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Thursday, March 1, 2012

हमारी प्रयोगशाला और श्वेत मूषक



मनुष्य जो एक सामाजिक प्राणी है,यानि की सोशियल एनिमल जिसे की सामाजिक जानवर कहें तो भी कुछ गलत नही। अंग्रेजी भाषा का अनुवाद हम अपनी मातृ भाषा मे चाहे जैसे करें,यह हमारी विचारधारा है भई। तो बात आती है मनुष्य के दुर्लभ प्रयोगों की। एक समय था जब मरे हुए जानवर या आदमी के शरीर की ही चीर-फ़ाड़ करके नये-नये प्रयोग किये जाते थे। और तो और स्कूल में भी बेहोश कॉक्रोच, चूहों व मेढ़को पर बच्चों द्वारा प्रयोग किये जाते थे। किन्तु आज हालत यह है कि आदमी के प्रयोगों का शिकार सभी जानवर हो रहे हैं। जानवरों पर  प्रयोग कर-कर के ही मनुष्य जान पाया है कि खुद कैसे ज्यादा दिनो तक निरोग रह सकता है व किस रोग में क्या खायें? व किस चीज की अधिकता से कौनसा रोग हो जाता है।


अब इसी रिपोर्ट से देखिये की वैज्ञानिकों ने ७६ रीहसस बंदरो पर प्रयोग करके पता लगाया की कम कैलोरी वाला भोजन करने से मनुष्य ज्यादा दिन तक जीवित रह पायेगा।कम कैलोरी वाला भोजन जब बंदरों को दिया तो वैज्ञानिको को पता चला की इससे न कैंसर होगा न दिल की बीमारी।बात ठीक भी है वानर हमारे वंशज थे तो सिमिलरिटीज तो होंगी ही न। किन्तु कुते, बिल्ली, चूहों के वंश में हम कब आये याद नही आ रहा।न ही इसकी कोई पौराणिक कथा है न ही शोधग्रंथ। बाहर के देशों में तकरिबन १.२ करोड़ जानवरों का प्रयोग हर साल किया जाता है। अब चाहे बर्ड फ़्लू हो या स्वाईन फ़्लू जानवरों पर टीके लगा-लगा कर प्रयोग किया जाता है फ़िर जाकर पता चलता है कि मनुष्य रूपी जानवर को कौनसा टीका लगाया जाये? वैसे तो मनुष्य सबसे स्वार्थी प्राणी है, जब भी करता है प्रयोग दूसरों पर ही करता है।


हम महिलायें भी वैसे किसी शोधकर्ता से कम नही हैं। जब देखो हम भी अपनी रसोई नामक प्रयोगशाला में पति पर प्रयोग करती ही रहती हैं। और बेचारे पतिदेव उन्हे क्या कहिये श्वेत मूषक बने हमारी नित नई रेसिपीज का स्वाद चखते रहते हैं। अब स्वादु हो या बेस्वादु प्रयोग तो प्रयोग ठहरा न।


चलो माना हमसे बच भी जाये मगर आजकल के डॉक्टर मरीज़ का बार-बार सिरींज में ब्लड लेकर टैस्ट करते रहते है कि मरीज को ऎसी कौनसी बीमारी बताई जाये,जो लम्बी हो और जिसके लक्षण भी दिखायें जा सके। और जब कोई बीमारी न निकले तो डॉक्टर का बिल देख कर मरीज को हर्ट की बीमारी होने का डर तो लगा ही रहता है।


सुनने में आया है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने डीडी असिस्ट नामक ऎसा सॉफ़्टवेयर बनाया है जिस पर दवाओं का शोध किया जा सकेगा।जिससे बेचारे जानवर तो बच ही सकेंगे। किन्तु फ़िर भी बेचारे पतिदेव मूषक बनने से बच नही पायेंगे। बचेंगे भी कैसे यह नारी जाति की प्रयोगशाला है सरकारी नही।


सुनीता शानू

Wednesday, July 27, 2011

चाहे जैसे भी हो, बस कोई मुझे फ़ैमस कर दे( नवभारत के व्यंग्यबाण कॉलम में प्रकाशित)



यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। दिल्ली में पृष्ठ १६(http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9373017.cms
लिखते-लिखते कलम घिस गई। सम्पादकों की मनुहार में बाल पक गये, और मुई ये चप्पल तो न जाने कितनी बार मोची की दूकान पर हो आई। लेकिन जिसको पाने की चाहत में उम्र बीती निगोड़ी वही न मिली। आजकल मिलता भी क्या है? और हमने किया ही क्या है। सोचो तो न चोरी की, न डकैती डाली, न किसी का खून किया, तो भला वो कैसे मिलती? वाह मियाँ खुद को बहलाने के अंदाज़ निराले है... बचपन में सीखा चोरी डकैती लूटमार यह सब काम अच्छे लोगो के नही। फ़िर सुना नफ़रत पापी से नही पाप से करो। पर आज जिंदगी की परिभाषा ही बदल जाये तो हम क्या करें? बस कैसे भी करके हे प्रभु तूं मुझे फ़ैमस कर दे, मै सवा पाँच रूपये का प्रसाद चढ़ाऊंगी। ओह्ह सवाया कहां से लाऊँगी चवन्नी तो गई।




भगवान भी क्या सोचता होगा कैसे भूखे नंगे लोग हैं, ये कलम घसीटॆ कभी मंदिर आते नही, सोना चढ़ाते नही, बिना कुछ किये सब पाना चाहते हैं। सोने की बात पर याद आया आजकल हर रोज खबर मिल रही है कि फ़लाँ मंदिर से सोना बरामद हो रहा है। फ़लाँ बाबा के पास से करोड़ो रूपये का सोना-चाँदी और रूपया-पैसा बरामद हुआ। तो भैया वह सब हमारा, आपका ही तो है। हमारे पुरखों ने भगवान को चढ़ाया। क्या फ़र्क पड़ जायेगा अगर मै उसी में से थोड़ा सा उठा कर भगवान को चढ़ा दूँ। वो सुना तो होगा… तेरा तूझको अर्पण, क्या लागे मेरा। लेकिन एक परेशानी फ़िर भी आड़े आ रही है। सुना है वह काला धन है, माँ कहती है पाप की कमाई भगवान नही लेते। तो क्या आजकल भगवान भी बदल गये हैं। हो सकता है वक्त के साथ भगवान भी मॉर्डन हो गये हों। और उन्होनें काले धन को गोरा करने का कॉन्ट्रेक्ट लिया हो तो सबने काला धन जमा करवा दिया। आज तो कैसे भी भगवान को पटाओ, पैसा लक्ष्मी जी है माथे के लगाओ तो भैया चाहे गोरा हो या काला स्लेटी हो या लाल पैसे के बिना तो भगवान भी नही सुनने वाले। चलो छोड़ो मुझे लगता है, कुछ और सोचना होगा।




शायद फ़ैमस होने के लिये कुछ बुक्स तो अवश्य होंगी मार्केट में जैसे,- फ़ूलन के टिप्स, बंटी की सफ़लतायें, कनिमोझी के सपने या फिर जेल जाने के आसान तरीके। हो सकता है किसी नीम-हकीम ने ऎसा कोई अर्क बनाया हो जिसे पीकर मै भी फ़ूलन जैसी शूरवीर, बंटी जैसी उस्ताद बन जाऊँ। और हो सकता है इसके बाद मुझे भी बिग बॉस बुला ले या फ़िर रामू अपनी फ़िल्म की हिरोईन बना ले। हे भगवान बस एक बार कनिमोझी का इंटरव्यू ही मेरे द्वारा करवा दे।




