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Thursday, April 12, 2012

जब चाहा इस्तेमाल किया जब चाहा फ़ेंक दिया वाह!



जब चाहा इस्तेमाल किया जब चाहा फ़ेंक दिया। क्या है यह सब? मै समझ नही पाती हूँ। जब भी किसी ने पुरूष के खिलाफ़ एक शब्द भी लिखा, उसका विरोध किया गया। स्त्री-विमर्श से जोड़ दिया गया। पुरूषों ने ही नही खुद औरत ने भी किया। हाँ पुरूष मेरे पिता भी है मेरा बेटा भी है। लेकिन यहाँ बात एक ही पुरूष की नही हो रही सम्पूर्ण पुरूष वर्ग की है।

कुछ दिनों से मन आहत है मै पूछना चाहती हूँ क्या पुरूष के लिये स्त्री मात्र खिलौना है बस एक खिलौना। पुरूष कहता है स्त्री पुरूष को खिलौना समझती है उल्टे-सीधे कपड़े पहन पुरूषों को भड़काती हैं, स्त्रीयाँ मेक अप भी पुरूष के लिये करती है स्त्री अपने अंगों का प्रदर्शन करती है तो बेचारे पुरूष का क्या दोष जो बलात्कार हो। तो कृपया ऎसा पुरूष वर्ग ये बताने की जहमत करेगा कि छोटी सी नन्ही बच्ची क्यों बलात्कार का शिकार होती है?

कभी-कभी ईश्वर से भी शिकायत होती है कि उसने भी स्त्री के साथ बेईंसाफ़ी की है। क्यों नही उसे ऎसा कोई हथियार सौपां जिससे वो जब चाहे जितने चाहे पुरुषों का सामना कर सके। बलात्कार का शिकार होने से बच सके। अरे बिल्ली तक अपने बचाव में झप्पटा मार खुद को बचा लेती है। तो नन्ही सी बच्ची हो या औरत खुद को बचा क्यों नही पाती।

सदियों से देखती हूँ कभी तुलसीदास जी ने कहा तो कभी चाणक्य ने ऎसा लिखा कितने ही महापुरूषों का हवाला दे देकर लेखकों ने भी औरत का ही तिरस्कार किया। जबकि सच यह है पुरूष आजतक औरत को समझ ही नही पाया। आज एक लेख में पढ़ा चाणक्य ने कहा चंचल स्त्री का विश्वास मत करों तो क्या चंचल पुरूष विश्वास के काबिल है?

पुरूष का प्रेम क्या स्त्री के शरीर तक सीमित है? क्यों औरत इक पहेली बन कर रह जाती है। सुंदर, गोरा, छरहरा, बदन ही पैमाना रह गया खूबसूरती का। और जैसे ही औरत पुरूष के पैमाने पर खरी नही उतरती वो तलाश करता है एक और नई औरत की। मुझे लगता है औरत नही पुरूष को बदलना होगा अपनी मानसिकता को।

सबसे खूबसूरत औरत तब लगती है जब एक नन्हा मासूम उसकी छाती से लिपट दूध पीता है और वो उसे बड़े प्यार से निहारती है। औरत की खूबसूरती का पैमाना उसका सुन्दर शरीर नही वरन उसकी सुंदर आत्मा होती है जो परिवार के हर रिश्ते को जोड़ कर रखती है। मेरी नज़र में सबसे खूबसूरत मेरी माँ है उनकी बूढ़ी काया अधकचरे सफ़ेद बाल चेहरे की झुरियों के पीछे छिपी मुस्कान मुझे एहसास दिलाती है कि औरत की खूबसूरती उसकी चाहत में है। चाहत जो इंसान को इंसान से जोड़ती है। चाहत जो संसार बसाती है। वृक्ष की भाँती हर शाख का पोषण करती है।

कितना लिखा जाये? जितना लिखूंगी बहुत कम है। यह भी सच है जब-जब औरत ने अपनी ज़रूरतों को अपने प्रेम का विश्लेषण किया है पुरूष ने बेहया शब्द इस्तेमाल किया है। और ये शीलवान संस्कार वान पुरूष गालियों में भी औरत का ही प्रयोग करते है चाहे वो माँ हो या बहन या बेटी।


Monday, April 9, 2012

ब्लॉग इन मीडिया गर न देखा तो न मालूम कहाँ छप गये...

ये जो पाबला जी हैं सचमुच डिफ़्रेंट ही हैं। कभी-कभी दिल कहता है इनका नाम करमचंद जासूस रख दूँ। मगर डर लगता है डर पाबला जी से नही उनसे पंगा लेने से लगता है। अब आप कहेंगे की सबसे पंगा ले सकती हैं पाबला जी से नही तो यह भी एक रहस्य वाली बात है आजमाना चाहते हैं तो बस जरा सा काम कीजिये उन्हे हल्लो कह हाथ मिलाईये बस.... मैने ...न न न मैने भाई साहब से पंगा लिया  ही नही। यह तो मन पखेरू फ़िर उड़ चला का पंगा था जो हमेशा हर जगह उड़ जाता है।
अब देखिये ब्लॉग इन मीडिया पर की मन पखेरू कहाँ उड़ा...

बहुत- बहुत शुक्रिया पाबला जी।






Thursday, March 1, 2012

हमारी प्रयोगशाला और श्वेत मूषक



मनुष्य जो एक सामाजिक प्राणी है,यानि की सोशियल एनिमल जिसे की सामाजिक जानवर कहें तो भी कुछ गलत नही। अंग्रेजी भाषा का अनुवाद हम अपनी मातृ भाषा मे चाहे जैसे करें,यह हमारी विचारधारा है भई। तो बात आती है मनुष्य के दुर्लभ प्रयोगों की। एक समय था जब मरे हुए जानवर या आदमी के शरीर की ही चीर-फ़ाड़ करके नये-नये प्रयोग किये जाते थे। और तो और स्कूल में भी बेहोश कॉक्रोच, चूहों व मेढ़को पर बच्चों द्वारा प्रयोग किये जाते थे। किन्तु आज हालत यह है कि आदमी के प्रयोगों का शिकार सभी जानवर हो रहे हैं। जानवरों पर  प्रयोग कर-कर के ही मनुष्य जान पाया है कि खुद कैसे ज्यादा दिनो तक निरोग रह सकता है व किस रोग में क्या खायें? व किस चीज की अधिकता से कौनसा रोग हो जाता है।


अब इसी रिपोर्ट से देखिये की वैज्ञानिकों ने ७६ रीहसस बंदरो पर प्रयोग करके पता लगाया की कम कैलोरी वाला भोजन करने से मनुष्य ज्यादा दिन तक जीवित रह पायेगा।कम कैलोरी वाला भोजन जब बंदरों को दिया तो वैज्ञानिको को पता चला की इससे न कैंसर होगा न दिल की बीमारी।बात ठीक भी है वानर हमारे वंशज थे तो सिमिलरिटीज तो होंगी ही न। किन्तु कुते, बिल्ली, चूहों के वंश में हम कब आये याद नही आ रहा।न ही इसकी कोई पौराणिक कथा है न ही शोधग्रंथ। बाहर के देशों में तकरिबन १.२ करोड़ जानवरों का प्रयोग हर साल किया जाता है। अब चाहे बर्ड फ़्लू हो या स्वाईन फ़्लू जानवरों पर टीके लगा-लगा कर प्रयोग किया जाता है फ़िर जाकर पता चलता है कि मनुष्य रूपी जानवर को कौनसा टीका लगाया जाये? वैसे तो मनुष्य सबसे स्वार्थी प्राणी है, जब भी करता है प्रयोग दूसरों पर ही करता है।


हम महिलायें भी वैसे किसी शोधकर्ता से कम नही हैं। जब देखो हम भी अपनी रसोई नामक प्रयोगशाला में पति पर प्रयोग करती ही रहती हैं। और बेचारे पतिदेव उन्हे क्या कहिये श्वेत मूषक बने हमारी नित नई रेसिपीज का स्वाद चखते रहते हैं। अब स्वादु हो या बेस्वादु प्रयोग तो प्रयोग ठहरा न।


चलो माना हमसे बच भी जाये मगर आजकल के डॉक्टर मरीज़ का बार-बार सिरींज में ब्लड लेकर टैस्ट करते रहते है कि मरीज को ऎसी कौनसी बीमारी बताई जाये,जो लम्बी हो और जिसके लक्षण भी दिखायें जा सके। और जब कोई बीमारी न निकले तो डॉक्टर का बिल देख कर मरीज को हर्ट की बीमारी होने का डर तो लगा ही रहता है।


सुनने में आया है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने डीडी असिस्ट नामक ऎसा सॉफ़्टवेयर बनाया है जिस पर दवाओं का शोध किया जा सकेगा।जिससे बेचारे जानवर तो बच ही सकेंगे। किन्तु फ़िर भी बेचारे पतिदेव मूषक बनने से बच नही पायेंगे। बचेंगे भी कैसे यह नारी जाति की प्रयोगशाला है सरकारी नही।


सुनीता शानू

Tuesday, August 2, 2011

बच के रहना रे बाबा बच के रहना तुझ पे नज़र है...



