Friday, July 31, 2015

बाढ़ की सम्भावनायें सामनें हैं...

                             


  बाढ़ की सम्भावनायें सामनें हैं/ और नदिया के किनारे घर बने हैं... आप सोच रहे होंगे कि उस शख्स को तो फिर डूब ही जाना पड़ेगा।  लेकिन नहीं ऎसा नहीं है, आप अपने घर की दीवारे वाटर प्रूफ़ बनाईये, बाहर कुछ नाव बाँधकर रखिये, कुछ टायर ट्यूब वगैरह का भी इंतजाम करके रखिये क्योंकि आज बचने के लिये तिनकों का सहारा तलाश करना भी बेवकूफ़ी है, अरे भई जिसको हवा तक उड़ा दे वो आपको क्या बचा पायेगा। बल्कि गरियाने लगेगा कि खुद तो डूबे सनम हमें भी ले डूबे?
यदि आपने अपने चारों तरफ़ जानबूझकर दोस्तों, शुभचिंतको के रूप में कंटीले झाड़ ही उगा लिये हैं तो ये समस्या भी आपकी अपनी है सरकार की नहीं, अब सम्मान या अपमान के लिये कृपया सरकार को न गरियायें।  आपको अपनी नाक इतनी दुरुस्त रखनी ही होगी कि कहीं जरा जलने की बू आने लगे तो तुरन्त सीज़ फ़ायर का इस्तेमाल करें, या हो सके तो कूड़ा-करकट डाल कर उस आग को बुझाने का प्रयत्न करें।
 माँ हमेशा समझाती भी थी कि दौड़ में सारे एक साथ भाग रहे होते हैं, प्रथम तो कोई एक ही आता है, कई बार दौड़ में साथ चलने वाला गिर सकता है। उसको उठाने के चक्कर में पहली बात खुद उसके बराबर ही खड़े रह जाओगे। दूसरी बात तुम्हारा रूक जाना गिरने वाले को गलत संदेश देगा। वह यह नहीं सोचेगा कि तुम उसकी
फ़िक्र में रुक गये हो या तुम्हें उसकी फ़िक्र है। वह सोचेगा तुम उसके बिना चल ही नहीं पा रहे थे इसीलिये रुक गये हो। तो बहुत जरूरी है ज़िंदगी की दौड़ में निशाना मछली की आँख में लगे... दाँये-बाँये देखना या झुक जाना तो सोच लेना कि तुम्हारी ही पीठ पर पैर रखकर भागने वाले वही होंगें जिनके लिये तुम रुक गये थे।

सुनीता शानू 

Thursday, July 30, 2015

हा हा! भैंस दुर्दशा देखी न जाई (आज नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक टिप्पणी)



भैंस बहुत ही परेशान है, करे... तो क्या करे? या तो किसी तालाब में डूब मरे, लेकिन वो तो तैरना जानती है सो आत्महत्या भी नहीं कर पा रही है। कल तक पच्चीस किलो दूध और चार टाइम गोबर करके घर वालों के लिये दूध और उपलों का इंतजाम भैंस के द्वारा हो रहा था कि अचानक एक सिरफ़िरे डायरेक्टर की नजर उस पर पड़ गई थी, दोनों ने एक दूसरे को कनखियों से देखा था, घर के मालिक ने भैंस के दूध की खीर खिला कर भैंस के फ़िल्म में काम करने की बात भी पक्की कर डाली। जब गाँव भर के भैंसों को पता चला था सबने बहुत रोका लेकिन भैंस पर तो हिरोइन बनने का ऎसा भूत सवार था कि नहीं मानी।

अब भैया फ़िल्मों में भैंस भी कभी हिरोइन बन सकती है कोई सोच नहीं सकता था, खुद भैंस को भी ये यकीन नहीं हो रहा था कि कोई उसके रूप रंग पर फ़िदा होगा, और उसे फ़िल्म की हिरोइन का रोल देगा। वो बार-बार पानी की होद में अपने चेहरे को निहार रही थी, और मन ही मन खुद को ब्लैक ब्यूटी पुकार रही थी। ताज्ज़ुब तो इस बात का हुआ जब भैंस को डायरेक्टर ने मिस कहकर पुकारा, अब तक कम से कम चार पडिया को जन्म दे चुकी थी। सोच कर फ़ूली न समाई । उसे दिन में ही करीना, कैटरीना के सपने आने लगे, अब तो मुहल्ले भर के लड़के मिस बोल कर सीटी बजाने लगे। अब कोई भी उसकी तुलना काली मोटी बदसूरत महिलाओं से नहीं कर पायेगा। हो सकता है उसे भी प्यार से शाहरूख या सेफ़ मिस युनिवर्स कह कर बुलायेगा। उसकी हैल्थी बोडी को देखकर टुनटुन भी कह देंगे तो भी चलेगा। कम से कम हिरोइन तो कहलायेगी ही। 

मै बैठी-बैठी मिस की खूबसूरत आँखों, मतवाली पूँछ के बारे में सोच ही रही थी कि दरवाजे की घंटी बजीमैने दरवाजा खोलाबाहर झाँका तो एक भैंस दिखाई दीजो लाल रंग की साड़ी लपेटे गोबर में लिथड़ी खड़ी थी, ध्यान से देखा तो मै चौंक पड़ी अरे यह तो हमारी मिस है, अरे क्या हुआ बहन? सहसा मेरे मुह से निकला। मिस के चेहरे की दुर्दशा बता रही थी कि गुजरी रात उसे पार्लर ले जाया गया होगागाढे लाल पेंट की लिपस्टिक देखकर लगता था किसी का खून पीकर आई होशायद किसी ने खूनी समझ मारा भी था उसेमोटी मगर खूबसूरत आँखों का काजल बह-बहकर उसके साथ हुये हादसे को कुछ परसेंट बयान भी कर रहा था। मुझे देखते ही वो बुक्का पाड़ कर रोने लगीमुझसे उसका रोना देखा नहीं जा रहा था, मैने तुरंत एक बाल्टी में पानी, और कुछ फ़्रूट्स लाकर रखे, अब हिरोइन बन कर यही तो खाये होंगे बेचारी ने...

