Friday, June 5, 2015

पर्यावरण विशेष

पेड़-पौधे परिवार के सदस्यों की तरह समझे जायेंगे तो वातावरण भी हमारे घर में रिश्तों में आई मिठास सा घुल जायेगा, जैसे परिवार का हर सदस्य घर में कुछ न कुछ योगदान देता ही है, पेड़-पौधे भी मनुष्य जीवन के लिये अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं...
एक समय था जब हम अपने घर की क्यारियों में ही पालक, मैथी, धनिया, टमाटर, ग्वार फली, चौलाई, भिंडी, बैंगन, आलू, फूल गौभी सब उगाया करते थे, हमें आज भी ज़मीन में बीज बोने से लेकर घर में सब्ज़ी बनाने तक का स्वाद याद है, लेकिन ये पिलानी की बात थी...
 दर असल इंसान जो भी करता है, फल की इच्छा में करता है, कुछ पेड़ पौधों से फल तो कुछ से फूल प्राप्त होते हैं, कुछ से हरियाली मिलती है जो कि डॉक्टर की माने तो आँखो को दुरुस्त, मन को महका देती है, जैसे चाय के बाग़ान में जायेंगे तो हरियाली देखकर, पत्तियों की महक पाकर ही दिल बाग-बाग़ हो जायेगा, कहने का मतलब यह है कि कुछ न कुछ तो मिलता ही है, सो पर्यावरण के नाम एक दिन नहीं हर दिन समर्पित कर हमें इसका लाभ उठा ही लेना चाहिये...
आज दिल्ली जैसे महानगर में गमलों में ही हमनें कुछ पौधे जैसे,- साइकस, फाइकस, चमेली, गुड़हल, बोगनविलिया, ग्वार पाठा, गुलाब... आदि विभिन्न प्रकार के पौधे लगा आत्म संतुष्टि हासिल करने की कोशिश की है... साथ ही हरियाली तो रहती ही है, ताकी आँखें तेज की जा सके...बग़ीचे की देखभाल, नये पौधे लगाना, गुड़ाई निराई का हम दोनों को आज भी बहुत शौक़ है, नन्हें पौधों को बच्चों की तरह समय-समय पर खाद पानी देकर पाला जाये, और बुज़ुर्ग पेड़ो को भी जो फलदार हैं या सिर्फ छांवदार है, समय-समय पर कटाई निराई की आवश्यकता, समझ देखभाल की जाये तो ऑक्सीजन का स्तर बढ़ेगा और दम घोटूँ वातावरण से निजात पाई जायेगी...
पर्यावरण की आवश्यकता आप भी समझें...।

Wednesday, June 3, 2015

ये सोशल साइट्स कहीं समाज में दहशत फैलाने का कार्य तो नहीं कर रही हैं?



आईये विचार करें..

सोशल साइट्स के ज़रिये जनता ने दामिनी, सुनंदा जैसे कई केस ऎसे हैं जिनमें अपराधियों को अंजाम तक पहुंचाया है, लेकिन अब तो ऎसा चलन हो गया है। कुछ समय से व्हाट्स एप जैसी साइट्स पर लोग दहशत फैलाने वाले विडियों अपलोड करते हैं साथ ही हिदायत देते हैं कि इस विडियो को जितना हो सके ज्यादा से ज्यादा फैलाया जाये।

आज ऎसा ही एक वाकया मेरे ग्रुप में हुआ किसी महिला के पास कहीं से एक विडियो आया और उन्होनें तैश में आकर उसे सभी ग्रुप्स में इस हिदायत के साथ पेश किया कि इसे जितना फैला सकते हो फैलाओ, ताकि मोदी तक ये बात पहुंचे और इस कुकृत्य पर सरकार कोई एक्शन भी ले सके। अपना फ़र्ज़ समझ सब यही करने लगें होंगे, ग्रुप में एक लड़की की इस विडियो को देख कर तबीयत भी बिगड़ गई।  लिखना तो नहीं चाहती थी, लेकिन लिखने पर विवश हो गई हूँ...

आप सोच रहे होंगे उस विडियो मे ऎसा क्या था, उसके साथ भेजे नोट पर लिखा था कि यह आंध्र प्रदेश की घटना है, इस लड़की को कुछ लोगों ने मिलकर मारा और जिंदा जला दिया। अब विडियो ऎसा था कि देखकर रौगंटे खड़े हो जाना स्वाभाविक सी बात थी, लेकिन उस भीड को देख कर मै दंग रह गई, करीब सौ सवा सौ लोगों की भीड़ में सिर्फ़ चार या पाँच लोगों का इस अज़ीब कारनामें को अंजाम देना।  जिसमें दो महिलायें भी शामिल थी, मन में कुछ प्रश्न उठे,... क्या इस तरह के विडियो हमें यहाँ-वहाँ फैला देनें चाहिये? क्या ऎसा करने से हम समाज में दहशत नही फ़ैला रहे हैं, वो भीड़ क्यों खामोश थी, किसी ने बीच बचाव क्यों नहीं किया, पुलिस को खबर क्यों नहीं दी? उस लड़की ने ऎसा क्या किया था,,, वगैरह-वगैरह। मुझे लगा मुझे इसकी जानकारी किसी बड़े अधिकारी को देनी चाहिये...

आप सबको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह घटना आँध्रप्रदेश की थी ही नहीं। ये किसी बाहर के देश (Guatemala) का विडियो था जिसमें किसी लड़की को ड्राइवर के खून और लूट के इल्ज़ाम में भीड़ के द्वारा पीटा जा रहा था। जब मैने यह घटना लिंक के साथ ग्रुप में डाली तो उस विडियो डालने वाली लड़की ने माफ़ी मांगते हुए कहा कि मुझे किसी ने भेजा था, मैने भी आगे भेज दिया...

दोस्तों आप सभी से निवेदन है इस आगे भेजने वाली बीमारी से बचे, यदि कहीं से कोई सूचना आती थी है तो पुलिस में खबर करें या तुरंत डिलिट मारे भेजने वाले को हिदायत भी दे दें की हम इसे पुलिस में तुम्हारे नाम और फोन नम्बर के साथ दे रहे हैं, हो सकता है आपके द्वारा यह दहशत फैलने का कार्य यहीं पर समाप्त हो जाये।
सुनीता शानू

