकार से क्या सदियों से चली आ रही ये कुर्बानी आज यो हीं व्यर्थ चली जायेगी।

अब कोई आँख से भैंगा हो तो बेचारा देखेगा कही दिखाई देगा फ़लाँ- फलाँ को घूर रहा है अब बताओ क्या करेगा वो? आँख फोड़ ले क्या?।
 प्रणब दा कितनें अच्छे से समझते है इस बात को कि जब तक लड़के-लड़्कियों  एकतक दूसरे को ध्यान से देखेंगे नही पसंद कैसे करेंगे । और पसंद नही करेंगे तो शादी विवाह जैसी रस्में भी नही होंगी। वाह प्रणब दा। कभी-कभी मुझे लगता है सरकार एक तीर से कई शिकार करती है। शादी नही तो जनसंख्या कम और महगाँई भी कम बेरोजगारी भी नही रहेगी। वाह भई वाह।  
मेरे खयाल से हमारे देश में कम से कम दस प्रतिशत दस साल के बच्चे, तीस प्रतिशत नौजवान और साठ प्रतिशत बुढ़ऊ नौजवान ऎसे हैं, जो घूरा-घूरी में लगे रहते हैं। और उनका नित्यप्रति घूरन प्रक्रिया द्वारा आई टॉनिक लेने का नियम बना हुआ है। अब ये आई टॉनिक पर भी रोक लग गई तो सोचिये देश की आँखों का क्या होगा। और यदि सुरक्षा कर्मचारी भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लेंगे यानि की पर्यटको को घूरेंगे नही तो देश की सुरक्षा कैसे होगी? उनमें से कोई बम फ़िसल गया तो क्या होगा। यह अत्यन्त गहन चिन्तन का विषय है। सरकार को देश की सुरक्षा का ख्याल तो रखना ही होगा। 
देखिये ब्रिटिश सरकार ने तो साबित कर दिया है कि घूरे बिना काम नही चलेगा हर इंसान में विपरीत सेक्स को घूरने की फितरत होती है. इंसान चाहकर भी घूरने की आदत छोड़ नहीं पाता। अब सरकार से कोई कहे कुत्ते की पूँछ को सीधा करके दिखाये। चाहे जितने साल नली में रखने की सज़ा दे दो रहेगी टेड़ी न!  तो भैय्या इश्वर ने आँख दी है काम है देखना, घूरना, निहारना। जाने कितनी माओं ने अपने बच्चों का नाम नैनसुख रखा होगा। ताकि बड़ा होकर नैन सुख प्राप्त हो सके। हे ईश्वर सरकार को कोई तो समझाये घूरने वालों से अपनी बुरी नज़र हटाये। मुझे तो फ़िक्र हो रही है हाय अल्लाह अब कौन देखेगा हमें।

सुनीता शानू