बाल ब्रह्मचारी मै हूँ कन्या कुँवारी...तेरे मन में प्रीत का रंग भर दूँ आज तपस्या भँग कर दूँ..:)


यह नवभारत ब्लॉग पर पोस्ट की थी। आज अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर रही हूँ जो लोग नही पढ़ पाये उनके लिये। शुक्रिया।
आज सुबह से हमारे शर्मा जी एक ही धुन गा रहे है। राखी बदनाम हुई बाबा तेरे लिये। समझ नही आया राखी तो पहले से ही बदनाम है, तो किसी बाबा पर इल्जाम क्यों लगाया जा रहा है। आखिर पूछना तो पड़ेगा ही न। -“अरे भई शर्मा जी राखी तो पहले ही से बदनाम हुई गई। आप बाबा को काहे लपेट रहे हो जी।“ शर्मा जी मुस्कुराये और बोले,”अरे मुनिया की अम्मा इस मुई पब्लिक ने हमार मुनिया का नाम बहुतहीं बदनाम कर दिये अब मौका मिलई गय तो गाने में से मुनियां को निकाल इस ससुरी राखी को घुसाई दे रहे हैं। पहलई ही से बदनाम है और का बदनाम होयेबे।“ बात तो ठीक है जो पहले से ही बदनाम है, उसका और क्या बदनाम होना। और फ़िर गाने से मुन्नी तो निकल जायेगी कम से कम। इस गाने की वजह से पहले ही कई मुन्नियों का बाहर निकलना मुश्किल हो गया था।


राखी को आखिर क्या ऊल-जुलूल सूझता रहता है? कल तक तो बाबा को भ्रष्ट बता रही थी, बाबा के अनशन को बाबा की नौटंकी बता रही थी। अचानक इतनी मेहरबान कि बाबा से शादी करने को तड़प रही है। कारण कुछ भी हो बाबा की तो हो गई “मौजा ही मौजा”। वैसे बाबा भी कम नौंटकी-बाज नही है। योग सिखाते-सिखाते कहाँ उछाल मारी है। सीधा हिरोईन से आँख टकराई। मुझे लगता है राखी को बाबा की ऊँची कूद वाला स्टंट पसंद आ गया होगा।


अरे हाँ! राखी कहीं शिल्पा शेट्टी से जल तो नही गई? मुझे याद है एक बार शिल्पा शेट्टी बाबा से अनुलोम-विलोम सीखने गई थी। एक बात समझ नही आती। ये बाबा जब भी कोई बात करता है, अपनी टमी को पिचका कर कमर से सटा दिखाता है। सोचता भी नही बेचारे टमीधारी पुरूष कितना बेईज्जत महसूस करते होंगे। उसके इन आसनों की वजह से स्विट्जरलैण्ड के एक भक्त ने बाबा को पूरा का पूरा टापू दान में दे दिया था। कहीं इस नैन मटक्का राखी को बाबा की पतली कमर ने दीवाना तो नही बना दिया है। तभी तो खुद भी वजन घटा कर और स्लिम-ट्रिम बन गई है। वाह भई राखी तेरा भी जवाब नही। मिलाओ-मिलाओ खूब मीठा मिलाओ, कभी अभिषेक कभी मीका तो कभी इलेश, कभी राहुल गाँधी तो कभी रामदेव, भई मन के लड्डू फ़िके भी क्यूँ हों?



जबसे राखी ने बाबा का बनाया लौकी का जूस पी लिया है बाबा को स्वामी, स्वामी कहती रहती है। वैसे राखी का कोई भरोसा भी नही बाबा की ग्यारह सौ करोड़ की प्रोपर्टी डकार संतरे का रस पी ले। उसे तो आदत है रे बाबा। अरे बाबा हाँ मत कर देना। बच के रहना रे बाबा बच के रहना तुझ पे नज़र है।

Friday, July 1, 2011

दो टके की नौकरी और ये मंहगाई....







शाम के करीब पाँच बजे थे,चाय की चुस्कियाँ लेते हुए मै अपने कम्प्यूटर पर खबरों की हैडलाइन्स पढ़ रही थी। मैने पढ़ा की आज शाम को एक मीटिंग बुलाई गई है जिसमे डीजल, और \रसोई गैस के मूल्य-वृध्दि सम्बंधी मुद्दों पर चर्चा होनी है। एक सरसरी नज़र मै खबरों पर डाल अपने दूसरे कार्यों में व्यस्त हो गई।

वक्त का पता ही नही चला कि कब रात के नौ बज गये। अभी मै कुछ सोच ही रही थी कि अचानक फ़ोन की घंटी बजी। मैने फ़ोन उठाया। उधर से एक लड़खड़ाती हुई आवाज़ आई। मैडम  क्या आपने  इंटेरनेट पर आज की ताजा खबर पढ़ी?(मेरे एक स्टॉफ़ मेम्बर का फ़ोन था।)  मैने आवाज़ को पहचानते हुए कहा हाँ क्यों कुछ खास बात?  वो बोला मैडम टी वी पर खबर आ रही है कि  डीजल तीन रूपये और गैस सिलेंडर पच्चास रूपये महंगा हो गया है। आप आज ही डाईवर को भेज कर टंकी फ़ुल करवा लीजियेगा।

मैने कहा क्या फ़र्क पड़ जायेगा आज बीस लीटर डीजल में साठ रूपये बच जायेंगे। और कल क्या होगा। उसके बाद तो बढ़ा हुआ रेट ही देना पड़ेगा। वो बोला मैडम आप लोग तो फ़िर भी बर्दाश्त कर लेंगे लेकिन हम जैसे नौकरी पेशा लोगों का क्या होगा? डीजल महगां हो जायेगा और गैस के भी पच्चास रूपये ज्यादा देने पड़ेंगे।और भी कई  चीज़ों के पैसे बढ़ जायेंगे। समझ नही आ रहा क्या किया जाये?

उसकी बातों ने अच्छी तरह पका दिया था। मैने पूछा अच्छा यह बताओ की महिने में गैस सिलेंडर कितने इस्तेमाल करते हो? शायद एक!... तो खर्चा बढ़ा पच्चास रूपये। रही बात  डीजल की तो  डीजल तुम्हे डलवाना नही होता कम्पनी डलवाती है।

अब सीधे-सीधे मेरे एक सवाल का जवाब दो दिन में कितने गुटके खा जाते हो? शायद पाँच तो गुटका जो पहले एक रूपये का आता था आज ब्लैक में दो का हो गया तो खर्चा हुआ दस रूपया एक दिन का और महिने भर का हो गया तीनसौ रूपये। और जो इस समय तुमने ये जो नशे की बोतल चढ़ा रखी है उसके दाम भी सौ रूपये प्रति बोतल बढ़ गये हैं महिने में तुम चार-पाँच सौ की तो पी ही जाते होंगे। जब ये बढ़ा हुआ खर्चा तुम एडजेस्ट कर सकते हो तो रसोई गैस के पच्चास रूपये का क्यों नही? इतना सुनना था कि उसका सारा नशा हिरन हो गया और बोला" अच्छा मैडम कल सुबह बात करेंगे। शुभरात्री।"...:) 

