Thursday, October 24, 2013

अमर उजाला में प्रकाशित एक व्यंग्य टिप्पणी...

सोना नहीं, तो सोना नहीं

No sleeping without gold
उन्नाव जिले के डौंडिया खेड़ा में आजकल दिल्ली के शनि बाजार जैसा माहौल है। लोग कुदाल-फावड़ों के साथ अपने दैनिक रोजगार का साज-ओ-सामान लेकर आ धमके हैं। ये लोग दिन भर चाट-पकौड़े और गरमा-गरम जलेबियों का आनंद उठाते हैं और रात-भर जागकर सोने की तलाश में सारा किला खोद डालते हैं। संन्यासी सोने के चक्कर में हवन कर रहे हैं, तो कहीं-कहीं चोर-डाकुओं ने भी रात के अंधेरे में चुपचाप खुदाई का काम चालू कर दिया है। क्या पता, सोना डौंडिया खेड़ा की जगह कहीं और मिल जाए। एक जगह तो कुछ लोगों ने मंदिर के पुजारी को कैद कर मंदिर के अंदर का भाग ही खोद डाला।

शोभन सरकार की भविष्यवाणी पर सोना मिलेगा या नहीं, यह तो मालूम नहीं, लेकिन उन्नाव में त्योहार जैसी हलचल मच गई है। देश के नेता हों या अभिनेता, सभी की दिलचस्पी है इस सोने में। कुछ लोगों का मानना है कि पूरे देश में अनेक स्थानों पर खजाना दबा पड़ा है, बस जमीन को खोदने की जरूरत है। कहा भी गया है कि जिन खोदा तिन पाइयां...। उपकार फिल्म का गाना, मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती भी शायद किसी खजाने की खुदाई से प्रेरित होकर ही बना होगा।

पुरातत्व विभाग का मानना है कि खुदाई में एक महीना लग सकता है। तो क्या सब लोग एक महीना वहीं तंबू तानकर इंतजार करें कि कब धरती माता सोना उगलेगी और कब उनके दिन बहुरेंगे। एक महीने तक वहां बैठे रहकर साधु-संतों के भजन सुनकर दिन बिताना तो कठिन है। ऐसे में यह भी हो सकता है कि लोग गुस्से में आकर कुदाल-फावड़े लेकर ऐसी खुदाई कर दें, जो एक महीना क्या, एक दिन में पूरी हो जाए। सबकी नजर उन्नाव पर टिकी है।

चाहे कुछ भी हो जाए, खुदाई होगी। आखिर साधु बाबा की जुबान है। भई, सोना न मिला, तो गर्दन कटवा लेंगे, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। कुछ मॉडर्न कथावाचकों की पोल खुलने के कारण लोगों का साधु-संतों से भले ही विश्वास उठ जाए, पर सोने के लिए खुदाई करने में आखिर क्या जाता है!

अभी तक तो खुदाई में किले की दीवार ही निकली है। खुदाई करते-करते अंत में महाराज के सोने का पलंग निकल आया, तो क्या कर लेंगे? बाबा कहेंगे, यही तो है। इसी की बात कर रहा था मैं। लो, जितना सोना चाहो सो लो...और मेरी तरह स्वप्न देखो सोने के।

Thursday, October 10, 2013

अपना प्रधानमंत्री खुद चुने “ उपयोगी टिप्स”



कल टीवी पर “कौन बनेगा करोड़पति” देखते-देखते ये खयाल आया कि क्यों न प्रधानमंत्री का चुनाव भी इसी तरह हो जाये! है न लाजवाब सोच! अब देखिये कितने उम्मीदवार खड़े हैं लाइन में। कोई हाथ दिखाता है तो कोई हाथी। कोई ट्रैक्टर लेकर आ गया तो कोई साईकिल। आम आदमी तो झाड़ू लेकर आ गया हैं।
मुझे लगता है देश की जनता से भी पूछ लेना चाहिये था कि प्रधानमंत्री किसे बनाना चाहिये। या तो अमिताभ बच्चन हॉट सीट पर बैठ कर सभी उम्मीदवारों में से क्विज़ कॉंटेस्ट द्वारा चुने। ताकि देश की जनता को इस बात का तो विश्वास हो ही जायेगा कि हमारा प्रधानमंत्री अपनी काबिलीयत से बना है, खुद कॉन्टेस्ट जीता है। वरना अँधेर नगरी चौपट राजा। रबड स्टैम्प तो भैया किसी को भी बना दो।
ये देश का अहम फैसला है जी इसमें महिलाओं की भी राय लेनी चाहिये। यदि आप मुझसे पूछते तो मै आपको सही और उत्तम राय ही देती। क्योंकि प्रधानमंत्री सिर्फ़ देखने के लिये या कुर्सी तोड़ने के लिये ही नही होता। देश का बेड़ा पार करने के लिये भी होता है। इसके लिये कुछ जायज शर्तें तय होनी चाहिये ताकि देश का प्रधानमंत्री चुना जा सके। चलिये आपको भी बता ही दिया जाये कि हमारी "आम औरत पार्टी" ने क्या सोचा है। सबसे पहली बात प्रधान मंत्री की उम्र चालिस से पैंतालिस के बीच होनी चाहिये। प्रधान मंत्री को दुनियादारी की पूरी पहचान होनी चाहिये। किसकी बेटी का किससे साथ चक्कर है, कब कौन किसके साथ भागने वाली है, और किसकी बीवी किसे धोखा दे रही है। किसके मुह में आसाराम है...और किसकी बगल में शिल्पी छुरी है। अब इन सब बातों का पता होगा तो पहले से ही बचने-बचाने का जुगाड़ किया जायेगा।
अब मुद्दा ये उठता है कि ऎसा शातिर दिमाग किस इंसान के पास होगा। इंसान से तात्पर्य इंसान ही है, यहाँ कृपया उन सम्बोधनों पर ध्यान न दिया जाये जो गधा, उल्लू या कोल्हू के बैळ की श्रेणी में आते हैं। हाँ तो मै कह रही थी कि जो देश-विदेश की खबरों के साथ घर की खबरें भी रखे। जहाँ तक मेरा चालीस साल का तजुर्बा कहता है तो भैया ये सब बातें तो एक नारी ही ढँग से बता पायेगी।
अब अपने मोहन को ही ले लो... चुपचाप खड़ा मुस्कुराता रहता है। उसके पीछे एक औरत न होती तो देश का क्या हाल होता... आप सब जानते हैं। तो भाई लोगों सबसे पहली बात तो यही है कि प्रधानमंत्री किसी महिला को ही बनाया जाये। क्यूँ?... क्या मै गलत बोल रही हूँ?  घर को चलाना यहाँ तक की पति को चलाना देवता बनाना पूजना और काम भी करवाना। ये सारे गुण एक नारी में उपलब्ध हैं। उपलब्ध क्या है कूट-कूट कर भरे हैं जी। नारी शक्ति का मुकाबला तो देवता तक नही कर पाये हैं जिन्होने अंजाने में इसका आविष्कार कर दिया था। हम अपने घर के साथ-साथ अड़ौस-पड़ौस सबकी खोज खबर रख लेते हैं तो देश भर की क्यों नही ले सकते बताओ?
...तो भाई लोगों हमारा नेता कैसा हो...... जैसा हो। अरे.. रे मै अपने लिये नही कह रही की मुझे प्रधानमंत्री बनना ही नही है। मेरे पास तो फ़ुर्सत ही नही है। क्या करुं वरना आपका आग्रह ठुकरा दूँ ऎसी मै नही हूँ।....
लेकिन हाँ आप ऎक बार बस इमेजिन करके देखिये तो मै ये वादा करती हूँ कि मै इस बात का पर्दाफाश कर दूँगी कि तेरी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद कैसे?  ये मेरा पक्का वादा है  आपसे कि मै पूरे देश को हिला कर रख दूँगी। रुपया नीचे गिरेगा नही और डॉलर ऊपर उठेगा नही। प्याज़ भी यूँ इतरायेगा नही क्योंकि पूरे शहर में सड़क किनारे बस प्याज़ ही प्याज़ उगाये जायेंगें कि जानवर भी नही खायेंगें। रही बात डिज़ल, पैट्रोल या रसोई गैस की तो कोई न कोई विदेशी फ़ार्मूला चुरा कर डिजल पैट्रोल और गैस तो बचा ही लूंगी। हम भारतीयों को बिजली चुराने की, टैक्स चुराने की, इधर का सामान उधर करने की बचपन से आदत होती है। तो दोस्तों चाहे जो हो जाये मै हर वादा जो मैने किया है या किया नही है कुर्सी मिलने तक हर हाल में पूरा करुंगी। मैने हर परेशानी से निबटने की तरकीबें सोच निकाली है। मेरे देश के समझदार नागरिकों आप सबकी यही मर्जी है तो मै आप सब के लिये ये कुर्बानी देने को भी तैयार हूँ। वैसे ये सच है बस फ़ुर्सत ही नही है मेरे पास।