Tuesday, November 18, 2014

यात्रा संस्मरण- पटना पुस्तक मेला



यात्रा संस्मरण- पटना पुस्तक मेला

यात्राएं तो बहुत की हैं, कभी अकेले तो कभी समूह में किंतु पटना पुस्तक मेला यात्रा मेरी ज़िंदगी में एक विशेष स्थान रखती है। मै नहीं जानती थी कि ऎसा भी होता होगा, जब किसी अनजान शहर से अनजान लोगों के द्वारा आपको बुलाया जायेगा, वह भी किसी विशेष प्रयोजन से खैर...
सुबह का वक्त था, मै बच्चों के लिये नाश्ता तैयार कर रही थी। दिन क्या था याद नहीं लेकिन एक अपरीचित सा स्वर था, उधर से आवाज आई... मै रत्नेश्वर सिंह बोल रहा हूँ पटना से, आप सुनीता शानू बोल रहीं है? मै नाम से परीचित थी लेकिन आवाज़ से नहीं सो मैने भी खुशी के साथ उनकी आवाज़ का अभिनन्दन करते हुए बताया कि मै ही सुनीता शानू बोल रही हूँ, कहिये कैसे हैं आप? माफ़ कीजियेगा आपकी किताब के लोकार्पण पर मै आ नहीं पाई थी। इस पर उन्होने कहा कोई बात नहीं फ़िलहाल मेरे फोन करने का विशेष प्रयोजन है, हम हर साल पटना पुस्तक मेले का आयोजन करते हैं और उसमें दूर-दूर से नामचीन लोगों को बुलाते हैं। नामवर सिंह जी जैसे अनेक बड़े साहित्यकार इस मेले की शान रहे हैं। इसमें एक जनसंवाद कार्यक्रम होता है, जिसमें लेखक की पाठको से सीधे बात होती है। लिहाजा आपको फोन करने का मकसद आपको पटना पुस्तक मेला में आमंत्रित करना चाहते हैं, आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि आपका नाम हमे नवभारत से संजय कुंदन जी ने दिया है। जब रत्नेश्वर जी से मैने कहा मेरा ही नाम क्यों और भी महिलायें अखबारों में छप रही हैं इस पर उन्होने कहा कि संजय कुंदन जी से हमने पूछा कोई महिला व्यंग्यकार बताईये जो अच्छा लिखती हैं, इस कर उन्होनें आपका ही नाम लिया। सुनकर बेहद रोमांच हुआ, एक शख्स जिसे मै अच्छे से जानती तक नहीं जिसे कभी देखा तक नहीं जिन्होनें अधिकतर व्यंग्य खेद है कह कर लौटा दिये थे, मेरा नाम कैसे लिया वह भी इतने विशेष कार्यक्रम में, आश्चर्य और खुशी इतनी थी कि आँख से आँसू निकल आये।

खैर सुनहरे पल ज़िंदगी में कभी-कभी आते हैं, और यह भी सच है कि जिन लोगों के बारे में हम सोच भी नहीं पाते वही हमारी सफ़लता का एक हिस्सा बन जाते हैं। आखिर एक दिन टिकिट भी आ गई कि मुझे इंडिगो से जाना है एयर इंडिया से वापस आना है। इस दौरान एक भी दिन नही मिल पाया कि मै जनता के सामने क्या प्रस्तुत करूंगी क्या नहीं कुछ तो तैयारी कर लूँ। यह भी नहीं मालूम था कि कार्यक्रम की रूपरेखा क्या है? ऎसे में ही रत्नेश्वर जी ने एक अखबार की कटिंग लगाई जिसमें कई लेखकों के साथ मेरा भी नाम था। किंतु उस दिन जनसंवाद कार्यक्रम में दो लोगों का नाम था एक मेरा दूसरा ललित मंडोरा... ये कहना गलत नहीं होगा कि मै ललित मंडॊरा से अच्छी तरह परीचित नहीं थी, खैर अपने अंदाज़े पर मैने ललित जी को फोन लगाया कि क्या आप ही ललित मंडॊरा है? इस पर वे हँसे और बोले जीहाँ मै ही ललित मंडोरा हूँ, चलिये देखते हैं कार्यक्रम में चल कर क्या होता है, मैने उनसे पूछा हमें करना क्या होगा? उन्होनें बताया कि दो चार व्यंग्य सुना देंगें, मेरी नई पुस्तक का लोकार्पण कर देंगें और बाद में पाठकों के साथ सवाल जवाब होगें... सो आप फ़िक्र न करें मै हूँ न सब सम्भाल लूंगा। “मै हूँ ना” शब्द ही कुछ ऎसा है, जो अंदर से हौसला पैदा कर देता है। मैने अपने लिखे व्यंग्य में से ही कुछ छपे छपाये व्यंग्य रख लिये और अपने चाय के व्यवसाय में लगी रही।

13 नवम्बर यात्रा पर निकलने का पहला दिन था, सोचा निकलने से पहले बड़ों से आशीर्वाद ले लिया जाये, मैने अपने घर फोन मिलाया, प्रताप सोमवंशी जी को फोन मिलाया, उमेश भैया से और कुछ दोस्तों से बात की सबने शुभ कामनायें दी, कामयाब होने का आशीर्वाद दिया, प्रताप सोमवंशी जी ने कहा ये तुम्हारा पहला अवसर है देखो अब तक के तमाम अनुभव तुम्हारें काम आयेंगे, एक अच्छी सी स्पीच लिखो और खुद में आत्मविश्वास पैदा करो। ऎसे मौके बार-बार नहीं मिलते। उनकी तमाम बातों ने दिल पर असर किया और मैने रत्नेश्वर जी से कार्यक्रम की रूपरेखा के अनुसार खुद को तैयार किया।

सुबह के छः बजे की अपेक्षा फ़्लाइट ने आठ बजे की उड़ान भरी ललित जी साथ ही थे लेकिन सीटे अलग-अलग मिली, खैर पटना पहुंचते ही रत्नेश्वर जी अपनी वही स्टाईलिश टोपी पहने दूर से ही नज़र आ गये थे, मैने भी उन्हें देख कर हाथ हिलाया और अपनी मौजुदगी की खबर दी। एक खूबसूरत अहसास था उनका करबध्द स्वागत करना। मै खुद को गौरवान्वित महसूस कर रही थी। रत्नेश्वर जी गाड़ी लेकर आये थे, एक ही गाड़ी में हम सब हवाई अड्डे से निकल पड़े। होटल की तरफ़ जाते हुए तमाम रास्ते रत्नेश्वर जी और लालित्य ललित जिनका नाम ललित मंडोरा छपा था, बोलते जा रहे थे, बहुत जोरदार कार्यक्रम होता है जनसंवाद, यहाँ के पाठक बहुत ही घमासान मचाते है, पूरे रास्ते टमाटर और अंडे का खयाल आता रहा कि कहीं मेरे मुह पर टैमटो कैचप तो नहीं बनने वाला है। बातें करते-करते वह स्थान भी आ गया जहाँ हमे रुकना था। मारवाड़ी होटल में दो कमरे बुक किये गये थे। जहाँ एक रात के लिये हमें रुकना था। सुबह का चाय नाश्ता हम सबने साथ मिलकर किया। दोपहर तक बेचैनी में बीत गई। मैने अपनी माँ को फोन मिलाया पिता से भी बात की, पतिदेव से बात की अब जाकर एक नई शक्ति, नई ऊर्जा महसूस हो रही थी। दोपहर में ही हम लोग पटना पुस्तक मेले में पहुंच गये थे। बहुत ही खूबसूरत तरीके से एक मैदान को व्यवस्थित किया गया था। बड़े-बड़े प्रकाशकों की दुकानें लगी थी, चाट-पापड़ी के अतिरिक्त हर तरह के साजो-सामान से सजा था पटना पुस्तक मेला। एक और बहुत बड़ा प्रोजक्टर लगा हुआ था जिस पर पटना के खूबसूरत दृष्य दिखाई दे रहे थे। पुस्तक मेले में विभिन्न क्षेत्रों से आये कलाकार थे। रागरंगों का ये मेला सचमुच अद्भुत था। एक विशेष बात जो देखने में आई वह यह थी की ग्रामीण इलाकों से कलाकारों को ढूँढ कर लाया गया था, जो कि प्रोफ़ेश्नल नहीं थे। मेले की कसावट में कहीं कोई कसर नज़र नही आई...

