Showing posts with label नवभारत में प्रकाशित. Show all posts
Showing posts with label नवभारत में प्रकाशित. Show all posts

Thursday, July 30, 2015

हा हा! भैंस दुर्दशा देखी न जाई (आज नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक टिप्पणी)



भैंस बहुत ही परेशान है, करे... तो क्या करे? या तो किसी तालाब में डूब मरे, लेकिन वो तो तैरना जानती है सो आत्महत्या भी नहीं कर पा रही है। कल तक पच्चीस किलो दूध और चार टाइम गोबर करके घर वालों के लिये दूध और उपलों का इंतजाम भैंस के द्वारा हो रहा था कि अचानक एक सिरफ़िरे डायरेक्टर की नजर उस पर पड़ गई थी, दोनों ने एक दूसरे को कनखियों से देखा था, घर के मालिक ने भैंस के दूध की खीर खिला कर भैंस के फ़िल्म में काम करने की बात भी पक्की कर डाली। जब गाँव भर के भैंसों को पता चला था सबने बहुत रोका लेकिन भैंस पर तो हिरोइन बनने का ऎसा भूत सवार था कि नहीं मानी।

अब भैया फ़िल्मों में भैंस भी कभी हिरोइन बन सकती है कोई सोच नहीं सकता था, खुद भैंस को भी ये यकीन नहीं हो रहा था कि कोई उसके रूप रंग पर फ़िदा होगा, और उसे फ़िल्म की हिरोइन का रोल देगा। वो बार-बार पानी की होद में अपने चेहरे को निहार रही थी, और मन ही मन खुद को ब्लैक ब्यूटी पुकार रही थी। ताज्ज़ुब तो इस बात का हुआ जब भैंस को डायरेक्टर ने मिस कहकर पुकारा, अब तक कम से कम चार पडिया को जन्म दे चुकी थी। सोच कर फ़ूली न समाई । उसे दिन में ही करीना, कैटरीना के सपने आने लगे, अब तो मुहल्ले भर के लड़के मिस बोल कर सीटी बजाने लगे। अब कोई भी उसकी तुलना काली मोटी बदसूरत महिलाओं से नहीं कर पायेगा। हो सकता है उसे भी प्यार से शाहरूख या सेफ़ मिस युनिवर्स कह कर बुलायेगा। उसकी हैल्थी बोडी को देखकर टुनटुन भी कह देंगे तो भी चलेगा। कम से कम हिरोइन तो कहलायेगी ही। 

मै बैठी-बैठी मिस की खूबसूरत आँखों, मतवाली पूँछ के बारे में सोच ही रही थी कि दरवाजे की घंटी बजीमैने दरवाजा खोलाबाहर झाँका तो एक भैंस दिखाई दीजो लाल रंग की साड़ी लपेटे गोबर में लिथड़ी खड़ी थी, ध्यान से देखा तो मै चौंक पड़ी अरे यह तो हमारी मिस है, अरे क्या हुआ बहन? सहसा मेरे मुह से निकला। मिस के चेहरे की दुर्दशा बता रही थी कि गुजरी रात उसे पार्लर ले जाया गया होगागाढे लाल पेंट की लिपस्टिक देखकर लगता था किसी का खून पीकर आई होशायद किसी ने खूनी समझ मारा भी था उसेमोटी मगर खूबसूरत आँखों का काजल बह-बहकर उसके साथ हुये हादसे को कुछ परसेंट बयान भी कर रहा था। मुझे देखते ही वो बुक्का पाड़ कर रोने लगीमुझसे उसका रोना देखा नहीं जा रहा था, मैने तुरंत एक बाल्टी में पानी, और कुछ फ़्रूट्स लाकर रखे, अब हिरोइन बन कर यही तो खाये होंगे बेचारी ने...