मिस रोये जा रही थी, मैने प्यार से उसके सिर पर हाथ फ़ेरा उसने बोलना शुरू किया,-  “ क्या बताऊं दीदी किस बुरी घड़ी में मैने गली के सारे भैंसों स नाता तोड़ कर उस मुये डायरेक्टर से नाता जोड़ लिया, उसने मेरी शादी भी कराई, मैने रात-दिन एक कर दिया था फ़िल्म की शूटिंग में, पच्चीस किलो दूध देती थी बिना कोई फ़ीस लिये, लेकिन जैसे ही फ़िल्म परदे पर आई मुझे कोई पूछता तक नहीं। जैसे-तैसे अपनी फ़िल्म देखने हॉल में घुस गई तो गार्ड ने मार-मार डंडे बाहर निकाल दिया। अब भला ये भी कोई बात होती है? क्या हम नारी जाति के अधिकारों का इसी प्रकार शमन होता रहेगा? मुझ बिरहन का साथी जिसके साथ शादी रचाई मुझसे बात तक नहीं करता है। भैंसे को छोड़ मैने एक इंसान से शादी कर ली, कुछ नहीं सोचा अपनी बिरादरी के बारे में कि लोग क्या कहेंगें... अब इस अवस्था में जब मै कहीं की न रही बाहर निकाल दी गई। आप ही बताईये दीदी एक शादी के रहते हमारी बिरादरी में कौन मुझसे शादी करेगा। 

उसकी नाजुक हालत थी फिर भी पूछना तो बनता ही था मैने कहा, तो तुम बताओ मै क्या मदद करूं तुम्हारी। उसने कहा दी बहुत उम्मीद के साथ आपके द्वार पर आई हूँआप भी एक नारी हैं मेरा दर्द अच्छे से समझेंगी और मुझे न्याय दिलवायेंगी। मुझे मेरे पति ने धोखा दिया हैसी आर पी सी की धारा 125 के तहत मुझे गुजारा भत्ता तो मिलना ही चाहिये। मिस की दलील सही थीअदालत में याचिका दर्ज करवा दी गईलेकिन दूल्हे और डॉयरेक्टर को कोई सज़ा मिले इसके पहले ही आऊट ऑफ़ कोर्ट सेटलमेंट हो गया, अब मिस प्रोड्यूसर के यहाँ बाड़े में रहती हैसिर्फ़ चारा खाकर दस किलो दूध देती हैइस उम्मीद के साथ की उसे अगली फ़िल्म की शूटिंग के लिये फिर बुलाया जायेगा। 

Sunday, July 19, 2015

ऑनलाइन पूजा कर भगवान को प्राप्त करें




जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा और हर साल उमड़-घुमड़ कर आने वाले श्रद्धालुओं की भक्ति देख कर मन प्रफ़ुल्लित हो उठता है, लेकिन पुलिस की चौकस निगरानी, सरकार की ओर से भक्तों के लिये सभी प्रकार की सुविधाये, साधु-संतो के पहचान पत्र तक बन जाने के बाद भी जगन्नाथ पुरी में इतनी प्राणघातक भगदड़ का मचना आश्चर्य में डाल देता है। 

धार्मिक स्थलों का हमारे जीवन में बड़ा महत्व है। जितने भी पाप-पुण्य किये जाते हैं, यहाँ जाकर ही इनकी धुलाई हो पाती है। मै भी एक बार ऎसे ही एक तीर्थ स्थल पर गई थी, उस वक्त यह महसूस किया कि आम आदमी को भगवान के दर्शन करने के लिये कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, रस्से के इस बार हम और रस्से के उस पार भगवन और बीच में ही वी आई पी समुदाय जो बड़ी आसानी से भगवान तक पहुंच जाता है, दर्शन करता है, स्तुति करता है, नहला धुला भी सकता है, इसके विपरीत हम दर्शन के प्यासे साथ ही भूखे-प्यासे, गर्मी सहते, पसीने की दुर्गंध सहते धूप में घंटो सिकते रहते हैं, तब जाकर भगवान की कंदरा के समीप आते हैं, लेकिन यह क्या! पंडे-पुजारियों के हाथों द्वारा ऎसे खदेड़ कर बाहर निकाल दिये जाते हैं जैसे हमसे बड़ा भिखारी कोई दूसरा है ही नहीं,...

अब आपको क्या लगता है किसी बच्चे को इतना ज्यादा सताया जायेगा तो क्या वो रोयेगा चिल्लायेगा नहीं? हुड़दंग भी मचायेगा, रस्सा तोड़ कर भगवान के पास जाने का पूरा प्रयास करेगा। लेकिन सफ़ल नहीं हो पायेगा... तो अब इस धक्का-मुक्की का मर्म समझ आया है, और भगवान के प्रेमियों से मेरी गुहार है, वो जो हमारे हृदय में विराजमान है उसे रथ खींचकर या गंगा-जमुना में डुबकी लगाकर प्राप्त नहीं किया जा सकता।
सोचो अगर भगवान को मिलना ही होता तो तुम यूँ जलील न होते, तो घर बैठिये और ईश्वर को खुद में ही तलाश करिये ताकि पुलिस और सरकार का समय बर्बाद न हो हम भी सुबह-सुबह चाय के साथ कोई अच्छी सी खबर पढ़ सकें कि इस साल सभी श्रद्धालुओं ने ऑनलाइन पूजा की और भगवान जगन्नाथ का रथ भी खींचा। जब भगवान खुद इंटरनेट पर उपलब्ध है तो ये मार-धाड़ किसके लिये कर रहे हो।

सुनीता शानू

Thursday, July 2, 2015

मुहल्ला अस्सी क्यों नहीं देखेंगें...?







मुहल्ला अस्सी का ट्रेलर देखा, देखते ही बचपन में होने वाली रामलीला याद आ गई, याद आ गये वे सभी भांड जो देवी-देवताओं का स्वाँग धरकर पैसा माँगते फिरते हैं, मुहल्ला अस्सी में भी देवी-देवताओं का स्वाँग रचकर गाली-गलौज की गई है, हम बेशक सारा दिन मंदिर की घंटियाँ न बजायें लेकिन फ़िल्म में एेसा कुछ देखते ही हमारी भावनायें आहत होने लगती हैं तो हैं। एक बार की बात है जब हम बच्चे रामलीला देख रहे थे अचानक पर्दा खुल गया तब देखा हनुमान जी और सीता जी बैठे बीड़ी पी रहे थे, ये बात तो हिंदुओं की रामलीला की है, हमारी जमादारनी ने आकर बताया कि हनुमान जी संजीवनी लाते वक़्त तार पर से गिर गये थे, जैसे ही श्री राम ने कहा हे तात तुम अब तक नहीं आये हनुमान जी ग़ुस्से में चिल्लाये," सुसरा के तात तात करै है, मेरी तो टाँग टूट गई है..." सुनकर हम सबको हँसी आ गई। कहने का तात्पर्य यह है कि इंसान स्वाँग धर सकता है, उससे राम या शिव रूपी आचरण की उम्मीद करना बेवक़ूफ़ी है, सच हमेशा विभत्स ही हुआ है, मुहल्ला अस्सी में भी इंसान का असली रूप सामने आया है कि इंसान इतना कुरूप है जो भगवान का रूप धर कर भी उन जैसा आचरण नहीं कर सकता। मुझे लगता है फ़िल्म का मक़सद सच को सामने लाना है, तो देखें और समझे कैसे भांड देवी-देवताओं का स्वाँग रच कर सबका मनोरंजन करते हैं असल जिंदगी उनकी भी यही है परदे के पीछे का चेहरा देखने में गुरेज़ क्यों? बस मनोरंजन करें और हँसे-हँसाये। 
जहाँ तक हो सके गाली-गलौज नहीं होने चाहिये, लेकिन कुछ लोगों को छोड़ दें तो बाकी बिना गाली के बात करते नजर ही नहीं आते हैं, आधे से ज्यादा टी वी शोज़ में भी गालियां प्रधान हैं, ऎसे में मुहल्ला अस्सी न देखना कोई तुक नहीं बनता। विरोध करना है तो सबका करो और जमकर करो। और शुरुआत खुद से करो,...वरना कहना पड़ेगा "पर उपदेश कुशल बहुतेरे",,,।