करना तो होगा कुछ न कुछ वैसे भी खाली दिमाग शैतान का दिमाग होता है। खाली दिमाग में गाँघी जी के सिध्दांत, बिनोवा भावे के विचार और न जाने कितने ही महापुरूषो की रूहों ने अड्डा जमा रखा है, अब इन्हे तो वर्तमान से कोई सरोकार ही नही। क्या फ़ायदा ऎसे लोगो का? आज ही गाँधी जी, बिनोवा भावे खोपड़ी से आऊट और फ़ूलन देवी, बंटी उस्ताद, कनिमोझी इन। ऎसे लोगो को रखूँगी न, जो आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। जिनमें दूसरे का पैसा लूटने की क्षमता है। जो मार्ग मे आने वाली हर बाधा को मसल कर रख दें। और जरा सोचिये लाइफ़ में एक बार भी जेल की सुख सुविधाये प्राप्त न की तो क्या पाया। चलो राह तो मिली सबसे पहले अपने पड़ौसी शर्मा को ही चाकू दिखा कर लूटा जाये। और नही माना तो टपका देंगे साले को भैया अपने को तो कैसे भी हो फ़ैमस होना है।






लूट… बाप रे बचपन में दो रूपये चुरा लेने पर अम्मा ने खूँटी पर उल्टा लटका दिया था। अरे छॊड़ो आज अम्मा भी बंटी चोर के साहस को देख रही हैं न उन्हे भी अपने किये पर पछतावा होगा कि काश चोरी करना सीखा पाती तो आज मेरी बेटी भी धूम मचाती।..ओह्ह अम्मा काश तुम समझ पाती, तो आज मै भी सेलिब्रिटी बन पाती।...







सुनीता शानू

Friday, July 1, 2011

दो टके की नौकरी और ये मंहगाई....







शाम के करीब पाँच बजे थे,चाय की चुस्कियाँ लेते हुए मै अपने कम्प्यूटर पर खबरों की हैडलाइन्स पढ़ रही थी। मैने पढ़ा की आज शाम को एक मीटिंग बुलाई गई है जिसमे डीजल, और \रसोई गैस के मूल्य-वृध्दि सम्बंधी मुद्दों पर चर्चा होनी है। एक सरसरी नज़र मै खबरों पर डाल अपने दूसरे कार्यों में व्यस्त हो गई।

वक्त का पता ही नही चला कि कब रात के नौ बज गये। अभी मै कुछ सोच ही रही थी कि अचानक फ़ोन की घंटी बजी। मैने फ़ोन उठाया। उधर से एक लड़खड़ाती हुई आवाज़ आई। मैडम  क्या आपने  इंटेरनेट पर आज की ताजा खबर पढ़ी?(मेरे एक स्टॉफ़ मेम्बर का फ़ोन था।)  मैने आवाज़ को पहचानते हुए कहा हाँ क्यों कुछ खास बात?  वो बोला मैडम टी वी पर खबर आ रही है कि  डीजल तीन रूपये और गैस सिलेंडर पच्चास रूपये महंगा हो गया है। आप आज ही डाईवर को भेज कर टंकी फ़ुल करवा लीजियेगा।

मैने कहा क्या फ़र्क पड़ जायेगा आज बीस लीटर डीजल में साठ रूपये बच जायेंगे। और कल क्या होगा। उसके बाद तो बढ़ा हुआ रेट ही देना पड़ेगा। वो बोला मैडम आप लोग तो फ़िर भी बर्दाश्त कर लेंगे लेकिन हम जैसे नौकरी पेशा लोगों का क्या होगा? डीजल महगां हो जायेगा और गैस के भी पच्चास रूपये ज्यादा देने पड़ेंगे।और भी कई  चीज़ों के पैसे बढ़ जायेंगे। समझ नही आ रहा क्या किया जाये?

उसकी बातों ने अच्छी तरह पका दिया था। मैने पूछा अच्छा यह बताओ की महिने में गैस सिलेंडर कितने इस्तेमाल करते हो? शायद एक!... तो खर्चा बढ़ा पच्चास रूपये। रही बात  डीजल की तो  डीजल तुम्हे डलवाना नही होता कम्पनी डलवाती है।

अब सीधे-सीधे मेरे एक सवाल का जवाब दो दिन में कितने गुटके खा जाते हो? शायद पाँच तो गुटका जो पहले एक रूपये का आता था आज ब्लैक में दो का हो गया तो खर्चा हुआ दस रूपया एक दिन का और महिने भर का हो गया तीनसौ रूपये। और जो इस समय तुमने ये जो नशे की बोतल चढ़ा रखी है उसके दाम भी सौ रूपये प्रति बोतल बढ़ गये हैं महिने में तुम चार-पाँच सौ की तो पी ही जाते होंगे। जब ये बढ़ा हुआ खर्चा तुम एडजेस्ट कर सकते हो तो रसोई गैस के पच्चास रूपये का क्यों नही? इतना सुनना था कि उसका सारा नशा हिरन हो गया और बोला" अच्छा मैडम कल सुबह बात करेंगे। शुभरात्री।"...:) 

सुनीता शानू

Thursday, December 24, 2009

सर्दी में कैसे नहाएं (अमर उजाला के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित...)

सर्दी में कैसे नहाएं



सुनीता शानू

सर्दी के मौसम में रजाई से निकलकर नहाने के लिए जाना भी एक विकट समस्या है। इस मौसम में शर्मा जी खुद को सबसे बदनसीब प्राणी समझते हैं। हर सुबह उस व1त उनका मूड उखड़ जाता है, जब पत्नी न नहाने पर बार-बार उलाहना देती है। आखिरकार बीवी कमांडर बनकर उन्हें बाथरूम की तरफ धकेल ही देती है। वह शहीद बनकर अंदर घुस जाते हैं। ठीक ऐसे ही समय पड़ोस से मिश्रा जी के गाने का स्वर आता है, ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए।

बस बीवी का दिमाग तमतमा जाता है, कब तक आलसी की तरह पड़े रहोगे? मिश्रा जी से कुछ सीखो, जो रोज ठंडे पानी से नहाते हैं। एक तुम हो, जो गरम पानी से नहाते हुए भी रो रहे हो। अब श्रीमती जी को कौन समझाए कि मिश्रा जी सचमुच ठंडे पानी से नहा रहे हैं या गरम पानी से। या नहा भी रहे हैं कि सिर्फ राग अलाप रहे हैं। बहरहाल बेचारे शर्मा जी को उठना ही पड़ा।अब यह कोई एक दिन की बात तो है नहीं। रोज-रोज का नहाना, सचमुच कंपकंपी-सी चढ़ जाती है

नल तेजी से चलाएं और ठिठुरते हुए गाएं, ताकि बीवी को लगे कि आप सचमुच नहा रहे हैं। हां, गीले तौलिये से शरीर पोंछना न भूलें


शर्मा जी पत्नी को समझा-समझाकर थक गए कि सर्दी में नहाना बेवकूफों का काम हैं। एक तो पसीना आता नहीं, दूसरे पानी की बरबादी। खैर ये गूढ़ रहस्य की बातें हैं, पत्नी की मोटी बुद्धि में घुसने वाली नहीं।