शाम का वक्त था बार-बार माइक पर सुनाई दे रहा था, जनसंवाद कार्यक्रम मे मिलिये दिल्ली से चर्चित व्यंग्यकार सुनीता शानू तथा लालित्य ललित, अब से कुछ ही देर में। सुन सुन कर हलक सूखे जा रहा था। धीरे-धीरे मंद गति से मंच की ओर प्रस्थान किया, पहले स्थान पर संचालक अजय शर्मा बैठे जो एक नामचीन लेखकों में आते हैं पटना के, दूसरे नम्बर पर मै सुनीता शानू मेरे बगल में ललित मंडोरा जी और उनकी बगल मे रत्नेश्वर जी... मुझे बस पानी की बोतल दिखाई दे रही थी मन कर रहा था सारा पानी गटक जाऊंगी तब भी गला सूखा ही रहेगा। लेकिन रत्नेश्वर जी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा कि आप सफ़ल रहेंगी मै देख रहा हूँ... जाने क्या बात थी उनकी बात में की मै आत्मविश्वास से भर गई और इंतजार करने लगी पहले मुझे बुलाये या ललित जी को मै घबराऊंगी नहीं। सर्वप्रथम ललित जी की पुस्तक का लोकार्पण किया गया तत्पश्चात मुझे ही पहले बोलने का अवसर मिला, जैसे ही बोलने को उठी सामने से किसी ने छींक दिया मुझे हँसी आ गई शायद मेरी यही हँसी मेरे सारे डर को भगा ले गई, फिर मैने शुरु किया बोलना तो भूल ही गई कि सामने पटना का भारी जनसमुदाय है, मै एक ही लय में खुद को भूलकर बस बोलती गई। हर बात पर जनसमुदाय का तालियां बजाना ऎसा लग रहा था, एक माँ के सामने बच्चे खुशी से झूम उठते हैं, कल्पना ही तो है वैसे भी बच्चे हों या बूढे एक औरत सभी के लिये पहले एक माँ का ही दर्ज़ा रखती है... ऎसा मुझे लगता है। मेरा भाषण खत्म हुआ और ललित जी का शुरू।

जब जनसंवाद की बारी आई, न जाने कब से जवाब की तलाश में बैठे पाठकों ने मुझे सवालों के कटघरे में घेर लिया, मै हर सवाल का जवाब देते मुस्कुरा रही थी, उन्हे बच्चों की तरह समझा रही थी। कभी-कभी गुस्से में बेकाबू भी हो जाती थी, लेकिन तुरंत बात को धीरे से कह मुस्कुरा देती थी। उनके सवालों के घेरे में मै अकेली ही थी, ललित जी से किसी ने कोई प्रश्न ही नहीं किया, वो पास बैठे अब भी वैसे ही देख रहे थे जैसे कह रहे हों “मै हूं ना”

कार्यक्रम सफल रहा यह तो मै जान ही गई थी, मंच से उतरते ही बहुत से लोगों से घेर लिया और मेरे संग्रह की चाह रखी, पहले अभी विचार ही नही हुआ कि कोई संग्रह मागेंगा भी। लेकिन अच्छा लगा सब लोगो का यूं सराहना करना। मेरी खुशी की सीमा नही थी, शायद इसीलिये बयान करने को शब्द भी नहीं हैं, बस मन ही मन संजय कुंदन जी को धन्यवाद कहती रही।

रात को कई नाटक नौटकीं देखें, बिहार का लोक गीत सुना, असम अंचल से आई लड़कियों ने खूबसूरत नृत्य प्रस्तुत किया और हम उसका आनन्द लेते रहे। आज रात ही रत्नेश्वर जी और उनकी पत्नी के साथ पटना घूमने का आनंद लिया, तिलकूट, अनारसा और भी कई तरह की मिठाइयाँ चखी। देर रात होटल आये, गप-शप मारते रहे। वो रात सचमुच बहुत खूबसूरत थी, सफल कार्यक्रम और कामयाबी की रात सचमुच नींद बहुत अच्छी आती है,  लेकिन अब हमें सुबह का इंतजार था।

सुबह थोड़ी ठंड थी, मै और ललित जी सड़क पर निकल पड़े थे कल रात की खबर लेने। पटना के तमाम अखबार खरीद कर जब हमने खोल डाले तो खुशी के मारे आवाज नहीं निकल रही थी। सभी प्रमुख अखबारों की सुर्खियाँ कह रही थी... प्रमुख वक्ता व्यंग्यकार सुनीता शानू ने व्यंग्य को दो धारी तलवार कहा। अखबारों में छपी तस्वीरें मुझे मेरे होने का अहसास दिला रही थी।

कुछ देर में हमें वापस जाना था, रत्नेश्वर जी का वही मुस्कुराता खिलखिलता चेहरा नज़र आया जब वह हमें छोड़ने हवाई अड्डे आये, बहुत खुश थे वह, निर्विकार, सौम्य कहीं कोई मिलावट नहीं। उन्हें धन्यवाद कह मै और ललित जी दिल्ली जाने के लिये टिकिट काऊंटर आये, यहाँ पता चला कि नौ बजे जाने वाली फ्लाईट शाम तीन बजे चलेगी। पहले लगा कि समय कैसे कटेगा क्योंकि दोनों को घर पहुंचने की जल्दी थी। बातों ही बातों मे समय का ध्यान ही नहीं रहा। हाँ इस पूरे समय में लालित्य ललित जी का एक अलग ही व्यक्तित्व उभर कर आया जिसमें मैने पाया कि वह मिलनसार और सरलहृदय इंसान है, जिन्हें एक अच्छा दोस्त कहा जा सकता है।

इस तरह पटना की यह यात्रा ज़िंदगी को एक नई दिशा प्रदान कर गई... देखें अब फिर कब मिलेगा कोई नया अवसर और घिर जाऊंगी मै सवालों में और आवाज आती रहेगी “मै हूँ न” या “आप सफ़ल रहोगी मै देख रहा हूँ”।









Tuesday, September 2, 2014

चस्का किटी पार्टी का (साहित्य अमृत में प्रकाशित)




