Tuesday, September 2, 2014

चस्का किटी पार्टी का (साहित्य अमृत में प्रकाशित)




चस्का कोई भी हो जब लग जाये तो समझोआधा दिमाग तो गया। कुछ ऎसा ही हाल हुआ हमारे साथ भी। हुआ यूँ कि संपादक महोदय ने बुलाया और कहाआजकल किटी पार्टी का चस्का महिलाओं में तेज़ी से बढ़ रहा हैआप ऎसा कीजिये कि इस विषय पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिये। और कल के अखबार में हैडिंग रहेगी चस्का किटी पार्टी का। अब भला ये भी कोई चस्के वाली बात है। दिल में तो आया कि कह दूंसर आजकल तो सबको मोबाइल का चस्का है जिधर देखिये मोबाइल ही मोबाइलवो चाहे कम्पनी का मालिक हो या कबाड़ी वाला। एक से एक महंगा फोन खरीद कर हाथ में पकड़ना शान बन गई है, और ज्यादा ही है तो लड़कियों और महिलाओं में विश्व सुंदरी दिखने का चस्का है। सासू माँ को टी वी सीरीयल का चस्का हैससुरजी को अखबार काबच्चों को गेम का और श्रीमान को चाय का चस्का है। यहाँ तक की कामवाली बाई को भी दूसरों की बात सुनने का ऎसा चस्का है कि पूछिये मत जब तक आयात-निर्यात न हो जाये बातों का उसे उल्टियां आने लगती है पेट में अफ़ारा और खट्टी डकारे आने लगती है। इसी लिये तो कहती हूँ चस्का आधा दिमाग तो खाली कर ही देता है। बहरहाल सबसे पहले मुझे किटी पार्टी का पता लगाना है। तभी चस्केबाज़ों का पता लग पायेगा। मुझे टेंशन में देख घर के सभी सदस्य किटी पार्टी की खोज खबर में लग गये। सबसे पहले अम्माजी का व्याख्यान सुनने को मिलाउनका मानना है कि आम आदमी पार्टी की तरह कोई पार्टी होगी। बच्चों से भी मम्मी की परेशानी देखी नहीं गईझट-पट अटकलें लगाने लगे...टिंकू बोला-.मम्मा किटी तो बिल्ली को कहते हैंचुन्नू ने भी हाँ में हाँ मिलाई- हाँ मम्मा मैने देखा थाएक बार बहुत सारी बिल्लियाँ मिलकर चूहा खा रही थी। ये लो बच्चों ने तो अच्छा अर्थ निकाल दिया था। अभी बात खत्म भी नही हुई थी कि श्रीमान जी टपक पड़े। अरे क्या सुन रहा हूँ मैतुम किटी पार्टी की ही बात कर रही हो न! क्या सचमुच तुम किटी ज्वाईन करोगी। उंह बस इन्ही की कसर थी। जबसे ऑफ़िस में मिसेज़ बत्रा आई हैं ये तो चाहते हैं मै भी उन सरीखी बन जाऊँ और साधारण लिबास छोड़ कुछ स्टाईलिश नजर आऊँ। चलिये चलते हैं मैने कहा और वो बिना कुछ पूछे ऎसे चल दिये जैसे समझ ही गये कि श्रीमति जी कहाँ चलने को बोल रही है। ऎसा होता है चस्का कि आदमी बिना-सवाल जवाब के अपनी ही रौ में चलता चला जाता है। हमें देखते ही मिसेज़ बत्रा उछल पड़ी अरे मिसेज़ शर्मा आप। मैने मुस्कुराने की बहुत कोशिश की लेकिन वो कोशिश भी हवा हो गई जब उन्होनें स्टाइल से शर्मा जी की पीठ पर धम से हाथ मारा और कहा, “ऎ नॉटी आखिर आज तुम पकड़ में आ ही गया। मै समझ नहीं पाई कि ये कैसी पकड़ थी खैर सोचने को बहुत कुछ बाकि था। मैने शुरुआत की मुझे किटी पार्टी के विषय में जानना है। जानना नहीं है मिसेज़ बत्रा आप मेरी मिसेज़ को आपके साथ शामिल ही कर लो। मैने बहुत नानुकुर की कि जरुरत क्या है मुझे जो लिखना है इन्हीं से पूछ कर लिख डालूंगी। लेकिन श्रीमान लगे भाषण देने। एक सच्चा पत्रकार आँखों देखी लिखता है। सुनी-सुनाई नहीं। मुझे भी लगा कि जब तक मै सभी लोगों के साथ शामिल होकर नही देखूंगी अच्छे से लिख नहीं पाऊंगी।
खैर किटी पार्टी ज्वाइन हो गई। महिने की पंद्रह तारीख को मिसेज़ बत्रा के घर में होगी किटी पार्टी फिर शर्मा के और उसके बाद मेरे यहाँ। तब तक मुझे सब कुछ समझ लेना है।
आखिर किटी पार्टी में जाने का दिन आ भी गया। सुबह से ही शर्मा जी लगे हुए थे कभी चाय बनाये कभी पूछें तुम कब तैयार हो जाओगी। अरे भई किटी पार्टी में ही तो जाना है किसी की बरात में नहीं। अच्छा देखो तुम्हे बहुत अच्छा लगेगा वहाँ जाकर। मेरे लिये अपने पसंद की साड़ी अलमिरा से निकालने के बाद ही उनको तसल्ली हुई। खैर घर के काम निबटा मै झटपट तैयार हुई और मिसेज़ बत्रा के यहाँ पहुंची। एक से बढ़कर एक खूबसूरत महिलायें थी वहाँ। ऎसा नही था कि पैसे वाले घरों से थीमिडिल क्लास की औरते भी इस तरह तैयार हुई थी कि यह समझना मुश्किल था कि किस वर्ग विशेष से हैं। मिसेज़ बत्रा भी स्लीव लेस टॉप और शार्ट्स में बहुत स्मार्ट लग रही थी। सभी की एक से एक बढ़कर ड्रेस थी। देखकर लग रहा था जैसे फैशन शो मे आई हैं। पार्टी में प्रफ़्यूम की भरमार थी । लगता था मै किसी इत्र की दुकान पर आ गई हूँ। खैर मै सिमटी सिमटाई एक कौने में दुबक गई। मिसेज़ बत्रा ने आवाज उठाईसखियों हम लोग सारा-सारा दिन मशीन की तरह काम करते हैं। क्या थोड़ा समय भी खुद के लिये नही निकाल सकतेहमारे पति और बच्चे यहाँ तक की सास और ननद भी आराम और छुट्टी का दिन मना लेती हैं तो क्यों नही हम भी एक दिन खुद के लिये जियेंसुबह आंख खुलने से लेकर नींद से पलके बोझिल होने तक सिर्फ और सिर्फ काम ही काम..।कब मिलेगा आराम?