अचानक माथे पर चंदन का टीका लगाए मौजीराम को आए देख शर्मा जी थोड़े आश्वस्त हुए। उन्हें लगा, डूबते को तिनके का सहारा मिला। लेकिन बीवी ने मौजीराम के सामने एक बार फिर शर्मा जी के न नहाने का उलाहना दिया। मौजीराम ने आग में घी डालते हुए कहा, अरे भाभी जी, सर्दी में नहाना अति उत्तम है, और वह भी ठंडे पानी से तो समझो कि सो रोगों की दवा।

बेचारे शर्मा जी गुस्से में दांत किटकिटा रहे थे। अब तो सहन करना मुश्किल हो गया। मौजीराम रोज-रोज नहाने वाला बंदा तो है नहीं, कोई न कोई घोटाला अवश्य है। खैर शर्मा जी को विप8िा में देख मौजीराम ने दोस्त होने का फर्ज निभाया और उन्हें शीत स्नान का नुसखा बताया। शीत स्नान यानी ह3ते में बस एक दिन रविवार की छुट्टी के दिन नहाएं। बाकी दिनों बस ठंडे पानी के नल को पूरे वेग से चलाएं और ठिठुरते-ठिठुरते गुनगुनाएं, ताकि पत्नी को लगे आप सचमुच ठंडे पानी से ही नहा रहे हैं। इसके बाद तौलिया भिगोकर सिर व हाथ-पैर पोंछ लें।


कहा भी जाता है कि धोए कान हुआ स्नान, अर्थात शीतकाल में इसे ही संपूर्ण स्नान माना जाएगा। और हां, चेहरे पर क्रीम और सिर में खुशबू वाला तेल लगाना न भूलें। सप्ताह के दिन जैसे-जैसे बीतें, वैसे-वैसे तेल, परफ़्यूम आदि की मात्रा बढ़ा दें। और हां, साबुन और कपड़े गीला करना न भूलें।

मौजीराम जी के नुसखे पर अमल कर शर्मा जी सुखी हैं। रोज शीत स्नान करते हैं और पत्नी से कहते हैं, सचमुच सर्दी में नहाने का मजा ही कुछ और है। लेकिन मिसेज शर्मा यह सोच-सोचकर हैरान हैं कि शर्मा जी आखिर चमेली का तेल क्यों लगाते हैं?

Friday, October 30, 2009

करामाती इंजेक्शन (नई दुनिया के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)




करामाती इंजेक्शन




एक जमाना था जब इंजेक्शन का नाम सुन कर बड़ों-बड़ो की हवा खराब हो जाती थी। बचपन में डॉक्टर जब सुई लगाने के लिये निकालता था सुई देखने के साथ ही उई निकल जाती थी। आज वही सुई करामाती इंजेक्शन बनकर देशभर में मशहूर हो गई है। एक जरा सी सुई और काम बड़े-बड़े। आज सुबह दूध वाला मुझसे बोला- "बीबीजी! सुई लगाये बिना कौन्हो भैंस दूध न देत है। हम रोज इंजेक्शन लगाई देत हैं तब ससुरी दूध देत है।" -अरे! तुम क्या डॉक्टर हो जो भैंस को इंजेक्शन लगाते हों? वो मुझ पर ऎसे हँसा जैसे कि कोई अजूबी बात कह दी हो। -"अरे बीबी जी भैंस के इंजेक्शन लगाने के लिये कौन्हो डॉक्टरी की जरूरत नाही।" सच ही तो है बेचारी भैंस के कहीं भी इंजेक्शन ठोक दो बेचारी कमप्लेन तो कर नही पायेगी। डरने वाली कोई बात ही नही। इंजेक्शन खाकर जहाँ गाय-भैंस दूध ज्यादा देने लगी वंही मुर्गी भी अण्डे ज्यादा देने लगी। है न छोटा सा इंजेक्शन और फ़ायदा दुनियां भर का।

यहाँ तक तो बात समझ में आ गई परंतु कल रात जब जोर-जोर से सिसकने की आवाज आई तो समझ नही पाई, क्या पेड़ भी रात को रोते हैं? डर के मारे रात को गार्डन में जाने का मन नही हुआ। दूसरे दिन माली से पूछने पर पता चला कि उसने गाय-भैंस को लगाने वाला प्रतिबंधित ऑक्सीटॉक्सीन इंजेक्शन लौकी, तुरई के लगा दिया था, ताकि वे रातों-रात बड़ी हो जायें। लो भई माली जी बन गये सब्जियों के डॉक्टर। इंजेक्शन नही हुआ जैसे की बच्चों का खिलौना हो गया है।

कल तक रोगी को जल्दी ठीक करने के लिये इंजेक्शन लगाये जाते थे ,आज रोग का सामान बन बैठे हैं। बाजार में बिकती हर चीज़ ऎसा लगने लगा जैसे की इस करामाती पकाऊ-बढ़ाऊ इंजेक्शन की ही देन है। सेव की चमक देख कर या केले, पपीते की रंगत देख कर यह कहना मुश्किल होगा की यह पेड पर पके हैं या किसी करामाती इंजेक्शन का कमाल है। ऎसा लगता है जैसे सभी फ़ल-सब्जियों को रात-भर सौंदर्य-प्रसाधन द्वारा सुंदर चमकदार बनाया जाता है।ताकि सुबह सवेरे ग्राहक उनकी उपरी चमक-धमक देख कर धोखा खा जाये। अब तरबूज से ही ले लीजिये गर्मियों में गला तर करने के लिये जिसे इस्तेमाल किया जाता है। रातभर इंजेक्शन खाकर बेचारा कराहता है।



बच्चे भी रोज-रोज ऎसी खबरे सुन कर मनसूबे बनाने लगे हैं कि काश भगवान हमे भी रातों-रात बड़ा करदे। हमे पढ़ाई का इंजेक्शन लगा दे। अब मै भी सोच रही हूँ कि जहाँ एक ओर मनुष्य ने इतनी प्रगति कर ली है कि परखनली शिशु और डिजानर शिशु तैयार करने लगा है। वहीं किसी दिन यह भी सुनने में आ ही जाये की कल जो बच्चा पैदा हुआ था रात-भर इंजेक्शन देकर उसे युवा बना दिया गया है। न पढ़ाई का खर्चा, न ही इतने दिन पालने-पोसने का झंझट। बस यही परेशानी है की बच्चा बोलना-पढ़ना सीखेगा कैसे? तो वैज्ञानिक उसका भी कोई न कोई तोड़ निकाल ही लेंगे। शायद कुछ करामाती इंजेक्शन्स देकर बच्चों को भाषा का ज्ञान, पढ़ाई का तजुर्बा दिया जा सके। देखिये अब ये इंजेक्शन क्या-क्या खेल दिखाता है...।

सुनीता शानू

Thursday, October 29, 2009

मिस कॉल की भाषा (अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)





मिस कॉल की भाषा

 
सबसे पहले हम पाठको को बता दें कि मिसकाली जी क्या हैं। ये वो शख्सियत हैं जिससे बड़े-बड़े भी अपनी पहचान छुपाते हैं। अब अपने शर्मा जी से ही ले लो। पिछले दो हफ़्ते से बेचारे सो नही पाये हैं। इस मिसकाली ने नाक में दम कर रखा है। कब,कहाँ,कैसे आ टपके कुछ मालूम नही। शर्मा जी का जो हाल हुआ है भगवान ही जानता है। बेचारे सोना-जागना,नहाना-धोना सब भूल गये हैं। और ये मिसकाली! इसे कोई फ़र्क ही नही पड़ता। इसे न मरघट नजर आता है न ही उत्सव। और अब लगता है, मिसेज शर्मा को भी इस मिसकाली से जलन होने लगती है। तभी तो आजकल वे मिसकाली को नींद में गालीयां निकालती हैं डेम फ़ूल,स्टूपिड इत्यादि,न मुँह गंदा न राष्ट्रभाषा का अपमान।

आप सोच रहे होंगे की यह मिसकाली है कौन? जिसने मिसेज शर्मा तक को परेशान कर दिया। कहीं ये शर्मा जी की कोई एक्स गर्लफ़्रेंड तो नही?