सुनीता शानू

Thursday, March 17, 2011

महाब्लॉगर सम्मेलन...अविनाश वाचस्पति के घर

आप सभी को भी निमंत्रण मिला होगा इस आयोजन का। अविनाश वाचस्पति जी वैसे भी आये दिन नई-नई ब्लॉगर मीट करते हैं लेकिन कल उनके यहाँ जो ब्लॉगर मीट थी उसका आँखों देखा प्रसारण यहाँ किया जा रहा है।  मैने तो सोचा था कि चार-पाँच लोगो को बुलाकर अविनाश जी कोई हल्की-फ़ुल्की मीट कर रहे होंगे और साथ ही इंटरनेट पर चैटिया रहे होंगे। परंतु आप सब के भी होश उड़ जायेंगे जब आप यह तस्वीर देखेंगे।





इस मीट में श्री सोहन लाल मधुप, श्री रवीन्द्र प्रभात, श्री रणवीर सिंह ‘सुमन’,  श्री राजीव तनेजा, पद्म सिंह, पवन चंदन, के केवलराम, मनोज कुमार पाण्डेय के अतिरिक्त बरेली से आए शिवशंकर यजुर्वेदी, किच्छा से नबी अहमद मंसूरी, लालकुऑ (नैनीताल) से श्रीमती आशा शैली हिमांचली, आनन्द गोपाल सिंह बिष्ट, रामनगर (नैनीताल) से सगीर अशरफ, जमीला सगीर, टनकपुर से रामदेव आर्य, चक्रधरपति त्रिपाठी, पीलीभीत से श्री देवदत्त प्रसून, अविनाश मिश्र, डा0 अशोक शर्मा, लखीमपुर खीरी से डा0 सुनील दत्त, बाराबंकी से अब्दुल मुईद, पन्तनगर से लालबुटी प्रजापति, सतीश चन्द्र, मेढ़ाईलाल, रंगलाल प्रजापति, नानकमता से जवाहर लाल, स0 स्वर्ण सिंह, खटीमा से सतपाल बत्रा, पी0एन0 सक्सेना, डा0 सिद्धेश्वर सिंह, रावेन्द्र कुमार रवि, डा0 गंगाधर राय, सतीश चन्द्र गुप्ता, वीरेन्द्र कुमार टण्डन आदि उपस्थित थे।




देखिये देखिये कल का ब्लॉगर महासम्मेलन जो सम्पूर्ण हुआ था मुन्ना भाई के घर पर बस एक तस्वीर मै नही दिखा पाऊँगी। जो समापन के बाद की है जिसमें आप सभी ब्लॉगरों के घर से जाने के उपरांत अविनाश जी की भाभी जी के द्वारा खींची गई थी खींची क्या गई थी समझो उतारी गई थी।




...कल की ही बात है मुझे पता चला कि अविनाश भाई चुपके-चुपके एक ब्लॉगर मीट कर रहे हैं मैने कहा मुझे तो बुलाया ही नही तो बोले सुनीता जी कुछ ही लोग आयेंगे। तो भई मुझे तो बहुत गुस्सा आया और मैने प्रेस में खबर दे दी की एक महा ब्लॉगर मीट का आयोजन है जिसमें चाय-नाश्ते के साथ भोजन का इंतजाम भी है। फ़िर क्या था ब्लॉगजगत के जाने-माने अनजाने सभी ब्लॉगर भाई टूट पड़े अविनाश जी के घर पर और वो धमाल मचाया की मत पूछिये। अविनाश जी भी क्या याद करेंगे कि पंगा किससे लिया गया है।
सभी ब्लॉगर भाईयों ने अपने-अपने ब्लॉग का वर्णन किया और इसके पश्चात अपना-अपना बोरिया बिस्तर....अरे नही-नही अभी जलपान भी है भैया। कौन पैसा लगना है। मुफ़्त का चंदन घिस मेरे नंदन...हहह्हहह कल रात एक सपना देखा था बस...



Friday, February 18, 2011

मूली बनाम मेडल





http://shikhakriti.blogspot.com/ आज शिखा जी का ब्लॉग देखा.. पढ़ कर एक  टिप्पणी याद आ गई। जो कुछ समय पहले ही लिखी थी जब दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स चल रहे थे। और कुश्ती में भारत की जीत हो रही थी। आप सब भी थोड़ा आनंद लीजिये।

कॉमनवेल्थ गेम्स के चलते आस्ट्रेलिया ने एक मीटिंग बुलाई। मीटिंग का अजेंडा था कि अचानक ऎसा क्या हुआ जो आस्ट्रेलिया के धुरन्धर कुश्तीबाज अपने आप को इंडिया वालो से छुड़ा कर अखाड़े से भाग खड़े हुए। जाँच कमैटी को ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों से पता चला कि उनके पीछा छुड़ा कर भागने की वजह इंडियन्स की पावरफ़ुल फ़्लेवर थी।जो उनकी सैंसीबिलिटी को इफ़ेक्ट करती है। जिसकी वजह से वो या तो नाक बन्द करने को मजबूर थे या मैदान छोड़ भाग जाने को। अतः नाक बंद कर वही खड़े-खड़े पिटने से अच्छा उन्हे मैदान छोड़ भागना ही लगा। ये फ़्लेवर किस तरह की है डोपिंग टैस्ट में तो कुछ पता नही चला। खिलाड़ियों की फ़िर से जाँच की गई तो पाया कि खिलाड़ियों को मूली का पराँठा खिलाया गया था। अब मूली का पराँठा कैसे डोपिंग में पकड़ा जाता। लगता है इंडिया वालों ने जीतने का ये नायाब तरीका सोच निकाला है। अब ऑस्ट्रेलिया में मूली खाई भी जाती होगी तो क्या हुआ उसके विशेष गुणों की परख तो इडियां वाले ही जानते हैं। मूली भी सदियों से कुश्ती के अखाड़े में बदनाम होती आ रही थी। जब एक खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी को ललकारता था कि तू किस खेत की मूली है। आखिर कब तक सहती आज उसकी कुर्बानी व्यर्थ नही गई। मिटते-मिटते भी देश के काम आ गई और कुश्ती में गोल्ड मेडल दिला ही गई।

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Saturday, December 25, 2010

कादम्बिनी मे प्रकाशित एक लेख....मन की चाह




एक चुस्की जो चाय बन गई 
मन की चाह

हिमालय की पहाड़ियों के चारों तरफ़ ढालू जमीन से उतरतेहुए कोहरे की परत के बीच नन्ही-नन्ही कोमल पत्तियों से लिपटी ओस की बूँदो पर जब सूरज की पहली किरण पड़ती है,तो पत्तियों पर फ़ैली ओस की बूंदे चमक उठती है, उन्हे देख कर लगता है, मानो पहाड़ियों ने रत्न जड़ित हरी चुनरिया ओढ़ ली है। मन रोमांच से भर उठता है।
-- वाह! क्या बात है।
-यह कुछ और नही जनाब चाय है।
हाँ वही चाय जिसकी एक घूँट गले में उतरते ही अहसास होता है,एक सुहानी सुबह का। हाँ वही चाय जो दिन की शुरूआत कर देती है,पूरे जोश के साथ। वही चाय जो दिल और दिमाग दोनो को रखती है ताज़गी से भरपूर।

-आईये,जरा एक प्याली चाय हो जाये। अरे! चाय के लिये तकल्लुफ़ कैसा? बातों ही बातों में महफ़िल की शान कहें या दोस्ती का फ़रमान कहें, थकान मिटानी हो या दिल बहलाना हो, हर मर्ज की दवा बन बैठी है चाय।


कुछ तो चाय न पिलाने का ताना भी दे जाते हैं,-कितना कंजूस है, चाय तक नही पूछी। चाय का दस्तूर तो रिश्वतखोरों को भी मालूम है,वे भी कहते नजर आते हैं,--कुछ चाय-पानी हो जाता तो...। ऎसे ही सदियों से जिंदगी के हरेक पल में शामिल रही है चाय। लेकिन फ़िर सोचती हूँ,ऎसा क्या है इसमें? क्यों शामिल है यह हमारी जरूरतों में?
बड़े-बूढ़ों को कहते सुना था कि हनुमान जी जिस संजीवनी बूटी को लेकर आये थे वह कुछ और नही चाय ही थी जिसने लक्ष्मण की मूर्छा खत्म की थी। ये भ्रम है या सत्य परंतु सदियों से थकान मिटाने के नाम पर चाय का नाम ही आता है।