Friday, June 19, 2015

देखना कहीं हमारी जीभ गायब न हो जाए (नवभारत में प्रकाशित)


सुनीता शानू
एक कमरे में ऎसे गुमसुम बैठे हैं, जैसे किसी शोक सभा में मौजूद हों। कभी लगता है सब के सब गूंगे-बहरे हो गए हैं। कान में मशीन घुसा ली है। कुछ लोग बीच-बीच में मुस्कुराते हैं, कभी गुस्सा करते हैं तो कभी हंसते भी हैं। लेकिन एक-दूसरे को देखते तक नहीं। यूं कहें कि एक दूसरे को देखने भर की फुरसत तक नहीं है बेचारों के पास। हां जी, बहुत व्यस्तता है। यदि आप चाहेंगें तो मोबाइल पर उन्हें देखने की इच्छा जाहिर कर सकते हैं। देखिए तो खट से मुस्कराती हुई खूबसूरत सेल्फी हाजिर हो जाएगी। मोबाइल हो या कम्प्यूटर, उंगलियां हिलती हैं अक्षर बोलते हैं, पर स्वर खामोश हो गए हैं।
जी हां, यही सच है जो दिखाई दे रहा है। अक्षर उग रहे हैं। लोग अब उंगलियों से बात करते हैं। सबके हाथ में एक खिलौना है और हर उम्र के लोग इससे खेल रहे हैं। ये खिलौना कुछ भी हो सकता है- मोबाइल, टेब्लेट या कम्प्यूटर, लेकिन सबके सब इतने ज्यादा व्यस्त हैं कि न खाने की फुरसत है न पानी की प्यास। खाना भी होगा तो एक हाथ पास पड़ी प्लेट में कुछ ढूंढता-सा जाएगा और लौटकर मुंह तक आ जाएगा। यह देखने की फिक्र भी नहीं कि उस पड़े हुए खाने पर कोई कीड़ा तो नहीं बैठ गया।
यदि कोई कान में हैड फोन घुसेड़े, आंखें मोबाइल पर टिकाए बैठा-बैठा तरह-तरह की भाव-भंगिमाएं बनाए जा रहा है तो खुद ही समझ जाइए, वो बहुत जरूरी मीटिंग में बिजी है। वैसे ये भी कोई बड़ी बात नहीं कि वो उसी कमरे में बैठे किसी शख्स से गुफ्तगू कर रहा हो। सच यह है कि जो लोग सामने देखकर भी नमस्ते नहीं कहते थे, पहचान भी न पाते थे, अब फेसबुक और वॉट्स ऎप पर नियम से माते गुड मॉर्निंग, लव यू माते, या कुछ ज्यादा ही अपनापन दिखाते हुए पूछते हैं- दोस्त भूल गए क्या? कहना गलत नहीं होगा कि मोबाइल से बच्चों में गुड मॉर्निंग और गुड नाइट कहने का शऊर आ गया है। वरना जब हम बच्चे थे, माता-पिता हमें समझाते ही रहते थे कि बेटा सुबह सबको नमस्ते कहा करो, किसी अनजान को नमस्ते कहते हुए तो सच नानी याद आ जाती थी, लेकिन मोबाइल और फेसबुक की दुनिया ने हमारे बच्चों को ये सारे एटिकेट्स फॉलो करवा ही दिए हैं। घर वालों को बेशक नमस्ते बोलने में देर लगे, दुनिया-जहान के दोस्तों को सुबह उठने के साथ ही गुड मॉर्निंग और रात के समय गुड नाइट लिखकर सोना नहीं भूलते।
इन साइट्स पर बहुत सारे ग्रुप बन गये हैं जिसमें दीदी, मम्मी, चाची, ताई, भाई सा, बिटिया, मित्र जैसे संबोधन इस्तेमाल होते हैं। देखकर लगता है, संयुक्त परिवार का निर्माण यहीं होने वाला है। घर के लोग बेशक पराये से हो गए हों, लेकिन दूर-दूर के लोग जिनके दर्शन भी दुर्लभ थे, क्लॉज फ्रेंड बन गए हैं। इससे साबित होता है कि हम सब में वसुधैव कुटुंबकम की भावना अधिक घर कर गई है।
कहने का मतलब यही है कि हमारे देश के लोग शांतिप्रिय हो गए हैं। आज पत्नी भी महंगी साड़ी या गहनों की डिमांड नहीं करती, सीधे कहेगी- जानू एक आई फोन ला देना बस। ज्यादा खर्चा करने की जरूरत नहीं है। बच्चों को भी बर्थ डे पर फोन विद रिचार्ज कूपन दे दो, फिर देखो। सच्चा सुख इसी में मिल जाएगा जब आप दुनिया के सबसे अच्छे पापा और पति कहलाएंगे।
अब आप जरूर सोच रहे होंगे कि जब सब अच्छा हो रहा है तो मैं क्यों परेशान हूं। तो भैया मुझे फिक्र है मेरी खूबसूरत जीभ की। सोचिए तो, जिस प्रकार पूंछ उपयोग में न आने के कारण हमारे शरीर से लुप्त ही हो गई, अब हमारा प्रबल हथियार हमारी जीभ ही न रहेगी तो क्या होगा?

Friday, June 5, 2015

पर्यावरण विशेष

पेड़-पौधे परिवार के सदस्यों की तरह समझे जायेंगे तो वातावरण भी हमारे घर में रिश्तों में आई मिठास सा घुल जायेगा, जैसे परिवार का हर सदस्य घर में कुछ न कुछ योगदान देता ही है, पेड़-पौधे भी मनुष्य जीवन के लिये अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं...
एक समय था जब हम अपने घर की क्यारियों में ही पालक, मैथी, धनिया, टमाटर, ग्वार फली, चौलाई, भिंडी, बैंगन, आलू, फूल गौभी सब उगाया करते थे, हमें आज भी ज़मीन में बीज बोने से लेकर घर में सब्ज़ी बनाने तक का स्वाद याद है, लेकिन ये पिलानी की बात थी...
 दर असल इंसान जो भी करता है, फल की इच्छा में करता है, कुछ पेड़ पौधों से फल तो कुछ से फूल प्राप्त होते हैं, कुछ से हरियाली मिलती है जो कि डॉक्टर की माने तो आँखो को दुरुस्त, मन को महका देती है, जैसे चाय के बाग़ान में जायेंगे तो हरियाली देखकर, पत्तियों की महक पाकर ही दिल बाग-बाग़ हो जायेगा, कहने का मतलब यह है कि कुछ न कुछ तो मिलता ही है, सो पर्यावरण के नाम एक दिन नहीं हर दिन समर्पित कर हमें इसका लाभ उठा ही लेना चाहिये...
आज दिल्ली जैसे महानगर में गमलों में ही हमनें कुछ पौधे जैसे,- साइकस, फाइकस, चमेली, गुड़हल, बोगनविलिया, ग्वार पाठा, गुलाब... आदि विभिन्न प्रकार के पौधे लगा आत्म संतुष्टि हासिल करने की कोशिश की है... साथ ही हरियाली तो रहती ही है, ताकी आँखें तेज की जा सके...बग़ीचे की देखभाल, नये पौधे लगाना, गुड़ाई निराई का हम दोनों को आज भी बहुत शौक़ है, नन्हें पौधों को बच्चों की तरह समय-समय पर खाद पानी देकर पाला जाये, और बुज़ुर्ग पेड़ो को भी जो फलदार हैं या सिर्फ छांवदार है, समय-समय पर कटाई निराई की आवश्यकता, समझ देखभाल की जाये तो ऑक्सीजन का स्तर बढ़ेगा और दम घोटूँ वातावरण से निजात पाई जायेगी...
पर्यावरण की आवश्यकता आप भी समझें...।