...नही भई नही। ये मिसकाली हैं मौजीराम। शर्मा जी के लंगोटियां यार। जिन्होनें नया-नया मोबाईल लिया है। मोबाईल में है बस बीस रूपये का बैलेंस और मिस कॉल करने की तगड़ी बीमारी, जिसका शिकार हुए बेचारे शर्मा जी। मिसकॉल करते समय कभी नही सोचते की काम किसे है। तीस पे तुर्रा भी यह कि अम्मा यार तुम तो याद ही नही करते। एक मै हूँ जो हर वक्त तुम्हे याद करता रहता हूँ। और तुम इतने कंजूस की एक मिसकॉल भी नही कर सकते।
ग़ज़ब की बात तो यह होती है कि इन मिसकालियों की डिमाण्ड भी मिसकॉल ही होती है। अपने दिल की बात बस मिसकॉल के माध्यम से ही कह देते हैं। अक्सर देखा जाता है कि प्रेमिका अपने प्रेमी को मिसकॉल करती है, फ़िर प्रेमी भी मिसकॉल देकर अपने प्यार का इजहार करता है। जहाँ भावनाओं की ही जरूरत है, भला बात करके क्या हॉसिल होगा? सो मिसकॉल सबसे उत्तम उपाय है, यह बताने का की किसे,किसकी, कितनी याद सता रही है। यह तो वह बात हुई न हींग लगै न फ़िटकरी, रंग भी चोखो आये। तो भैया मिसकॉल का स्वाद एक बार जो चखले वो कॉल क्यूँ करे?

कुछ लोगों के लिये मिसकॉल अच्छा-खासा लव लेटर है, तो किसी के लिये हाल-चाल पूछने का तरीका। कोई बस डायलर टोन सुनने के लिये ही मिसकॉल करता रहता है। मुझे तो लगता है, यह मैथड भी भाषा-विज्ञान के अंतर्गत आता है। जहाँ पहले से डिसाईड होता है कि मिसकॉल आने वाला है। मिसकॉल आते ही चहरे पर एक चिरपरीचित सी मुसकान देखी जा सकती है।

मिसकॉल के किटाणु डेंगू,मलेरिया,स्वाईन फ़्लू की तरह चारों तरफ़ फ़ैल गये है। जिस दिन मिसकॉल न आये तो घर भी सूना-सूना सा लगता है। वैसे भी जितनी बार मोबाईल बजेगा देखने वाले को तो यही लगेगा न की बंदा कितना बिजी है भई।

मौजीराम की मिसकॉल ऎसी रंगत लाई की शर्मा जी के भीतर भी इसके किटाणु प्रवेश कर ही गये। अब मौजीराम की मिसकॉल पर शर्मा जी भी मिसकॉल करते हैं।अब दोनो में न शिकवे हैं न शिकायत है। एक राजस्थानी गीतकार ने इस मिसकॉल से प्रेरित होकर एक गीत तक लिख डाला है जो जगह-जगह मोबाईल पर सुनने को मिल जाता है, बनड़ी रो मिसकॉल म्हारे मोबाईल पर आवेगो, रे नया जमाने वाली बनड़ी फ़ोन मिलावे रे... शुक्र है कि मिसकालियों की यह मूक भाषा किसी ने तो समझी।

सुनीता शानू

Tuesday, August 18, 2009

बीमारी का लाभ


अमर उजाला पर प्रकाशित एक व्यंग्य....

इधर जब से शर्मा जी को हल्की सी खाँसी आई हैं, ऑफ़िस में रूबी भी हाथ मिलाने से हिचकिचाती है।शर्मा जी बहुत परेशान हैं। बाहर स्वाइन फ़्लू का बढ़ता हुआ आतंक और घर में बीबी का। बार-बार हाथ धोते-धोते परेशान हो गये थे। गले लगाना तो दूर लोग हाथ मिलाते हुए भी कतराते थे। अगर स्वाइन फ़्लू सचमुच हो गया तो? रूबी की बात तो छोड़ो बीबी भी पास न आयेगी। शर्माजी उलझल में थे कि उनके दोस्त मौजीराम आ धमके। शर्मा जी ने उन्हे आपबीती सुनाई।मौजीराम ठहरे ऑल टाइम मौजी। लगे स्वाईन फ़्लू के फ़ायदे गिनाने। यार घबराते क्यों हो?फ़ायदा क्यों नही उठाते।आराम का आराम और बिना आरक्षण सीट पर विश्राम।शर्मा जी-वो कैसे? अरे यार स्वाइन फ़्लू के मरीज के पास कौन बैठेगा सोचो? तुम आराम से मैट्रो मे सफ़र कर पाओगे। घर के सारे काम भी बीबी चुपचाप किया करेगी। दिन भर तुम्हारी सेवा करेगी।एक सबसे बढिया बात, ऑफ़िस से बॉस भी छुट्टी दे देगा। मौजीराम की बात शर्मा जी के दिमाग में फ़िट हो गई।
योजनानुसार शर्मा जी एन 95 स्पेशियल मास्क पहन आये। तैयार होकर जैसे ही मैट्रो पर चढे़। तैसे ही खाँसी आई सारी भीड़ छट गई,पास बैठी खूबसूरत बाला उन्हे छोड़ मौजीराम के साथ बैठ गई।ऑफ़िस मे भी बॉस उन पर बरसता उससे पहले ही खाँसी आई और बॉस नरम होकर बोला-अरे पहले बताया होता न तुम बीमार हो। जाओ आराम करो। शर्मा जी मन ही मन मौजीराम को थैंक्यू पकडा रहे थे।तभी उनकी नजर रूबी पर पड़ी जो मौजीराम से हाथ मिलाते हुए कह रही थी कि आप कितने नेक हैं,जो जान की परवाह किये बगैर स्वाइन फ़्लू के मरीज के साथ है। शर्मा जी बेचारे तिलमिला कर रह गये।
मौजीराम के सौजन्य से मिसेज शर्मा को पता लग चुका था,अब तक सभी रिश्तेदारों को फोन किये जा चुके थे। शर्मा जी को घर पहुँचते ही सबने दूर से ही देखा। उनके कपड़े उनका सामान सब पृथक कर दिया गया। पत्नी की आँखों के आसूँ शर्मा जी को बेहाल कर रहे थे,कि अचानक मौजीराम की आवाज आई आप फ़िक्र क्यों करती हैं भाभी जी,मै हूँ न। और बस घर के सभी सदस्य मौजीराम की आवभगत में ।
शर्मा जी को हॉस्पिटल भर्ती करवाया गया। डॉक्टर को मौजीराम ने जाने क्या समझाया की उसने भी स्वाइन फ़्लू की बीमारी कन्फ़र्म कर दी, अब शर्मा जी का बुरा हाल, मौजीराम की मौज,लोग मौजी राम को मसीहा कहने लगे।
हॉस्पिटल से छूट कर शर्मा जी जब ऑफ़िस पहुँचे तब ४४० वाट का करंट उनसे चिपक चुका था।रूबी बन गई थी मिसेज मौजीराम। मौजीराम को बॉस के द्वारा प्रोमोशन मिला था। और शर्मा जी के घर में ही नही उनकी बीबी के दिल में भी मौजीराम ने गहरा असर छोड़ा था कि जिन्दगी भर उनके परिवार की रक्षा का बन्धन बीबी ने उसके हाथ पर बाँध दिया। शर्मा जी मौजीराम को हड़काते,या अपना फ़ायदा उठाने पर डाँट लगाते मगर खाँसी आई और शर्मा जी चुप होकर रह गये। मौजीराम मुस्कुराते हुए गुनगुना रहे थे-स्वाइन फ़्लू बड़े काम की चीज है...