सुनीता शानू

Tuesday, September 24, 2013

अमर उजाला में प्रकाशित एक व्यंग्य टिप्पणी...

http://www.amarujala.com/news/samachar/reflections/vyang/satire-on-aam-aadmi-party/

चकला-बेलन भी ले जाएंगे

satire on aam aadmi party
अलसुबह पार्क जाने के लिए बाहर निकली, तो हैरान रह गई। मेरे घर की खिड़की, दरवाजे यहां तक कि गाड़ी पर भी कोई झाड़ू के पोस्टर लगा गया था। सामने ही झाड़ू वाली झाड़ू लगाती हुई बड़-बड़ किए जा रही थी। मैंने पूछा, क्या हुआ, तो वह बोली, का बताएं बीबी जी, औ ससुर का नाती हमार झाड़ू पर हाथ साफ कर गया। ऐकै ही झाड़ू खरीदे रहे, ओकू भी कल आम आदमी पार्टी मा लेकर झण्डा फहराए रहे। आए तो झाड़ू सै मार-मार के ऊ का समझाई दें।

हां, सही तो कह रही है झाड़ू वाली कि झाड़ू ही लेकर चला गया उसका मर्द नारे लगाने, अब करे तो वह क्या करे? घर से निकलते समय झाड़ू वाली झाड़ू लगाती नजर आया करती थी, लेकिन आज तो सारे रास्ते भर झाड़ू के पोस्टर ही पोस्टर नजर आए।

वो झाड़ू, जो गृहणी के हाथ में होती थी। जिस झाड़ू को हम महिलाएं बदमाशों को मार-मार कर सुधारने के लिए प्रयोग में लाती थीं। आज उसी झाड़ू को सरे बाजार आसमान में चढ़ते देखा। यहां तक कि जो मौजीराम पंडित भी झाड़ू छू जाने पर दोबारा नहाकर आता था, आज वही झाड़ू उसके घर के दरवाजे पर टंगी उसे चिढ़ा रही है, कि जा नहा ले कितनी बार नहाएगा।

वाह भई वाह, आम आदमी की ये झाड़ू न जाने कितनों के माथे का तिलक बन जाएगी। पहले झाड़ू वाले को देख कर सब दूर-दूर भागा करते थे। आज आम आदमी पार्टी का हर आदमी झाड़ू उठाकर चल रहा है। खुद को आम आदमी बता रहा है। और तो और टी शर्ट कंपनियों ने झाड़ू के टैटू बना डाले हैं। यह भी हो सकता है कि किसी झाड़ू कंपनी ने सिफारिश की हो, ताकि विज्ञापन भी हो जाए, सारी झाड़ू भी बिक जाए।

ये भी तो हो सकता है कि पुरुषों ने महिलाओं को खुश करने की यह तरकीब निकाली हो। या कोई पुरुष झाड़ू खा-खाकर इतना परेशान हो गया हो कि उसने पार्टी में इसी को चुनाव चिह्न बनाने की सिफारिश की हो, वरना आम आदमी पार्टी को झाड़ू ही क्यों नजर आई, कुछ और नजर क्यों नही आया?

दोस्तो, अटकलें लगा-लगाकर मन में सांय-सांय होने लगी है। ऐसा लगता है कि कोई हमारी नारी सत्ता में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है। आज झाड़ू ली है, कल चकला, बेलन, चिमटा सभी ले लिए गए तो? यही तो हथियार है हमारे गिने चुने। इन्हीं पर कुदृष्टि डाली गई, तो हमारा क्या होगा।

टैग्स

» sunita shanuaam aadmi party

Monday, July 8, 2013

नटखट तुम कब सुधरोगे




आप सोच रहे होंगे किस नटखट की बात हो रही है। नटखट का तो बस एक ही नाम होता है नटखट कृष्ण को भी कहते थे। लेकिन मै उन बच्चों को कहती हूँ जो अपनी हाज़िर जवाबी से सामने वाले को चुप कर देते हैं।
अभी कुछ समय पहले की ही बात है मै गार्डन में घास पर चक्कर लगा रही थी कि एक बच्चा दूसरे बच्चे से बोला... अच्छा आँखें तेज़ कर रही है। सुनकर गुस्सा तो आया ही हँसी भी आई कि बच्चे इतनी आसानी से ऎसा कैसे बोल देते हैं।
बच्चों मे निडरता का गुण मेरे ख्याल से परवरिश से ही आता है। कल की ही बात है मै ऑफ़िस के बाहर कोरिडोर में खड़ी फ़ोन पर बात कर रही थी कि मेरे कान में आवाज़ आई। डर मत मै हूँ न। नन्ही सी वो आवाज़ मुझे अपनी ओर खींच रही थी मैने बाहर झाँक कर देखा तो पता चला कि एक पाँच साल का बच्चा अपने से भी छोटे बच्चे को कह रहा था। चल मै चलता हूँ तेरे साथ तूं डर मत मै हूँ न। सुनकर ही बहुत अच्छा लग रहा था। दिल चाहा कि उसे चूम लूं थोड़ा सा गाल खींचू जो बचपन में बड़े हमारे साथ करते थे। मैने बाहर आकर उसे प्यार से पूछा कहाँ जा रहे हो बेटा। वो बोला आपको कहाँ चलना है। एकदम से झंन्नाटेदार थप्पड़ की सी आवाज़ आई। मै साहस करके बोली अभी तो आप इसे कह रहे थे कि चल मेरे साथ डर मत वही पूछ रही हूँ आप कहाँ जा रहे हो। वो फ़िर उसी टोन में बोला... पहले आप बताईये आपको चलना कहाँ है... कुछ देर बाद रुक कर बोला अच्छा सोच कर बता देना कि आपको चलना कहाँ हैं। मै उसे देख कर ठगी सी खड़ी रह गई ऎसा लगा जैसे वो बड़ा है और मै उसका बच्चा और मेरे गाल खींच कर परेशान कर रहा है। आखिर उससे पीछा छुड़ाना मुश्किल लगा तो मैने उसके घर को हथियार बनाया और पूछा तुम इसी पास वाले घर में रहते हो न सुनते की वो सर पर पैर रख कर भाग गया। 
किस्से तो और बहुत हैं जो इन नटखटों की नटखटी बातों से मन में घर कर गये हैं। ऎसा ही एक नटखट कल राँझना मूवी मे देखा जो छुटपन में ही एक मुस्लिम लड़की का आशिक हो गया। लो कर लो बात।