Wednesday, June 3, 2015

ये सोशल साइट्स कहीं समाज में दहशत फैलाने का कार्य तो नहीं कर रही हैं?



आईये विचार करें..

सोशल साइट्स के ज़रिये जनता ने दामिनी, सुनंदा जैसे कई केस ऎसे हैं जिनमें अपराधियों को अंजाम तक पहुंचाया है, लेकिन अब तो ऎसा चलन हो गया है। कुछ समय से व्हाट्स एप जैसी साइट्स पर लोग दहशत फैलाने वाले विडियों अपलोड करते हैं साथ ही हिदायत देते हैं कि इस विडियो को जितना हो सके ज्यादा से ज्यादा फैलाया जाये।

आज ऎसा ही एक वाकया मेरे ग्रुप में हुआ किसी महिला के पास कहीं से एक विडियो आया और उन्होनें तैश में आकर उसे सभी ग्रुप्स में इस हिदायत के साथ पेश किया कि इसे जितना फैला सकते हो फैलाओ, ताकि मोदी तक ये बात पहुंचे और इस कुकृत्य पर सरकार कोई एक्शन भी ले सके। अपना फ़र्ज़ समझ सब यही करने लगें होंगे, ग्रुप में एक लड़की की इस विडियो को देख कर तबीयत भी बिगड़ गई।  लिखना तो नहीं चाहती थी, लेकिन लिखने पर विवश हो गई हूँ...

आप सोच रहे होंगे उस विडियो मे ऎसा क्या था, उसके साथ भेजे नोट पर लिखा था कि यह आंध्र प्रदेश की घटना है, इस लड़की को कुछ लोगों ने मिलकर मारा और जिंदा जला दिया। अब विडियो ऎसा था कि देखकर रौगंटे खड़े हो जाना स्वाभाविक सी बात थी, लेकिन उस भीड को देख कर मै दंग रह गई, करीब सौ सवा सौ लोगों की भीड़ में सिर्फ़ चार या पाँच लोगों का इस अज़ीब कारनामें को अंजाम देना।  जिसमें दो महिलायें भी शामिल थी, मन में कुछ प्रश्न उठे,... क्या इस तरह के विडियो हमें यहाँ-वहाँ फैला देनें चाहिये? क्या ऎसा करने से हम समाज में दहशत नही फ़ैला रहे हैं, वो भीड़ क्यों खामोश थी, किसी ने बीच बचाव क्यों नहीं किया, पुलिस को खबर क्यों नहीं दी? उस लड़की ने ऎसा क्या किया था,,, वगैरह-वगैरह। मुझे लगा मुझे इसकी जानकारी किसी बड़े अधिकारी को देनी चाहिये...

आप सबको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह घटना आँध्रप्रदेश की थी ही नहीं। ये किसी बाहर के देश (Guatemala) का विडियो था जिसमें किसी लड़की को ड्राइवर के खून और लूट के इल्ज़ाम में भीड़ के द्वारा पीटा जा रहा था। जब मैने यह घटना लिंक के साथ ग्रुप में डाली तो उस विडियो डालने वाली लड़की ने माफ़ी मांगते हुए कहा कि मुझे किसी ने भेजा था, मैने भी आगे भेज दिया...

दोस्तों आप सभी से निवेदन है इस आगे भेजने वाली बीमारी से बचे, यदि कहीं से कोई सूचना आती थी है तो पुलिस में खबर करें या तुरंत डिलिट मारे भेजने वाले को हिदायत भी दे दें की हम इसे पुलिस में तुम्हारे नाम और फोन नम्बर के साथ दे रहे हैं, हो सकता है आपके द्वारा यह दहशत फैलने का कार्य यहीं पर समाप्त हो जाये।
सुनीता शानू

Tuesday, November 18, 2014

यात्रा संस्मरण- पटना पुस्तक मेला



यात्रा संस्मरण- पटना पुस्तक मेला

यात्राएं तो बहुत की हैं, कभी अकेले तो कभी समूह में किंतु पटना पुस्तक मेला यात्रा मेरी ज़िंदगी में एक विशेष स्थान रखती है। मै नहीं जानती थी कि ऎसा भी होता होगा, जब किसी अनजान शहर से अनजान लोगों के द्वारा आपको बुलाया जायेगा, वह भी किसी विशेष प्रयोजन से खैर...
सुबह का वक्त था, मै बच्चों के लिये नाश्ता तैयार कर रही थी। दिन क्या था याद नहीं लेकिन एक अपरीचित सा स्वर था, उधर से आवाज आई... मै रत्नेश्वर सिंह बोल रहा हूँ पटना से, आप सुनीता शानू बोल रहीं है? मै नाम से परीचित थी लेकिन आवाज़ से नहीं सो मैने भी खुशी के साथ उनकी आवाज़ का अभिनन्दन करते हुए बताया कि मै ही सुनीता शानू बोल रही हूँ, कहिये कैसे हैं आप? माफ़ कीजियेगा आपकी किताब के लोकार्पण पर मै आ नहीं पाई थी। इस पर उन्होने कहा कोई बात नहीं फ़िलहाल मेरे फोन करने का विशेष प्रयोजन है, हम हर साल पटना पुस्तक मेले का आयोजन करते हैं और उसमें दूर-दूर से नामचीन लोगों को बुलाते हैं। नामवर सिंह जी जैसे अनेक बड़े साहित्यकार इस मेले की शान रहे हैं। इसमें एक जनसंवाद कार्यक्रम होता है, जिसमें लेखक की पाठको से सीधे बात होती है। लिहाजा आपको फोन करने का मकसद आपको पटना पुस्तक मेला में आमंत्रित करना चाहते हैं, आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि आपका नाम हमे नवभारत से संजय कुंदन जी ने दिया है। जब रत्नेश्वर जी से मैने कहा मेरा ही नाम क्यों और भी महिलायें अखबारों में छप रही हैं इस पर उन्होने कहा कि संजय कुंदन जी से हमने पूछा कोई महिला व्यंग्यकार बताईये जो अच्छा लिखती हैं, इस कर उन्होनें आपका ही नाम लिया। सुनकर बेहद रोमांच हुआ, एक शख्स जिसे मै अच्छे से जानती तक नहीं जिसे कभी देखा तक नहीं जिन्होनें अधिकतर व्यंग्य खेद है कह कर लौटा दिये थे, मेरा नाम कैसे लिया वह भी इतने विशेष कार्यक्रम में, आश्चर्य और खुशी इतनी थी कि आँख से आँसू निकल आये।