सुनीता शानू

Wednesday, December 3, 2008

शेयर का शेर






















शेयर का शेर

आजकल शेयर का शेर पड़ौस वाले शुक्ला जी के घर में घुस गया है और उसने वहाँ ऎसी उठा-पटक मचाई है कि घर के सभी सदस्यों को अपने शिकंजे में कस लिया है। न ढ़ंग से नाश्ता मिलता है न खाना, सुबह के दस बजे से लेकर दोपहर के चार बजे तक घर के सभी सदस्य टी वी के सामने बारी-बारी से घात लगा कर बैठे रहते है कि आज शेयर का शेर क्या गुल खिलाने वाला है। और तो और मोबाईल पर भी शेयर का ही हाल चाल पूछा जाता है ।
जब से शेयर का शेर आकर बैठा है, सबकी नींद हराम हो गई है, इन्हे दीन-दुनिया की कोई खबर ही नही है। न किसी के पास जाना न किसी को बुलाना, कोई भूला भटका दोस्त आ भी जाता है तो उसके सामने भी घर के सभी सदस्य शेयर्स के मोल भाव करने लगते हैं। बेचारा दोस्त भी कुछ देर शेयर्स की खरीद फ़रोख्त में शामिल हो जाता हैं, अंत में शेर का शिकार हो ही जाता है।


घर का हर सदस्य शेयर्स के बारे में जानकारी देता हुआ खुद को वॉरेन बूफ़े समझने लगा है। बच्चों की चाहत है पापा रिलायंस खरीदो, पत्नी कहती है जो भी हो उसे तो जल्दी से जल्दी इस दीपावली पर चूड़ीया चाहिये, ऎसा शेयर खरीदो जो रातो रात दुगना मुनाफ़ा दे जाये। दादी अम्मा भी इस कर्म-काण्ड से अछूती नही हैं, पूजा-पाठ कर्म-धर्म छोड़ बस लगी है बेटे-बहू के साथ इसी बिजनेस में कि कब शेयर के शेर का रंग लाल हो रहा है कब हरा। अब ये तो वो जान गई हैं कि लाल होने पर भाव घटता है और हरे रंग से बढ़ता है। अब चाहे शेयर्स की जानकारी हो या न हो।


जबसे सास,बहू और सेंसेक्स नामक फ़िल्म देखी है,सब को शेयर्स खरीद कर अमीर बनने का भूत सवार हो गया है, कुछ शेयर्स खरीद कर घर के लोग खुद को कम्पनी का बादशाह समझने लगे है। और क्यूँ न समझें? एकता कपूर ने अपने सीरियल में बताया था कि कैसे कम्पनी के 50 प्रतिशत से ज्यादा शेयर खरीद कर मालिक बना जा सकता है। अब जितने पर्सेंट के शेयर्स है उतने के मालिक तो हुए ही न।


शुक्ला जी की छोडिये आज जमाना ही बदल गया है, सास बहू को मायके के ताने नही देती बल्कि पूछती है कि बहू जरा देख कर बताओ आज सेंसेक्स कहाँ अटका? एक चैनल पर शेयर्स की जानकारी देते हुए एक सास से बातचीत हो रही थी,"आपको शेयर खरीदने की सलाह किसने दी?" सास ने बड़े फ़क्र से कहा,"उसकी बहू ने कहा था और उसने खरीद लिये।" लगता हैं शेयर्स ने रिश्तों में भी समकालीन मिठास घोल दी है लेकिन वो दिन दूर नही जब शेयर का शेर बच्चे-बच्चे को जन्म-घूटी की तरह पिलाया जायेगा। ऎसा न हो कि वो बड़ा होने के साथ ही सट्टे बाज़ी करना शुरू कर दें।


सुनीता शानू

Thursday, October 30, 2008

बीड़ी कहाँ जलइले!

अमर उजाला पर प्रकाशित एक व्यंग्य


सार्वजनिक स्थानों पर स्मोकिंग पर प्रतिबंध लगते ही सिगरेट पीने वालों के सिर पर पहाड़ टूट पड़ा है। ऑफिस में स्मोकिंग जोन नहीं है, और बाहर सिगरेट पीने पर पुलिस पकड़ लेगी। एक मशहूर फिल्म में देव आनंद साहब सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए गाना गाते हैं, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया। वह फिल्म देखकर हर सिगरेट पीने वाला खुशी-खुशी सिगरेट का कश भरता और अपने चारों तरफ धुएं का गुबार छोड़ता हुआ यही गुनगुनाता था। यह और बात है कि कुछ महीनों या सालों के बाद न वह रहता और न उसकी परेशानियां।
कई चेन स्मोकर सिगरेट ऐसे पीते हैं, जैसे सांस उस पाइप से ही आ-जा रही हों। एक सज्जन ने सिगरेट का अंगरेजी में संधि-विच्छेद करते हुए इसे शी ग्रेट कहा, तो मुझे इसका धुआं उड़ाए बिना ही चक्कर आने लगा। सिगरेट सचमुच तुम कितनी महान हो। ऊंचे लोगों की ऊंची पसंद हो। ऊंची पसंद से याद आया। हमारे स्वास्थ्य मंत्री अंबूमणि रामदास की नजर अब तंबाकू पर भी पड़ गई है। ऐसे में, वह यूपी-बिहार से कोई पंगा तो नहीं ले रहे? एक फिल्म में अमिताभ बच्चन पर गाना फिल्माया गया था, अस्सी चुटकी नेब्बे ताल, रगड़ के खैनी मुंह में डाल, फिर खैनी का देख कमाल। अब ये कमाल देखने के लिए तो खैनी को मुंह में डालना ही होगा न? और सबसे बड़ी बात यह कि जो अमिताभ भैया के फैन चारों तरफ टंगे हुए हैं, वे तो ऐसा करेंगे ही।
कुछ लोग अपने बच्चों से सिगरेट मंगवाते हैं। ऐसे बच्चे आंखें बचाकर कभी-कभी खुद भी एकाध कश खींच ही लेते हैं। उन्हें लगता है, इस तरह वे जल्दी ही बड़े बन जाएंगे। और तो और, सीधे-सादे और संजीदा लगने वाले गुलजार साहब के भी मन में न जाने क्या बात आई कि उन्होंने बीड़ी सुलगाई। अब बच्चे भी गाने लगे हैं, बीड़ी जलइले...जिगर से पिया, जिगर मा बड़ी आग है। अब इन बच्चों के जिगर की आग बुझाने के लिए स्वास्थ्य मंत्री को कोई न कोई कानून बनाना ही होगा।
कल मैंने सिगरेट के लगातार कश लगाते एक ट्रैफिक पुलिस के जवान को देखकर पूछा, आप क्यों परेशान हैं? सिगरेट पीने वालों को कैसे पकड़ेंगे, क्या यही सोच रहे हैं? उसने कहा, नहीं जी, मैं तो यह सोचकर परेशान हूं कि अब सिगरेट कैसे और कहां पी जाएगी?
पान की दुकान पर कांटे फिल्म का गाना बज रहा था, सिगरेट के धुएं का छल्ला बना के, सोचना है क्या, जो होना है होगा, चल पड़े है फिक्र यार, धुएं में उड़ा के।अब सरकार को तो फिक्र है अपने नागरिकों के सेहत की, सो उसने इस तरह के धुएं को गैरकानूनी बता दिया है।
कई लोग पूछते हैं, सिगरेट, बीड़ी, तंबाकू बनाने वाली कंपनियां कब तक बंद होंगी? बंद किसलिए भैया? असली मुनाफा तो नशे से ही होता है। इसका मजा ही कुछ और है। एक बार पीकर तो देखो। सारी फिक्र भूल जाओगे।