मिस रोये जा रही थी, मैने प्यार से उसके सिर पर हाथ फ़ेरा उसने बोलना शुरू किया,-  “ क्या बताऊं दीदी किस बुरी घड़ी में मैने गली के सारे भैंसों स नाता तोड़ कर उस मुये डायरेक्टर से नाता जोड़ लिया, उसने मेरी शादी भी कराई, मैने रात-दिन एक कर दिया था फ़िल्म की शूटिंग में, पच्चीस किलो दूध देती थी बिना कोई फ़ीस लिये, लेकिन जैसे ही फ़िल्म परदे पर आई मुझे कोई पूछता तक नहीं। जैसे-तैसे अपनी फ़िल्म देखने हॉल में घुस गई तो गार्ड ने मार-मार डंडे बाहर निकाल दिया। अब भला ये भी कोई बात होती है? क्या हम नारी जाति के अधिकारों का इसी प्रकार शमन होता रहेगा? मुझ बिरहन का साथी जिसके साथ शादी रचाई मुझसे बात तक नहीं करता है। भैंसे को छोड़ मैने एक इंसान से शादी कर ली, कुछ नहीं सोचा अपनी बिरादरी के बारे में कि लोग क्या कहेंगें... अब इस अवस्था में जब मै कहीं की न रही बाहर निकाल दी गई। आप ही बताईये दीदी एक शादी के रहते हमारी बिरादरी में कौन मुझसे शादी करेगा। 

उसकी नाजुक हालत थी फिर भी पूछना तो बनता ही था मैने कहा, तो तुम बताओ मै क्या मदद करूं तुम्हारी। उसने कहा दी बहुत उम्मीद के साथ आपके द्वार पर आई हूँआप भी एक नारी हैं मेरा दर्द अच्छे से समझेंगी और मुझे न्याय दिलवायेंगी। मुझे मेरे पति ने धोखा दिया हैसी आर पी सी की धारा 125 के तहत मुझे गुजारा भत्ता तो मिलना ही चाहिये। मिस की दलील सही थीअदालत में याचिका दर्ज करवा दी गईलेकिन दूल्हे और डॉयरेक्टर को कोई सज़ा मिले इसके पहले ही आऊट ऑफ़ कोर्ट सेटलमेंट हो गया, अब मिस प्रोड्यूसर के यहाँ बाड़े में रहती हैसिर्फ़ चारा खाकर दस किलो दूध देती हैइस उम्मीद के साथ की उसे अगली फ़िल्म की शूटिंग के लिये फिर बुलाया जायेगा। 

Wednesday, July 27, 2011

चाहे जैसे भी हो, बस कोई मुझे फ़ैमस कर दे( नवभारत के व्यंग्यबाण कॉलम में प्रकाशित)



यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। दिल्ली में पृष्ठ १६(http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9373017.cms
लिखते-लिखते कलम घिस गई। सम्पादकों की मनुहार में बाल पक गये, और मुई ये चप्पल तो न जाने कितनी बार मोची की दूकान पर हो आई। लेकिन जिसको पाने की चाहत में उम्र बीती निगोड़ी वही न मिली। आजकल मिलता भी क्या है? और हमने किया ही क्या है। सोचो तो न चोरी की, न डकैती डाली, न किसी का खून किया, तो भला वो कैसे मिलती? वाह मियाँ खुद को बहलाने के अंदाज़ निराले है... बचपन में सीखा चोरी डकैती लूटमार यह सब काम अच्छे लोगो के नही। फ़िर सुना नफ़रत पापी से नही पाप से करो। पर आज जिंदगी की परिभाषा ही बदल जाये तो हम क्या करें? बस कैसे भी करके हे प्रभु तूं मुझे फ़ैमस कर दे, मै सवा पाँच रूपये का प्रसाद चढ़ाऊंगी। ओह्ह सवाया कहां से लाऊँगी चवन्नी तो गई।