चस्का कोई भी हो जब लग जाये तो समझोआधा दिमाग तो गया। कुछ ऎसा ही हाल हुआ हमारे साथ भी। हुआ यूँ कि संपादक महोदय ने बुलाया और कहाआजकल किटी पार्टी का चस्का महिलाओं में तेज़ी से बढ़ रहा हैआप ऎसा कीजिये कि इस विषय पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिये। और कल के अखबार में हैडिंग रहेगी चस्का किटी पार्टी का। अब भला ये भी कोई चस्के वाली बात है। दिल में तो आया कि कह दूंसर आजकल तो सबको मोबाइल का चस्का है जिधर देखिये मोबाइल ही मोबाइलवो चाहे कम्पनी का मालिक हो या कबाड़ी वाला। एक से एक महंगा फोन खरीद कर हाथ में पकड़ना शान बन गई है, और ज्यादा ही है तो लड़कियों और महिलाओं में विश्व सुंदरी दिखने का चस्का है। सासू माँ को टी वी सीरीयल का चस्का हैससुरजी को अखबार काबच्चों को गेम का और श्रीमान को चाय का चस्का है। यहाँ तक की कामवाली बाई को भी दूसरों की बात सुनने का ऎसा चस्का है कि पूछिये मत जब तक आयात-निर्यात न हो जाये बातों का उसे उल्टियां आने लगती है पेट में अफ़ारा और खट्टी डकारे आने लगती है। इसी लिये तो कहती हूँ चस्का आधा दिमाग तो खाली कर ही देता है। बहरहाल सबसे पहले मुझे किटी पार्टी का पता लगाना है। तभी चस्केबाज़ों का पता लग पायेगा। मुझे टेंशन में देख घर के सभी सदस्य किटी पार्टी की खोज खबर में लग गये। सबसे पहले अम्माजी का व्याख्यान सुनने को मिलाउनका मानना है कि आम आदमी पार्टी की तरह कोई पार्टी होगी। बच्चों से भी मम्मी की परेशानी देखी नहीं गईझट-पट अटकलें लगाने लगे...टिंकू बोला-.मम्मा किटी तो बिल्ली को कहते हैंचुन्नू ने भी हाँ में हाँ मिलाई- हाँ मम्मा मैने देखा थाएक बार बहुत सारी बिल्लियाँ मिलकर चूहा खा रही थी। ये लो बच्चों ने तो अच्छा अर्थ निकाल दिया था। अभी बात खत्म भी नही हुई थी कि श्रीमान जी टपक पड़े। अरे क्या सुन रहा हूँ मैतुम किटी पार्टी की ही बात कर रही हो न! क्या सचमुच तुम किटी ज्वाईन करोगी। उंह बस इन्ही की कसर थी। जबसे ऑफ़िस में मिसेज़ बत्रा आई हैं ये तो चाहते हैं मै भी उन सरीखी बन जाऊँ और साधारण लिबास छोड़ कुछ स्टाईलिश नजर आऊँ। चलिये चलते हैं मैने कहा और वो बिना कुछ पूछे ऎसे चल दिये जैसे समझ ही गये कि श्रीमति जी कहाँ चलने को बोल रही है। ऎसा होता है चस्का कि आदमी बिना-सवाल जवाब के अपनी ही रौ में चलता चला जाता है। हमें देखते ही मिसेज़ बत्रा उछल पड़ी अरे मिसेज़ शर्मा आप। मैने मुस्कुराने की बहुत कोशिश की लेकिन वो कोशिश भी हवा हो गई जब उन्होनें स्टाइल से शर्मा जी की पीठ पर धम से हाथ मारा और कहा, “ऎ नॉटी आखिर आज तुम पकड़ में आ ही गया। मै समझ नहीं पाई कि ये कैसी पकड़ थी खैर सोचने को बहुत कुछ बाकि था। मैने शुरुआत की मुझे किटी पार्टी के विषय में जानना है। जानना नहीं है मिसेज़ बत्रा आप मेरी मिसेज़ को आपके साथ शामिल ही कर लो। मैने बहुत नानुकुर की कि जरुरत क्या है मुझे जो लिखना है इन्हीं से पूछ कर लिख डालूंगी। लेकिन श्रीमान लगे भाषण देने। एक सच्चा पत्रकार आँखों देखी लिखता है। सुनी-सुनाई नहीं। मुझे भी लगा कि जब तक मै सभी लोगों के साथ शामिल होकर नही देखूंगी अच्छे से लिख नहीं पाऊंगी।
खैर किटी पार्टी ज्वाइन हो गई। महिने की पंद्रह तारीख को मिसेज़ बत्रा के घर में होगी किटी पार्टी फिर शर्मा के और उसके बाद मेरे यहाँ। तब तक मुझे सब कुछ समझ लेना है।
आखिर किटी पार्टी में जाने का दिन आ भी गया। सुबह से ही शर्मा जी लगे हुए थे कभी चाय बनाये कभी पूछें तुम कब तैयार हो जाओगी। अरे भई किटी पार्टी में ही तो जाना है किसी की बरात में नहीं। अच्छा देखो तुम्हे बहुत अच्छा लगेगा वहाँ जाकर। मेरे लिये अपने पसंद की साड़ी अलमिरा से निकालने के बाद ही उनको तसल्ली हुई। खैर घर के काम निबटा मै झटपट तैयार हुई और मिसेज़ बत्रा के यहाँ पहुंची। एक से बढ़कर एक खूबसूरत महिलायें थी वहाँ। ऎसा नही था कि पैसे वाले घरों से थीमिडिल क्लास की औरते भी इस तरह तैयार हुई थी कि यह समझना मुश्किल था कि किस वर्ग विशेष से हैं। मिसेज़ बत्रा भी स्लीव लेस टॉप और शार्ट्स में बहुत स्मार्ट लग रही थी। सभी की एक से एक बढ़कर ड्रेस थी। देखकर लग रहा था जैसे फैशन शो मे आई हैं। पार्टी में प्रफ़्यूम की भरमार थी । लगता था मै किसी इत्र की दुकान पर आ गई हूँ। खैर मै सिमटी सिमटाई एक कौने में दुबक गई। मिसेज़ बत्रा ने आवाज उठाईसखियों हम लोग सारा-सारा दिन मशीन की तरह काम करते हैं। क्या थोड़ा समय भी खुद के लिये नही निकाल सकतेहमारे पति और बच्चे यहाँ तक की सास और ननद भी आराम और छुट्टी का दिन मना लेती हैं तो क्यों नही हम भी एक दिन खुद के लिये जियेंसुबह आंख खुलने से लेकर नींद से पलके बोझिल होने तक सिर्फ और सिर्फ काम ही काम..।कब मिलेगा आराम?
बात में दम था मुझे लगा सचमुच घर में सभी को अवकाश मिलता है आराम मिलता है। मेरे आराम का दिन तो कोई भी नही होता। छुट्टी के दिन पतिदेव चाय की फरमाईश करते दिखेंगे तो बच्चे कहेंगें मम्मी आज कुछ अच्छा सा बना दो। जैसे कि रोज खराब सा खाया जा रहा था। और कुछ नहीं तो संडे देखते ही ननदें टपक आती हैं क्या बतायें भाभी आराम तो मिलता ही नहीं सोचा एक दिन तो मायके में जाकर आराम कर लें। ये भी कोई बात हुई सबको अपने आराम कि पड़ी है। अच्छा सोचा श्रीमान जी ने पत्नी हूँ न उन्हें ही फ़िक्र होगी कि मेरी पत्नी भी थोड़ा इंजाय कर ले।
कुछ देर में खाने-पीने का दौर शुरू हुआ। खानें में मूंग की दाल का हलवामूंग की दाल की बर्फ़ीमूंग की दाल का चिल्ला और मूंग दाल के पापड़मूंग के आटे ही रोटी। सबकुछ मूंगमय होना रौचक लग रहा था। मुझसे रहा नही गया आखिर पूछ ही लिया मिसेज़ बत्रा क्या आपके यहाँ मूंग के खेत लगे हुए हैंया आपकी राशन की दुकान है जो इतने महंगे भाव की मूंग को पूरे मीनू में ठूस दियाउन्होने कहा कि ऎसा करके वो बाकी सबकी छाती पर मूंग दलती है।
धीरे-धीरे चुगलियों का दौर शुरु हुआसबसे पहले सास-ननद की बातें शुरू हुई... होते-होते मौहले की औरतें जो किटी पार्टी में नही आती उनकी बाते हुई। पुरुषों के घूरने की बातें भी शामिल थी चुगलियों में। बात यहाँ तक बढ़ गई कि वे एक दूसरे के पतियों को भी घूरा घूरी के मैदान में घसीट लाई। कुछ महिलायें किटी में आई महिलाओं पर छींटा कशी करने से भी बाज़ नही आई। मेरा तो पहला ही दिन था सो सबकी हमदर्दी थी कि मुझे सीखने में समय लगेगा।एक ने कहा शायद गाँव की है। अच्छा। ओह। बेचारी जाने कितने ही शब्द ऎसे मिल रहे थे जैसे पुरस्कार बट रहे हो। पहले दिन कुछ चस्के सा मुझ में नही जागा। हाँ एक बात तो अच्छी थी किटी पार्टी में कि सब मिलजुल कर सास-ननदघर-परिवार सब पर भंड़ास निकाल लेती हैं। और फ़्री माइंड होकर घर जा पाती हैं।  
घर आकर शर्मा जी को सब कुछ बताया।  बहुत सोचविचार किया गयाकि उन लोगों के साथ रहना है तो खुद को बदलना तो पडेगा ही
 सो मिसेज़ बत्रा के साथ पार्लर गई और बाल कटवा आई। घर में सब हँस रहे थे। बच्चे तो ताली बजाने से भी नहीं चूके,... हाहाहा मम्मी देखो क्या बन गई।जल्दी-जल्दी जींसटी-शर्ट पहना। महंगा परफ़्यूम लगाया। इस बार हँसने की बारी कमला बाई की थी। अरे वाह मेमसाब आप तो बिल्कुल ऎ हिरोइन की माफ़िक लग रहा है। सादा सलवार सूट कोने में पड़ा रो रहा था लेकिन कमला बाई की गोद में गिरकर शान्त हो गया। कम से कम शर्मा जी को घूरा-घूरी कांड से तो निकाल ही पाऊंगी। अभी पर्स उठा निकलने ही वाली थी कि टिंकू की आवाज़ आई मम्मी कुछ अच्छा सा। और शर्मा जी ने उसे अपने पास खींच लिया।
मिसेज़ गुप्ता के यहाँ जैसे ही धमाकेदार एंट्री कि सबके दिमाग के फ़्यूज उड़ गये। देख कर हाय-हल्लो करने लगी। इतनी प्रशंसा तो कभी सुनी ही नहीं थीपागलों की तरह घर का बाहर का काम करती रही कभी किसी ने ध्यान ही नही दिया मेरी सुंदरता पर। खैर दिल गर्व से फूला नही समा रहा था। बार-बार टेलिफ़ोन की घंटी बज रही थी आज सबको उसकी याद आ रही थी। कितना बदल गया है सब दो ही महीने में। खान-पान से लेकर उसके व्यवहार और सोसायटी में कितना परिवर्तन आ गया था। नये दोस्त बन गये हैं। जब-तब घर में होटलों में पार्टियां होने लगी। किटी पार्टी के चस्के ने घर में खाना छुड़वाकर होटलों पर निर्भर कर दिया। सुबह जिम तो शाम को क्लबों के चक्कर लगने लगे। नई ड्रेसेज़ नई ज्वैलरी सब कुछ नया-नया। सचमुच फ़ुर्सत ही नहीं है कुछ सोचने की। घर आते-आते इतनी थकान हो जाती कि एक गिलास पानी का उठाना मुश्किल हो गया। सास-ससुर को इंतजार है कि कब बहू घर लौट कर आये तो उसे बतायें आजकल उनकी बेटियों ने घर आना बंद कर दिया है। क्योंकि यहाँ आकर भी काम ही करना पड़ रहा है। बच्चे भी कुछ अच्छा सा बनने के इंतजार में हैं।
लेकिन हाँ स्टेटस बदला देखकर रिश्तेदारों के चेहरे भी मुस्कुराहटहँसी और अपनेपन के मेक अप में नजर आने लगे। शायद इसीलिये मशहूर शायर निदा फ़ाजली साहब ने कहा होगा कि,...
हर आदमी में बसते हैं दस बीस आदमी... जब भी किसी को देखना कई बार देखना।
शर्मा जी की शकल देख कर लग रहा था कि अब वे किटी पार्टी का नाम तक भूल गये हैं। जब से उनकी जेब पर डाका पड़ा है वे गुमसुम से नजर आते हैं। आखिर एक दिन जेब कराह उठी सब्र का इम्तिहान पूरा हुआ, “कब पूरी होगी तुम्हारी स्क्रिप्ट हद हो गई है