सुनीता शानू

बम तू कहाँ नहीं...

कुछ समय पहले लिखा हुआ एवं प्रकाशित

"बीबी जी कल से मै काम पर नही आ पाऊँगी", क्यों ? क्या हुआ! मैने कामवाली से पूछा' वह बोली, आप देख नही न रही हैं, रोज टी.वी.पर बतला रहे हैं, रोज धमाका होत है, बा पुलिसवा को आप रोजही देख रहीन, किसी की तलाशी न लेत है, मुआ रोज गुटखा खात रहे, हमरी तलाशी लेना तो दूर हमको देखबे भी न है, कहो तो किसके भरोसे रहे हम दिल्ली मा, हम कौनो जान-माल का खतरा न लेबे, हम गाँव चले जाईबे...
सचमुच ठीक तो कह रही है यह, किसके भरोसे रहें दिल्ली में? मैने कहा, "पागल है क्या तेरा ही घर मिला है बम विस्फ़ोट के लिये, तू क्या कलाम या क्रिकेटर की श्रेणी में आती है? या तेरा घर संसद भवन में है" वो बोली, "बीबी जी आतंकवादियों का कोई दीन-ईमान नही होत, और फ़िर क्या बम पर कौन्हू नाम लिखा होता है, और खबर जे है कि इस धमाकें में कुछ छोटे बच्चन कै बम लिपटाईके धमाका होत है, मैने कहा "अरे घबरा मत हमारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जी ने अश्वासन दिया है, कि वो आतंकवादियों को बड़ी से बड़ी सजा दिलायेंगें, जल्द ही आतंकवादी भी पकड़े ही जायेंगे".
मैने उसे आश्वासन तो दे दिया, किन्तु एक ही चिन्ता सताती रही , क्या सचमुच कभी इसका अन्त होगा? घबराकर मैने टीवी चालू किया, छब्बीस मिनिट में पाँच धमाके, बैंगलूर और अहमदाबाद के बाद अब दिल्ली दहल उठी, पाँच बम फ़टे व चार निष्क्रिय कर दिये गये, करोल बाग,कनॉट प्लेस ,ग्रेटर कैलास में बम ब्लास्ट से 24 की मौत 100 घायल, हाई अलर्ट के बावजूद पुलिस की लापरवाही, ओह ! खबरे तो घर बैठे ही बम विस्फ़ोट कर रही हैं, आदमी इतना दहशत में आ जाता है कि बचाव की बात सोचने कि बजाय भागना ही पसंद करता है, देख कर दिल घबराने लगा, मैने कामवाली की तरफ़ देखा सचमुच वो बुरी तरह से डर गई थी, ऎसी दिल दहला देने वाली खबरें देख कर कौन नही दहशत में आ जायेगा , किन्तु क्या यही सिलसिला बार-बार नही चलता, क्या ऐसा ही हर बार नही होता है कितनी बार बम फ़टते है सब काम-धाम छोड़ मंत्री जी विदेश दौरे पर निकलते हैं, प्रधान मंत्री, गृह मंत्री, और कई राज नेता घटना स्थल का दौरा करते हैं, और मरने वालो के परिवारों की आर्थिक सहायता करने का आश्वासन देते हैं, तीन दिन तक पुलिस अलर्ट होती है फ़िर सब कुछ जैसे का तैसा और फ़िर इन्तजार होता है अगले बम ब्लास्ट का...सब कुछ फ़िल्मी फ़ंडा, एसा तो फ़िल्मों में मिलता है देखने को, लगता है फ़िल्में आजकल रीएलिटी शो बन गई है, आतंकवादी पहले फ़िल्म देखते है फ़िर एक्शन लेते है हाल ही में आई फ़िल्म कान्ट्रेक्ट में भी ऐसा ही बम विस्फ़ोट दिखाया गया है जैसा कि अहमदाबाद में किया गया, लो जी आतंकवादी भी फ़िल्म देखने लग गये, अगर यूँ ही सिलसिलेवार विस्फ़ोट होते रहें, तो एक दिन सामने खड़े आदमी पर भी शक होने लग जायेगा कि यह मानव बम तो नही? घर आये मेहमान के झोले में आर.डी.एक्स तो नही? होटलों में लगे सी सी कैमरे क्या बाथरूम की भी शोभा बढ़ायेंगे? लगता है इन शहरों से तो गाँव ही ठीक है, सोचती हूँ...गाँव ही चली जाऊँ.

सुनीता शानू

Friday, September 5, 2008

गुनाहगारों की रिएलिटी एक व्यंग्य...

हिंदी मीडिया पर प्रकाशित

बिग बॉस बड़ा अच्छा शो है, एक साथ इतने सारे अजनबी लोगो का साथ-साथ परिवार की तरह रहना, वाह मज़ा आ गया! श्रीमान जी चहक कर बोले

अजनबी!! सबको तो जानते हो, नया कौन है भला ? ये अहसान कुरैशी कितनी बार कविता सुना-सुना कर हँसाता रहा है सबको। और रेवती बहन आ रा रा रा इसे नही पहचानते, सास भी कभी बहू में थी न, और ये राहुल महाजन जाने कब तक इस पर मुकदमा चलता रहा और टी वी पर दिखाते रहें हैं, मोनिका बेदी भी चेहरा छुपा-छुपा टीवी पर रोती रही है, श्रीमती जी ने अचूक बाण फ़ेंका।

हाँ-हाँ ठीक है बाबा! परन्तु अलग-अलग जगहों से आये लोगों को अजनबी ही तो कहेंगें, इसमें कुछ गलत नही है, तुम्हे तो बेकार कमी निकालने की आदत है,इनमें से कोई सेलिब्रिटी तुम्हें मिल जाता न तो तुम झट सारी बातें भूल कर कह रही होती ऑटोग्राफ़ प्लीज, काश मै भी जा पाता, इस रियलिटी शो में।

हुँह मै सबकी तरह मूर्ख नही हूँ और रियलिटी शो किसे कह रहे है आप? कोरी बकवास है यह, पर्दे पर और वह भी जब इंसान को पता है कि उसे कैमरे से देखा जा रहा है, उसकी हर गति-विधि पर पूरी नजर रखी जा रही है,क्या वह अपनी असली जिन्दगी जी पायेगा, क्या सचमुच इसे रियलिटी शो कहा जायेगा? श्रीमती जी तैश में आ गई।