खैर सुनहरे पल ज़िंदगी में कभी-कभी आते हैं, और यह भी सच है कि जिन लोगों के बारे में हम सोच भी नहीं पाते वही हमारी सफ़लता का एक हिस्सा बन जाते हैं। आखिर एक दिन टिकिट भी आ गई कि मुझे इंडिगो से जाना है एयर इंडिया से वापस आना है। इस दौरान एक भी दिन नही मिल पाया कि मै जनता के सामने क्या प्रस्तुत करूंगी क्या नहीं कुछ तो तैयारी कर लूँ। यह भी नहीं मालूम था कि कार्यक्रम की रूपरेखा क्या है? ऎसे में ही रत्नेश्वर जी ने एक अखबार की कटिंग लगाई जिसमें कई लेखकों के साथ मेरा भी नाम था। किंतु उस दिन जनसंवाद कार्यक्रम में दो लोगों का नाम था एक मेरा दूसरा ललित मंडोरा... ये कहना गलत नहीं होगा कि मै ललित मंडॊरा से अच्छी तरह परीचित नहीं थी, खैर अपने अंदाज़े पर मैने ललित जी को फोन लगाया कि क्या आप ही ललित मंडॊरा है? इस पर वे हँसे और बोले जीहाँ मै ही ललित मंडोरा हूँ, चलिये देखते हैं कार्यक्रम में चल कर क्या होता है, मैने उनसे पूछा हमें करना क्या होगा? उन्होनें बताया कि दो चार व्यंग्य सुना देंगें, मेरी नई पुस्तक का लोकार्पण कर देंगें और बाद में पाठकों के साथ सवाल जवाब होगें... सो आप फ़िक्र न करें मै हूँ न सब सम्भाल लूंगा। “मै हूँ ना” शब्द ही कुछ ऎसा है, जो अंदर से हौसला पैदा कर देता है। मैने अपने लिखे व्यंग्य में से ही कुछ छपे छपाये व्यंग्य रख लिये और अपने चाय के व्यवसाय में लगी रही।

13 नवम्बर यात्रा पर निकलने का पहला दिन था, सोचा निकलने से पहले बड़ों से आशीर्वाद ले लिया जाये, मैने अपने घर फोन मिलाया, प्रताप सोमवंशी जी को फोन मिलाया, उमेश भैया से और कुछ दोस्तों से बात की सबने शुभ कामनायें दी, कामयाब होने का आशीर्वाद दिया, प्रताप सोमवंशी जी ने कहा ये तुम्हारा पहला अवसर है देखो अब तक के तमाम अनुभव तुम्हारें काम आयेंगे, एक अच्छी सी स्पीच लिखो और खुद में आत्मविश्वास पैदा करो। ऎसे मौके बार-बार नहीं मिलते। उनकी तमाम बातों ने दिल पर असर किया और मैने रत्नेश्वर जी से कार्यक्रम की रूपरेखा के अनुसार खुद को तैयार किया।

सुबह के छः बजे की अपेक्षा फ़्लाइट ने आठ बजे की उड़ान भरी ललित जी साथ ही थे लेकिन सीटे अलग-अलग मिली, खैर पटना पहुंचते ही रत्नेश्वर जी अपनी वही स्टाईलिश टोपी पहने दूर से ही नज़र आ गये थे, मैने भी उन्हें देख कर हाथ हिलाया और अपनी मौजुदगी की खबर दी। एक खूबसूरत अहसास था उनका करबध्द स्वागत करना। मै खुद को गौरवान्वित महसूस कर रही थी। रत्नेश्वर जी गाड़ी लेकर आये थे, एक ही गाड़ी में हम सब हवाई अड्डे से निकल पड़े। होटल की तरफ़ जाते हुए तमाम रास्ते रत्नेश्वर जी और लालित्य ललित जिनका नाम ललित मंडोरा छपा था, बोलते जा रहे थे, बहुत जोरदार कार्यक्रम होता है जनसंवाद, यहाँ के पाठक बहुत ही घमासान मचाते है, पूरे रास्ते टमाटर और अंडे का खयाल आता रहा कि कहीं मेरे मुह पर टैमटो कैचप तो नहीं बनने वाला है। बातें करते-करते वह स्थान भी आ गया जहाँ हमे रुकना था। मारवाड़ी होटल में दो कमरे बुक किये गये थे। जहाँ एक रात के लिये हमें रुकना था। सुबह का चाय नाश्ता हम सबने साथ मिलकर किया। दोपहर तक बेचैनी में बीत गई। मैने अपनी माँ को फोन मिलाया पिता से भी बात की, पतिदेव से बात की अब जाकर एक नई शक्ति, नई ऊर्जा महसूस हो रही थी। दोपहर में ही हम लोग पटना पुस्तक मेले में पहुंच गये थे। बहुत ही खूबसूरत तरीके से एक मैदान को व्यवस्थित किया गया था। बड़े-बड़े प्रकाशकों की दुकानें लगी थी, चाट-पापड़ी के अतिरिक्त हर तरह के साजो-सामान से सजा था पटना पुस्तक मेला। एक और बहुत बड़ा प्रोजक्टर लगा हुआ था जिस पर पटना के खूबसूरत दृष्य दिखाई दे रहे थे। पुस्तक मेले में विभिन्न क्षेत्रों से आये कलाकार थे। रागरंगों का ये मेला सचमुच अद्भुत था। एक विशेष बात जो देखने में आई वह यह थी की ग्रामीण इलाकों से कलाकारों को ढूँढ कर लाया गया था, जो कि प्रोफ़ेश्नल नहीं थे। मेले की कसावट में कहीं कोई कसर नज़र नही आई...

शाम का वक्त था बार-बार माइक पर सुनाई दे रहा था, जनसंवाद कार्यक्रम मे मिलिये दिल्ली से चर्चित व्यंग्यकार सुनीता शानू तथा लालित्य ललित, अब से कुछ ही देर में। सुन सुन कर हलक सूखे जा रहा था। धीरे-धीरे मंद गति से मंच की ओर प्रस्थान किया, पहले स्थान पर संचालक अजय शर्मा बैठे जो एक नामचीन लेखकों में आते हैं पटना के, दूसरे नम्बर पर मै सुनीता शानू मेरे बगल में ललित मंडोरा जी और उनकी बगल मे रत्नेश्वर जी... मुझे बस पानी की बोतल दिखाई दे रही थी मन कर रहा था सारा पानी गटक जाऊंगी तब भी गला सूखा ही रहेगा। लेकिन रत्नेश्वर जी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा कि आप सफ़ल रहेंगी मै देख रहा हूँ... जाने क्या बात थी उनकी बात में की मै आत्मविश्वास से भर गई और इंतजार करने लगी पहले मुझे बुलाये या ललित जी को मै घबराऊंगी नहीं। सर्वप्रथम ललित जी की पुस्तक का लोकार्पण किया गया तत्पश्चात मुझे ही पहले बोलने का अवसर मिला, जैसे ही बोलने को उठी सामने से किसी ने छींक दिया मुझे हँसी आ गई शायद मेरी यही हँसी मेरे सारे डर को भगा ले गई, फिर मैने शुरु किया बोलना तो भूल ही गई कि सामने पटना का भारी जनसमुदाय है, मै एक ही लय में खुद को भूलकर बस बोलती गई। हर बात पर जनसमुदाय का तालियां बजाना ऎसा लग रहा था, एक माँ के सामने बच्चे खुशी से झूम उठते हैं, कल्पना ही तो है वैसे भी बच्चे हों या बूढे एक औरत सभी के लिये पहले एक माँ का ही दर्ज़ा रखती है... ऎसा मुझे लगता है। मेरा भाषण खत्म हुआ और ललित जी का शुरू।