वैसे चाय का इतिहास पाँच हजार वर्ष पुराना है। कहा जाता है कि चाय की शुरुआत चीन से हुई थी। चीन का सम्राट शैन नुंग एक बार गर्म पानी का प्याला पीते हुए अपने बगीचे में घूम रहा था कि अचानक तेज़ हवा से एक जंगली झाड़ी के कुछ पत्ते आकर उसके पानी में गिर गये। गर्म पानी में गिरते ही उसमें से एक अलग सी महक आने लगी और पानी का रंग भी बदल गया। शेन ने रोंमांचित हो एक घूँट भरी और खुशी से चिल्ला उठा, और तभी से चाय का जन्म हुआ।



कुछ प्रमाणिक तथ्यों से ये उजागर होता है कि सबसे पहले सन् 1610 में कुछ डच व्यापारी चीन से चाय यूरोप ले गए और धीरे-धीरे ये समूची दुनिया का प्रिय पेय बन गया। भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड बैंटिक ने 1834 में एक समिति का गठन किया जिसमे चाय की परंपरा भारत में शुरू करने और उसका उत्पादन करने की बात रखी गई। इसके बाद 1835 में असम में चाय के बाग़ लगाए गए।




असम हमारे देश में चाय का सबसे बड़ा उत्‍पादक राज्‍य माना जाता है। इसके अतिरिक्त दार्जिलिंग, हिमालय की तराई, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु में भी चाय की पैदावार होती है। आसाम,गुवाहाटी आदि कई क्षेत्रों में हर साल नवम्बर के महिने में चाय उत्सव मनाया जाता है।


विश्व के अन्य देशों में जापान, श्रीलंका,केनिया,जावा, सुमात्रा, चीन, अफ्रीकाताईवान, इण्डोनेशिया इत्यादि भी चाय का उत्पादन करते हैं ।जापान में भी हर साल कुछ संगठनों द्वारा चाय समारोह मनाया जाता हैं।
भारत में सन 1953 में टी बोर्ड की स्थापना की गई। जिसने भारत में ही नही अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में भी चाय के उत्पादन को फ़ैलाया। टी बोर्ड ने लोगों को चाय की गुणवत्ता बताते हुए चाय के प्रति जागरुक किया।
चाय कैमेलियासिनेसिस नामक पौधे से मिलती है, इसका वैज्ञानिक नाम थियौसिनेसिस है। परंतु प्रत्येक प्रांत मे उगने वाली चाय की किस्में अलग-अलग होती है। प्रांत की जलवायु तथा मिट्टी, चाय की महक व स्वाद में परिवर्तन करती है। जैसे दार्जीलिंग की चाय एक मीठा सा कोमलता का अहसास जगाती है। आसाम की चाय कड़क स्वाद और चुस्ती के लिये दुनिया भर में मशहूर है। वैसे ही काँगड़ा की हरी चाय औषधी के रूप में जानी जाती है। चीन की ऊलोंग टी डिज़ाइनर चाय के रूप में भी अपनी अलग पहचान बनाये हुए हैं
चाय की पत्तियों का आकार व उनके उत्पादन की विधि ही नही चाय की पत्तियों का
तोड़ना-सुखाना भी चाय के गुणों में अंतर करता है।
आजकल बाज़ार में ऑर्गनिक चाय का भी चलन बहुतायात से है। ज्यादातर ऑर्गनिक चाय की खरीदारी फ़्रांस,जर्मनी,जापान,अमरीका तथा ब्रिटेन द्वारा की जाती है।
अनुभवी टी टेस्टर्स के द्वारा चाय को छूकर,चखकर,उसकी पत्तियों का रंग देख कर और उसकी महक से गुणवत्ता का पता लगाया जाता है।


चाय निर्यातक स्पाईटैक्स कम्पनी के निर्माता पवन चोटिया कहते है कि बेहतरीन चाय की जाँच उसके लीकर से की जा सकती है। जिसमें सभी अलग-अलग किस्म की चाय पत्ती ढक्कन लगे बर्तन में कुछ मात्रा में डाल दी जाती है। इसके बाद उसमें उबलता हुआ पानी डाल कर ढक दिया जाता है। दो मिनट बाद चाय के रंग,खुशबू एवं स्वाद द्वारा चाय का पता लगाया जा सकता है।
मुख्यतःचाय चार ही प्रकार की होती है ग्रीन टी, ब्लैक टी, व्हाइट टी तथा ऊलोंग टी।


ग्रीन टी:  इसे 5% से 15 % तक ऑक्सिडाईज़ किया जाता है। भारत,चीन तथा जापान में चाय की क्वालिटी देखकर ही ग्रेडिंग की जाती है। चीन में ग्रीन पियोनी, ड्रेगन पर्ल, ड्रेगन वेल, जैस्मीन, पर्ल इत्यादि,जापान में सेन्चा, माचा, गेकुरो आदि तथा भारत में चीन के समान ही ग्रेडिंग की जाती है। ग्रीन टी एंटी-एजिंग के साथ-साथ एंटी-ऑक्सीडेंट का काम भी करती है। इसे औषधी के रूप में प्रयोग में लिया जाता है। इससे
कहवा,हर्बल टी तथा आर्गेनिक टी भी तैयार की जाती है।
यह कॉलेस्ट्रोल तथा वजन को
नियंत्रित करने,गले के संक्रमण तथा हृदय रोग के लिये उपयोगी है। ग्रीन टी में
पॉलीफ़िनोल्स होते है,जो दाँतों को केविटी से बचाते हैं।इसके अलावा महिलाओं में
गर्भाशय कैंसर, पेट कैंसर में भी लाभदायक है। इसमें कैफ़िन की मात्रा बहुत कम होती
है, अतः रात में भी पी सकते हैं।


ब्लैक टी--- यह कड़क स्वाद तथा कड़क खुशबू वाली चाय है।
इसे चीन में रेड टी के नाम से जाना जाता है,
इसे आम चाय भी कहा जाता है ।जो चीनी तथा दूध के साथ मिला कर बनाई जाती है। इसे गर्म व बर्फ़ डाल कर दोनो तरह से प्रयोग में लिया जाता है। इसमें कुछ विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक फ़्लेवर मिला कर फ़्लेवर टी के रूप में बनाया जाता है।जैसे,--जिंजर, रोज़, चोकोलेट, जस्मीन,स्ट्राबेरी, कार्डेमम, बनाना, ऑरेंज, लेमन, मंगो, एप्पल, मिंट, तुलसी, पीच सिनेमोन, अर्ल ग्रे आदि फ़्लेवर्ड चाय आजकल मार्केट में उपलब्ध है। यह पूरी तरह से फ़रमेंटेड होती है। इसे दो तरह से तैयार किया जाता है। पहली प्रक्रिया में चाय  की पत्तियों को सी.टी.सी. (कट,टियर,कर्ल) प्रोसेस के द्वारा तैयार किया जाता है। इससे निम्न कोटि
की चाय तैयार होती है। दूसरी प्राक्रिया ओर्थोडोक्स कहलाती है। इसके ऑक्सिडेशन में
एक नियंत्रित तापमान तथा नमी का प्रयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया हाथ व मशीन के द्वारा की जाती है। इस दौरान पत्तियां रोल हो जाती हैं। अब चाय को तीन श्रेणियों
में किया जाता है। डस्ट टी--ज्यादातर कैटरिंग में  कड़क चाय के रूप में प्रयोग की
जाती है।फ़ैनिंग टी--ये निम्न कोटि की चाय होती है, जो टी बैग बनाने के काम
आती है।व्होल लीफ़—यह उच्च गुणवत्ता की चाय है।