और नही तो क्या पुलिस भी तो पूरी मुस्तैदी से बिग बॉस पर नजरे गढ़ाए हुए है, मोनिका बेदी और राहुल महाजन की सारी गतिबिधि देख रही है पुलिस। क्या पता कोई सुराग हाथ लग जाये।वाह रे मेरे देश की भोली-भाली पुलिस, अभी देखना मोनिका बेदी डॉन के बारे में सब कुछ बता ही देगी, और हाँ राहुल महाजन भी शायद अपने गुनाह यहीं कबूल करेगा। आप भी न कितने भोले हैं, जानते नही टी वी के पर्दे पर सब नाटक है सच्चाई नही। कह कर श्रीमती जी ने टी वी बंद कर दिया गया।

अरे! ,मुझे तो देखने दो! तुम्हे पसंद नही तो मत देखना। मुझे तो अच्छा लग रहा है, कैसे एक साथ रहेंगे सबके सब, कम से कम यह बात एकता की भावना ही पैदा करती है। तुम तो एकता कपूर के नाटक देख-देख कर नारी सशक्तीकरण के उपाय ढूँढती रहती हो बस, श्रीमान जी गुस्से मे झल्लाए।

तो क्या हुआ, आप क्या बच पायेंगे एकताजी से, एकता कपूर अपने भाई तुषार कपूर के साथ आ रही है बिग बॉस में,अब नया फ़ंडा होने वाला है, चलो अच्छा है एकता जी की लाईफ़ की रियलिटी भी पता चल जायेगी, कैसे वो इतने सारे सीरियल एक साथ बना पाती हैं,अच्छा सुनो ! मोनिका बेदी की शक्ल देख कर तो बहुत मासूम नजर आती है, मुझे तो इस बेचारी पर तरस आता है, शायद यह सच ही कह रही है, इसको पता नही होगा कि जिससे यह प्यार करती है, वह अंडरवर्ड का सरगना है। सुना है डॉन मोनिका को टीवी पर देख कर और बेचैन हो गया है, अब तो कुछ न कुछ जरूर पुलिस के हाथ लग ही जायेगा, कहकर श्रीमान जी मुस्कुराये।

बस ! यही एक कसर बाकी थी, अब इस एक टीवी शो को देख कर आपने कह दिया की मोनिका अपराधी नही हालात की शिकार होगी, थोड़ी देर में कहोगे की राहुल महाजन भी बेगुनाह है, क्या अब सजा-याफ़्ता मुजरिम भी वी आई पी कहे जायेंगे? अगर आधी से ज्यादा जनता यही सोचने लगी तो जानते हैं क्या होगा, टी वी सीरियल ही अदालत का रूप इख्तियार कर लेंगें, और पुलिस अपराधी को पकड़ने के लिये सब काम-धाम छोड़ टीवी पर नजरे गढ़ाए बैठी रहेगी, और अपराधी मज़े से चैनल की शोभा बढ़ा रहे होंगें।

Tuesday, September 2, 2008

हर चैनल पर चीर हरण

हिन्दी-मीडिया पर प्रकाशित

ऎ गणपत चल दारू ला, क्या परोस रहे हैं हम और आप अपने बच्चों को" एक टी वी चैनल पर रामायण का विज्ञापन दिखाया जाता है, कि आईये हम अपने बच्चों का भविष्य संवारें, परन्तु जैसे ही रामायण शुरू होती है बच्चे मुँह बना उठ खड़े होते है और वहाँ स्थान ले लेते हैं घर के बड़े-बुजुर्ग। चलिये एक फ़ायदा तो हुआ, अब सास-बहू के झगड़ो से हट कर धर्म-कर्म ही शुरू हो जायेगा।किन्तु यह क्या? जैसे ही कहानी घर घर की के ओम और पार्वती का किरदार निभाने वाले कलाकार महाभारत मे शान्तनु और गंगा के रूप में नजर आये, घर में खलबली मच गई, "अरे! देखो ओम कैसा लग रहा है", और महाभारत छोड़ बात चल निकली "कहानी घर-घर की" की। इतने में एक और कलाकार नजर आये बड़े जोश के साथ जँच तो बहुत रहे थे मगर फ़िर वही जाने-पहचाने मि।बजाज, उर्फ़ मिहिर उर्फ़ भीष्म को देखते ही दादी बोली लो मिहिर भी आ गया है भीष्म बन के, अब इसमें तुलसी या मन्दिरा की दाल नही गलने वाली, भीष्म तो ब्रह्मचारी थे भैया", यहाँ भी वो महाभारत को महाभारत के रूप में देखती, मगर शुरू हो गई "सास भी कभी बहू थी", बच्चों ने कहा, "दादी कोई फ़ायदा नही, एकता कपूर के सीरियल है। यह आप दूसरे चैनल पर द्रौपदी देखिये। कम से कम सास-बहू पुराण तो खत्म होगा", तो चैनल बदल दिया गया, उस पर दौपदी चीर-हरण दिखाया जा रहा था। अब उसे देख कर फ़िर आक्रोश फ़ैल गया पाँच-पाँच पति हैं, फ़िर भी ये मुआ दुर्योधन चीर-हरण कर रहा है, अब भगवान ही बचायेंगे, काफ़ी जद्दोजेहद के बाद भगवान कृष्ण ने द्रौपदी की साड़ी बढ़ाई और दादी हाथ जोड आँखों में आंसू भरकर बोली, "हे भगवान तेरे यहाँ देर है अंधेर नही, जैसी लाज तूने द्रौपदी की बचाई सबकी बचाना", उनका ये रोना बच्चों से सहन नही हुआ और चैनल फ़िर बदल दिया गया, इस चैनल पर शूर्पनखा संवाद चल रहा था, शूर्पनखा के अति न्यूनतम वस्त्र और बाकी जगह टैटू देख बच्चों ने दादी से पूछा, "दादी क्या उस समय भी टैटू का रिवाज था? अब दादी परेशान ये टैटू क्या बीमारी है भाई, मगर बच्चे चुप रहने को तैयार ही नहीं, पहले बताओ सही क्या है? अबके दादी दुःखी हो गई बोली, "चैनल बदल दो"। चैनल बदलने का सिलसिला लगातार चलता रहा, चारों दिशाओं में महात्माओं की जयजयकार हो रही थी,खबरों के चैनल पर हमने मन्दिर, मस्ज़िद, गुरूद्वारा और गिरिजाघर देख डाले, कोई भी चैनल ऎसा नजर नही आया जहाँ धर्म और आस्था की बात न दिखाई गई हो, जैसे की जीतने की होड़ लगी हो, बहुत देर से देखते-देखते आँख-कान पक गये, दादी को अकेला छोड़ सब जाने लगे,मैने कहा "एक काम करो खबर देखा करो देश में क्या हो रहा है",बच्चों ने तुरंत खबरी चैनल लगाना शुरू किया, पहले चैनल पर आ रहा था, प्रभु-दर्शन, दूसरे चैनल पर नजर आया, गुरूवाणी, फ़िर चैनल बदला तो देखा एक ज्योतिषी कह रहे थे, तुलसी की माला लेकर आराधना करें शनि को दूर भगायें, कहीं योगाचार्य जी लगे थे योग सिखाने और कहीं ईसा मसीह का उपदेश दिया जा रहा था,मैने हार कर कहा, "अरे वो लगाओ जो सर्वश्रेष्ठ चैनल है, बड़ा ही तेज चैनल है। चैनल बदलते ही नजर आया दुनियां का सर्वश्रेष्ठ चैनल और चैनल पर नजर आये एक महात्मा, जो बैठे प्रवचन दे रहे थे,सचमुच बड़ा ही तेज़ चैनल है यह तो सबके साथ इसका भी रंग बदल गया। क्या करें? क्या देखें? कुछ भी तो नया नही, एक टी वी चैनल ने तो हद ही पार कर दी, जब यह दिखाया गया कि २१ दिसम्बर २०१२ को शुरू होगा प्रलय का दिन कुछ भी नही बचेगा सब कुछ नष्ट हो जायेगा, सिर्फ़ चार साल बचे है, हमारी जिन्दगी के, यह माया सभ्यता के लोगो ने भविष्यवाणी की थी और आज केरल के हिन्दू धर्मगुरू ने भी यह दावे के साथ कह दिया है कि कलियुग अब खत्म हो जायेगा। सुनकर सभी दहशत में आ गये, दादी फ़टाफ़ट माला उठा लाई और राम-राम भजने लगी, हम सोच में पड़ गये क्या इन टी। वी। चैनलो ने जिम्मा ले लिया है, लोगो में दहशत फ़ैलाने का, कभी बम-काण्ड, कभी प्रकृति का कहर, तो कभी बलात्कार, सभी कुछ सनसनी खेज, यूं फ़िल्माया जाता है जैसे कि बैठा हुआ व्यक्ति यह सब खुद के ऊपर महसूस करता है, सबका मन कड़वा हो गया। ऎसा लगा हम अपना कीमती वक्त क्यों बरबाद कर रहे है, मगर तभी नन्हा बेटा आया और चैनल बदल दिया, "टॉम ऎण्ड जेरी" और सभी देखने लगे सब कुछ भूल कर, बच्चों का यह कार्टून सीरियल सचमुच बहुत अच्छा लगा, न कोई डर, न कोई भय, न ही कुछ सोचने की जरूरत।बेटा बोला, "देथा आपने छबछे अच्छा मेला चैनल, ओल आप मुझे देथने भी नई देले थे" उसकी मासूम तोतली आवाज सुनकर सबको हँसी आ गई, सचमुच दहशत की इस भीड़ में अगर कुछ हँसने जीने की तमन्ना नजर आई तो लगा बचपन से बेहतर कुछ भी नही, जिसे देख दादी को भी हँसी आ गई, और नासमझ, भोले नादान,दीन-दुनिया से बेखबर बच्चे गाने लगे, ऎ गणपत चल दारू ला।