भगवान भी क्या सोचता होगा कैसे भूखे नंगे लोग हैं, ये कलम घसीटॆ कभी मंदिर आते नही, सोना चढ़ाते नही, बिना कुछ किये सब पाना चाहते हैं। सोने की बात पर याद आया आजकल हर रोज खबर मिल रही है कि फ़लाँ मंदिर से सोना बरामद हो रहा है। फ़लाँ बाबा के पास से करोड़ो रूपये का सोना-चाँदी और रूपया-पैसा बरामद हुआ। तो भैया वह सब हमारा, आपका ही तो है। हमारे पुरखों ने भगवान को चढ़ाया। क्या फ़र्क पड़ जायेगा अगर मै उसी में से थोड़ा सा उठा कर भगवान को चढ़ा दूँ। वो सुना तो होगा… तेरा तूझको अर्पण, क्या लागे मेरा। लेकिन एक परेशानी फ़िर भी आड़े आ रही है। सुना है वह काला धन है, माँ कहती है पाप की कमाई भगवान नही लेते। तो क्या आजकल भगवान भी बदल गये हैं। हो सकता है वक्त के साथ भगवान भी मॉर्डन हो गये हों। और उन्होनें काले धन को गोरा करने का कॉन्ट्रेक्ट लिया हो तो सबने काला धन जमा करवा दिया। आज तो कैसे भी भगवान को पटाओ, पैसा लक्ष्मी जी है माथे के लगाओ तो भैया चाहे गोरा हो या काला स्लेटी हो या लाल पैसे के बिना तो भगवान भी नही सुनने वाले। चलो छोड़ो मुझे लगता है, कुछ और सोचना होगा।




शायद फ़ैमस होने के लिये कुछ बुक्स तो अवश्य होंगी मार्केट में जैसे,- फ़ूलन के टिप्स, बंटी की सफ़लतायें, कनिमोझी के सपने या फिर जेल जाने के आसान तरीके। हो सकता है किसी नीम-हकीम ने ऎसा कोई अर्क बनाया हो जिसे पीकर मै भी फ़ूलन जैसी शूरवीर, बंटी जैसी उस्ताद बन जाऊँ। और हो सकता है इसके बाद मुझे भी बिग बॉस बुला ले या फ़िर रामू अपनी फ़िल्म की हिरोईन बना ले। हे भगवान बस एक बार कनिमोझी का इंटरव्यू ही मेरे द्वारा करवा दे।




करना तो होगा कुछ न कुछ वैसे भी खाली दिमाग शैतान का दिमाग होता है। खाली दिमाग में गाँघी जी के सिध्दांत, बिनोवा भावे के विचार और न जाने कितने ही महापुरूषो की रूहों ने अड्डा जमा रखा है, अब इन्हे तो वर्तमान से कोई सरोकार ही नही। क्या फ़ायदा ऎसे लोगो का? आज ही गाँधी जी, बिनोवा भावे खोपड़ी से आऊट और फ़ूलन देवी, बंटी उस्ताद, कनिमोझी इन। ऎसे लोगो को रखूँगी न, जो आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। जिनमें दूसरे का पैसा लूटने की क्षमता है। जो मार्ग मे आने वाली हर बाधा को मसल कर रख दें। और जरा सोचिये लाइफ़ में एक बार भी जेल की सुख सुविधाये प्राप्त न की तो क्या पाया। चलो राह तो मिली सबसे पहले अपने पड़ौसी शर्मा को ही चाकू दिखा कर लूटा जाये। और नही माना तो टपका देंगे साले को भैया अपने को तो कैसे भी हो फ़ैमस होना है।






लूट… बाप रे बचपन में दो रूपये चुरा लेने पर अम्मा ने खूँटी पर उल्टा लटका दिया था। अरे छॊड़ो आज अम्मा भी बंटी चोर के साहस को देख रही हैं न उन्हे भी अपने किये पर पछतावा होगा कि काश चोरी करना सीखा पाती तो आज मेरी बेटी भी धूम मचाती।..ओह्ह अम्मा काश तुम समझ पाती, तो आज मै भी सेलिब्रिटी बन पाती।...







सुनीता शानू