Friday, April 12, 2013

आओ मोटे लोगों आदोंलन करें... मोटापा ज़िंदाबाद

आज नवभारत में
 


पिछले दिनों एक खबर सुनने में आई कि समोआ एयरलाइंस मोटे लोगों से दोगुना किराया वसूलती है। यह कंपनी अमेरिकी समोआ द्वीप के लिए हवाई सेवा उपलब्ध कराती है। उसमें यात्रा के लिए एक किलो ग्राम वजन के लिए एक से 4.16 डॉलर तक अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। इस यात्रा के दौरान यात्री के सामान और उसके अपने वजन में कोई फर्क नहीं किया जाता। तो क्या मोटे लोगों का वजन उठाते-उठाते रिक्शे वालों की तरह हवाई जहाज वाले भी उकता गए हैं? हद हो गई भैया। मोटे बेचारे हर जगह लूटे जा रहे हैं। एक तो मोटापे की वजह से खाना ज्यादा पड़ता है। कपड़ा ज्यादा लगता है। दूसरे इस महंगाई ने जान निकाल कर रख दी है। जो लोग चार लोगों का अकेले खाते हैं, उन पर तो कहर टूट पड़ा है।
अब पार्टियां या शादियां रोज-रोज तो होती नहीं जो काम चल सके। महाकाय शरीर छुपाये छुपता भी नहीं है। मेजबान संदेह की दृष्टि से देखता है कि यह दूसरी प्लेट खा रहा है या चौथी? मोटे लोगों के खिलाफ हर जगह साजिश हो रही है। ब्रिटेन के एक ट्रस्ट ने तो मोटापा कम करने पर इनाम की घोषणा कर दी। लेकिन बात यहीं तक नहीं रही। अब ब्रिटेन ने एक और योजना बना डाली है जिसके मुताबिक मोटे लोगों के अंतिम संस्कार के लिए 40 पाउंड का अतिरिक्त कर देना पड़ेगा। क्या इससे मोटापा कम हो जाएगा? ये तो भैया और भी जटिल समस्या हो गई कि बेचारे मोटे लोग जीते जी ही जेब ढीली नहीं करें वरन मरते-मरते घरवालों की जेब से वसूली भी करवा के जाएं।
अमेरिका की भारोत्तोलक हॉली मैनगोल्ड को इस बात पर गहरी आपत्ति है कि मीडिया और जनता उन्हें मोटी कहती है जबकि वो एक अच्छी एथलीट हैं। अब वजन का कांटा उनके चढ़ते ही 150 को पार कर जाए तो उनका क्या कसूर? उन्हें तो अपने मोटापे पर गर्व है। वह इस बात को गलत बताती हैं कि खेलकूद के लिए छरहरी काया होनी चाहिए। बिल्कुल ठीक कहती हैं वह। शरीर क्या होता है, जज्बा होना चाहिए।
वैसे अमिताभ बच्चन जी ने गाया भी है कि जिसकी बीवी मोटी उसका भी बड़ा नाम है। पर लगता है कि यह गाना समोआ एयरलाइंस ने नहीं सुना। उन्होंने शायद वह हरियाणवी गीत सुन लिया होगा-जिसकी बीवी मोटी उसकी आफत होरी सै दरवाजे में फंस गई तो खिचम खाची होरी सै। इसलिए हवाई जहाज वालों ने क्लीयर बोल दिया है, भैया कि एयरलाइनें सीटों पर नहीं चलती हैं, वे वजन पर चलती हैं। जैसे हम अतिरिक्त वजन नहीं चढ़ाते वैसे ही भारी यात्रियों को नहीं चढ़ाएंगे या उनसे ज्यादा वसूलेंगे। लो जी कर लो बात, आदमी न हुआ सब्जी-भाजी, सूटकेस हो गया। यह तो मनुष्यता का अपमान है। उसकी स्वतंत्रता पर रोक है कि भैया यह मत खाओ, यह मत पीओ। इतना मत सोओ। फिर इस जिंदगी का मतलब क्या रह जाएगा। ऐसा सोचने वाले क्या चाहते हैं कि कोई चैन भर नींद भी न ले? आखिर नींद और आलस्य भी तो प्रकृति की ही देन है। और चटोरापन भी तो प्रकृति ने ही दिया है न।
अब जल्दी ही स्लिम बनाने के लिए नई - नई तिकड़में शुरू हो जाएंगी। कोई स्लिम टी पिएगा , तो कोई कैप्सूल खाएगा कि जल्दी से जल्दी पतला हो जाऊं। इंग्लैंड में वैज्ञानिकों ने एक ' बुद्धिमान ' इलेक्ट्रॉनिक माइक्रोचिप बनाया है जिससे मोटापा घटाया जा सकेगा। अब यह प्रकृति के काम में हस्तक्षेप तो नहीं तो और क्या है। लेकिन मोटे लोगों की ओर से अभी तक इसका कोई विरोध नहीं हो रहा है। समझ में नहीं आता कि उनमें इतनी हीन भावना क्यों है। वे क्यों नहीं पूरे आत्मविश्वास के साथ संगठित होते हैं ? उन्हें भी ग्रीन पार्टी की तर्ज पर ओबेस पार्टी या किसी और नाम से पार्टी बना ही लेनी चाहिए। एक बार वे संगठित हो जाएं तो फिर किसी भी देश की सरकार या कंपनी की मजाल नहीं कि वह कोई मोटापा विरोधी कदम उठा सके।




Friday, April 5, 2013

घूरने वालों ने दी कुर्बानी ( एक व्यंग्य टिप्पणी)


हिंदुस्तान के सम्पादकीय पृष्ठ पर नश्तर कॉलम में प्रकाशित ( देखते देखते चले गये देखने वाले)

सुना है घूरे के दिन भी फिरते हैं तो भला घूरने वालों के दिन क्यों नही फिरेंगें? सरकार ने जबसे ये नियम लागू किया गया है कि घूरने वालों या पीछा करने वालों पर गैर जमानती कार्यवाही की जायेगी तब से तमाम ब्यूटी पार्लरो का चलना कम हो गया है। हाँ पुरुष पार्लर पूरे जोर-शोर से चल रहे हैं। पुरुष कभी बाल सैट करवाते हैं कभी मूँछे सैट करवा कर इतराते हैं। कि अब हमें देखो तुम्हें देखने वाला कोई नही। यह भी कोई बात हुई भला जब देखने वाला ही कोई नही तो हम महिलाओं का तो बहुत ही बुरा हाल हो गया है, अब सारी की सारी महिलाये हॉलीवुड स्टार मेगन फॉक्स तो हैं नही जो घूरे जाने से नफ़रत करती होँ। हमारे देश में तो एक्ट्रैस नई-नई स्टाइल के कपड़े पहनती ही इसलिये है कि अधिक से अधिक उनके फ़ैन हों और फैन तो भैय्या तभी बनेंगे जब किसी अदाकारा को घूर-घूर कर निहार कर न देख लें। 
 अधिकतरों घरों मे अल्ताफ़ राजा का गाना सुनाई दे रहा है मै कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किसके लिये। जैसे कि बाल बनाना सुन्दर कपड़े पहनना ही पडौसी के लिये किया जाता है कि आप पड़ौसी घूरो हमें। सही भी है साड़ी के साथ कुछ भी मैचिंग लगा कर श्रीमान जी से पूछो कि मै कैसी लग रही हूँ बोलते हैं अरे हमेशा जैसी लग रही हो या ठीक है यार तुम अच्छी ही लगती हो। जबकि पडौस वाले शर्मा जी बड़ी पारखी नज़र रखते हैं जब भी देखते हैं कहे बिना नही रहते हैं, ओह्ह भाभी यू आर लुकिंग गोर्जियस... या ये साड़ी तो गज़ब लग रही है... या आपको पहनने का सलीका आता है, सबके बस की बात नही। सोचिये ये अमृत-तुल्य वाक्य अब कौन बोलेगा। पर कहते हैं न अपना सिक्का खोटा हो तो दोष दूसरे को क्या दें। या तो ये श्रीमान जी की करतूत है जब भी शर्मा जी तारीफ़ करते थे उनसे चिढ़ जाते थे या विदेशी ताकतों का हाथ है जो न तो मुन्नी को बदनाम होते देख पाये न शीला को जवान।