इसके बाद चाय विशेषज्ञो द्वारा चाय की गुणवत्ता को ध्यान में रख कर ग्रेडिंग होती है---
१--ब्रोकन ऑरेंज पिको (BOP)-- इसमें चाय के छोटे-बड़े सभी तरह के पत्ते होते हैं।
२--ऑरेंज पिको(OP)---इसमें चाय के
पूरे पत्ते को बिना कली के तोड़ा जाता है।
३--फ़्लावरी ऑरेंज पिको(FOP)---
इसमें सभी चाय की पत्तियां फूलों के साथ होती हैं।
फ़्लावरी ऑरेंज पिको भी दो तरह की होती है।
१--गोल्डन फ़्लावरी ऑरेंज पीको(GFOP)---इसमें पत्तियों पर सुनहरे दाने होते हैं, जो इसकी  गुणवत्ता को और भी निखार देते हैं।


२---टिप्पी गोल्डन फ़्लावरी ऑरेंज पीको(TGFOP)--इसमें चाय की कलियां और पौधों की दो ऊपर वा्ली पत्तियां शामिल होती हैं
इसके भी दो वर्ग होते हैं।


१--फ़ाइन टिप्पी गोल्डन फ़्लावरी
ऑरेंज पीको(FTGFOP)
२---सुपर फ़ाइन टिप्पी गोल्डन
फ़्लावरी ऑरेंज पीको। (SFTGFOP)
व्हाइट टी--- यह सबसे कम प्रोसेस्ड
टी है।इसमें कैफीन सबसे कम और एंटी
-ऑक्सिडेंट सबसे ज्यादा होते हैं।
यह कैंसर से बचाती है। तथा हड्डियों को मजबूत करती है। इसका
उत्पादन बहुत कम होता है।
ये साल में वसंत ऋतु के आरम्भ मे दो दिन तोड़ी जाती हैं।इसके अंतर्गत आती हैं सिल्वर निडल व्हाइट, व्हाइट पिओनी,लोंग लाइफ़ आइब्रो,ट्राइब्यूट आइब्रो आदि।
सिल्वर निडल व्हाइट टी- ताजा कलियों को हाथ से तोड़ा जाता है। ये कलिया चारों तरफ़ से सफ़ेद बाल जैसी रचना से ढकी होती है। व्हाइट टी को पानी में डालते ही बहुत हल्का सा कलर आता है, व इसका हल्का मीठा स्वाद शरीर को ताज़गी देता प्रतीत होता है।


व्हाइट पिओनी टी- इसका उत्पादन चीन में होता है। इसमें बड्स के साथ कोमल पत्तियों को भी तोड़ा जाता है। इसका स्वाद सिल्वर निडल टी से थोड़ा कड़क और रंग भी थोड़ा ज्यादा होता है।
लोंग लाईफ़ आइब्रो —यह सिल्वर निडिल,तथा पिओनी टी के बाद बची हुई पत्तियों से प्राप्त होती है। यह निम्न कोटि की चाय है।
ट्राइब्यूट आइब्रो—यह सबसे कम कीमत की व्हाइट टी की किस्म है जो विशेष प्रकार की झाड़ियों से प्राप्त की जाती है।
ऊलोंग टी---यह सेमी फ़रमेंटेड टी है।जिसे कुछ अधिक या कुछ कम ऑक्सिडाइज़
करके डिजाईनर बनाया जाता है। यह कुछ हिस्से से हरी तथा कुछ हिस्से से ब्लैक होती
है। चाय की यही विशेषता इसके स्वाद में परिवर्तन करती है। यह पेट के लिये लाभदायक । ग्रीन टी की तरह ही इसमें भी एंटिऑक्सिडेंट होते है। स्वाद में ही ग्रीन टी के समान है वरन यह भी हमारे शरीर की अनेक रोगों से रक्षा करती है।


चाय के  छोटे से पौधे ने सम्पूर्ण विश्व में अपनी पहचान बना ली है। इसकी हर घूँट के साथ अहसास होता है- सुकून,ताजगी और सेहत भरी जिंदगी का




सुनीताशानू

Thursday, December 24, 2009

सर्दी में कैसे नहाएं (अमर उजाला के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित...)

सर्दी में कैसे नहाएं



सुनीता शानू

सर्दी के मौसम में रजाई से निकलकर नहाने के लिए जाना भी एक विकट समस्या है। इस मौसम में शर्मा जी खुद को सबसे बदनसीब प्राणी समझते हैं। हर सुबह उस व1त उनका मूड उखड़ जाता है, जब पत्नी न नहाने पर बार-बार उलाहना देती है। आखिरकार बीवी कमांडर बनकर उन्हें बाथरूम की तरफ धकेल ही देती है। वह शहीद बनकर अंदर घुस जाते हैं। ठीक ऐसे ही समय पड़ोस से मिश्रा जी के गाने का स्वर आता है, ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए।

बस बीवी का दिमाग तमतमा जाता है, कब तक आलसी की तरह पड़े रहोगे? मिश्रा जी से कुछ सीखो, जो रोज ठंडे पानी से नहाते हैं। एक तुम हो, जो गरम पानी से नहाते हुए भी रो रहे हो। अब श्रीमती जी को कौन समझाए कि मिश्रा जी सचमुच ठंडे पानी से नहा रहे हैं या गरम पानी से। या नहा भी रहे हैं कि सिर्फ राग अलाप रहे हैं। बहरहाल बेचारे शर्मा जी को उठना ही पड़ा।अब यह कोई एक दिन की बात तो है नहीं। रोज-रोज का नहाना, सचमुच कंपकंपी-सी चढ़ जाती है

नल तेजी से चलाएं और ठिठुरते हुए गाएं, ताकि बीवी को लगे कि आप सचमुच नहा रहे हैं। हां, गीले तौलिये से शरीर पोंछना न भूलें


शर्मा जी पत्नी को समझा-समझाकर थक गए कि सर्दी में नहाना बेवकूफों का काम हैं। एक तो पसीना आता नहीं, दूसरे पानी की बरबादी। खैर ये गूढ़ रहस्य की बातें हैं, पत्नी की मोटी बुद्धि में घुसने वाली नहीं।

अचानक माथे पर चंदन का टीका लगाए मौजीराम को आए देख शर्मा जी थोड़े आश्वस्त हुए। उन्हें लगा, डूबते को तिनके का सहारा मिला। लेकिन बीवी ने मौजीराम के सामने एक बार फिर शर्मा जी के न नहाने का उलाहना दिया। मौजीराम ने आग में घी डालते हुए कहा, अरे भाभी जी, सर्दी में नहाना अति उत्तम है, और वह भी ठंडे पानी से तो समझो कि सो रोगों की दवा।

बेचारे शर्मा जी गुस्से में दांत किटकिटा रहे थे। अब तो सहन करना मुश्किल हो गया। मौजीराम रोज-रोज नहाने वाला बंदा तो है नहीं, कोई न कोई घोटाला अवश्य है। खैर शर्मा जी को विप8िा में देख मौजीराम ने दोस्त होने का फर्ज निभाया और उन्हें शीत स्नान का नुसखा बताया। शीत स्नान यानी ह3ते में बस एक दिन रविवार की छुट्टी के दिन नहाएं। बाकी दिनों बस ठंडे पानी के नल को पूरे वेग से चलाएं और ठिठुरते-ठिठुरते गुनगुनाएं, ताकि पत्नी को लगे आप सचमुच ठंडे पानी से ही नहा रहे हैं। इसके बाद तौलिया भिगोकर सिर व हाथ-पैर पोंछ लें।


कहा भी जाता है कि धोए कान हुआ स्नान, अर्थात शीतकाल में इसे ही संपूर्ण स्नान माना जाएगा। और हां, चेहरे पर क्रीम और सिर में खुशबू वाला तेल लगाना न भूलें। सप्ताह के दिन जैसे-जैसे बीतें, वैसे-वैसे तेल, परफ़्यूम आदि की मात्रा बढ़ा दें। और हां, साबुन और कपड़े गीला करना न भूलें।

मौजीराम जी के नुसखे पर अमल कर शर्मा जी सुखी हैं। रोज शीत स्नान करते हैं और पत्नी से कहते हैं, सचमुच सर्दी में नहाने का मजा ही कुछ और है। लेकिन मिसेज शर्मा यह सोच-सोचकर हैरान हैं कि शर्मा जी आखिर चमेली का तेल क्यों लगाते हैं?