सुनीता शानू


Tuesday, July 8, 2014

(आज अमर उजाला में प्रकाशित) आलू-प्याज कैबिनेट मीटिंग

आलू-प्याज कैबिनेट मीटिंग

potato onion cabinet meeting

 सुनीता शानू मंगलवार, 8 जुलाई 2014 अमर उजाला, दिल्ली Updated @ 1:59 AM IST

आज रात आलू जी ने एक मीटिंग बुलवाई, जिसका एजेंडा था कि जब-जब सरकारें बनती हैं, हम पर ही दबाव क्यों बनाया जाता है। वह बोले, कभी गोदाम में हमें इतना ठूंस-ठूंसकर भर देते हैं कि हमारा दम घुट जाता है और हम मुंह दिखाने के काबिल भी नहीं बचते। हमें जबरन कीमत बढ़ाने के चक्कर में पकड़ कर रखा जाता है, बाद में पता चलता है कि लोग आलू खाना ही बंद कर देते हैं, यह कहकर कि इससे डायबीटिज हो जाती है। पिछले दिनों जब मैं गोदाम में सड़ रहा था, तब सबने मटर के समोसे खाने शुरू कर दिये थे। मटर भाई, क्या मैंने सब्जी को जायकेदार बनाने में तुम्हारी मदद नहीं की थी, जो तुम अकेले ही समोसे का स्वामित्व ले बैठे थे। आलू जी बोले जा रहे थे, साथ ही, पसीना पोछ रहे थे। प्याज खुद को बनाने-संवारने में इस तरह लगा हुआ था, जैसे उस पर कोई आंच आने वाली ही न हो। गुस्से में आलू जी फिर बोले, महाशय, आपको तो जैसे कोई फिक्र ही नहीं है। आप जानते हैं कि यह सब आपका ही किया धरा है। मुझे तो अंदाजा ही नहीं था इस बात का, यदि खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने न बताया होता। तुमने तो यार, कई सरकारें पलटकर रख दी है। दिल्ली का मामला कोई भूल सकता है क्या? फिर भी भाव खाना छोड़ो और कोई तरीका सोचो, वरना इस बार मंत्रियों की बैठक में मेरे साथ तुम भी गोदाम में सड़ोगे। प्याज मुस्कराते हुए बोला, मैं कतई नहीं सड़ने वाला आलू जी, चाहे वेज हो या नॉनवेज, मुझे तो हर सब्जी में जगह मिलती है। पिछले दिनों मै दौ सौ रुपये तक बिका था। मेरा रूप रंग ही ऐसा है कि सबके मुंह का स्वाद बदल जाता है। अमीर ही नहीं, गरीब भी मुझे पाने के लिये पूरे प्रयत्न करता है, इसीलिए सरकार से भी भिड़ जाता है। दरअसल मुझमें कई परतें हैं, और इन परतों के बीच ही सत्ता की कोई कमजोरी छिपी है। इसी कारण जो मंत्री जी भिंडी, टिंडा, परवल या मटर से नहीं घबराते, वे प्याज से घबरा रहे हैं। सारी सब्जियों ने प्याज का समर्थन करते हुए कहा, तुम बिल्कुल सही बोल रहे हो भाई।