एक ब्रिटिश संस्था कोडैक लेन्स विजन ने १८ से ५० साल के लोगों की राय को आधार बनाकर रिसर्च
की तो पता चला पुरुष अपनी ज़िंदगी का पूरा एक साल लड़कियों को घूरने में कुर्बान कर देता है। दिन भर में एक-दौ नही तकरीबन दस लड़कियों को घूर लेता है। ४३ मिनिट तक महिलाओं या लड़कियों को आँखें फ़ाड़ कर देखने या निहारने में हर दिन लगाता है। जबकि महिलायें पूरी ज़िंदगी के ६ महिने पुरुषों को घूरने या निहारने में लगाती हैं। लेकिन लगाती तो है ही।  मै पूछती हूँ सरकार से क्या सदियों से चली आ रही ये कुर्बानी आज यो हीं व्यर्थ चली जायेगी।

अब कोई आँख से भैंगा हो तो बेचारा देखेगा कही दिखाई देगा फ़लाँ- फलाँ को घूर रहा है अब बताओ क्या करेगा वो? आँख फोड़ ले क्या?।
 प्रणब दा कितनें अच्छे से समझते है इस बात को कि जब तक लड़के-लड़्कियों  एकतक दूसरे को ध्यान से देखेंगे नही पसंद कैसे करेंगे । और पसंद नही करेंगे तो शादी विवाह जैसी रस्में भी नही होंगी। वाह प्रणब दा। कभी-कभी मुझे लगता है सरकार एक तीर से कई शिकार करती है। शादी नही तो जनसंख्या कम और महगाँई भी कम बेरोजगारी भी नही रहेगी। वाह भई वाह।  
मेरे खयाल से हमारे देश में कम से कम दस प्रतिशत दस साल के बच्चे, तीस प्रतिशत नौजवान और साठ प्रतिशत बुढ़ऊ नौजवान ऎसे हैं, जो घूरा-घूरी में लगे रहते हैं। और उनका नित्यप्रति घूरन प्रक्रिया द्वारा आई टॉनिक लेने का नियम बना हुआ है। अब ये आई टॉनिक पर भी रोक लग गई तो सोचिये देश की आँखों का क्या होगा। और यदि सुरक्षा कर्मचारी भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लेंगे यानि की पर्यटको को घूरेंगे नही तो देश की सुरक्षा कैसे होगी? उनमें से कोई बम फ़िसल गया तो क्या होगा। यह अत्यन्त गहन चिन्तन का विषय है। सरकार को देश की सुरक्षा का ख्याल तो रखना ही होगा। 
देखिये ब्रिटिश सरकार ने तो साबित कर दिया है कि घूरे बिना काम नही चलेगा हर इंसान में विपरीत सेक्स को घूरने की फितरत होती है. इंसान चाहकर भी घूरने की आदत छोड़ नहीं पाता। अब सरकार से कोई कहे कुत्ते की पूँछ को सीधा करके दिखाये। चाहे जितने साल नली में रखने की सज़ा दे दो रहेगी टेड़ी न!  तो भैय्या इश्वर ने आँख दी है काम है देखना, घूरना, निहारना। जाने कितनी माओं ने अपने बच्चों का नाम नैनसुख रखा होगा। ताकि बड़ा होकर नैन सुख प्राप्त हो सके। हे ईश्वर सरकार को कोई तो समझाये घूरने वालों से अपनी बुरी नज़र हटाये। मुझे तो फ़िक्र हो रही है हाय अल्लाह अब कौन देखेगा हमें।

सुनीता शानू

Friday, March 8, 2013

गलतफ़हमियाँ या एक और साजिश



दोस्तों जागरण जंक्शन में एक सवाल रखा गया था...मासूम बच्चियों के साथ यौन अपराध के लिये आधुनिक महिलायें कितनी जिम्मेदार हैं?
मैने इसी विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये हैं आप भी पढ़िये...



सबसे पहले मै बता देना चाहती हूँ कि आधुनिक महिला कौन है… मेरी नज़र में आधुनिक महिला वो औरत है, जिसने घुटन से आज़ादी हासिल की है। आधुनिक महिला वो है, जिसने पुरुष के कंधें से कधाँ मिला कर चलना शुरु किया है। जो अपने पैरों पर खड़ी है। आधुनिक महिला वो है, जो परिवार के मुखिया की तरह परिवार के भरण-पोषण का जिम्मा लेती है। आधुनिक महिला अपने फ़ैसले खुद लेती है। किसी भी गलत बात को होते देख विरोध करती है। वह आधुनिक महिला है, जिसने समाज़ में अपने लिये एक सम्मानित स्थान प्राप्त किया है। पुरुष की तरह उसने भी हर क्षेत्र में कामयाबी हासिल की है।

अब बात आती है आधुनिक महिलाओं को उन महिलाओं से जोड़ने की जो अपनी लड़कियों को छोटे-छोटे कपड़े पहनने की सीख देती हैं। अरे कहाँ हैं आप लोग एक समय था जब इतनी छोटी बच्चियों को कपड़े पहनने तक का सऊर नही था। मुझे याद है बारिश में नंगे बदन लड़कियाँ भी लड़कों के साथ खूब शोर मचाते हुए नहाती थी। घर में जब नये कपड़े आते थे सबके सामने अहाते में ही पहनने-बदलने शुरु हो जाते थे। किसी को आभास तक नही होता था कि यह बच्ची जो सात या आठ साल की है आने वाले समय में गैंग रेप का शिकार हो जायेगी। तो मेरी नज़र में यह बेकार की बात है कि नन्ही बच्चियाँ कम कपड़ों की वजह से बलात्कार का शिकार होती हैं।

दोस्तों सच कुछ और ही है जो सदियों से चला आ रहा है। बात आज की कि जाये या उस वक्त की जब औरत सिर्फ़ एक औरत थी, और चुप थी। उस वक्त भी बलात्कार होते थे। सच कहना बहुत कठिन है मगर सच यही है। नन्ही सी बच्ची नही जानती उसके चाचा उसे प्यार क्यों कर रहे हैं। नन्ही सी बच्ची नही जानती की भाई की जगह उसे क्यों पीठ पर लाद घोड़ा बनने पड़ौस के मामा हर रोज़ आ जाते हैं। वो यह भी नही जानती उसकी टीचर उसकी पेंटी का कौनसा डिजाइन पसंद करती है जो बार-बार देखना चाहती है। जाने कितनी ही बातें ऎसी हैं जो सदियों से ढकी-छुपी है। यह भी मुझ जैसी आधुनिक महिला की लाचारी है जो अपनी बात कहने के लिये हर शब्द को तौलना पड़ रहा है। कहीं जरा भी शब्द में हेरा-फ़ेरी हुई तो मेरे अज़ीज़ दोस्त मुझे अश्लीलता के कटघरे में ला खड़ा करेंगे। लेकिन मै जानती हूँ चाहे ऊपर से जितने लोग मुझे न न कहेंगे गालियाँ निकालेंगे। सच कभी बदल नही सकता।