बात में दम था मुझे लगा सचमुच घर में सभी को अवकाश मिलता है आराम मिलता है। मेरे आराम का दिन तो कोई भी नही होता। छुट्टी के दिन पतिदेव चाय की फरमाईश करते दिखेंगे तो बच्चे कहेंगें मम्मी आज कुछ अच्छा सा बना दो। जैसे कि रोज खराब सा खाया जा रहा था। और कुछ नहीं तो संडे देखते ही ननदें टपक आती हैं क्या बतायें भाभी आराम तो मिलता ही नहीं सोचा एक दिन तो मायके में जाकर आराम कर लें। ये भी कोई बात हुई सबको अपने आराम कि पड़ी है। अच्छा सोचा श्रीमान जी ने पत्नी हूँ न उन्हें ही फ़िक्र होगी कि मेरी पत्नी भी थोड़ा इंजाय कर ले।
कुछ देर में खाने-पीने का दौर शुरू हुआ। खानें में मूंग की दाल का हलवामूंग की दाल की बर्फ़ीमूंग की दाल का चिल्ला और मूंग दाल के पापड़मूंग के आटे ही रोटी। सबकुछ मूंगमय होना रौचक लग रहा था। मुझसे रहा नही गया आखिर पूछ ही लिया मिसेज़ बत्रा क्या आपके यहाँ मूंग के खेत लगे हुए हैंया आपकी राशन की दुकान है जो इतने महंगे भाव की मूंग को पूरे मीनू में ठूस दियाउन्होने कहा कि ऎसा करके वो बाकी सबकी छाती पर मूंग दलती है।
धीरे-धीरे चुगलियों का दौर शुरु हुआसबसे पहले सास-ननद की बातें शुरू हुई... होते-होते मौहले की औरतें जो किटी पार्टी में नही आती उनकी बाते हुई। पुरुषों के घूरने की बातें भी शामिल थी चुगलियों में। बात यहाँ तक बढ़ गई कि वे एक दूसरे के पतियों को भी घूरा घूरी के मैदान में घसीट लाई। कुछ महिलायें किटी में आई महिलाओं पर छींटा कशी करने से भी बाज़ नही आई। मेरा तो पहला ही दिन था सो सबकी हमदर्दी थी कि मुझे सीखने में समय लगेगा।एक ने कहा शायद गाँव की है। अच्छा। ओह। बेचारी जाने कितने ही शब्द ऎसे मिल रहे थे जैसे पुरस्कार बट रहे हो। पहले दिन कुछ चस्के सा मुझ में नही जागा। हाँ एक बात तो अच्छी थी किटी पार्टी में कि सब मिलजुल कर सास-ननदघर-परिवार सब पर भंड़ास निकाल लेती हैं। और फ़्री माइंड होकर घर जा पाती हैं।  
घर आकर शर्मा जी को सब कुछ बताया।  बहुत सोचविचार किया गयाकि उन लोगों के साथ रहना है तो खुद को बदलना तो पडेगा ही
 सो मिसेज़ बत्रा के साथ पार्लर गई और बाल कटवा आई। घर में सब हँस रहे थे। बच्चे तो ताली बजाने से भी नहीं चूके,... हाहाहा मम्मी देखो क्या बन गई।जल्दी-जल्दी जींसटी-शर्ट पहना। महंगा परफ़्यूम लगाया। इस बार हँसने की बारी कमला बाई की थी। अरे वाह मेमसाब आप तो बिल्कुल ऎ हिरोइन की माफ़िक लग रहा है। सादा सलवार सूट कोने में पड़ा रो रहा था लेकिन कमला बाई की गोद में गिरकर शान्त हो गया। कम से कम शर्मा जी को घूरा-घूरी कांड से तो निकाल ही पाऊंगी। अभी पर्स उठा निकलने ही वाली थी कि टिंकू की आवाज़ आई मम्मी कुछ अच्छा सा। और शर्मा जी ने उसे अपने पास खींच लिया।
मिसेज़ गुप्ता के यहाँ जैसे ही धमाकेदार एंट्री कि सबके दिमाग के फ़्यूज उड़ गये। देख कर हाय-हल्लो करने लगी। इतनी प्रशंसा तो कभी सुनी ही नहीं थीपागलों की तरह घर का बाहर का काम करती रही कभी किसी ने ध्यान ही नही दिया मेरी सुंदरता पर। खैर दिल गर्व से फूला नही समा रहा था। बार-बार टेलिफ़ोन की घंटी बज रही थी आज सबको उसकी याद आ रही थी। कितना बदल गया है सब दो ही महीने में। खान-पान से लेकर उसके व्यवहार और सोसायटी में कितना परिवर्तन आ गया था। नये दोस्त बन गये हैं। जब-तब घर में होटलों में पार्टियां होने लगी। किटी पार्टी के चस्के ने घर में खाना छुड़वाकर होटलों पर निर्भर कर दिया। सुबह जिम तो शाम को क्लबों के चक्कर लगने लगे। नई ड्रेसेज़ नई ज्वैलरी सब कुछ नया-नया। सचमुच फ़ुर्सत ही नहीं है कुछ सोचने की। घर आते-आते इतनी थकान हो जाती कि एक गिलास पानी का उठाना मुश्किल हो गया। सास-ससुर को इंतजार है कि कब बहू घर लौट कर आये तो उसे बतायें आजकल उनकी बेटियों ने घर आना बंद कर दिया है। क्योंकि यहाँ आकर भी काम ही करना पड़ रहा है। बच्चे भी कुछ अच्छा सा बनने के इंतजार में हैं।
लेकिन हाँ स्टेटस बदला देखकर रिश्तेदारों के चेहरे भी मुस्कुराहटहँसी और अपनेपन के मेक अप में नजर आने लगे। शायद इसीलिये मशहूर शायर निदा फ़ाजली साहब ने कहा होगा कि,...
हर आदमी में बसते हैं दस बीस आदमी... जब भी किसी को देखना कई बार देखना।
शर्मा जी की शकल देख कर लग रहा था कि अब वे किटी पार्टी का नाम तक भूल गये हैं। जब से उनकी जेब पर डाका पड़ा है वे गुमसुम से नजर आते हैं। आखिर एक दिन जेब कराह उठी सब्र का इम्तिहान पूरा हुआ, “कब पूरी होगी तुम्हारी स्क्रिप्ट हद हो गई है