Wednesday, July 30, 2008

सबसे सुखी गरीब

अमर उजाला के तीर-ए-नजर में प्रकाशित एक व्यंग्य प्रस्तुत है...

महंगाई जब आती है, अमीरों के सिर चढ़ जाती है, मिडिल क्लास फ़ैमिली को मुँह चिढ़ाती है, परन्तु गरीबी के पेड़ की एक डाल भी हिला नही पाती... वो कल भी तरसते थे रोटी को और रोटी आज भी गरीब को भाव दिखाती है... गरीब ये कह कर निजात पाता है, 'बड़े लोगो की बड़ी-बड़ी बातें, हम तो इसमें ही सुखी हैं'... लेकिन पिसती रहती है मिडिल क्लास फ़ैमिली , गरीब कहे जाने को तैयार नही इज्जत खराब होगी, और अमीरी के चक्कर में न जाने कितनी बार जलील होना पड़ता है, भाव-ताव, जोड़-तोड़ कर-कराके बमुश्किल घर का खर्च अमीर की तरह चला पाते हैं सारी भड़ास निकलती है महँगाई पर, दोनो की लड़ाई बराबर होती है...
अमीरों को महगांई बड़ी खूबसूरत लगती है, कटी-फ़टी ड्रेस हजारों रूपये की खरीदते है, जबकी गरीब कटी-फ़टी ड्रेस में अपनी गरीबी छुपाने की कोशिश करता है, और उसी ड्रेस को मिडिल फ़ैमिली के पहनते ही अश्लील कहा जाता है... और फ़िर लगता है पटरी छाप कपड़ों पर बड़ी कम्पनियों का नकली लेबल...जिसे खरीद कर मिडिल फ़ैमिली अपने-आप को अमीर महसूस कर पाती है,...अपनी झूठी शान-शौकत के चलते ये चेहरे अमीरों की भीड़ मे आसानी से पकड़ भी लिये जाते हैं,...हद से ज्यादा टपकती हँसी अथवा सहमापन यह बता देता है कि अभी-अभी महँगाई ने इन्हे किस कदर निचौड़ा है।
महंगाई के चलते अपनी शादी को यादगार बनाने के लिये अमीर तरह-तरह की अजीबो-गरीब हरकतें भी करते रहते हैं, कभी आसमान में शादी, तो कभी पानी के अन्दर, और अब तो सुनने में आता है दूल्हा हेलिकाप्टर से उतरता है और दुल्हन गुब्बारे से, चाहे लाईसेंस हो या न हो,... इन शादियों में कई लाखों रूपये सिर्फ़ कूदने-फ़ाँदने में ही खर्च हो जाते है...हाल ही में एक दूल्हे मियाँ ७००० फ़ीट की ऊँचाई से कूद कर मंडप मे पधारे, जैसे कि कह रहे हों अगर बच गया तो इस शादी के मौके को हमेशा याद रखूँगा, और अगर न बच पाया तो तुम सब याद रखोगे मेरी कुर्बानी...जैसे कि देश के लिये शहीद हुआ जा रहा हो... मिडिल क्लास फ़ैमिली की शादी की जो महँगाई के साथ होती है, अपने बूते से बाहर दहेज देने पर भी दुल्हन के पिता की पगड़ी सरे-आम उड़ा दी जाती है, दहेज की बलिवेदी पर बैठी दुल्हन या तो जला दी जाती है या छोड़ दी जाती है,
सबसे सुखी है गरीब आदमी कभी घोड़ी नही,कभी बैंड-बाजा नही तो कभी बराती नही दुनियां को शादी का पता भी नही चलता और शादी हो जाती है...
एकदिन महँगाई मुझसे टकराई मैने पूछा उससे," ईश्वर ने जब इन्सान को बनाने में भेदभाव नही किया तू क्यों भाई-भाई के बीच दूरी बनाती है, तेरा आना ही समाज में दंगे फ़ैलाता है, गरीब और गरीब अमीर और अमीर होता जाता है,..वो बोली सबको अपना नाम चाहिये, कुर्सी चाहिये अगर सबके सब टाटा,बिड़ला और मुकेश अम्बानी बन जायेंगे तो मुझको कहाँ पायेंगे... मत भूलिये मेरे आने से ही देश में इंकलाब आता है मै अगर चली गई,तो देश में बाकी क्या बच जायेगा...भूख से कोई मरेगा नही, बिमारी से कोई डरेगा नही...बरसों से गरीब इतना भूखा है कि सब कुछ खाकर भी उसका पेट भर नही पायेगा...और देश में अकाल पड़ जायेगा..."

सुनीता शानू

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http://www.amarujala.com/today/editnews.asp?edit=27c1.asp