Thursday, November 12, 2009

प्रेम मे लाठी

प्रेम में लाठी ( अमर उजाला के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)




मियां-बीवी राजी, तो क्या करेगा काजी? लेकिन वस्तुत: ऐसा है नहीं। दो प्रेम करने वालों के बीच से दुनिया की दीवार हटने का नाम ही नहीं लेती। यह प्यार भी, समझ में नहीं आता कि ऊटपटांग परिस्थितियों में ही क्यों होता है। कभी दुश्मन की बेटी से, तो कभी अपनी जाति के बाहर इश्क होता है और घरवाले लाठियां लेकर निकल पड़ते हैं। जाने कितने ही किस्से हैं जी। किस-किस का नाम लें? हर गली-सड़क पर आशिक घूमते नजर आते हैं। उस्ताद वाली आसी ने कहा है," तू अगर इश्क में बरबाद नही हो सकता। जा तुझे कोई सबक याद नही हो सकता।"



किसी ने सच ही कहा है कि प्यार अंधा होता है, जो न उम्र देखता है, न मजहब, न गोरा, न काला। इस अंधे प्यार का परिणाम तो अंधा ही होगा। किसी ने तो यह भी कहा है कि पागल प्रेमी दीवाना। सही है, अगर प्रेमी दीवानगी में पागल न हो पाए, तो दुनिया मजनू की तरह पत्थर मार-मारकर पागल देगी। उससे भी पेट न भरा, तो समझो, राम-नाम सत्य तो कर ही देगी। इसलिए अगला जनम लेने से पहले भगवान से रिकवेस्ट कीजिएगा कि आपकी प्रेमिका या पत्नी सगोत्र न हो, वरना अंजाम तो सब जानते ही हैं। क्या फायदा, अगर अगला जन्म भी गीत गाते-गाते गुजर जाए। या फिर आपकी प्रेमिका को अनारकली की तरह दीवार में चुनवा दिया जाए। अच्छा बवाल है भैया। प्यार करे कोई और परेशानी सारी दुनिया को।

इस समस्या का कोई न कोई उपाय तो भगवान को ढूंढना ही होगा। वरना मनुष्य उसकी बनाई सृष्टि का विनाश करता ही रहेगा, और जो काम २०१२ में होने की आशंका है, इस प्रेम के चक्कर में पहले ही हो जायेगा। इस समस्या से निपटने के लिए क्यों न भगवान लड़के-लड़कियों के चेहरों पर टैटू बना कर भेजे, ताकि उन्हें प्यार करने से पहले ही पता चल जाए कि उनका गोत्र क्या है। और जहां किसी लड़की को सगोत्र लड़का दिखे, उसे राखी बांधकर भाई बना दे। सोचिए, तब कितने भाई बन जाएंगे। छेड़े जाने का डर भी नहीं रहेगा। माता-पिता चैन की बंसी बजाएंगे।

अब सरकार को ही ले लीजिए। वह भी बेवजह रोड़े अटकाती है। जब लड़की की कुंडली मिला ली, गोत्र मिला लिए, छत्तीस गुण भी मिला लिए, तब सरकार ने मेडिकल चेक अप का लफड़ा पैदा कर दिया और शादी रुक गई। अब ऐसे में भगवान भी क्या कर लेंगे, जब सरकार भी उनके बनाए हर काम में अड़चन डालने लगेगी। तो भैया, यह बात बेकार हो गई कि जोडिय़ां बनती हैं आसमानों में।

आजकल गॉड ने प्रेम का गिफ़्ट देना बंद कर दिया है। इसलिए युवाओं को सोच-समझकर प्रेम करना चाहिए। अच्छा होगा कि वे अपने साथ अपनी मेडिकल रिपोर्ट साथ रखें। जन्म कुंडली भले न बनवाई हो, लेकिन अपने माथे पर जाति, धर्म और गोत्र का टैटू अवश्य गुदवा लें, ताकि जब कभी प्रेम के कीटाणु आपके शरीर में प्रवेश करने की कोशिश करें, तो आप अपना बायोडाटा दिखाकर सामने वाले या वाली का उचित मार्गदर्शन करें।

सुनीता शानू

Thursday, October 29, 2009

मिस कॉल की भाषा (अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)





मिस कॉल की भाषा

 
सबसे पहले हम पाठको को बता दें कि मिसकाली जी क्या हैं। ये वो शख्सियत हैं जिससे बड़े-बड़े भी अपनी पहचान छुपाते हैं। अब अपने शर्मा जी से ही ले लो। पिछले दो हफ़्ते से बेचारे सो नही पाये हैं। इस मिसकाली ने नाक में दम कर रखा है। कब,कहाँ,कैसे आ टपके कुछ मालूम नही। शर्मा जी का जो हाल हुआ है भगवान ही जानता है। बेचारे सोना-जागना,नहाना-धोना सब भूल गये हैं। और ये मिसकाली! इसे कोई फ़र्क ही नही पड़ता। इसे न मरघट नजर आता है न ही उत्सव। और अब लगता है, मिसेज शर्मा को भी इस मिसकाली से जलन होने लगती है। तभी तो आजकल वे मिसकाली को नींद में गालीयां निकालती हैं डेम फ़ूल,स्टूपिड इत्यादि,न मुँह गंदा न राष्ट्रभाषा का अपमान।

आप सोच रहे होंगे की यह मिसकाली है कौन? जिसने मिसेज शर्मा तक को परेशान कर दिया। कहीं ये शर्मा जी की कोई एक्स गर्लफ़्रेंड तो नही?

...नही भई नही। ये मिसकाली हैं मौजीराम। शर्मा जी के लंगोटियां यार। जिन्होनें नया-नया मोबाईल लिया है। मोबाईल में है बस बीस रूपये का बैलेंस और मिस कॉल करने की तगड़ी बीमारी, जिसका शिकार हुए बेचारे शर्मा जी। मिसकॉल करते समय कभी नही सोचते की काम किसे है। तीस पे तुर्रा भी यह कि अम्मा यार तुम तो याद ही नही करते। एक मै हूँ जो हर वक्त तुम्हे याद करता रहता हूँ। और तुम इतने कंजूस की एक मिसकॉल भी नही कर सकते।
ग़ज़ब की बात तो यह होती है कि इन मिसकालियों की डिमाण्ड भी मिसकॉल ही होती है। अपने दिल की बात बस मिसकॉल के माध्यम से ही कह देते हैं। अक्सर देखा जाता है कि प्रेमिका अपने प्रेमी को मिसकॉल करती है, फ़िर प्रेमी भी मिसकॉल देकर अपने प्यार का इजहार करता है। जहाँ भावनाओं की ही जरूरत है, भला बात करके क्या हॉसिल होगा? सो मिसकॉल सबसे उत्तम उपाय है, यह बताने का की किसे,किसकी, कितनी याद सता रही है। यह तो वह बात हुई न हींग लगै न फ़िटकरी, रंग भी चोखो आये। तो भैया मिसकॉल का स्वाद एक बार जो चखले वो कॉल क्यूँ करे?

कुछ लोगों के लिये मिसकॉल अच्छा-खासा लव लेटर है, तो किसी के लिये हाल-चाल पूछने का तरीका। कोई बस डायलर टोन सुनने के लिये ही मिसकॉल करता रहता है। मुझे तो लगता है, यह मैथड भी भाषा-विज्ञान के अंतर्गत आता है। जहाँ पहले से डिसाईड होता है कि मिसकॉल आने वाला है। मिसकॉल आते ही चहरे पर एक चिरपरीचित सी मुसकान देखी जा सकती है।

मिसकॉल के किटाणु डेंगू,मलेरिया,स्वाईन फ़्लू की तरह चारों तरफ़ फ़ैल गये है। जिस दिन मिसकॉल न आये तो घर भी सूना-सूना सा लगता है। वैसे भी जितनी बार मोबाईल बजेगा देखने वाले को तो यही लगेगा न की बंदा कितना बिजी है भई।

मौजीराम की मिसकॉल ऎसी रंगत लाई की शर्मा जी के भीतर भी इसके किटाणु प्रवेश कर ही गये। अब मौजीराम की मिसकॉल पर शर्मा जी भी मिसकॉल करते हैं।अब दोनो में न शिकवे हैं न शिकायत है। एक राजस्थानी गीतकार ने इस मिसकॉल से प्रेरित होकर एक गीत तक लिख डाला है जो जगह-जगह मोबाईल पर सुनने को मिल जाता है, बनड़ी रो मिसकॉल म्हारे मोबाईल पर आवेगो, रे नया जमाने वाली बनड़ी फ़ोन मिलावे रे... शुक्र है कि मिसकालियों की यह मूक भाषा किसी ने तो समझी।