सुनीता शानू


Tuesday, July 8, 2014

(आज अमर उजाला में प्रकाशित) आलू-प्याज कैबिनेट मीटिंग

आलू-प्याज कैबिनेट मीटिंग

potato onion cabinet meeting

 सुनीता शानू मंगलवार, 8 जुलाई 2014 अमर उजाला, दिल्ली Updated @ 1:59 AM IST

आज रात आलू जी ने एक मीटिंग बुलवाई, जिसका एजेंडा था कि जब-जब सरकारें बनती हैं, हम पर ही दबाव क्यों बनाया जाता है। वह बोले, कभी गोदाम में हमें इतना ठूंस-ठूंसकर भर देते हैं कि हमारा दम घुट जाता है और हम मुंह दिखाने के काबिल भी नहीं बचते। हमें जबरन कीमत बढ़ाने के चक्कर में पकड़ कर रखा जाता है, बाद में पता चलता है कि लोग आलू खाना ही बंद कर देते हैं, यह कहकर कि इससे डायबीटिज हो जाती है। पिछले दिनों जब मैं गोदाम में सड़ रहा था, तब सबने मटर के समोसे खाने शुरू कर दिये थे। मटर भाई, क्या मैंने सब्जी को जायकेदार बनाने में तुम्हारी मदद नहीं की थी, जो तुम अकेले ही समोसे का स्वामित्व ले बैठे थे। आलू जी बोले जा रहे थे, साथ ही, पसीना पोछ रहे थे। प्याज खुद को बनाने-संवारने में इस तरह लगा हुआ था, जैसे उस पर कोई आंच आने वाली ही न हो। गुस्से में आलू जी फिर बोले, महाशय, आपको तो जैसे कोई फिक्र ही नहीं है। आप जानते हैं कि यह सब आपका ही किया धरा है। मुझे तो अंदाजा ही नहीं था इस बात का, यदि खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने न बताया होता। तुमने तो यार, कई सरकारें पलटकर रख दी है। दिल्ली का मामला कोई भूल सकता है क्या? फिर भी भाव खाना छोड़ो और कोई तरीका सोचो, वरना इस बार मंत्रियों की बैठक में मेरे साथ तुम भी गोदाम में सड़ोगे। प्याज मुस्कराते हुए बोला, मैं कतई नहीं सड़ने वाला आलू जी, चाहे वेज हो या नॉनवेज, मुझे तो हर सब्जी में जगह मिलती है। पिछले दिनों मै दौ सौ रुपये तक बिका था। मेरा रूप रंग ही ऐसा है कि सबके मुंह का स्वाद बदल जाता है। अमीर ही नहीं, गरीब भी मुझे पाने के लिये पूरे प्रयत्न करता है, इसीलिए सरकार से भी भिड़ जाता है। दरअसल मुझमें कई परतें हैं, और इन परतों के बीच ही सत्ता की कोई कमजोरी छिपी है। इसी कारण जो मंत्री जी भिंडी, टिंडा, परवल या मटर से नहीं घबराते, वे प्याज से घबरा रहे हैं। सारी सब्जियों ने प्याज का समर्थन करते हुए कहा, तुम बिल्कुल सही बोल रहे हो भाई।

Tuesday, March 11, 2014

चाय उबली ही नहीं दूध डाल दिया




चाय उबली ही नहीं दूध डाल दिया
जबसे मोदी जी ने “नमो” टी स्टॉल खोली है, लोगों ने “शनो” टी स्टॉल पर आना ही बंद कर दिया। क्या बुराई थी बताओ तो? मै तो बदले में वोट भी नहीं माँग रही थी। जाने कितनी ही  बार कविता सुनाने के चक्कर में, लोंगों को एक के साथ एक चाय फ़्री भी पिलाई थी, लेकिन भावी प्रधानमंत्री दुकान ही खोल ले, तो लोग कवि की दुकान पर क्यों आयेंगें। ज्यादा ही दिल था तो मेरी दुकान पर ही पोस्टर लगा लेते, मेरी चाय का प्रोमोशन हो जाता। एक कवि के बच्चों की दुआयें मिलती सो अलग। मुझ अदना से कवि के पेट पर लात मार के क्या मिला बताओ तो। चाय के साथ-साथ एक-आध किताब ही बिक जाया करती थी। सोचा था चाय की दुकान पर ही एक मुशायरा करवा लूंगी। बहुत सारे लोग आयेंगे कविता भी सुनेंगे और साथ ही चाय भी बिकेगी।
लेकिन हे मोदी चाचा आपकी नमो चाय ने तो सारे सपनों पर पानी ही फेर दिया। मुझे पता होता कि आप भी चाय वाले हैं, और भविष्य में चाय बेचेंगे, तो भैया मै तो चाय की दुकान ही न खोलती। कोई छोटी-मोटी समोसे-कचौरी की दुकान खोल लेती। कम से कम ये कम्पीटिशन तो नही भुगतना पड़ता मुझे।

काम तो बहुत सारे थे आपके पास, जैसे कवियों के लिये चौपाल बनवाते, कवियों के बच्चों की फ़्री शिक्षा का जुगाड करते, कवियों की किताब स्कूलों में अनिवार्य करवाते। सोचिये देश का बच्चा-बूढ़ा-जवान सब आपकी रैली में दौड़ लगाता, कविता सुनाता। कवियों की पत्नियाँ आपको इतनी दुआयें देती की झोली छोटी पड जाती। लेकिन आपको मेरा ही राइवल बनना था ? पहले क्या कम हैं, देश में चाय वाले जो आप भी उतर आये चाय के मैदान में।