बच्चियों के यौन शोषण की जिम्मेदार आधुनिक महिलायें नही हैं। वरन उन्ही की वजह से आज सारी वारदातें सामने आ रहीं है। आज की बच्चियाँ जरा भी अभद्र व्यवहार होने पर माँ से शिकायत कर पाती है। अपना मुह खोल बता पाती है कि फलाँ व्यक्ति टीचर या अंकल उसे किस तरह से प्यार कर रहा था और पुरानी माँओं की तरह आज की यही आधुनिक महिला घूंघट की ओट में रह कर अपनी ही बच्ची को पीटती नही है वरन खुल कर विरोध करती है। और मुझे लगता है उस महिला का यह विरोध ही ऎसे लोगों को सहन नही हो रहा जो इस प्रकार के कुकृत्य कर रहे हैं। ये आपकी गलतफहमी है या सामाज के चंद ठेकेदारों की आधुनिक महिला के खिलाफ़ साजिश?

अंत में यही कहना चाहूंगी कि हमें उन लोगों का साथ देना चाहिये जिन्होनें इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाई है। आज के माहौल को देखते हुए ज़रुरी है कि हर माँ अपनी बच्ची को ऎसी तालीम दे की वह समझ सके औरत की अस्मिता क्या होती है। हमारे कपड़े, हमारा बोलना, देखना, उठना, बैठना… हर बात हमारे व्यक्तित्व पर असर करती है। अतः बहुत ज़रुरी है हमें खुद को बनाये रखना। गर्व के साथ कहना हाँ हम आज की आधुनिक महिला है।


Friday, February 22, 2013

मन पखेरु उड़ चला पर लिखी गई भूमिका...



बहुत निष्ठा से की गई समीक्षा ने प्रभावित किया ।
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निशा जी द्वारा कहे गये ये वाक्य पढ़कर सचमुच नतमस्तक हूँ। धन्यवाद आनंद जी


ज़िंदगी की खूबसूरत कविता को भरपूर जीने की ख्वाहिश

आनंदकृष्ण जी द्वारा लिखी गई भूमिका आप भी पढ़िये। उनके द्वारा लिखी गई भूमिका पढ़कर मै अपनी कविताओं से परिचित हुई हूँ....आनंदकृष्ण जी खुद एक अच्छे कवि हैं तथा आलोचक भी हैं। उनके द्वारा मेरी कविताओं की समालोचना मेरे लिये सौभाग्य की बात है...