जब जनसंवाद की बारी आई, न जाने कब से जवाब की तलाश में बैठे पाठकों ने मुझे सवालों के कटघरे में घेर लिया, मै हर सवाल का जवाब देते मुस्कुरा रही थी, उन्हे बच्चों की तरह समझा रही थी। कभी-कभी गुस्से में बेकाबू भी हो जाती थी, लेकिन तुरंत बात को धीरे से कह मुस्कुरा देती थी। उनके सवालों के घेरे में मै अकेली ही थी, ललित जी से किसी ने कोई प्रश्न ही नहीं किया, वो पास बैठे अब भी वैसे ही देख रहे थे जैसे कह रहे हों “मै हूं ना”

कार्यक्रम सफल रहा यह तो मै जान ही गई थी, मंच से उतरते ही बहुत से लोगों से घेर लिया और मेरे संग्रह की चाह रखी, पहले अभी विचार ही नही हुआ कि कोई संग्रह मागेंगा भी। लेकिन अच्छा लगा सब लोगो का यूं सराहना करना। मेरी खुशी की सीमा नही थी, शायद इसीलिये बयान करने को शब्द भी नहीं हैं, बस मन ही मन संजय कुंदन जी को धन्यवाद कहती रही।

रात को कई नाटक नौटकीं देखें, बिहार का लोक गीत सुना, असम अंचल से आई लड़कियों ने खूबसूरत नृत्य प्रस्तुत किया और हम उसका आनन्द लेते रहे। आज रात ही रत्नेश्वर जी और उनकी पत्नी के साथ पटना घूमने का आनंद लिया, तिलकूट, अनारसा और भी कई तरह की मिठाइयाँ चखी। देर रात होटल आये, गप-शप मारते रहे। वो रात सचमुच बहुत खूबसूरत थी, सफल कार्यक्रम और कामयाबी की रात सचमुच नींद बहुत अच्छी आती है,  लेकिन अब हमें सुबह का इंतजार था।

सुबह थोड़ी ठंड थी, मै और ललित जी सड़क पर निकल पड़े थे कल रात की खबर लेने। पटना के तमाम अखबार खरीद कर जब हमने खोल डाले तो खुशी के मारे आवाज नहीं निकल रही थी। सभी प्रमुख अखबारों की सुर्खियाँ कह रही थी... प्रमुख वक्ता व्यंग्यकार सुनीता शानू ने व्यंग्य को दो धारी तलवार कहा। अखबारों में छपी तस्वीरें मुझे मेरे होने का अहसास दिला रही थी।

कुछ देर में हमें वापस जाना था, रत्नेश्वर जी का वही मुस्कुराता खिलखिलता चेहरा नज़र आया जब वह हमें छोड़ने हवाई अड्डे आये, बहुत खुश थे वह, निर्विकार, सौम्य कहीं कोई मिलावट नहीं। उन्हें धन्यवाद कह मै और ललित जी दिल्ली जाने के लिये टिकिट काऊंटर आये, यहाँ पता चला कि नौ बजे जाने वाली फ्लाईट शाम तीन बजे चलेगी। पहले लगा कि समय कैसे कटेगा क्योंकि दोनों को घर पहुंचने की जल्दी थी। बातों ही बातों मे समय का ध्यान ही नहीं रहा। हाँ इस पूरे समय में लालित्य ललित जी का एक अलग ही व्यक्तित्व उभर कर आया जिसमें मैने पाया कि वह मिलनसार और सरलहृदय इंसान है, जिन्हें एक अच्छा दोस्त कहा जा सकता है।

इस तरह पटना की यह यात्रा ज़िंदगी को एक नई दिशा प्रदान कर गई... देखें अब फिर कब मिलेगा कोई नया अवसर और घिर जाऊंगी मै सवालों में और आवाज आती रहेगी “मै हूँ न” या “आप सफ़ल रहोगी मै देख रहा हूँ”।









Tuesday, September 2, 2014

चस्का किटी पार्टी का (साहित्य अमृत में प्रकाशित)