Tuesday, March 11, 2014

चाय उबली ही नहीं दूध डाल दिया




चाय उबली ही नहीं दूध डाल दिया
जबसे मोदी जी ने “नमो” टी स्टॉल खोली है, लोगों ने “शनो” टी स्टॉल पर आना ही बंद कर दिया। क्या बुराई थी बताओ तो? मै तो बदले में वोट भी नहीं माँग रही थी। जाने कितनी ही  बार कविता सुनाने के चक्कर में, लोंगों को एक के साथ एक चाय फ़्री भी पिलाई थी, लेकिन भावी प्रधानमंत्री दुकान ही खोल ले, तो लोग कवि की दुकान पर क्यों आयेंगें। ज्यादा ही दिल था तो मेरी दुकान पर ही पोस्टर लगा लेते, मेरी चाय का प्रोमोशन हो जाता। एक कवि के बच्चों की दुआयें मिलती सो अलग। मुझ अदना से कवि के पेट पर लात मार के क्या मिला बताओ तो। चाय के साथ-साथ एक-आध किताब ही बिक जाया करती थी। सोचा था चाय की दुकान पर ही एक मुशायरा करवा लूंगी। बहुत सारे लोग आयेंगे कविता भी सुनेंगे और साथ ही चाय भी बिकेगी।
लेकिन हे मोदी चाचा आपकी नमो चाय ने तो सारे सपनों पर पानी ही फेर दिया। मुझे पता होता कि आप भी चाय वाले हैं, और भविष्य में चाय बेचेंगे, तो भैया मै तो चाय की दुकान ही न खोलती। कोई छोटी-मोटी समोसे-कचौरी की दुकान खोल लेती। कम से कम ये कम्पीटिशन तो नही भुगतना पड़ता मुझे।

काम तो बहुत सारे थे आपके पास, जैसे कवियों के लिये चौपाल बनवाते, कवियों के बच्चों की फ़्री शिक्षा का जुगाड करते, कवियों की किताब स्कूलों में अनिवार्य करवाते। सोचिये देश का बच्चा-बूढ़ा-जवान सब आपकी रैली में दौड़ लगाता, कविता सुनाता। कवियों की पत्नियाँ आपको इतनी दुआयें देती की झोली छोटी पड जाती। लेकिन आपको मेरा ही राइवल बनना था ? पहले क्या कम हैं, देश में चाय वाले जो आप भी उतर आये चाय के मैदान में।

आप जानते थे, चाय का सीधा रास्ता आदमी के दिल तक जाता है। हम मेहमान की खातिर दारी भी चाय पिला कर ही किया करते है। और तो और बड़े-बड़े काम चाय-पानी के बिना सम्भव नही होते। राजनीती की सारी बातें चाय,बीड़ी या पान की दुकान पर ही हो जाती हैं।

समझने वाली बात तो ये है कि पहले लालू ब्रांड पटाखे आये, फिर लालू ब्रांड आम, और अब लालू जी ने निकाल दिया है- लालू ब्रांड चाय विद चारा बिस्किट। साथ ही अब मोदी जी ने भी मोदी ब्रांड चॉकलेट, मोबाइल कवर, टी शर्ट, जैकेट जाने क्या-क्या सामान मार्केट में आ गया है। अब आप ही ब्रांड अम्बेस्डर बन जायेंगे तो बेचारे अभिनेताओं को कौन पूछेगा? खैर लालू जी बिस्किट बेचे चाहे राहुल दूध पिलाये। बस आप एक कवि की पुकार सुननी ही होगी।


अच्छा मान लिया आप चाय को देश का भविष्य बना रहे है, लेकिन एक बार सोच कर देखिये, क्या यह अच्छा लगेगा, कि हमारे देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद जब आप बड़ी-बड़ी राजनैतिक मिटिंग्स में बैठे होंगे, अचानक खयाल आयेगा, चाय-पत्ती मंगानी है, अरे फलां व्यापारी दूध देकर गया कि नहीं? सोच रहे होंगें कि चाय में उबाल आया कि नहीं? और कहीं गलती से चाय उबली ही नही दूध डाल दिया तो... देश के भविष्य का क्या होगा।

शानू

Thursday, February 6, 2014

आज अमर उजाला में प्रकाशित एक व्यंग्य... सच बता, किसकी भैंस है तू

ओए, तू किसकी भैंस है बोल! ऐ, रुक कहां जाती है? बेचारे सिपाही कभी भैंस को ढूंढेंगे, कभी कुत्तों को। देश की भैंस जाए पानी में, हमको क्या। हां, मंत्री जी की भैंस का सवाल है, भैया। भैंस न हुई, फिल्म की हीरोइन हो गई, जो कभी टीवी, तो कभी अखबार की सुर्खियां बन गई। आखिर सबको नाकों चने चबवा कर मिल भी गई।

कौन जाने! चोरी हुई या भाग गई थी। जैसे अमेरिकी जेल से कैदी भाग गए थे और सर्दी के मारे वापस आ गए जेल में। लेकिन इन भैंसों के चक्कर में बेचारे दो सिपाहियों की भैंस तो गई पानी में। यों कहें कि दोनों को लाइन हाजिर कर दिया गया, कि उनके रहते भैंस चोरी हुई, तो कैसे हुई। अब कोई यह बताए कि बेचारे सिपाही कैसे पहचानेंगे कि ये भैंस जो बीच रास्ते में घूम रही हैं, मंत्री जी की हैं। भैंस की भी कोई पहचान है भैया, भैंस तो बस भैंस है। मंत्री जी की भैंस पर क्या मंत्री जी का पोस्टर चस्पां था? या मंत्री जी की फोटो लटकी थी गले में, जो कोई पहचान पाता?