( कविता संग्रह “मन पखेरू उड़ चला फिर” पर केन्द्रित)
कविता बेचैनी से उपजती है। जितनी घनीभूत बेचैनी होगी उतनी सार्थक कविता भी होगी। यह बेचैनी संवेदनशील व्यक्ति को ही हो सकती है, और संवेदनशील होना मनुष्य की पहली और अनिवार्य शर्त है। इसी लिये धूमिल ने कविता को “भाषा में आदमी होने की तमीज़” कहा है। कविता, गहन पीड़ादायक अनुभवों से गुज़र रहे रचनाकार की सृजनात्मक चीत्कार है। इस प्रकार प्रत्येक रचनाकार दृष्टा होता है क्योंकि वेदना की शक्ति दृष्टि देती है। जो यातना में होता है वह दृष्टा हो सकता है (अज्ञेयः शेखरः एक जीवनी)। इस वेदना को अपनी “सेंसिबिलिटी” से जितनी शिद्दत से महसूस किया जायेगा उतनी ही पारदर्शी और दूरदर्शी दृष्टि से संपन्न कविता प्रस्फ़ुटित होगी। सुश्री सुनीता शानू की कविताओं को पढ़ते-गुनते हुए शीतल जल के छींटों-सा ताज़गी भरा अहसास छू-छूकर गुज़रता है। इस जीवंत और स्फ़ूर्त शीतल जल के अंतस में भी गहन पीड़ाएं हैं- पत्थरों से टकराने की पीड़ा, अपने मूलबिंदु से बिछड़ने की पीड़ा, अनजानों के बीच रहने की उत्कंठित पीड़ा, अज्ञात लक्ष्य की ओर बढ़ते जाने की विवश-पीड़ा, किंतु इन सब पीड़ाओं के साथ जीवन देने की, सुख देने की लालसा, पीड़ा के चीत्कार को मधुर गान में परिवर्तित कर देती है। सुनीता जी की सभी कवितायें इन्ही पीड़ाओं के चीत्कारों और जिजीविषा के मधुरतम गान का संतुलित समुच्चय है। ये कवितायें, इसीलिये समकालिक से आगे बढ़ कर सर्वकालिक हो जाती हैं और मानवीय सरोकारों की सशक्त पैरवी करती हैं। इसी क्रम में उनकी “उसने कहा”, ”मैं रूठ पाऊँ, “सुबह का भूला”, “मलाल”, “इंतजार”, “मुखौटे के पीछे”, खबर: दुनिया बदलने की”, “ए कामवाली- !” जैसी कविताएं विशेष दृष्ट्व्य हैं।
सुनीता का रचना संसार बहुत व्यापक है। उनकी कवितायें उनके जैसी ही मुखर है और अपने पाठकों व श्रोताओं से सक्रिय व सीधा संवाद करती हैं । कविताओं की यह बहिर्मुखी प्रवृत्ति एक ओर उन्हें ऎकान्तिक अवसाद से बचाती है और दूसरी ओर अपनी कहन को बिना किसी लाग-लपेट के अपने पाठकों को सीधा संप्रेषित कर देती है। सुनीता की कविता जीवंतता की, गति की और अजस्र ऊर्जा की दस्तावेज है। इस संग्रह का पहला ही गीत “ मन पखेरु उड़ चला फिर...” इस जीवन्तता की सघनता और गति की दिशा निर्धारित करता है। यह गीत इस संग्रह का शीर्षक गीत है, जिसमें डूबते-उतराते सुनीता की रचना धर्मिता के विविध आयामों का विहगावलोकन किया जा सकता है। इस गीत में “मन पखेरु” जहां एक ओर आसमान की ऊँचाइयाँ नापने को बेचैन है तो वहीं दूसरी ओर हृदय की गहराइयों में दबी मलिनता की ग्रंथियाँ खोलने को आतुर है । एक साथ बहिर्यात्रा और अंतर्यात्रा का ऎसा संगम विरल ही देखने को मिलता है। “पंछी” या “पखेरु” सुनीता का प्रिय प्रतीक है। पंछी या पखेरु; जीवंतता को, गति को, अज्रस ऊर्जा को, जिजीविषा को और उन्मुक्तता और उत्सवप्रियता के विविध बिम्बों को उनकी रचनाओं में रुपायित करता है। इस संग्रह की कुल बारह कविताओं में “पखेरु” ने उड़ान भरी है। ये कविताएं हैं- “मन पखेरु फिर उड़ चला”, “आज होली रे”, “किस पर करूँ विश्वास”,”सुबह का भूला”, “डोर”, “ओढ़ा दी चुनर”, “गीतिका: ये कौन है”, “गीतिका: प्यार में अक्सर”, ”मन पखेरु”, ”प्रेम बंधन”, “मै अपना घर ढूँढती हूँ”, और ”पंछी तुम कैसे गाते हो”। इन कविताओं में सुनीता के पंछियों- पखेरुओं ने जीवन के मौलिक बिम्ब गढ़े हैं। एक सफ़ल, सार्थक और सक्षम प्रतीक की खोज, सुनीता की बहुत बड़ी उपलब्धि है। सुनीता की रचनाओं का मूल स्वर “प्रेम” है। वे प्रेम के विविध आयामों की अनुगायिका हैं। प्रेम को उन्होने व्यष्टि से समष्टि और अणु से ब्रह्माण्ड तक पहुंचाया। ऎहिक और दैविक प्रेम का चित्रण करने में वे बहुत सफ़ल रही हैं। उनके प्रेम का कैनवास बहुत व्यापक है, जिसमें बचपन के घरौंदे, कच्ची इमली, नीम, पीपल, बरगद, अमलतास, से लेकर माँ, पिता, पुत्र, पति और मित्रों को भी बहुत आत्मीयता और निश्छलता के साथ विषय बनाया गया है। प्रकृति के प्रति उनके प्रेम ने “अमलतास” जैसी महत्वपूर्ण कविता दी है, तो प्रेम के आध्यात्मिक और पारलौकिक आयाम ने उन्हें “दर्द का रिश्ता” कविता रचने के लिये प्रेरित किया है। पूरी बेबाकी और ईमानदारी के साथ उन्होने प्रेम के ऎहिक, ऎन्द्रिक और सांसारिक स्थूल स्वरूप पर भी कलम चलाई जिससे “प्रिय बिन जीना कैसा जीना”, “तुम्हारी चाहत”, “श्याम सलोना”, जैसी कविताएं निः सृत हुई। प्रेम का वियोग पक्ष भी उनकी कविताओं में बड़ी समर्थ ध्वनि के साथ गुंजित हुआ है।
प्रस्तुत संग्रह “मन पखेरु उड़ चला फिर” सुनीता शानू का पहला काव्य संग्रह है। इसे पढ़ते हुए यह सुखद आश्चर्य होता है कि यह संग्रह किसी अन्य रचनाकार के पहले संग्रह में आने वाली भाव, भाषा, शिल्प, संयोजन, बिम्ब व प्रतीक विधान, अनुभूति, सम्प्रेषण आदि की बड़ी और गंभीर त्रुटियों से लगभग पूरी तरह से मुक्त है। वास्तव में वे समकालिक दौर की बेहद सतर्क और चिंतनशील रचनाकार हैं। उनकी काव्यधारा में प्रेम की शीतल फुहारें हैं तो समकालीन विद्रूपों के खिलाफ विद्रोह के तीखे तेवर भी दिखाई देते हैं। उनकी सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ सुपरिचित पोलिश कवयित्री विस्लावा शिम्बोर्स्का की याद दिलाती है। शिम्बोर्स्का की भांति सुनीता जी की रचनाओं में बड़ी-बड़ी थोथी व सैद्धान्तिक बातों का अभाव और मर्मस्पर्शी शब्द चित्रों का बाहुल्य है। जो खामोश ज्वालामुखी शिम्बोर्स्का की रचनाओं में धधकता है, उसकी गहरी आँच सुनीता की रचनाओं में भी मिलती है। जहाँ एक ओर शिम्बोर्स्का अपनी कविता “डिस्कवरी” में कहती है-
मै शामिल होने से इंकार करने में विश्वास करती हूँ
मै बर्बाद जीवन में विश्वास करती हूँ
मै कर्म में खर्च हुए समय में विश्वास करती हूँ
मेरी आस्था अडिग
-अंधी और निर्लिप्त।
वहीं सुनीता शानू अपनी कविता “जीना चाहती थी मैं” में पूछती
“दीमक भी पूरा नही चाटती
ज़िंदगी दरख्त की
फिर तुमने क्यों सोच लिया
कि मै वजह बन जाऊँगी
तुम्हारी साँसों की घुटन
तुम्हारी परेशानी की
और तुम्हें तलाश करनी पड़ेगी वजहें
गोरख पांडॆ की डायरी या फिर
परवीन शाकिर के चुप हो जाने की।
ये सच है मैं जीना चाहती थी
तुमसे माँगी थी चंद सांसें-
वो भी उधार।“
सुनीता ने अपनी कविताओं में उस दुनिया को प्रस्तुत किया है जो सामान्य जन की दुनिया है। इस दुनिया मे प्रेम है, संघर्ष है, भूख है, अभाव है और इन सबके साथ आत्मीय उत्सव-धर्मिता है। उनकी कवितायें सामान्य जन के सरोकारों से जुड़े प्रश्न सीधी-सरल भाषा में पूरी सादगी के साथ उठाती हैं। उनकी कविताओं में हर्ष-उल्लास, उम्मीद-हताशा, जीवन, मृत्यु, यथार्थ, संशय, प्रकृति, आस्था जैसे भावों के साथ मानवीय संवेदनाओं का आश्वस्त करता हुआ उष्ण स्पर्श भी है। वे जीवन के जयघोष का उत्सव मनाती हैं किन्तु इस उत्सव में वे अपनी जिम्मेदारियों के प्रति भी पूर्णतः सचेत हैं। उनकी समग्र चिंताएँ मानव-मात्र के लिए “स्त्रीविमर्श” समकालीन वाङमय में महत्वपूर्ण प्रवृत्ति के रुप में तेजी से उभरा है हालाकिं इसकी जड़ें बहुत गहरे तक और बहुत दूर तक फैली हुई है। एक जागरूक रचनाकार के रुप में सुनीता ने भी स्त्रीविमर्श पर अपने मौलिक तर्कों और मान्यताओं के साथ चिंतन किया है। निष्कर्षतः स्त्री विमर्श पर उनका सुस्पष्ट, सुचिंतित मौलिक दर्शन उनकी कविताओं मे निरायास ही उतर आया है। वे स्त्री के स्त्रीत्व की गरिमा से गौरवान्वित है किंतु स्त्रीविमर्श के नाम पर स्त्री को तमाशा बनाने के खिलाफ हैं। उनके दृष्टिकोण, उनकी कविताओं- “तो फिर प्यार कहाँ हैं”, “तुम ऎसे तो न थे”, “मेरे मालिक”, “डोर”, “चिह्न”, “कन्यादान”, “माँ”, “तुम कैसी हो”, “मै तनहा नही हूँ”, “श्याम सलोना”, “गरीब की बेटी”, “तुम्हारे लिये”, “ऎ कामवाली”, आदि कविताओं में परिलक्षित होता इसी क्रम में मै इस संग्रह की रचना “जन गीत: कोई शिल्पकार यहाँ आएगा” का उल्लेख अलग से तथा विशेष रूप से करना चाहूँगा। यह असाधारण लंबी कविता पूरी मानव सभ्यता के प्रागैतिहासिक काल से वर्तमान तक के दौरान स्त्रीविमर्श की गहरी पड़ताल करती है और सारे विद्रूपों, विसंगतियों, प्रताड़नाओं और संघर्षों का संयत चित्रण करते हुए नई आस्था और विश्वास स्थापित करती है। इस रचना के लिये केवल यही कहा जा सकता है कि ऎसी रचनाएं “लिखी” नही जाती, “लिख” जाती है। यह कविता संदेश देती है कि हम पूर्वजों की गलतियों को मिटा नही सकते पर किसी न किसी तरीके से उनका प्रायश्चित करके उन्हें हलका अवश्य कर सकते हैं। पारंपरिक स्त्री विमर्श के पक्षधर तथा स्त्रीवादी इस कविता की मान्यताओं और स्थापनाओं से नाइत्तफ़ाकी रख सकते है किंतु इस रचना के सिध्द व्यवहारिक दर्शन को नकारा नही जा सकता। इस संदर्भ में मुझे नथानियल हॉर्थन की कालजयी औपन्यासिक कृति “द स्कारलैट लैटर” याद आती है जो सन 1850 में प्रकाशित हुई थी और आज 162 वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रासंगिक बनी हुई है। इस उपन्यास में “बाइबिल”, “पिलग्रिम्स प्रोसेस” आदि पौराणिक व पुरा-ऎतिहासिक ग्रंथो का प्रभाव है। स्त्री विमर्श की प्रारम्भिक रचनाओं में, अनेक असहमतियों के बावजूद, इसका सम्मानीय स्थान है। सुनीता के जनगीत “कोई शिल्पकार यहाँ आएगा” में भी “रामायण”, “महाभारत” जैसे धर्मग्रंथों को आधार बनाकर स्त्री पर यथार्थपरक विमर्श किया गया है। हॉर्थन के उपन्यास “द स्कारलेट लैटर” पर कई फिल्में बन चुकी है और सुनीता का यह जनगीत भी संवेदन शील फिल्मकारों के लिये आधारभूमि उपलब्ध कराता है। सुनीता की कविताओं का यह पहला संग्रह उनके लिये तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही समग्र हिंदी कविता संसार के लिये भी महत्वपूर्ण है। इस संग्रह में भविष्य की एक दृष्टा और जीवंत कवयित्री की पदचाप सुनाई दे रही है। ये संभावनाओं के स्वर पूर्णतः जीवंत हो सकें और अनंत आसमान को नापने की इच्छा रखने वाला पखेरु अपने लक्ष्य को प्राप्त करे, यही कामना है। ज़िंदगी की खूबसूरत कविता को भरपूर जीने की ख्वाहिश करने वाले सुनीता शानू के “मन पखेरु” की यह पहली उड़ान सधी हुई, संतुलित तथा आत्म विश्वास से भरी हुई है। यह आशा की जानी चाहिये कि अपनी इस उड़ान में तथा भविष्य में होने वाली उड़ानों में यह मन पखेरु जीवन के आसमान की नई-नई बुलंदियों तक पहुंचेगा और नए रहस्यों का अन्वेषण करेगा। फिलहाल सुनीता जी के लिये प्रख्यात शायर डॉ बशीर बद्र का ये शेर मुलाहिज़ा फ़रमाएं...
 चमक रही है परों में उड़ान की खुश्बू।
बुला रही है बहुत आसमान की खुश्बू।
आनंदकृष्ण, भोपाल (म॰प्र॰)
मोबा.: 9425800818