सुनीता शानू

Wednesday, October 21, 2009

भ्रूण हत्या पर आधारित...मिस इंडिया की पहल से उपजे प्रश्न



मिस इंडिया की पहल से उपजे प्रश्न

( अमर उजाला के काम्पेक्ट में प्रकाशित)

मिस इंडिया पूजा चोपड़ा सेव द गर्ल चाइल्ड के लिए 10 लाख रूपए जुटाने के एक अभियान पर हैं। पूजा खुद एक ऐसे परिवेश से आती है, जहां उनके पिता ने उनकी मां को छोड़ दिया। पूजा की मां की हिम्मत और खुद के संकल्प ने उसे यह मुकाम दिया कि वह लड़कियों को बचाने के किसी मुहिम के अभियान को पहचान दे सके। पूजा के जज्बे को सलाम करने के साथ एक सवाल करने का भी मन कर रहा है। देश में लड़कियों की घटती संख्या के प्रश्न का हल साधन जुटाने से नहीं सामाजिक सोच में बदलाव से होगा। पूजा का काम ज्यादा बड़ा प्रेरणास्पद काम है, बजाए कि किसी संगठन के लिए कुछ लाख जुटाना। पूजा चोपड़ा के जरिए इस जरूरी विषय पर एक व्यापक बहस हो यह भी एक बड़ी पहल का हिस्सा होगा।
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लासेंट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 5,00,000 कन्या भ्रूण हत्या होती हैं,व पिछले दो दशक में एक करोड़ लड़कियां कम हो गई हैं। जो या तो दहेज की भेंट चढ़ गई हैं या वारिस पाने की चाह में मार दी गई हैं।
भारत वर्ष में लगभग दो दशक पूर्व अल्ट्रासाउंड मशीन के द्वारा भ्रूण-परीक्षण पद्धति की शुरुआत हुई थी, जिसे एमिनो सिंथेसिस कहा जाता था। इसका उद्देश्य सिफऱ् गर्भस्थ शिशु के क्रोमोसोम के संबंध में जानकारी हासिल करना था। यदि इनमें किसी भी तरह की विकृति हो, जिससे शिशु की मानसिक व शारीरिक स्थिति बिगड़ सकती हो, तो उसका उपचार करना होता था । किन्तु अल्ट्रासाउंड मशीन का इस्तेमाल गर्भ में बेटा है या बेटी है की जाँच के लिये किया जाने लगा। अगर गर्भ में लड़का है तो उसे रहने दिया जाता है व लड़की होने पर गर्भ में ही खत्म कर दिया जाने लगा। इस लिंग चयनात्मक पद्धति को अवैध बताते हुए सन 1994 में प्रसव पूर्व नैदानिक तकनीक (विनियमन और दुरूपयोग निवारण) अधिनियम बनाया गया जिसे सन1996 में प्रचलन में लाया गया। ताकि कन्या भ्रूण हत्या रोकी जा सके। इस अधिनियम के अंतर्गत, लिंग चयन करने में सहायता लेने वाले व्यक्ति को तीन वर्ष की सजा ,तथा 50,000 रूपये का जुर्माना घोषित किया गया। तथा लिंग चयन में शामिल चिकित्सा व्यवसायियों का पंजीकरण रद्द किया जा सकने और प्रैक्टिस करने का अधिकार समाप्त किये जाने का कानून बना। पब्लिक हैल्थ ऑफि़सर्स का कहना है कि पिछले दो सालों में 21,072 अल्ट्रासाउँड की मशीने रजिस्टर्ड की गई थी। जो कि तब तक ही कानूनन वैद्य थी जब तक की उनसे भ्रूण की जाँच नही की जाती। इसी दौरान 199 मशीनो को भ्रूण जाँच करने के जुर्म में सील कर दिया गया व 405 डॉक्टर्स पर भी गैरकानूनी टैस्ट को करने का चार्ज लगा दिया गया।फिऱ भी चोरी छिपे भ्रूण परीक्षण करवाया जाता रहा। जिसे रोकने के लिये सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में राष्ट्रीय निरीक्षण और निगरानी कमेटी बनाई गई। किन्तु सरकार की तमाम कोशिशे कन्या भ्रूण हत्या को रोकने में नाकाम ही रही।
यूनिसेफ़ की रिपोर्ट के अनुसार लड़कियों के मामले में भारत की स्थिती चिंताजनक है। कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते आकड़ों ने भारत के कुछ राज्यों में लिंगानुपात में भारी गिरावट ला दी है।देश की जनगणना 2001के अनुसार 1000 लड़को पर लड़कियों की संख्या 0से6 वर्ष तक की आयु का अनुपात दिल्ली में 845,पंजाब में 798,हरियाणा में 819, गुजरात में 883 था। यूनिसेफ़ की रिपोर्ट बताया कि भारत में प्रतिदिन 7,000 लड़कियों की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है।आज की ताजा स्थिती में संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में अवैध रूप से अनुमानित तौर पर प्रतिदिन 2,000 अजन्मी कन्याओं का गर्भपात किया जाता है।यह स्थिति धीरे-धीरे इतनी विस्फोटक हो सकती है कि महिलाओं की संख्या में कमी उनके खिलाफ अपराधों को भी बढा सकती है ।
कन्या भ्रूण हत्या से 2007 में देश के 80 प्रतिशत जिलो में लिंगानुपात में गिरावट आ गई थी। प्रति 1000 लड़कों पर भारत में लिंगानुपात 927, पाकिस्तान में 958,नाइजीरिया में 965 आकां गया था। आज यह मानना गलत साबित हो गया है कि भ्रूण हत्या का कारण अशिक्षा व गरीबी है, वरन शिक्षित व सम्पंन परिवार भी इस तरह के कृत्य में शामिल है। कन्या भ्रूण हत्याओं का पहला और प्रमुख कारण तो यही है कि आज भी बेटे को बुढापे की लाठी ही समझा जा रहा है और कहा जाता है की पुत्र ही माँ-बाप का अंतिम संस्कार करता है व वंश को आगे बढ़ाता है।
इधर शुरू हुए कुछ सामाजिक संस्थानिक प्रयास इस अवधारणा को बदलने में लगे हैं। गुजरात में ऐसा ही एक डिकरी बचाओ अभियान चलाया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश ने भी कन्या भ्रूण हत्या करवाने वाले की खबर देने वाले को दस हजार का इनाम देने की घोषणा कर डाली है। सरकार अमेरिका व कनाडा से आयातित लिंग परीक्षण किट पर भी रोक लगा रही है।
सरकार को भी इस दृष्टि को विस्तार देना होगा कि फंड उपलब्ध कराने और कानून बनाने से तो इस मुश्किल का हल नहीं दिख रहा। सामाजिक स्तर पर बदलाव के लिए जरूरी है कि लड़कियों की भूमिका को विस्तार दिया जाए। उन्हें ज्यादा से ज्यादा अवसर दिए जाएं। ऐसे समय में जब राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, सत्ताधारी दल की शीर्ष नेत्री और देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री महिलाएं हों तो इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है, कि देश के एक दूरवर्ती गांव में बेटियों को बोझ न समझने की कोशिशों को शक्ति मिलेगी।


सुनीता शानू

Wednesday, September 2, 2009

छप्पर फ़ाड़ के (आई नेक्स्ट के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)




छप्पर फाड़ के

सुनीता शानू


( १ सितम्बर आई नेक्स्ट के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित )




माफ़ कीजियेगा मै यहाँ ऎसा कुछ लिखने नही जा रही कि बच्चों ने छप्पर फ़ाड़ा होगा। यहाँ बात ऊपर वाले की है कि ऊपर वाला जब भी देता है लेकिन ऎसा वो करता क्यों है? जिसे चाहिये एक उसे दस दे देता है।कुछ दिनों पहले अमेरिका की नाद्या सुलेमान ने एक साथ आठ बच्चे पैदा किये।और इसके बाद एक ट्यूनिशियाई महिला ने भगवान से दो जुड़वा बच्चों की डिमांड की और भगवान ने बारह बच्चे एक साथ उसकी झोली में टपका दिये।