सबसे सच्ची बात, भैंस कहलाना किसे पसंद है? भैंस शब्द सुनते ही काली डरावनी विशालकाय आकृति आंखों के सामने कौंध जाती है। क्या आपने कभी सोचा है कि भैंस को कितना बुरा लगता होगा? भैंस बेचारी ब्यूटी पार्लर जाकर भी अपना रूप संवार नही पाती। ऐसे में भैंस जो कोई मंत्री जी की हो, तो काहे सुनेगी बेकार की बातें? इसका दूध पी-पीकर मंत्री जी जवान हुए हैं, इसका खालिस दूध पीकर ही कुशलता पूर्वक पदभार संभाल पाते हैं। लेकिन इस नेकदिल दूध पिलाने वाली भैंस माता को खिलाते क्या हैं- भूसा! सुलाते कहां हैं-तबेले में! क्या भैंस को यह अच्छा लगता होगा? आप सोएं मखमल पर और भैंस माता सोए तबेले में। एक खटिया भी लगा देते, तो क्या बिगड़ जाता। अरे घर का कुत्ता तक मंत्री जी के सोफे पर चढ़कर सोता होगा। चार लोग गोद में उठाए घूमते होंगे।

अच्छा चलो, भाग गई या भगा ली गई। भैंस की मर्जी। सारे के सारे पुलिस वाले भैंस को ढूंढने में लग गए। अब सोचने वाली बात है कि हमारे देश की पुलिस करे, तो क्या करे? अपराधियों को पकड़े या भैंस पकड़े। अच्छा होता, मंत्री जी भैंस के गले में भी आधार कार्ड टंगवा देते। ताकि सड़क पार करते वक्त हर सिपाही रोककर आधार कार्ड तो देख ही लेगा कि किसकी भैंस किसके खेत में चर रही हैं। बेचारा सिपाही पूछता भी तो किससे पूछता कि ऐ भैंस, तू कहां जा रही है।

सुनीता शानू

Tuesday, January 28, 2014

एक लाइक तो बनता है न जी ( नव भारत में प्रकाशित)



 सुनीता शानू

ज्यादा मत सोचिए। कोई लड़की या लड़के की फोटो को शादी के लिए लाइक करने की बात नहीं हो रही है। यहां सवाल बस एक लाइक का है। लाइक बोले तो- अंगेजी का ये लाइक चेहरे की किताब पर पसंद का एक चटका लगाना है- कि फलां की तस्वीर खूबसूरत है, तो फलां ने एक शेर लिख डाला है और चाहता है कि आप जरा लाइक का चटका लगा दें। ज्यादा नहीं, बस एक छोटी सी ख्वाहिश ही तो करता है हर फेसबुकिया कि आप आएं और एक लाइक का चटका लगाएं। सुबह शर्मा जी प्रोफाइल पर एक तस्वीर लगा आए थे। तब से बीस बार कंप्यूटर खोल कर देख चुके हैं कि किसी ने लाइक किया कि नहीं। अब सारे घर वाले तो लाइक कर ही चुके हैं दूसरा न करे तो क्या किया जाए?

वैसे एक लाइक में जाता क्या है, कर ही दो आप भी। कौन आप शादी के लिए पसंद कर रहे हो। जरा सा माउस घुमाया, क्लिक किया- हो गया लाइक। सारे दोस्तों को फोन करने पूछ चुके हैं, लाइक किया कि नहीं। यार एक लाइक का सवाल है बस। सोशल मीडिया की मानें तो 4.5 अरब लोग फेसबुक पर लाइक का चटका लगाते हैं। औसतन एक व्यक्ति 20 मिनट तक फेसबुक पर रहता है। तो क्या पांच हजार फेसबुकिया फ्रेंड्स में से पचास से भी लाइक की उम्मीद न की जाए। अरे, लोग तो किसी के बाप के मरने की खबर पर भी ऐसे लाइक का चटका लगाते हैं कि तेरा बाप मरा तो मरा। सामने वाला भी सोचता रह जाता है कि इसे मेरे बाप के मरने की खबर भी पसंद आ गई, कमाल है!

कितनी अजीब सी बात है दोस्तो, ये लाइक का चटका एक पल में बता देता है कि आप किसी को कितना पसंद करते हैं, जब आप किसी की हर बात पर चटका लगाते हैं। देखा जाए तो आपका कुछ खर्च भी नहीं हो रहा। वो कहते हैं न 'हींग लगी न फिटकरी रंग भी चोखो आवै।' किसी के मन को शांति मिलती है, कोई ये सोच-सोच कर खुश है कि इतने लोग उसे पसंद कर रहे हैं। और ये आप के लिए भी सही है। वैसे भी जब खाली बैठे हों तो करना ही क्या होगा। एक तो लॉगिन करो। दूसरे की प्रोफाइल देखो, इतना टाइम खोटा करो तो कम से कम सामने वाले को चटका लगा के बता भी तो कि देख आज मैं आया हूं कल यही चटका लगाने तुझे भी आना है। इस धंधे में बेइमानी बर्दाश्त नहीं होती दोस्तो। उसूलन तू मेरी पीठ खुजला मैं तेरी खुजलाऊं।

कुछ लोगों को तो इस लाइक का ऐसा बुखार होता है कि महिला हो या पुरुष, अपनी जवानी के टाइम की ऐसी तस्वीर चस्पा कर लेते हैं कि खुद घर वाले गच्चा खा जाएं। एक महिला काफी समय से अपने बचपन की तस्वीर लगाए थी। उसकी लिस्ट में दुनिया भर के स्कूल के बच्चे शामिल हो गए। एक बच्चा तो उसके चक्कर में ही पड़ गया। और कमेंट करने लगा-साड़ी के फॉल सा मैच किया रे...। बस एक लाइक के चक्कर में बालक पागल हुआ जा रहा था और दादी मन ही मन बोल रही थी-मुए मै तेरी दादी हूं, नासपिटे फेसबुक पर ये काम करता है। अब बताओ बच्चे को इस चेहरे में दादी दिखाई कैसे दे! वसीम वरेलवी लिखते हैं :

अपने चेहरे से जो जाहिर है छुपाएं कैसे 
 तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे।

बार - बार लाइक करने पर भी जब कोई लाइक न करे तो आदमी विक्षिप्त सा हो जाता है। इसी पागलपन के दौरे में वो नई पोस्ट लिखता है - मैं ऐसे लोगों को अपनी प्रोफाइल से डिलीट कर रहा हूं जो संवेदनशील नहीं हैं। अब ये भी कोई बात हुई , बार - बार एक ही बात सुनते आए हैं कि पुलिस ऎसे इलाकों में कर्फ्यू लगा देती है जो संवेदनशील होते हैं। फेसबुक पर कब कर्फ्यू लग जाए मालूम नहीं।

इंट्रो : एक लाइक में जाता क्या है , कर ही दो आप भी। कौन सा आप शादी के लिए पसंद कर रहे हो ! जरा सा माउस घुमाया , क्लिक किया - हो गया लाइक।


बकरी को चाहिए उसका खोया हुआ सम्मान (नवभारत टाइम्स में प्रकाशित)




बकरी को चाहिए उसका खोया हुआ सम्मान
बतरस
सुना है कि डेंगू के कई मरीज बकरी के दूध से स्वस्थ हो गए। इससे डॉक्टर भी हैरान हैं। बकरी के महत्व को फिर से समझना होगा। समाज के हित में ऐसा करना जरूरी है।


यदि आप सोचते हैं कि दिवाली के पटाखों के साथ ही मच्छरों का भी सफाया हो गया यानी कि डेंगू का भी अंत हो गया, तो ऐसा नहीं है। डेंगू के मामले कम जरूर हुए हैं पर पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। देश भर में उसका खतरा अब भी बना हुआ है।

कुछ दिन पहले चर्चा फैल गई कि बकरी का दूध पीने से डेंगू ठीक हो जाता है। अचानक बकरी के दूध के दाम बढ़ गए। बेचारे डॉक्टर्स परेशान हैं। सोच रहे हैं कि क्या वे बकरी पर पीएचडी कर लें/