Friday, August 31, 2012

मुझे चुना एक अनोखी शख्सियत के रुप में( स्टार प्लस तथा हिंदुस्तान की अनोखी पेशकश)


कितना अच्छा लग रहा है आज मै बता नही सकती। सम्मान किसी भी रूप में हो उसे पाकर इंसान खुद को महत्वपूर्ण समझने लगता है। यह एक ऎसा सच है जिसे नकारा नही जा सकता। लखनऊ से सम्मान पाकर आते ही मुझे  अनोखी क्लब में पैनलिस्ट के रूप में चुना गया।
ये प्रोग्राम स्टार प्लस के सौजन्य से हिंदुस्तान के द्वारा आयोजित था। पैनल पर होना मेरे लिये सौभाग्य की बात थी। सबसे खूबसूरत लम्हा था जब मैने इस प्रोग्राम का आगाज़ किया। सामने उपस्थित तमाम महिलाओं को आवाज़ दी की वे आगें बढ़े। जीवन को यूंही बर्बाद न होनें दे। अपनी शक्तियों को समझें और कुछ ऎसा करें जो आप को साबित कर पायें, मैने उन्हें समझाया कोई भी काम छोटा-बड़ा नही होता। मैने अपने सपनों को कैसे पंख लगाये और साकार किया। अगर इंसान के पास हौसला है, कुछ कर गुजरने का जज़बा है, तो कोई भी मुश्किल आ नही सकती। वहाँ उपस्थित तमाम महिलायें मुझसे पूछ रही थी ढेरों सवाल और उन सवाल के जवाब देते हुए मै भी खुद को मज़बूत कर रही थी, कि मै किस प्रकार इन सबकी समस्याओं को हल कर सकूं क्या कहूं की इनमें भी मै खुद को देख सकूँ।
मैने उन्हें कहा कि वो ज़माना चला गया जब कहा जाता था "अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आँचल मे है दूध और आँखों मे पानी" मेरी सखियों तुम चाहो तो मिसाल बन सकती हो एक नई जागृति ला सकती हो। मैने उन्हे समझाया कि कैसे मैने कम समय में कम साधनों मे कामयाबी हासिल की।
जहाँ तक मुझे लगता है मै उनके दिल तल पहुंच पाई हूँ। उनमे से अनेक सखियों ने मेरे पर्सनल फ़ोन नम्बर भी लिये ताकि वो बिजिनेस कैसे करें समझ सकें।
प्रोग्राम के अंत में साड़ी कॉम्पिटिशन भी हुआ और बहुत मुश्किल था मेरे लिये इतने लोगों मे से एक खूबसूरत साड़ी पहने महिला का चुनाव। लेकिन फिर भी सर्वसम्मति से ये सौभाग्य एक को मिला भी। हाँ थोड़ा सा अटपटा सा अवश्य लगा लेकिन सभी सखियां बहुत खुश थी अवार्ड पाकर। खेल ही खेल में समय पंख लगा उड़ गया और मै बटोर लाई न जाने कितनी सखियों का प्यार। शब्दों में बयां करना सचमुच बहुत मुश्किल है मेरे लिये। इस कार्य का भार हिंदुस्तान से शुभा को दिया गया गया था जिसने इतनी मुस्तैदी से सारा कार्यभार सम्भाला जिसकी जितनी तारीफ़ की जाये कम है। आज की नौजवान पीढ़ी इतनी जिम्मेदार और विनम्र होती है आज देखा भी। सर्वेश जो हिंदुस्तान में सीनियर फ़ोटोग्राफ़र है उनसे भी दोस्ती अच्छी हो गई उनकी लाजवाब फ़ोटोग्राफ़ी के बारे में तो ब्लॉग जगत में सभी जानते हैं।
अंत में मेरा मेरी तमाम सखियों से अनुरोध है कि वे भी आगे आयें। अपने आप को साबित करें जिससे वो तमाम सखियां भी आपको देखकर कुछ सीख सकें।
सुनीता शानू

Wednesday, August 22, 2012

वजूद ( राजस्थान साहित्य अकादमी में प्रकाशित)

 ये कहानी राजस्थान साहित्य अकादमी के अगस्त अंक में प्रकाशित हुई है। मुझे नही मालूम आपको पसंद आयेगी या नही। मगर यही सच है ये किसी एक की कहानी नही है। बस कोशिश की है खुद को समझने की...