आप जानते थे, चाय का सीधा रास्ता आदमी के दिल तक जाता है। हम मेहमान की खातिर दारी भी चाय पिला कर ही किया करते है। और तो और बड़े-बड़े काम चाय-पानी के बिना सम्भव नही होते। राजनीती की सारी बातें चाय,बीड़ी या पान की दुकान पर ही हो जाती हैं।

समझने वाली बात तो ये है कि पहले लालू ब्रांड पटाखे आये, फिर लालू ब्रांड आम, और अब लालू जी ने निकाल दिया है- लालू ब्रांड चाय विद चारा बिस्किट। साथ ही अब मोदी जी ने भी मोदी ब्रांड चॉकलेट, मोबाइल कवर, टी शर्ट, जैकेट जाने क्या-क्या सामान मार्केट में आ गया है। अब आप ही ब्रांड अम्बेस्डर बन जायेंगे तो बेचारे अभिनेताओं को कौन पूछेगा? खैर लालू जी बिस्किट बेचे चाहे राहुल दूध पिलाये। बस आप एक कवि की पुकार सुननी ही होगी।


अच्छा मान लिया आप चाय को देश का भविष्य बना रहे है, लेकिन एक बार सोच कर देखिये, क्या यह अच्छा लगेगा, कि हमारे देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद जब आप बड़ी-बड़ी राजनैतिक मिटिंग्स में बैठे होंगे, अचानक खयाल आयेगा, चाय-पत्ती मंगानी है, अरे फलां व्यापारी दूध देकर गया कि नहीं? सोच रहे होंगें कि चाय में उबाल आया कि नहीं? और कहीं गलती से चाय उबली ही नही दूध डाल दिया तो... देश के भविष्य का क्या होगा।

शानू

Thursday, February 6, 2014

आज अमर उजाला में प्रकाशित एक व्यंग्य... सच बता, किसकी भैंस है तू

ओए, तू किसकी भैंस है बोल! ऐ, रुक कहां जाती है? बेचारे सिपाही कभी भैंस को ढूंढेंगे, कभी कुत्तों को। देश की भैंस जाए पानी में, हमको क्या। हां, मंत्री जी की भैंस का सवाल है, भैया। भैंस न हुई, फिल्म की हीरोइन हो गई, जो कभी टीवी, तो कभी अखबार की सुर्खियां बन गई। आखिर सबको नाकों चने चबवा कर मिल भी गई।

कौन जाने! चोरी हुई या भाग गई थी। जैसे अमेरिकी जेल से कैदी भाग गए थे और सर्दी के मारे वापस आ गए जेल में। लेकिन इन भैंसों के चक्कर में बेचारे दो सिपाहियों की भैंस तो गई पानी में। यों कहें कि दोनों को लाइन हाजिर कर दिया गया, कि उनके रहते भैंस चोरी हुई, तो कैसे हुई। अब कोई यह बताए कि बेचारे सिपाही कैसे पहचानेंगे कि ये भैंस जो बीच रास्ते में घूम रही हैं, मंत्री जी की हैं। भैंस की भी कोई पहचान है भैया, भैंस तो बस भैंस है। मंत्री जी की भैंस पर क्या मंत्री जी का पोस्टर चस्पां था? या मंत्री जी की फोटो लटकी थी गले में, जो कोई पहचान पाता?

सबसे सच्ची बात, भैंस कहलाना किसे पसंद है? भैंस शब्द सुनते ही काली डरावनी विशालकाय आकृति आंखों के सामने कौंध जाती है। क्या आपने कभी सोचा है कि भैंस को कितना बुरा लगता होगा? भैंस बेचारी ब्यूटी पार्लर जाकर भी अपना रूप संवार नही पाती। ऐसे में भैंस जो कोई मंत्री जी की हो, तो काहे सुनेगी बेकार की बातें? इसका दूध पी-पीकर मंत्री जी जवान हुए हैं, इसका खालिस दूध पीकर ही कुशलता पूर्वक पदभार संभाल पाते हैं। लेकिन इस नेकदिल दूध पिलाने वाली भैंस माता को खिलाते क्या हैं- भूसा! सुलाते कहां हैं-तबेले में! क्या भैंस को यह अच्छा लगता होगा? आप सोएं मखमल पर और भैंस माता सोए तबेले में। एक खटिया भी लगा देते, तो क्या बिगड़ जाता। अरे घर का कुत्ता तक मंत्री जी के सोफे पर चढ़कर सोता होगा। चार लोग गोद में उठाए घूमते होंगे।

अच्छा चलो, भाग गई या भगा ली गई। भैंस की मर्जी। सारे के सारे पुलिस वाले भैंस को ढूंढने में लग गए। अब सोचने वाली बात है कि हमारे देश की पुलिस करे, तो क्या करे? अपराधियों को पकड़े या भैंस पकड़े। अच्छा होता, मंत्री जी भैंस के गले में भी आधार कार्ड टंगवा देते। ताकि सड़क पार करते वक्त हर सिपाही रोककर आधार कार्ड तो देख ही लेगा कि किसकी भैंस किसके खेत में चर रही हैं। बेचारा सिपाही पूछता भी तो किससे पूछता कि ऐ भैंस, तू कहां जा रही है।

सुनीता शानू

Tuesday, January 28, 2014

एक लाइक तो बनता है न जी ( नव भारत में प्रकाशित)



 सुनीता शानू

ज्यादा मत सोचिए। कोई लड़की या लड़के की फोटो को शादी के लिए लाइक करने की बात नहीं हो रही है। यहां सवाल बस एक लाइक का है। लाइक बोले तो- अंगेजी का ये लाइक चेहरे की किताब पर पसंद का एक चटका लगाना है- कि फलां की तस्वीर खूबसूरत है, तो फलां ने एक शेर लिख डाला है और चाहता है कि आप जरा लाइक का चटका लगा दें। ज्यादा नहीं, बस एक छोटी सी ख्वाहिश ही तो करता है हर फेसबुकिया कि आप आएं और एक लाइक का चटका लगाएं। सुबह शर्मा जी प्रोफाइल पर एक तस्वीर लगा आए थे। तब से बीस बार कंप्यूटर खोल कर देख चुके हैं कि किसी ने लाइक किया कि नहीं। अब सारे घर वाले तो लाइक कर ही चुके हैं दूसरा न करे तो क्या किया जाए?

