Showing posts with label सुनीता शानू नई दुनिया. Show all posts
Showing posts with label सुनीता शानू नई दुनिया. Show all posts

Wednesday, December 9, 2009

दहेज के कारण पुरुषों का भी उत्पीड़न (नई दुनिया में प्रकाशित)







दहेज के कारण पुरुषों का भी उत्पीड़न

देश भर में वर्ष में ७० हजार मामले भारतीय दंड संहिता की धारा "४९८-ए" के अंतर्गत दर्ज किए जाते हैं। प्रतिदिन अनेक निर्दोष आरोपित पुरुष या नाते रिश्तेदारों को सजा हो जाती है, यहां तक की छोटे मासूम बच्चों व घर के बुजुर्गों की जिंदगी भी दांव पर लग जाती है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिवर्ष ५०,००० स्त्रियां परिवार के सदस्यों द्वारा किसी न किसी रूप में प्रताड़ित होती है। लगभग ६००० पुरुषों पर किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि अधिकांश पुरुष अपनी पत्नी को किसी न किसी रूप में शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना देते हैं अब मुद्दा यही उठता है कि पीड़ित महिला क्या करे, कहां जाए। इससे निपटने के लिए ही भारत सरकार ने सन १९८३ में आइपीसी की धारा ४९८ ए के अंतर्गत "पति या उसके रिश्तेदारों के अत्याचारों" को गैर जमानती अपराध करार दिया था, १९८६ में मुस्लिम महिला के तलाक के खिलाफ अधिकार की सुरक्षा अधिनियम के तहत स्पष्ट किया की तलाक देने वाले पति द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता दिया जाएगा, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मशहूर शाहबानो फैसला आया था, १९८७ दिवराल में फिर एक केस हुआ राजस्थान हाईकोर्ट में रूपकवर सती कांड जिसने सबके रौंगटे खड़े कर दिए, हाईकोर्ट ने फिर एक आदेश जारी किया "भारतीय सती रोकथाम अधिनियम १९८७" इसके अंतर्गत सती होना, जबरन सती बनाया जाना, फ़ुसलाना या महिमांडन करना अपराध माना गया। भारतीय दंड संहिता की धारा "४९८-ए" के अनुसार पीड़ित महिला पति या अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ याचिका दायर कर न्याय की गुहार कर सकती है। यदि पति या कोई अन्य रिश्तेदार अपराधी घोषित हो जाता है तो उसे कम से कम एक साल से लेकर तीन साल की सजा हो सकती है। इसके आलावा जुर्माना भी हो सकता है।



जेंडर ह्यूमन राइट्स सोसयटी के अध्यक्ष श्री संदीप भाटिया के अनुसार हर साल "४९८-ए" के तहत ५८ हजार मामले दर्ज किए जाते हैं। एक लाख से भी ज्यादा लोग झूठे मामलों में गिरफ्तार होते हैं। हर चार मिनट में एक पुरुष पर दहेज प्रताड़ना का झूठा आरोप लगाया जाता है। हर २.४ घंटे में एक बुजुर्ग नागरिक को दहेज की मांग के झूठे आरोप में फंसा दिया जाता है। हर रोज एक निर्दोष बच्चा इसी धारा में गिरफ्तार होता है, हर २३ मिनट में एक निर्दोष महिला धारा ४९८ए के तहत गिरफ्तार होती है तो हर पांच मिनट में एक निर्दोष सलाखों के पीछे पहुंचता है। अपनी दुश्मनी निकालने के लिए भी कुछ लोग दहेज के गलत आरोप लगा कर निर्दोष लोगों को फंसा देते हैं, जिस पर जस्टिस अशोक भान और जस्टिस डी.के. जैन ने कहा कि सेक्शन "४९८ ए" को दहेज के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए लागू किया गया था न कि मासूम व निर्दोष लोगों को फांसने के लिए। आईपीसी की धारा "४९८-ए" बनाई तो दहेजलोभियों को सबक सिखाने के लिए ही है लेकिन दुर्भाग्य से इसके दुरुपयोग के मामले भी सामने आने लगे हैं । दहेज निरोधक कानून के तहत दर्ज मामला गैर जमानती और दंडनीय होने के कारण और भी उलझ जाता है। आत्मसम्मान वाले व्यक्ति के लिए यह काफ़ी घातक हो गया है, जब तक अपराध का फ़ैसला होता है जेल में रहते-रहते वह इस तरह खुद को बेइज्जत महसूस करता है कि मर जाना पसंद करता है, जिसके पिछले दिनों में कई किस्से नजर आए थे कि कई पुरुषों ने बदनामी से बचने के लिए आत्महत्या कर ली, आत्मसम्मान वाले आदमी के लिए एक बार गिरफ्तार हो जाना काफी घातक होता है।