...जिस कोख से भाई जन्मा उसी कोख से मैं पराई कैसे हो गई?
‘‘बाबा तुम्हीं तो कहा करते थे, कि मैं बेटा हूं तुम्हारा, तो आज क्या हो गया बाबा? क्या विवाह होते ही सब कुछ भूला दिया जाता है।’’ कहते-कहते मेरी आँखें भर आईं।
माँ-बाबा को घर ले जाने की सारी खुशी काफूर हो गई। कितना खुश थी मैं यहां आते हुए सारे रास्ते बस एक ही विचार आ रहा था, कि अब माँ-बाबा खुश रह पायेंगे, मैं उन्हें अपने साथ घर ले जाऊंगी। जब से मेरी शादी हुई है, उनके लिए एक दिन की खुशी भी नहीं खरीद पाई हूं। बरसों से एक-एक दिन गिन रहे हैं, कि कब बेटा-बहू आयेंगे और उन्हें अपने साथ ले जायेंगे, परन्तु मैंने सदा उन्हें इन्तजार करते हुए पाया, और आज फैसला हो भी गया कि बेटा-बहू के पास उन्हें ले जाने की फुर्सत ही नहीं है, जहां चाहें, जिसके साथ चाहें, रह सकते हैं। आज जब किस्मत ने मुझे उन्हें अपने साथ रखने का मौका दिया है, तो दोनों मना कर रहे हैं।
मैं फूट-फूट कर रो पडी। कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं? ‘‘क्या हो गया बाबा? यह बेटा-बेटी का फर्क कहां से आ गया?’’
बाबा मगर कुछ भी न बोल पाये। हमेशा की तरह शांत चेहरा। मगर माँ बुदबुदाती रही, ‘‘कैसे रह सकते हैं हम तेरे घर में? लोग क्या कहेंगे? सारी बात बेटों पर आ जायेगी कि बेटे नालायक हैं। मां-बाप को रख नहीं पाये, बुढापे में बेटी के सिर पर पडे हैं और फिर तेरे सास-ससुर ! वो क्या कुछ नहीं कहेंगे ?’’
फिर अचानक जोर से बोली, ‘‘तू जा अब तू पराई हो गई है। हमारा तेरे घर में रहना ठीक नहीं।’’ इससे पहले कि मैं कुछ कहती, जैसे उन्हें ख्याल आ गया कि पराई कह कर बेटी का दिल तो नहीं दुखा दिया, मुझे समझाने लगी, ‘पाप लगता है न, बेटी के घर में रहेंगे तो नरक के भागीदार होंगे कि नहीं, बेटी! तुम बात को समझो और जवांई बाबू को भी समझाओ। हमारी फिक्र ना करें, हम रह लेंगे कैसे भी दो वक्त की रोटी ही तो चाहिए। थोडी कट गई अब थोडी और कट जायेगी राम भरोसे।’’
यही जो विचारधारा है इंसान की, जो उसे चैन से जीने भी नहीं देती। धर्म-कर्म का जामा पहने अंधविश्वास आज भी घेरे रहते हैं। मैं बेबस निःसहाय सोचती रह गई। खुद को कोसती रही, कि काश मैं बेटा बन पाती? किन्तु इसमें मेरी गलती ही क्या है? अगर नहीं तो कुदरत का ये कैसा मजाक है भगवान्? जो मुझे अपने कर्त्तव्य से विमुख करने पर आमादा है। मेरी नाकामयाबी पर मेरी अंतरात्मा मुझे धिक्कारती रही। लगता है मेरी जन्दगी आज एक सवाल बन कर रह जायेगी।
और अतीत की चादर ने मुझे अपने में लपेट लिया। मुझे मेरे तमाम सवालों के जवाब मिलने लगे, ‘‘अरे! मैं तो बचपन से ही पराई थी, मैं उनका प्यारा बेटा कैसे बन सकती थी?’’ मुझे याद है, जब कभी भी मैं घर की किसी चीज पर अपना हक जताया करती थी, माँ भाई को समझाती थी, ‘‘कोई बात नहीं बेटा, तूं फिक्र मत किया कर, जब इसे शादी कर इसके घर भेज देंगे, तब सब कुछ तेरा ही तो हो जाना है।’’ उस वक्त उनकी बातें मुझे बहुत चुभती थीं और मैं गुस्से में बाबू जी से माँ की शिकायत किया करती थी, और बाबू जी भी तो मेरी हर बात पर मुझे सराहा करते थे, कहते थे कि ‘मैं उनका प्यारा बेटा हूं’, लेकिन जब माँ उन्हें समझाती बेटियां तो पराया धन है उनसे मोह मत कीजिये, उस समय वे भी माँ की हां में हां मिला कर कहते थे, ‘हां बेटियां तो पराई अमानत होती है, एक दिन अपना घर बसाना ही है।’
अपना घर ! मगर कौनसा बाबा! मैं अचानक पूछ बैठी थी। मेरी बात सुनकर माँ ने हँस कर कहा था, ‘‘देखो, कितनी फिक्र हो गई है इसे, यह बात कितनी जल्दी गई है इसके कानों में। अरे! जिस घर तू ब्याह के जायेगी, वो तेरा ही तो घर होगा, तेरे पति का घर ही तो होगा तेरा घर, पागल लडकी।’’ और मैं शर्मा कर भाग खडी हुई थी।
.....मेरा घर! कौनसा है मेरा घर? यकायक जैसे शरीर में हरकत हुई। जैसे गहन-निद्रा से जाग गई....सचमुच कौनसा है मेरा घर? एक वो घर जिसे मैं छोडकर आई हूं, जहां बचपन बीता, जिसके हर कोने में, दीवारों से, मैं परिचित थी। फिर भी जहां मुझे पराई अमानत समझा जाता था, या फिर यह जहां आकर एक नया नाम मिला, नया रिश्ता मिला, नये लोग अपरिचित से माहौल में परिचित बन कर रहना। क्या यही है मेरा अपना घर? सहसा दिल से एक आवाज आई, ‘‘याद कर वो दिन जब घर में एक हादसा हो गया था, और सास ने तेरे लिये कहा था, अरे! यह तो पराई जाई है इसे दर्द कहां?’’ उफ! तो कौनसा घर है मेरा? मैं चीख पडी, कितना छलावा है इस दुनिया में माँ! मुझे अचानक अपने नीचे से जमीन खिसकती नजर आई, चारों तरफ बस अंधेरा ही अंधेरा था। मेरा वजूद कहां है बाबा? एक ये घर जहां मैं पराई अमानत हूं, एक वो घर जहां मैं पराई जाई हूं, मगर मेरा प्यार तो दोनों ही में बराबर है, मैंने कब चाहा था? एक नया घर, एक नया साम्राज्य, क्यों एक नये रिश्ते से बांध कर घर से बेदखल कर दिया मुझे? बोलो माँ, जिस कोख से भाई जन्मा, उसी कोख से मैं पराई कैसे हो गई? मेरा हृदय वेदना से चीत्कार कर उठा, रोम-रोम में कम्पन्न होने लगा। मैं कौन हूं? मेरा वजूद क्या है? कहां है मेरा घर? क्यों मुझे मेरे माँ-बाप को अपने साथ रखने पर रोक लगी है। माँ मुझे बताओ? तुम भी तो एक औरत हो? फिर यह कठोरता कैसी?
माँ कुछ क्षण चुप रही, फिर बोली, ‘‘जानती हो! यह सभी के बस की बात नहीं है, अपना घर छोडकर किसी और का घर बसाना। क्या पुरुष ऐसा कर सकता है? जो धैर्य, सहनशीलता, दर्द सहने की शक्ति, ईश्वर ने नारी को दी है, क्या पुरुष के पास है? इस जग की निर्मात्री नारी है, वह एक नव-जीवन का निर्माण करती है, यह सामर्थ्य बस उसी के पास है कि वो अपना घर खुद बना सकती है, तुम्हारे लिये यह बहुत बडी खुशी की बात है कि तुम्हारा अपना सुखी परिवार है और मैं भी अपने इसी घर में तुम्हारे बाबा के साथ अंतिम समय तक रहना चाहती हूं, यहां हमारी बीते दिनों की यादें हैं, यह घर मेरा और तेरे बाबा का सपना है। हम दोनों यहीं रह कर ही खुश रह सकते हैं।’’

सुनीता शानू