चस्का कोई भी हो जब लग जाये तो समझोआधा दिमाग तो गया। कुछ ऎसा ही हाल हुआ हमारे साथ भी। हुआ यूँ कि संपादक महोदय ने बुलाया और कहाआजकल किटी पार्टी का चस्का महिलाओं में तेज़ी से बढ़ रहा हैआप ऎसा कीजिये कि इस विषय पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिये। और कल के अखबार में हैडिंग रहेगी चस्का किटी पार्टी का। अब भला ये भी कोई चस्के वाली बात है। दिल में तो आया कि कह दूंसर आजकल तो सबको मोबाइल का चस्का है जिधर देखिये मोबाइल ही मोबाइलवो चाहे कम्पनी का मालिक हो या कबाड़ी वाला। एक से एक महंगा फोन खरीद कर हाथ में पकड़ना शान बन गई है, और ज्यादा ही है तो लड़कियों और महिलाओं में विश्व सुंदरी दिखने का चस्का है। सासू माँ को टी वी सीरीयल का चस्का हैससुरजी को अखबार काबच्चों को गेम का और श्रीमान को चाय का चस्का है। यहाँ तक की कामवाली बाई को भी दूसरों की बात सुनने का ऎसा चस्का है कि पूछिये मत जब तक आयात-निर्यात न हो जाये बातों का उसे उल्टियां आने लगती है पेट में अफ़ारा और खट्टी डकारे आने लगती है। इसी लिये तो कहती हूँ चस्का आधा दिमाग तो खाली कर ही देता है। बहरहाल सबसे पहले मुझे किटी पार्टी का पता लगाना है। तभी चस्केबाज़ों का पता लग पायेगा। मुझे टेंशन में देख घर के सभी सदस्य किटी पार्टी की खोज खबर में लग गये। सबसे पहले अम्माजी का व्याख्यान सुनने को मिलाउनका मानना है कि आम आदमी पार्टी की तरह कोई पार्टी होगी। बच्चों से भी मम्मी की परेशानी देखी नहीं गईझट-पट अटकलें लगाने लगे...टिंकू बोला-.मम्मा किटी तो बिल्ली को कहते हैंचुन्नू ने भी हाँ में हाँ मिलाई- हाँ मम्मा मैने देखा थाएक बार बहुत सारी बिल्लियाँ मिलकर चूहा खा रही थी। ये लो बच्चों ने तो अच्छा अर्थ निकाल दिया था। अभी बात खत्म भी नही हुई थी कि श्रीमान जी टपक पड़े। अरे क्या सुन रहा हूँ मैतुम किटी पार्टी की ही बात कर रही हो न! क्या सचमुच तुम किटी ज्वाईन करोगी। उंह बस इन्ही की कसर थी। जबसे ऑफ़िस में मिसेज़ बत्रा आई हैं ये तो चाहते हैं मै भी उन सरीखी बन जाऊँ और साधारण लिबास छोड़ कुछ स्टाईलिश नजर आऊँ। चलिये चलते हैं मैने कहा और वो बिना कुछ पूछे ऎसे चल दिये जैसे समझ ही गये कि श्रीमति जी कहाँ चलने को बोल रही है। ऎसा होता है चस्का कि आदमी बिना-सवाल जवाब के अपनी ही रौ में चलता चला जाता है। हमें देखते ही मिसेज़ बत्रा उछल पड़ी अरे मिसेज़ शर्मा आप। मैने मुस्कुराने की बहुत कोशिश की लेकिन वो कोशिश भी हवा हो गई जब उन्होनें स्टाइल से शर्मा जी की पीठ पर धम से हाथ मारा और कहा, “ऎ नॉटी आखिर आज तुम पकड़ में आ ही गया। मै समझ नहीं पाई कि ये कैसी पकड़ थी खैर सोचने को बहुत कुछ बाकि था। मैने शुरुआत की मुझे किटी पार्टी के विषय में जानना है। जानना नहीं है मिसेज़ बत्रा आप मेरी मिसेज़ को आपके साथ शामिल ही कर लो। मैने बहुत नानुकुर की कि जरुरत क्या है मुझे जो लिखना है इन्हीं से पूछ कर लिख डालूंगी। लेकिन श्रीमान लगे भाषण देने। एक सच्चा पत्रकार आँखों देखी लिखता है। सुनी-सुनाई नहीं। मुझे भी लगा कि जब तक मै सभी लोगों के साथ शामिल होकर नही देखूंगी अच्छे से लिख नहीं पाऊंगी।
खैर किटी पार्टी ज्वाइन हो गई। महिने की पंद्रह तारीख को मिसेज़ बत्रा के घर में होगी किटी पार्टी फिर शर्मा के और उसके बाद मेरे यहाँ। तब तक मुझे सब कुछ समझ लेना है।
आखिर किटी पार्टी में जाने का दिन आ भी गया। सुबह से ही शर्मा जी लगे हुए थे कभी चाय बनाये कभी पूछें तुम कब तैयार हो जाओगी। अरे भई किटी पार्टी में ही तो जाना है किसी की बरात में नहीं। अच्छा देखो तुम्हे बहुत अच्छा लगेगा वहाँ जाकर। मेरे लिये अपने पसंद की साड़ी अलमिरा से निकालने के बाद ही उनको तसल्ली हुई। खैर घर के काम निबटा मै झटपट तैयार हुई और मिसेज़ बत्रा के यहाँ पहुंची। एक से बढ़कर एक खूबसूरत महिलायें थी वहाँ। ऎसा नही था कि पैसे वाले घरों से थीमिडिल क्लास की औरते भी इस तरह तैयार हुई थी कि यह समझना मुश्किल था कि किस वर्ग विशेष से हैं। मिसेज़ बत्रा भी स्लीव लेस टॉप और शार्ट्स में बहुत स्मार्ट लग रही थी। सभी की एक से एक बढ़कर ड्रेस थी। देखकर लग रहा था जैसे फैशन शो मे आई हैं। पार्टी में प्रफ़्यूम की भरमार थी । लगता था मै किसी इत्र की दुकान पर आ गई हूँ। खैर मै सिमटी सिमटाई एक कौने में दुबक गई। मिसेज़ बत्रा ने आवाज उठाईसखियों हम लोग सारा-सारा दिन मशीन की तरह काम करते हैं। क्या थोड़ा समय भी खुद के लिये नही निकाल सकतेहमारे पति और बच्चे यहाँ तक की सास और ननद भी आराम और छुट्टी का दिन मना लेती हैं तो क्यों नही हम भी एक दिन खुद के लिये जियेंसुबह आंख खुलने से लेकर नींद से पलके बोझिल होने तक सिर्फ और सिर्फ काम ही काम..।कब मिलेगा आराम?
बात में दम था मुझे लगा सचमुच घर में सभी को अवकाश मिलता है आराम मिलता है। मेरे आराम का दिन तो कोई भी नही होता। छुट्टी के दिन पतिदेव चाय की फरमाईश करते दिखेंगे तो बच्चे कहेंगें मम्मी आज कुछ अच्छा सा बना दो। जैसे कि रोज खराब सा खाया जा रहा था। और कुछ नहीं तो संडे देखते ही ननदें टपक आती हैं क्या बतायें भाभी आराम तो मिलता ही नहीं सोचा एक दिन तो मायके में जाकर आराम कर लें। ये भी कोई बात हुई सबको अपने आराम कि पड़ी है। अच्छा सोचा श्रीमान जी ने पत्नी हूँ न उन्हें ही फ़िक्र होगी कि मेरी पत्नी भी थोड़ा इंजाय कर ले।
कुछ देर में खाने-पीने का दौर शुरू हुआ। खानें में मूंग की दाल का हलवामूंग की दाल की बर्फ़ीमूंग की दाल का चिल्ला और मूंग दाल के पापड़मूंग के आटे ही रोटी। सबकुछ मूंगमय होना रौचक लग रहा था। मुझसे रहा नही गया आखिर पूछ ही लिया मिसेज़ बत्रा क्या आपके यहाँ मूंग के खेत लगे हुए हैंया आपकी राशन की दुकान है जो इतने महंगे भाव की मूंग को पूरे मीनू में ठूस दियाउन्होने कहा कि ऎसा करके वो बाकी सबकी छाती पर मूंग दलती है।
धीरे-धीरे चुगलियों का दौर शुरु हुआसबसे पहले सास-ननद की बातें शुरू हुई... होते-होते मौहले की औरतें जो किटी पार्टी में नही आती उनकी बाते हुई। पुरुषों के घूरने की बातें भी शामिल थी चुगलियों में। बात यहाँ तक बढ़ गई कि वे एक दूसरे के पतियों को भी घूरा घूरी के मैदान में घसीट लाई। कुछ महिलायें किटी में आई महिलाओं पर छींटा कशी करने से भी बाज़ नही आई। मेरा तो पहला ही दिन था सो सबकी हमदर्दी थी कि मुझे सीखने में समय लगेगा।एक ने कहा शायद गाँव की है। अच्छा। ओह। बेचारी जाने कितने ही शब्द ऎसे मिल रहे थे जैसे पुरस्कार बट रहे हो। पहले दिन कुछ चस्के सा मुझ में नही जागा। हाँ एक बात तो अच्छी थी किटी पार्टी में कि सब मिलजुल कर सास-ननदघर-परिवार सब पर भंड़ास निकाल लेती हैं। और फ़्री माइंड होकर घर जा पाती हैं।  
घर आकर शर्मा जी को सब कुछ बताया।  बहुत सोचविचार किया गयाकि उन लोगों के साथ रहना है तो खुद को बदलना तो पडेगा ही
 सो मिसेज़ बत्रा के साथ पार्लर गई और बाल कटवा आई। घर में सब हँस रहे थे। बच्चे तो ताली बजाने से भी नहीं चूके,... हाहाहा मम्मी देखो क्या बन गई।जल्दी-जल्दी जींसटी-शर्ट पहना। महंगा परफ़्यूम लगाया। इस बार हँसने की बारी कमला बाई की थी। अरे वाह मेमसाब आप तो बिल्कुल ऎ हिरोइन की माफ़िक लग रहा है। सादा सलवार सूट कोने में पड़ा रो रहा था लेकिन कमला बाई की गोद में गिरकर शान्त हो गया। कम से कम शर्मा जी को घूरा-घूरी कांड से तो निकाल ही पाऊंगी। अभी पर्स उठा निकलने ही वाली थी कि टिंकू की आवाज़ आई मम्मी कुछ अच्छा सा। और शर्मा जी ने उसे अपने पास खींच लिया।
मिसेज़ गुप्ता के यहाँ जैसे ही धमाकेदार एंट्री कि सबके दिमाग के फ़्यूज उड़ गये। देख कर हाय-हल्लो करने लगी। इतनी प्रशंसा तो कभी सुनी ही नहीं थीपागलों की तरह घर का बाहर का काम करती रही कभी किसी ने ध्यान ही नही दिया मेरी सुंदरता पर। खैर दिल गर्व से फूला नही समा रहा था। बार-बार टेलिफ़ोन की घंटी बज रही थी आज सबको उसकी याद आ रही थी। कितना बदल गया है सब दो ही महीने में। खान-पान से लेकर उसके व्यवहार और सोसायटी में कितना परिवर्तन आ गया था। नये दोस्त बन गये हैं। जब-तब घर में होटलों में पार्टियां होने लगी। किटी पार्टी के चस्के ने घर में खाना छुड़वाकर होटलों पर निर्भर कर दिया। सुबह जिम तो शाम को क्लबों के चक्कर लगने लगे। नई ड्रेसेज़ नई ज्वैलरी सब कुछ नया-नया। सचमुच फ़ुर्सत ही नहीं है कुछ सोचने की। घर आते-आते इतनी थकान हो जाती कि एक गिलास पानी का उठाना मुश्किल हो गया। सास-ससुर को इंतजार है कि कब बहू घर लौट कर आये तो उसे बतायें आजकल उनकी बेटियों ने घर आना बंद कर दिया है। क्योंकि यहाँ आकर भी काम ही करना पड़ रहा है। बच्चे भी कुछ अच्छा सा बनने के इंतजार में हैं।
लेकिन हाँ स्टेटस बदला देखकर रिश्तेदारों के चेहरे भी मुस्कुराहटहँसी और अपनेपन के मेक अप में नजर आने लगे। शायद इसीलिये मशहूर शायर निदा फ़ाजली साहब ने कहा होगा कि,...
हर आदमी में बसते हैं दस बीस आदमी... जब भी किसी को देखना कई बार देखना।
शर्मा जी की शकल देख कर लग रहा था कि अब वे किटी पार्टी का नाम तक भूल गये हैं। जब से उनकी जेब पर डाका पड़ा है वे गुमसुम से नजर आते हैं। आखिर एक दिन जेब कराह उठी सब्र का इम्तिहान पूरा हुआ, “कब पूरी होगी तुम्हारी स्क्रिप्ट हद हो गई है