मुझे लगता है भगवान को फ़ैमिली प्लानिंग के बारे में नॉलेज नही है। या इसमें सरकार और भगवान दोनो की कोई साठ-गाँठ भी हो सकती है। वरना हम भारतवासी तो आस लगाये बैठे रहते हैं कि कब छप्पर रूपी सीमेंट की छत फ़टेगी और कब मोती बरसेंगे।वैसे भी हम हर बात का जिम्मेदार भगवान या सरकार को ही ठहराते हैं। एक जमाना वह भी था जब कोई पूछता था कितने बच्चे हैं तो बच्चे कहते थे छ भाई है जी छह बहन हैं।अरे इतने बच्चे तो झट से घर का मुखिया कहता सब भगवान की देन है जी।


लेकिन सरकार और भगवान ने मिल कर भारत का नक्शा ही बदल दिया। कभी पाँच बच्चों की या तीन बच्चों की फ़ैमिली प्लानिंग ही हुई थी। लेकिन बाद में सरकार ने एक या दो बच्चे के बाद ही रोक लगा दी। किन्तु भगवान ने दूसरे देशों मे यह प्लानिंग लागू नही की, तभी तो वो लगे हैं वर्ड रिकार्ड तोड़ने में। सबसे मजेदार बात तो तब पैदा हुई जब दो जुड़वा बच्चों की जगह छ जुड़वा यानि कि बारह बच्चे पैदा होने पर ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रजनन विशेषज्ञ सिमन ने डॉक्टरों को दोषी बताया। अब भला उन बच्चों के पैदा होने में डॉक्टर का क्या कुसूर? जब ऊपर वाला देता है तो डॉक्टरों की इजाजत थोड़े ही लेता है।


अब जितने बच्चे उतने नाम। आप चाहें तो महीनों के नाम सप्ताह के नाम या फ़िर ज्यादा ही दिक्कत खड़ी करे तो एक ही नाम रखके ग्रेडिंग कर दो। अगर बच्चों के रंग में भी भेद हो। जैसे जैनी(बिल्ली) ने दस बच्चे दिये थे, दो काले थे बाकि की बस पूछँ ही काली थी। तो हो सकता है नाम रखना और भी आसान हो जाये। ट्वीन्स में सबसे ज्यादा दिक्कत पहचानने की ही होती है।


आजकल जो ये टैटू का जमाना है तो चाहें तो माता-पिता अपने बच्चे पर रूचि के अनुसार टैटू बना दें ताकि पहचान कर पुकारा जा सके। वैसे भी सुनने में आया है कि लॉस एंजिलिस क्लीनिक ने एक प्रयोग के द्वारा भ्रूण में मोडिफ़िकेशन करके डिजानर बच्चे पैदा करने का दावा किया है।हो सकता है कि बच्चों के पेट पर जिप लग जाये या बटन लग जाये। हाथ -पैर में फ़ोल्डिंग सिस्टम हो तो संड़क पार करवाने में भी सुविधा रहेगी। एक ही पलंग पर सब को ऎड्जेस्ट किया जा सकेगा। बस डर इस बात का लगता है कि कहीं माता-पिता सूट की तरह बच्चे भी पुराने फ़ैशन के समझ बाज़ार में एक्सचेंज ऑफ़र में बदलने की न सोचें।या फ़िर माँ बच्चों की शकल शाहरूख खान या सलमान जैसी बनवा ले और बाप सच का सामना में बैठा शाहरूख या सलमान पर इल्जाम लगाये। देख लेना भैया जब बुरे दिन आये भगवान भी कल्टी न कर जाये।

...

Tuesday, August 18, 2009

बीमारी का लाभ


अमर उजाला पर प्रकाशित एक व्यंग्य....

इधर जब से शर्मा जी को हल्की सी खाँसी आई हैं, ऑफ़िस में रूबी भी हाथ मिलाने से हिचकिचाती है।शर्मा जी बहुत परेशान हैं। बाहर स्वाइन फ़्लू का बढ़ता हुआ आतंक और घर में बीबी का। बार-बार हाथ धोते-धोते परेशान हो गये थे। गले लगाना तो दूर लोग हाथ मिलाते हुए भी कतराते थे। अगर स्वाइन फ़्लू सचमुच हो गया तो? रूबी की बात तो छोड़ो बीबी भी पास न आयेगी। शर्माजी उलझल में थे कि उनके दोस्त मौजीराम आ धमके। शर्मा जी ने उन्हे आपबीती सुनाई।मौजीराम ठहरे ऑल टाइम मौजी। लगे स्वाईन फ़्लू के फ़ायदे गिनाने। यार घबराते क्यों हो?फ़ायदा क्यों नही उठाते।आराम का आराम और बिना आरक्षण सीट पर विश्राम।शर्मा जी-वो कैसे? अरे यार स्वाइन फ़्लू के मरीज के पास कौन बैठेगा सोचो? तुम आराम से मैट्रो मे सफ़र कर पाओगे। घर के सारे काम भी बीबी चुपचाप किया करेगी। दिन भर तुम्हारी सेवा करेगी।एक सबसे बढिया बात, ऑफ़िस से बॉस भी छुट्टी दे देगा। मौजीराम की बात शर्मा जी के दिमाग में फ़िट हो गई।
योजनानुसार शर्मा जी एन 95 स्पेशियल मास्क पहन आये। तैयार होकर जैसे ही मैट्रो पर चढे़। तैसे ही खाँसी आई सारी भीड़ छट गई,पास बैठी खूबसूरत बाला उन्हे छोड़ मौजीराम के साथ बैठ गई।ऑफ़िस मे भी बॉस उन पर बरसता उससे पहले ही खाँसी आई और बॉस नरम होकर बोला-अरे पहले बताया होता न तुम बीमार हो। जाओ आराम करो। शर्मा जी मन ही मन मौजीराम को थैंक्यू पकडा रहे थे।तभी उनकी नजर रूबी पर पड़ी जो मौजीराम से हाथ मिलाते हुए कह रही थी कि आप कितने नेक हैं,जो जान की परवाह किये बगैर स्वाइन फ़्लू के मरीज के साथ है। शर्मा जी बेचारे तिलमिला कर रह गये।
मौजीराम के सौजन्य से मिसेज शर्मा को पता लग चुका था,अब तक सभी रिश्तेदारों को फोन किये जा चुके थे। शर्मा जी को घर पहुँचते ही सबने दूर से ही देखा। उनके कपड़े उनका सामान सब पृथक कर दिया गया। पत्नी की आँखों के आसूँ शर्मा जी को बेहाल कर रहे थे,कि अचानक मौजीराम की आवाज आई आप फ़िक्र क्यों करती हैं भाभी जी,मै हूँ न। और बस घर के सभी सदस्य मौजीराम की आवभगत में ।
शर्मा जी को हॉस्पिटल भर्ती करवाया गया। डॉक्टर को मौजीराम ने जाने क्या समझाया की उसने भी स्वाइन फ़्लू की बीमारी कन्फ़र्म कर दी, अब शर्मा जी का बुरा हाल, मौजीराम की मौज,लोग मौजी राम को मसीहा कहने लगे।
हॉस्पिटल से छूट कर शर्मा जी जब ऑफ़िस पहुँचे तब ४४० वाट का करंट उनसे चिपक चुका था।रूबी बन गई थी मिसेज मौजीराम। मौजीराम को बॉस के द्वारा प्रोमोशन मिला था। और शर्मा जी के घर में ही नही उनकी बीबी के दिल में भी मौजीराम ने गहरा असर छोड़ा था कि जिन्दगी भर उनके परिवार की रक्षा का बन्धन बीबी ने उसके हाथ पर बाँध दिया। शर्मा जी मौजीराम को हड़काते,या अपना फ़ायदा उठाने पर डाँट लगाते मगर खाँसी आई और शर्मा जी चुप होकर रह गये। मौजीराम मुस्कुराते हुए गुनगुना रहे थे-स्वाइन फ़्लू बड़े काम की चीज है...

सुनीता शानू