वैसे एक लाइक में जाता क्या है, कर ही दो आप भी। कौन आप शादी के लिए पसंद कर रहे हो। जरा सा माउस घुमाया, क्लिक किया- हो गया लाइक। सारे दोस्तों को फोन करने पूछ चुके हैं, लाइक किया कि नहीं। यार एक लाइक का सवाल है बस। सोशल मीडिया की मानें तो 4.5 अरब लोग फेसबुक पर लाइक का चटका लगाते हैं। औसतन एक व्यक्ति 20 मिनट तक फेसबुक पर रहता है। तो क्या पांच हजार फेसबुकिया फ्रेंड्स में से पचास से भी लाइक की उम्मीद न की जाए। अरे, लोग तो किसी के बाप के मरने की खबर पर भी ऐसे लाइक का चटका लगाते हैं कि तेरा बाप मरा तो मरा। सामने वाला भी सोचता रह जाता है कि इसे मेरे बाप के मरने की खबर भी पसंद आ गई, कमाल है!

कितनी अजीब सी बात है दोस्तो, ये लाइक का चटका एक पल में बता देता है कि आप किसी को कितना पसंद करते हैं, जब आप किसी की हर बात पर चटका लगाते हैं। देखा जाए तो आपका कुछ खर्च भी नहीं हो रहा। वो कहते हैं न 'हींग लगी न फिटकरी रंग भी चोखो आवै।' किसी के मन को शांति मिलती है, कोई ये सोच-सोच कर खुश है कि इतने लोग उसे पसंद कर रहे हैं। और ये आप के लिए भी सही है। वैसे भी जब खाली बैठे हों तो करना ही क्या होगा। एक तो लॉगिन करो। दूसरे की प्रोफाइल देखो, इतना टाइम खोटा करो तो कम से कम सामने वाले को चटका लगा के बता भी तो कि देख आज मैं आया हूं कल यही चटका लगाने तुझे भी आना है। इस धंधे में बेइमानी बर्दाश्त नहीं होती दोस्तो। उसूलन तू मेरी पीठ खुजला मैं तेरी खुजलाऊं।

कुछ लोगों को तो इस लाइक का ऐसा बुखार होता है कि महिला हो या पुरुष, अपनी जवानी के टाइम की ऐसी तस्वीर चस्पा कर लेते हैं कि खुद घर वाले गच्चा खा जाएं। एक महिला काफी समय से अपने बचपन की तस्वीर लगाए थी। उसकी लिस्ट में दुनिया भर के स्कूल के बच्चे शामिल हो गए। एक बच्चा तो उसके चक्कर में ही पड़ गया। और कमेंट करने लगा-साड़ी के फॉल सा मैच किया रे...। बस एक लाइक के चक्कर में बालक पागल हुआ जा रहा था और दादी मन ही मन बोल रही थी-मुए मै तेरी दादी हूं, नासपिटे फेसबुक पर ये काम करता है। अब बताओ बच्चे को इस चेहरे में दादी दिखाई कैसे दे! वसीम वरेलवी लिखते हैं :

अपने चेहरे से जो जाहिर है छुपाएं कैसे 
 तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे।

बार - बार लाइक करने पर भी जब कोई लाइक न करे तो आदमी विक्षिप्त सा हो जाता है। इसी पागलपन के दौरे में वो नई पोस्ट लिखता है - मैं ऐसे लोगों को अपनी प्रोफाइल से डिलीट कर रहा हूं जो संवेदनशील नहीं हैं। अब ये भी कोई बात हुई , बार - बार एक ही बात सुनते आए हैं कि पुलिस ऎसे इलाकों में कर्फ्यू लगा देती है जो संवेदनशील होते हैं। फेसबुक पर कब कर्फ्यू लग जाए मालूम नहीं।

इंट्रो : एक लाइक में जाता क्या है , कर ही दो आप भी। कौन सा आप शादी के लिए पसंद कर रहे हो ! जरा सा माउस घुमाया , क्लिक किया - हो गया लाइक।


बकरी को चाहिए उसका खोया हुआ सम्मान (नवभारत टाइम्स में प्रकाशित)




बकरी को चाहिए उसका खोया हुआ सम्मान
बतरस
सुना है कि डेंगू के कई मरीज बकरी के दूध से स्वस्थ हो गए। इससे डॉक्टर भी हैरान हैं। बकरी के महत्व को फिर से समझना होगा। समाज के हित में ऐसा करना जरूरी है।


यदि आप सोचते हैं कि दिवाली के पटाखों के साथ ही मच्छरों का भी सफाया हो गया यानी कि डेंगू का भी अंत हो गया, तो ऐसा नहीं है। डेंगू के मामले कम जरूर हुए हैं पर पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। देश भर में उसका खतरा अब भी बना हुआ है।

कुछ दिन पहले चर्चा फैल गई कि बकरी का दूध पीने से डेंगू ठीक हो जाता है। अचानक बकरी के दूध के दाम बढ़ गए। बेचारे डॉक्टर्स परेशान हैं। सोच रहे हैं कि क्या वे बकरी पर पीएचडी कर लें/

कल तक जिस बकरी की कोई औकात नहीं थी वह आज खड़ी मुस्करा रही है। गांधी जी ने बकरी को उसकी गरिमा दिलाई थी, पर उनके जाते ही हम उनके साथ-साथ बकरी को भी भूल गए। बकरी का दूध पीना लोगों ने छोड़ दिया।

मुझे याद है बचपन में कभी बकरी गुस्से में आकर सींग मार देती थी तो उसे चुड़ैल कह देते थे। बकरी की तो शक्ल ही चुड़ैल सी नजर आती थी। गाय सींग मारे या पूंछ, फिर भी माता कहकर पूजी जाती थी, बकरी की आवाज एकदम चेपू किस्म की है न! तो हम स्कूल में अक्सर दोस्तों को चिढ़ाने में एक दूसरे को बकरी की गाली देते थे कि क्या बकरी की तरह में-में लगा रखी है।

