Thursday, October 30, 2008

बम तू कहाँ नहीं...

कुछ समय पहले लिखा हुआ एवं प्रकाशित

"बीबी जी कल से मै काम पर नही आ पाऊँगी", क्यों ? क्या हुआ! मैने कामवाली से पूछा' वह बोली, आप देख नही न रही हैं, रोज टी.वी.पर बतला रहे हैं, रोज धमाका होत है, बा पुलिसवा को आप रोजही देख रहीन, किसी की तलाशी न लेत है, मुआ रोज गुटखा खात रहे, हमरी तलाशी लेना तो दूर हमको देखबे भी न है, कहो तो किसके भरोसे रहे हम दिल्ली मा, हम कौनो जान-माल का खतरा न लेबे, हम गाँव चले जाईबे...
सचमुच ठीक तो कह रही है यह, किसके भरोसे रहें दिल्ली में? मैने कहा, "पागल है क्या तेरा ही घर मिला है बम विस्फ़ोट के लिये, तू क्या कलाम या क्रिकेटर की श्रेणी में आती है? या तेरा घर संसद भवन में है" वो बोली, "बीबी जी आतंकवादियों का कोई दीन-ईमान नही होत, और फ़िर क्या बम पर कौन्हू नाम लिखा होता है, और खबर जे है कि इस धमाकें में कुछ छोटे बच्चन कै बम लिपटाईके धमाका होत है, मैने कहा "अरे घबरा मत हमारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जी ने अश्वासन दिया है, कि वो आतंकवादियों को बड़ी से बड़ी सजा दिलायेंगें, जल्द ही आतंकवादी भी पकड़े ही जायेंगे".
मैने उसे आश्वासन तो दे दिया, किन्तु एक ही चिन्ता सताती रही , क्या सचमुच कभी इसका अन्त होगा? घबराकर मैने टीवी चालू किया, छब्बीस मिनिट में पाँच धमाके, बैंगलूर और अहमदाबाद के बाद अब दिल्ली दहल उठी, पाँच बम फ़टे व चार निष्क्रिय कर दिये गये, करोल बाग,कनॉट प्लेस ,ग्रेटर कैलास में बम ब्लास्ट से 24 की मौत 100 घायल, हाई अलर्ट के बावजूद पुलिस की लापरवाही, ओह ! खबरे तो घर बैठे ही बम विस्फ़ोट कर रही हैं, आदमी इतना दहशत में आ जाता है कि बचाव की बात सोचने कि बजाय भागना ही पसंद करता है, देख कर दिल घबराने लगा, मैने कामवाली की तरफ़ देखा सचमुच वो बुरी तरह से डर गई थी, ऎसी दिल दहला देने वाली खबरें देख कर कौन नही दहशत में आ जायेगा , किन्तु क्या यही सिलसिला बार-बार नही चलता, क्या ऐसा ही हर बार नही होता है कितनी बार बम फ़टते है सब काम-धाम छोड़ मंत्री जी विदेश दौरे पर निकलते हैं, प्रधान मंत्री, गृह मंत्री, और कई राज नेता घटना स्थल का दौरा करते हैं, और मरने वालो के परिवारों की आर्थिक सहायता करने का आश्वासन देते हैं, तीन दिन तक पुलिस अलर्ट होती है फ़िर सब कुछ जैसे का तैसा और फ़िर इन्तजार होता है अगले बम ब्लास्ट का...सब कुछ फ़िल्मी फ़ंडा, एसा तो फ़िल्मों में मिलता है देखने को, लगता है फ़िल्में आजकल रीएलिटी शो बन गई है, आतंकवादी पहले फ़िल्म देखते है फ़िर एक्शन लेते है हाल ही में आई फ़िल्म कान्ट्रेक्ट में भी ऐसा ही बम विस्फ़ोट दिखाया गया है जैसा कि अहमदाबाद में किया गया, लो जी आतंकवादी भी फ़िल्म देखने लग गये, अगर यूँ ही सिलसिलेवार विस्फ़ोट होते रहें, तो एक दिन सामने खड़े आदमी पर भी शक होने लग जायेगा कि यह मानव बम तो नही? घर आये मेहमान के झोले में आर.डी.एक्स तो नही? होटलों में लगे सी सी कैमरे क्या बाथरूम की भी शोभा बढ़ायेंगे? लगता है इन शहरों से तो गाँव ही ठीक है, सोचती हूँ...गाँव ही चली जाऊँ.

सुनीता शानू

2 comments:

  1. वैसे तो मजबूरी न हो तो गाँव चले जाने से बेहतर कोई ऑप्शन भी नहीं. बढ़िया आलेख, बधाई!!

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