कई बार अविवाहित लड़कियों, छोटे बच्चों और बुजुर्गों को आरोपी बना दिया जाता है। अग्रिम जमानत का प्रावधान न होने से उन्हें जेल जाना पड़ता है। इससे लड़कियों के विवाह के अवसर समाप्त हो जाते हैं और बुजुर्गों को जिल्लत झेलनी पड़ती है। एक और सबसे बड़ी समस्या है बेकसूर बच्चे जिन्हें नाहक ही सजा भुगतनी पड़ती है, जो अपने माता-पिता, घर- परिवार से दूर होते जाते हैं व कई बार अपराधी भी बन जाते हैं । इन तमाम बातों को देखते हुए जनता की अपील पर केंद्र सरकार ने निर्देश जारी किए हैं कि दोनों तरफ न्याय बराबर हो, सजा दोषी को ही मिले निर्दोष को नहीं। एवं धारा ४९८-ए के लिए पर्याप्त सबूत मिल जाने पर अन्वेषण के बाद ही दहेज विरोधी मामले दर्ज किए जाएंगे। हो सकता है कानून के इस बदलाव से कानून की बदनामी होने के आसार भी कम हो पाएं किंतु इसके लिए समाज और प्रशासन में भी जरूरी फेरबदल किए जाने चाहिएं। इसी से परिवार का विघटन रुकेगा ।

Monday, November 23, 2009

घूरना मना है (नई दुनिया के संपादकीय पृष्ठ पर)



राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी क्या शुरू हुई कि जिधर देखो उधर उथल-पुथल मच गई।दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। उन दिनों कुछ खास है,जैसे अब कहीं गाय भगाई जा रही है तो कहीं कुत्ता, कहीं एमसीडी वाले बंदर के पीछे उछल रहे हैं तो कहीं सूअर भगा रहे हैं। बाकी सब तो ठीक है मगर मच्छरजी को कैसे भगाया जाए। उन्होंने तो लगता है, राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेने की ठान ली है।


कॉमनवेल्थ गेम्स का एक फायदा तो है हमारी दिल्ली भी साफ-सुथरी, सुंदर हो जाएगी और सड़कें चौड़ी होंगी, फ्लाईऑवर बनेंगे, नई इमारतें, नए स्टेडियम। अरे भैया! हम कोई खयाली पुलाव नहीं पका रहे हैं, बाकायदा कागजी नक्शा तैयार किए हैं। अब तो हमारे देश का पूरी तरह से नवीनीकरण होकर रहेगा। मजाक नहीं है भई, क्या हुआ जो महँगाई ने मुँह खोल रखा है। हम दिल्ली वाले दिल भी तो बड़ा रखते हैं जी। यह और बात है कि देश के सारे भिखारियों को और रिक्शे वालों को दिल्ली से हटा देंगे। आखिर कॉमनवेल्थ गेम्स में कॉमन मैन का क्या काम?

विदेशियों का स्वागत करने में कोई कसर न रह जाए इसलिए तरह-तरह के ट्रेनिंग सेंटर भी खुल गए हैं। रेलवे ने भी अपने स्टेशनों का हुलिया बदलने की ठान ली है। इसके साथ ही रेलवे ट्रेनिंग सेंटर में कुलियों को सिखा रहे हैं कि कैसे अँगरेजी में बात की जाए। अरे उन्हें अँगरेजी ही आती तो वे कुलीगिरी करते ही क्यूँ?

देखा-देखी पुलिस प्रशासन को भी जाने क्या हो गया है। पचास हजार से भी ज्यादा पुलिसकर्मियों को सारा काम-धंधा छोड़कर यही सीखने में लगा रखा है कि किस प्रकार विदेशी मेहमानों से पेश आया जाए। अब विदेशी चाहे जैसी हरकत करें, हमें अपने क्रोध को वश में रखना है। मुझे लगता है, बाबा रामदेव ही उनकी क्लास ले रहे होंगे। रोगों से छुटकारा, तनाव से मुक्ति, क्रोध पर काबू इत्यादि।

सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात तो यह है कि घूरने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अब भला यह भी कोई बात हुई? कोई यह बताए कि घूरना भी कोई अपराध हुआ भला। मेरे खयाल से हमारे देश में कम से कम दस प्रतिशत दस साल के बच्चे, तीस प्रतिशत नौजवान और साठ प्रतिशत बुढ़ऊ नौजवान से हैं, जो घूरा-घूरी में लगे रहते हैं। और नित्यप्रति घूरन प्रक्रिया द्वारा आई टॉनिक लेने का उनका नियम बना हुआ है। अब ये आई टॉनिक पर भी रोक लग गई तो सोचिए देश की आँखों का क्या होगा। और यदि सुरक्षा कर्मचारी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लेंगे यानी कि पर्यटको को घूरेंगे नहीं तो देश की सुरक्षा कैसे होगी? उनमें से किसी के पास बम निकल गया तो क्या होगा? यह अत्यंत गहन चिंतन का विषय है।


सुनीता शानू

Saturday, November 7, 2009

जातीय दबाव से दम तोड़ती ममता





(नई दुनिया के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)

पिछले दिनों सगोत्रीय विवाह से नाराज एक पिता द्वारा अपनी पुत्री की नृशंस हत्या और उससे पहले क्रूररतम उत्पीड़न की खबर आई । राजधानी के महिपालपुर इलाके की इस घटना ने लोगों को दहला दिया । इसी संदर्भ में सवाल उठता है,कि क्या हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत सपिंड में विवाह करने की इजाजत नहीं है। परंतु ऐसा कोई नियम नहीं बना जिसमें यह लिखा गया हो कि सगोत्र विवाह करने पर जाति से बेदखल कर गांव से निकाल दिया जाएगा या जान से मार दिया जाएगा।

हालांकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय विवाह परंपरा के अनुसार विवाह अपनी ही जाति में होता है व सपिंड व सगोत्र के बाहर रहता है। परंतु कितने लोग हैं जो गोत्र से भलीभांति परिचित हैं? जहां तक हमारी नजर जाती है, हम अपने बच्चों को भी अपने परिवार की ही शिक्षा देते हैं। जिसे सपिंड कहा जा सकता है। तो आज छोटा सा बच्चा भी जानता है कि कौन उसकी बहन है, कौन भाई लेकिन अगर अठारह वर्ष के किसी बच्चे से पूछा जाए उसका गोत्र क्या है तो वह शायद बता नहीं सकेगा। वह जाति को जानता है, परिवार को समझता है। उसकी नजर में चाचा, ताऊ, बुआ सभी अपने परिवार के अंतर्गत आते हैं परंतु सगोत्र की परिभाषा समझाए बगैर कैसे कोई समझ पाएगा की सगोत्र होता क्या है? और एक बात जो सबसे जरूरी है, देश भर के सगोत्री अपने चेहरे पर लिखकर तो नहीं चलते कि हम भाई-भाई हैं। कैसे कोई जान पाएगा की कौन उसके गोत्र से संबंधित है और कौन नहीं?

यह सवाल सिर्फ एक-दो बच्चों का ही नहीं तमाम भारतीयों का है जिसके कानून में अंतर्जातीय विवाहों और प्रेम विवाहों को मान्यता तो दे दी है परंतु समाज अभी तक अपना नहीं पाया है। ऐसा लगता है जैसे विश्व में एक सी पाठशाला चालू हो गई है जो कौमी एकता को भंग कर सगोत्री एकता की बात कर रही है। आज जो हमारा देश आधुनिकता का दावा करता है, किसी भी कानून को मानें या नहीं मानें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन सामान्य परिवार समाज के ठेकेदारों की चपेट में आ जाते हैं।

जिस देश में नारी को मां-बहन-बेटी के रूप में सम्मानित किया जाता रहा है । ससुराल में भी गृहलक्ष्मी, गृहस्वामिनी के रूप में समझा जाता है, उसी देश में अपनी बेटी का उत्पीड़न कोई भी माता-पिता तो नहीं कर सकते, जब तक कि उन पर गहरा सामाजिक दबाव न हो । क्या इस गुनाह का समर्थन किया जाना चाहिए?

मौजूदा हालात में हम कैसे सक्षम हो पाएंगे एक सुंदर और सुगठित समाज बनाने में। कैसे पिरो पाएंगे समस्त भारतवर्ष को एक सूत्र में। जब घर में ही फ़ूट पड़ी होगी तो दुश्मनों से मुकाबला कैसे हो पाएगा। तमाम बातें इस ओर इशारा कर रही हैं कि आज भी हम पाषाण युग में जी रहे हैं।


सुनीता शानू