बकरी ये सब देख-देख कर थक गई थी। जाने कितने दिनों का अवसाद पाले हुए थी। आखिर एक दिन बकरी गुस्से में आकर डेंगू के मच्छर से मिली और बोली- ये इंसान हमारी कद्र कभी नहीं करेगा। तुझ पर मिट्टी का तेल डलवा देगा, ऑल आऊट से भगवा देगा और मेरा तो हमेशा से शोषण हो रहा है।

जरा सी घास डाली और दूध निकाल लिया। किसी भी पेड़ के पत्ते हों यहां तक की नीम के पत्ते, पपीते के पत्ते, सब मुझे खिला देते हैं और दूध निकाल लेते हैं। हालांकि छोटे बच्चे को दूध मेरा पिलाते हैं, दवा के रूप में भी मेरा ही दूध काम आता है लेकिन माता गाय को बताते हैं। अरे मुझे बहन ही कह देते। या मौसी कह सकते थे।

मेरे सामने ही मेरे बच्चे को मार कर खा जाते हैं। तुम्हीं बताओ भैया आखिर कब तक मैं बेइज्जती सहन करूं/ बकरी ने डेंगू के मच्छर राजा से विनती की और डेंगू के मच्छर ने रक्षाबंधन के दिन वचन दिया कि हे बहना, जब-जब ये मनुष्य मेरे क्रोध की चपेट में आएगा इनकी सारी पुश्तें तुम्हें याद करेंगी। तब इन्हें छठी का दूध नहीं तुम्हारा ही दूध याद आएगा। और यह मूर्ख मनुष्य खुद नीम, पपीते के पत्ते ही खाएगा जो इसने तुम्हें खिलाए हैं। सुनकर बकरी बहुत प्रसन्न हुई और मच्छर भाई अंतर्ध्यान हो गए। इसलिए इस साल संपूर्ण भारतवर्ष में डेंगू के मच्छर ने जब उत्पात मचाया, तो मच्छर के काटे रोगी को पपीते तथा नीम का रस पिलाया गया। साथ ही सुबह- शाम प्रसाद के रूप में मरीज को बकरी का दूध पिलाया गया। कई जगहों पर बकरी का दो घूंट दूध पचास रुपये तक में बिका है जबकि इतने में गाय का एक किलो दूध मिलता है। आज कई लोग बकरी पालने की सोच रहे हैं। बकरी को अच्छा-अच्छा खाने को मिल रहा है।

अब ये सब देख कर तो ऎसा लगता है कि हमें बकरी से हाथ मिला लेना चाहिए। गाय की जगह बकरी पर निबंध बच्चों से लिखवाया जाए और उसके दूध पर पीएचडी कर ली जाए ताकि आने वाले समय में डेंगू के मच्छर से छुटकारा मिल सके। सरकार को भी इस पर ध्यान देना होगा। पशुपालन विभाग को चाहिए कि वह बकरी पालन के महत्व को प्रचारित करे। इस तरह का कार्यक्रम गांधी जयंती पर शुरू किया जा सकता है।

सुनीता शानू

Wednesday, December 25, 2013

ड्रोन आएगा डाक लाएगा ( अमर उजाला में प्रकाशित एक टिप्पणी)




कल मैंने दादी मां को बताया कि भविष्य में आपके लिए ड्रोन से सामान भिजवाएंगे। दादी मां घबरा गई, ऐसा कैसे संभव है? सोच-विचार कर काम करना चाहिए, ड्रोन तो एक राक्षस है बिटवा। आए दिन खबर सुनती हूं, आज यहां हमला, कल वहां हमला।

अमेरिकी ड्रोन ने पाकिस्तान पर कितने हमले किए हैं, तुम्हें कुछ पता भी है! हमारे इस पड़ोसी देश में लोग ड्रोन का नाम सुनकर ही कांप उठते हैं। पता नहीं, वहां इसने आतंकवादियों के साथ कितने निर्दोषों की जान ली है। ऐसा शक्तिशाली ड्रोन सामान उठाएगा? ड्रोन अंग्रेजी का शब्द है, जिसे हिंदी में नर मधुमक्खी कहते हैं। मधुमक्खी के छत्ते में हाथ न ही डालो, तो अच्छा।

लेकिन वह दिन दूर नहीं, जब बच्चे चिल्लाते नजर आएंगे, ड्रोन आया डाक लाया। आप भी कहती नजर आएंगी, ऐ ड्रोन, चल आलू-प्याज ला।

आपको क्या लगता है कि ड्रोन थैला उठाकर बाजार जाएगा? हमें तो इस पर यकीन नहीं होता। लेकिन दिग्गज ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी अमेजन कह रही है कि अब ड्रोन यह करेगा, ड्रोन वह करेगा। जबकि ड्रोन का नाम सुन-सुनकर हमें डर लगता है कि न जाने कब, कहां हमला कर दे। इसे रडार भी देख नहीं पाता। फिर क्या पता चलेगा कि फलां ड्रोन के पास राशन है और फलां ड्रोन के पास बम।

सुना है कि यह विमान एक बार ईंधन भरने के बाद आधी दुनिया का चक्कर लगा सकता है और 18,000 मीटर की ऊंचाई पर उड़ते हुए बादल छाए रहने के बावजूद एक-एक व्यक्ति पर निगरानी रख सकता है। अब बताओ, एक-एक आदमी की निगरानी की क्या आवश्यकता है भला! इससे तो अच्छा था कि इसे पतियों की जासूसी के लिए प्रयोग में लाया जाता।

कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी, थ्री इडियट्स। उसमें भी ड्रोन रूपी एक ऐसा उपकरण दिखाया गया था, जो रिमोट द्वारा उड़ाया जा रहा था। उसकी जासूसी देखकर सब सहम गए थे। खासकर महिलाएं तो उसे देखकर डर ही गई थीं। हमें सावधान होने की जरूरत है। यह ड्रोन हमारे ऊपर बिन बुलाई आफत के रूप में आने वाला है। पहले कबूतर उड़ते थे डाक लिए, उसके बाद संदेश वाहक आए, बेतार के तार टेलीग्राम, फिर हवाई जहाज, रेलगाड़ियों द्वारा डाक आई और आने वाले दिनों में ड्रोन को डाकिया बना डालने की तैयारी है। आगे-आगे देखिए, होता है क्या!