कल तक जिस बकरी की कोई औकात नहीं थी वह आज खड़ी मुस्करा रही है। गांधी जी ने बकरी को उसकी गरिमा दिलाई थी, पर उनके जाते ही हम उनके साथ-साथ बकरी को भी भूल गए। बकरी का दूध पीना लोगों ने छोड़ दिया।

मुझे याद है बचपन में कभी बकरी गुस्से में आकर सींग मार देती थी तो उसे चुड़ैल कह देते थे। बकरी की तो शक्ल ही चुड़ैल सी नजर आती थी। गाय सींग मारे या पूंछ, फिर भी माता कहकर पूजी जाती थी, बकरी की आवाज एकदम चेपू किस्म की है न! तो हम स्कूल में अक्सर दोस्तों को चिढ़ाने में एक दूसरे को बकरी की गाली देते थे कि क्या बकरी की तरह में-में लगा रखी है।

बकरी ये सब देख-देख कर थक गई थी। जाने कितने दिनों का अवसाद पाले हुए थी। आखिर एक दिन बकरी गुस्से में आकर डेंगू के मच्छर से मिली और बोली- ये इंसान हमारी कद्र कभी नहीं करेगा। तुझ पर मिट्टी का तेल डलवा देगा, ऑल आऊट से भगवा देगा और मेरा तो हमेशा से शोषण हो रहा है।

जरा सी घास डाली और दूध निकाल लिया। किसी भी पेड़ के पत्ते हों यहां तक की नीम के पत्ते, पपीते के पत्ते, सब मुझे खिला देते हैं और दूध निकाल लेते हैं। हालांकि छोटे बच्चे को दूध मेरा पिलाते हैं, दवा के रूप में भी मेरा ही दूध काम आता है लेकिन माता गाय को बताते हैं। अरे मुझे बहन ही कह देते। या मौसी कह सकते थे।

मेरे सामने ही मेरे बच्चे को मार कर खा जाते हैं। तुम्हीं बताओ भैया आखिर कब तक मैं बेइज्जती सहन करूं/ बकरी ने डेंगू के मच्छर राजा से विनती की और डेंगू के मच्छर ने रक्षाबंधन के दिन वचन दिया कि हे बहना, जब-जब ये मनुष्य मेरे क्रोध की चपेट में आएगा इनकी सारी पुश्तें तुम्हें याद करेंगी। तब इन्हें छठी का दूध नहीं तुम्हारा ही दूध याद आएगा। और यह मूर्ख मनुष्य खुद नीम, पपीते के पत्ते ही खाएगा जो इसने तुम्हें खिलाए हैं। सुनकर बकरी बहुत प्रसन्न हुई और मच्छर भाई अंतर्ध्यान हो गए। इसलिए इस साल संपूर्ण भारतवर्ष में डेंगू के मच्छर ने जब उत्पात मचाया, तो मच्छर के काटे रोगी को पपीते तथा नीम का रस पिलाया गया। साथ ही सुबह- शाम प्रसाद के रूप में मरीज को बकरी का दूध पिलाया गया। कई जगहों पर बकरी का दो घूंट दूध पचास रुपये तक में बिका है जबकि इतने में गाय का एक किलो दूध मिलता है। आज कई लोग बकरी पालने की सोच रहे हैं। बकरी को अच्छा-अच्छा खाने को मिल रहा है।

अब ये सब देख कर तो ऎसा लगता है कि हमें बकरी से हाथ मिला लेना चाहिए। गाय की जगह बकरी पर निबंध बच्चों से लिखवाया जाए और उसके दूध पर पीएचडी कर ली जाए ताकि आने वाले समय में डेंगू के मच्छर से छुटकारा मिल सके। सरकार को भी इस पर ध्यान देना होगा। पशुपालन विभाग को चाहिए कि वह बकरी पालन के महत्व को प्रचारित करे। इस तरह का कार्यक्रम गांधी जयंती पर शुरू किया जा सकता है।

सुनीता शानू

Wednesday, December 25, 2013

ड्रोन आएगा डाक लाएगा ( अमर उजाला में प्रकाशित एक टिप्पणी)




कल मैंने दादी मां को बताया कि भविष्य में आपके लिए ड्रोन से सामान भिजवाएंगे। दादी मां घबरा गई, ऐसा कैसे संभव है? सोच-विचार कर काम करना चाहिए, ड्रोन तो एक राक्षस है बिटवा। आए दिन खबर सुनती हूं, आज यहां हमला, कल वहां हमला।

अमेरिकी ड्रोन ने पाकिस्तान पर कितने हमले किए हैं, तुम्हें कुछ पता भी है! हमारे इस पड़ोसी देश में लोग ड्रोन का नाम सुनकर ही कांप उठते हैं। पता नहीं, वहां इसने आतंकवादियों के साथ कितने निर्दोषों की जान ली है। ऐसा शक्तिशाली ड्रोन सामान उठाएगा? ड्रोन अंग्रेजी का शब्द है, जिसे हिंदी में नर मधुमक्खी कहते हैं। मधुमक्खी के छत्ते में हाथ न ही डालो, तो अच्छा।

लेकिन वह दिन दूर नहीं, जब बच्चे चिल्लाते नजर आएंगे, ड्रोन आया डाक लाया। आप भी कहती नजर आएंगी, ऐ ड्रोन, चल आलू-प्याज ला।

आपको क्या लगता है कि ड्रोन थैला उठाकर बाजार जाएगा? हमें तो इस पर यकीन नहीं होता। लेकिन दिग्गज ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी अमेजन कह रही है कि अब ड्रोन यह करेगा, ड्रोन वह करेगा। जबकि ड्रोन का नाम सुन-सुनकर हमें डर लगता है कि न जाने कब, कहां हमला कर दे। इसे रडार भी देख नहीं पाता। फिर क्या पता चलेगा कि फलां ड्रोन के पास राशन है और फलां ड्रोन के पास बम।

सुना है कि यह विमान एक बार ईंधन भरने के बाद आधी दुनिया का चक्कर लगा सकता है और 18,000 मीटर की ऊंचाई पर उड़ते हुए बादल छाए रहने के बावजूद एक-एक व्यक्ति पर निगरानी रख सकता है। अब बताओ, एक-एक आदमी की निगरानी की क्या आवश्यकता है भला! इससे तो अच्छा था कि इसे पतियों की जासूसी के लिए प्रयोग में लाया जाता।

कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी, थ्री इडियट्स। उसमें भी ड्रोन रूपी एक ऐसा उपकरण दिखाया गया था, जो रिमोट द्वारा उड़ाया जा रहा था। उसकी जासूसी देखकर सब सहम गए थे। खासकर महिलाएं तो उसे देखकर डर ही गई थीं। हमें सावधान होने की जरूरत है। यह ड्रोन हमारे ऊपर बिन बुलाई आफत के रूप में आने वाला है। पहले कबूतर उड़ते थे डाक लिए, उसके बाद संदेश वाहक आए, बेतार के तार टेलीग्राम, फिर हवाई जहाज, रेलगाड़ियों द्वारा डाक आई और आने वाले दिनों में ड्रोन को डाकिया बना डालने की तैयारी है। आगे-आगे देखिए, होता है क्या!

सुनीता शानू