सुनीता शानू


Tuesday, July 8, 2014

(आज अमर उजाला में प्रकाशित) आलू-प्याज कैबिनेट मीटिंग

आलू-प्याज कैबिनेट मीटिंग

potato onion cabinet meeting

 सुनीता शानू मंगलवार, 8 जुलाई 2014 अमर उजाला, दिल्ली Updated @ 1:59 AM IST

आज रात आलू जी ने एक मीटिंग बुलवाई, जिसका एजेंडा था कि जब-जब सरकारें बनती हैं, हम पर ही दबाव क्यों बनाया जाता है। वह बोले, कभी गोदाम में हमें इतना ठूंस-ठूंसकर भर देते हैं कि हमारा दम घुट जाता है और हम मुंह दिखाने के काबिल भी नहीं बचते। हमें जबरन कीमत बढ़ाने के चक्कर में पकड़ कर रखा जाता है, बाद में पता चलता है कि लोग आलू खाना ही बंद कर देते हैं, यह कहकर कि इससे डायबीटिज हो जाती है। पिछले दिनों जब मैं गोदाम में सड़ रहा था, तब सबने मटर के समोसे खाने शुरू कर दिये थे। मटर भाई, क्या मैंने सब्जी को जायकेदार बनाने में तुम्हारी मदद नहीं की थी, जो तुम अकेले ही समोसे का स्वामित्व ले बैठे थे। आलू जी बोले जा रहे थे, साथ ही, पसीना पोछ रहे थे। प्याज खुद को बनाने-संवारने में इस तरह लगा हुआ था, जैसे उस पर कोई आंच आने वाली ही न हो। गुस्से में आलू जी फिर बोले, महाशय, आपको तो जैसे कोई फिक्र ही नहीं है। आप जानते हैं कि यह सब आपका ही किया धरा है। मुझे तो अंदाजा ही नहीं था इस बात का, यदि खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने न बताया होता। तुमने तो यार, कई सरकारें पलटकर रख दी है। दिल्ली का मामला कोई भूल सकता है क्या? फिर भी भाव खाना छोड़ो और कोई तरीका सोचो, वरना इस बार मंत्रियों की बैठक में मेरे साथ तुम भी गोदाम में सड़ोगे। प्याज मुस्कराते हुए बोला, मैं कतई नहीं सड़ने वाला आलू जी, चाहे वेज हो या नॉनवेज, मुझे तो हर सब्जी में जगह मिलती है। पिछले दिनों मै दौ सौ रुपये तक बिका था। मेरा रूप रंग ही ऐसा है कि सबके मुंह का स्वाद बदल जाता है। अमीर ही नहीं, गरीब भी मुझे पाने के लिये पूरे प्रयत्न करता है, इसीलिए सरकार से भी भिड़ जाता है। दरअसल मुझमें कई परतें हैं, और इन परतों के बीच ही सत्ता की कोई कमजोरी छिपी है। इसी कारण जो मंत्री जी भिंडी, टिंडा, परवल या मटर से नहीं घबराते, वे प्याज से घबरा रहे हैं। सारी सब्जियों ने प्याज का समर्थन करते हुए कहा, तुम बिल्कुल सही बोल रहे हो भाई।