सुनीता शानू

Thursday, October 24, 2013

अमर उजाला में प्रकाशित एक व्यंग्य टिप्पणी...

सोना नहीं, तो सोना नहीं

No sleeping without gold
उन्नाव जिले के डौंडिया खेड़ा में आजकल दिल्ली के शनि बाजार जैसा माहौल है। लोग कुदाल-फावड़ों के साथ अपने दैनिक रोजगार का साज-ओ-सामान लेकर आ धमके हैं। ये लोग दिन भर चाट-पकौड़े और गरमा-गरम जलेबियों का आनंद उठाते हैं और रात-भर जागकर सोने की तलाश में सारा किला खोद डालते हैं। संन्यासी सोने के चक्कर में हवन कर रहे हैं, तो कहीं-कहीं चोर-डाकुओं ने भी रात के अंधेरे में चुपचाप खुदाई का काम चालू कर दिया है। क्या पता, सोना डौंडिया खेड़ा की जगह कहीं और मिल जाए। एक जगह तो कुछ लोगों ने मंदिर के पुजारी को कैद कर मंदिर के अंदर का भाग ही खोद डाला।

शोभन सरकार की भविष्यवाणी पर सोना मिलेगा या नहीं, यह तो मालूम नहीं, लेकिन उन्नाव में त्योहार जैसी हलचल मच गई है। देश के नेता हों या अभिनेता, सभी की दिलचस्पी है इस सोने में। कुछ लोगों का मानना है कि पूरे देश में अनेक स्थानों पर खजाना दबा पड़ा है, बस जमीन को खोदने की जरूरत है। कहा भी गया है कि जिन खोदा तिन पाइयां...। उपकार फिल्म का गाना, मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती भी शायद किसी खजाने की खुदाई से प्रेरित होकर ही बना होगा।

पुरातत्व विभाग का मानना है कि खुदाई में एक महीना लग सकता है। तो क्या सब लोग एक महीना वहीं तंबू तानकर इंतजार करें कि कब धरती माता सोना उगलेगी और कब उनके दिन बहुरेंगे। एक महीने तक वहां बैठे रहकर साधु-संतों के भजन सुनकर दिन बिताना तो कठिन है। ऐसे में यह भी हो सकता है कि लोग गुस्से में आकर कुदाल-फावड़े लेकर ऐसी खुदाई कर दें, जो एक महीना क्या, एक दिन में पूरी हो जाए। सबकी नजर उन्नाव पर टिकी है।

चाहे कुछ भी हो जाए, खुदाई होगी। आखिर साधु बाबा की जुबान है। भई, सोना न मिला, तो गर्दन कटवा लेंगे, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। कुछ मॉडर्न कथावाचकों की पोल खुलने के कारण लोगों का साधु-संतों से भले ही विश्वास उठ जाए, पर सोने के लिए खुदाई करने में आखिर क्या जाता है!

अभी तक तो खुदाई में किले की दीवार ही निकली है। खुदाई करते-करते अंत में महाराज के सोने का पलंग निकल आया, तो क्या कर लेंगे? बाबा कहेंगे, यही तो है। इसी की बात कर रहा था मैं। लो, जितना सोना चाहो सो लो...और मेरी तरह स्वप्न देखो सोने के।

Thursday, October 10, 2013

अपना प्रधानमंत्री खुद चुने “ उपयोगी टिप्स”



कल टीवी पर “कौन बनेगा करोड़पति” देखते-देखते ये खयाल आया कि क्यों न प्रधानमंत्री का चुनाव भी इसी तरह हो जाये! है न लाजवाब सोच! अब देखिये कितने उम्मीदवार खड़े हैं लाइन में। कोई हाथ दिखाता है तो कोई हाथी। कोई ट्रैक्टर लेकर आ गया तो कोई साईकिल। आम आदमी तो झाड़ू लेकर आ गया हैं।
मुझे लगता है देश की जनता से भी पूछ लेना चाहिये था कि प्रधानमंत्री किसे बनाना चाहिये। या तो अमिताभ बच्चन हॉट सीट पर बैठ कर सभी उम्मीदवारों में से क्विज़ कॉंटेस्ट द्वारा चुने। ताकि देश की जनता को इस बात का तो विश्वास हो ही जायेगा कि हमारा प्रधानमंत्री अपनी काबिलीयत से बना है, खुद कॉन्टेस्ट जीता है। वरना अँधेर नगरी चौपट राजा। रबड स्टैम्प तो भैया किसी को भी बना दो।
ये देश का अहम फैसला है जी इसमें महिलाओं की भी राय लेनी चाहिये। यदि आप मुझसे पूछते तो मै आपको सही और उत्तम राय ही देती। क्योंकि प्रधानमंत्री सिर्फ़ देखने के लिये या कुर्सी तोड़ने के लिये ही नही होता। देश का बेड़ा पार करने के लिये भी होता है। इसके लिये कुछ जायज शर्तें तय होनी चाहिये ताकि देश का प्रधानमंत्री चुना जा सके। चलिये आपको भी बता ही दिया जाये कि हमारी "आम औरत पार्टी" ने क्या सोचा है। सबसे पहली बात प्रधान मंत्री की उम्र चालिस से पैंतालिस के बीच होनी चाहिये। प्रधान मंत्री को दुनियादारी की पूरी पहचान होनी चाहिये। किसकी बेटी का किससे साथ चक्कर है, कब कौन किसके साथ भागने वाली है, और किसकी बीवी किसे धोखा दे रही है। किसके मुह में आसाराम है...और किसकी बगल में शिल्पी छुरी है। अब इन सब बातों का पता होगा तो पहले से ही बचने-बचाने का जुगाड़ किया जायेगा।
अब मुद्दा ये उठता है कि ऎसा शातिर दिमाग किस इंसान के पास होगा। इंसान से तात्पर्य इंसान ही है, यहाँ कृपया उन सम्बोधनों पर ध्यान न दिया जाये जो गधा, उल्लू या कोल्हू के बैळ की श्रेणी में आते हैं। हाँ तो मै कह रही थी कि जो देश-विदेश की खबरों के साथ घर की खबरें भी रखे। जहाँ तक मेरा चालीस साल का तजुर्बा कहता है तो भैया ये सब बातें तो एक नारी ही ढँग से बता पायेगी।
अब अपने मोहन को ही ले लो... चुपचाप खड़ा मुस्कुराता रहता है। उसके पीछे एक औरत न होती तो देश का क्या हाल होता... आप सब जानते हैं। तो भाई लोगों सबसे पहली बात तो यही है कि प्रधानमंत्री किसी महिला को ही बनाया जाये। क्यूँ?... क्या मै गलत बोल रही हूँ?  घर को चलाना यहाँ तक की पति को चलाना देवता बनाना पूजना और काम भी करवाना। ये सारे गुण एक नारी में उपलब्ध हैं। उपलब्ध क्या है कूट-कूट कर भरे हैं जी। नारी शक्ति का मुकाबला तो देवता तक नही कर पाये हैं जिन्होने अंजाने में इसका आविष्कार कर दिया था। हम अपने घर के साथ-साथ अड़ौस-पड़ौस सबकी खोज खबर रख लेते हैं तो देश भर की क्यों नही ले सकते बताओ?
...तो भाई लोगों हमारा नेता कैसा हो...... जैसा हो। अरे.. रे मै अपने लिये नही कह रही की मुझे प्रधानमंत्री बनना ही नही है। मेरे पास तो फ़ुर्सत ही नही है। क्या करुं वरना आपका आग्रह ठुकरा दूँ ऎसी मै नही हूँ।....
लेकिन हाँ आप ऎक बार बस इमेजिन करके देखिये तो मै ये वादा करती हूँ कि मै इस बात का पर्दाफाश कर दूँगी कि तेरी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद कैसे?  ये मेरा पक्का वादा है  आपसे कि मै पूरे देश को हिला कर रख दूँगी। रुपया नीचे गिरेगा नही और डॉलर ऊपर उठेगा नही। प्याज़ भी यूँ इतरायेगा नही क्योंकि पूरे शहर में सड़क किनारे बस प्याज़ ही प्याज़ उगाये जायेंगें कि जानवर भी नही खायेंगें। रही बात डिज़ल, पैट्रोल या रसोई गैस की तो कोई न कोई विदेशी फ़ार्मूला चुरा कर डिजल पैट्रोल और गैस तो बचा ही लूंगी। हम भारतीयों को बिजली चुराने की, टैक्स चुराने की, इधर का सामान उधर करने की बचपन से आदत होती है। तो दोस्तों चाहे जो हो जाये मै हर वादा जो मैने किया है या किया नही है कुर्सी मिलने तक हर हाल में पूरा करुंगी। मैने हर परेशानी से निबटने की तरकीबें सोच निकाली है। मेरे देश के समझदार नागरिकों आप सबकी यही मर्जी है तो मै आप सब के लिये ये कुर्बानी देने को भी तैयार हूँ। वैसे ये सच है बस फ़ुर्सत ही नही है मेरे पास।

सुनीता शानू

Tuesday, September 24, 2013

अमर उजाला में प्रकाशित एक व्यंग्य टिप्पणी...

http://www.amarujala.com/news/samachar/reflections/vyang/satire-on-aam-aadmi-party/

चकला-बेलन भी ले जाएंगे

satire on aam aadmi party
अलसुबह पार्क जाने के लिए बाहर निकली, तो हैरान रह गई। मेरे घर की खिड़की, दरवाजे यहां तक कि गाड़ी पर भी कोई झाड़ू के पोस्टर लगा गया था। सामने ही झाड़ू वाली झाड़ू लगाती हुई बड़-बड़ किए जा रही थी। मैंने पूछा, क्या हुआ, तो वह बोली, का बताएं बीबी जी, औ ससुर का नाती हमार झाड़ू पर हाथ साफ कर गया। ऐकै ही झाड़ू खरीदे रहे, ओकू भी कल आम आदमी पार्टी मा लेकर झण्डा फहराए रहे। आए तो झाड़ू सै मार-मार के ऊ का समझाई दें।

हां, सही तो कह रही है झाड़ू वाली कि झाड़ू ही लेकर चला गया उसका मर्द नारे लगाने, अब करे तो वह क्या करे? घर से निकलते समय झाड़ू वाली झाड़ू लगाती नजर आया करती थी, लेकिन आज तो सारे रास्ते भर झाड़ू के पोस्टर ही पोस्टर नजर आए।

वो झाड़ू, जो गृहणी के हाथ में होती थी। जिस झाड़ू को हम महिलाएं बदमाशों को मार-मार कर सुधारने के लिए प्रयोग में लाती थीं। आज उसी झाड़ू को सरे बाजार आसमान में चढ़ते देखा। यहां तक कि जो मौजीराम पंडित भी झाड़ू छू जाने पर दोबारा नहाकर आता था, आज वही झाड़ू उसके घर के दरवाजे पर टंगी उसे चिढ़ा रही है, कि जा नहा ले कितनी बार नहाएगा।

वाह भई वाह, आम आदमी की ये झाड़ू न जाने कितनों के माथे का तिलक बन जाएगी। पहले झाड़ू वाले को देख कर सब दूर-दूर भागा करते थे। आज आम आदमी पार्टी का हर आदमी झाड़ू उठाकर चल रहा है। खुद को आम आदमी बता रहा है। और तो और टी शर्ट कंपनियों ने झाड़ू के टैटू बना डाले हैं। यह भी हो सकता है कि किसी झाड़ू कंपनी ने सिफारिश की हो, ताकि विज्ञापन भी हो जाए, सारी झाड़ू भी बिक जाए।

ये भी तो हो सकता है कि पुरुषों ने महिलाओं को खुश करने की यह तरकीब निकाली हो। या कोई पुरुष झाड़ू खा-खाकर इतना परेशान हो गया हो कि उसने पार्टी में इसी को चुनाव चिह्न बनाने की सिफारिश की हो, वरना आम आदमी पार्टी को झाड़ू ही क्यों नजर आई, कुछ और नजर क्यों नही आया?

दोस्तो, अटकलें लगा-लगाकर मन में सांय-सांय होने लगी है। ऐसा लगता है कि कोई हमारी नारी सत्ता में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है। आज झाड़ू ली है, कल चकला, बेलन, चिमटा सभी ले लिए गए तो? यही तो हथियार है हमारे गिने चुने। इन्हीं पर कुदृष्टि डाली गई, तो हमारा क्या होगा।

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