Friday, January 8, 2016

अतुल्य भारत अभियान का स्वप्न

पहरेदारी मुल्क की सौंप हमारे हाथ ..
सारा भारत चैन से सोये सारी रात .

भारतीय सेना के एक ऑफ़िसर विजेंद्र शर्मा की यह पंक्तियाँ बरबस ही याद आ रही हैं, आप भी सोचिये इस विषय में। हमारे बुजूर्ग कहा करते थे, "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" यानि जिनकी कथनी और करनी में फ़र्क होता है उनकी बात कोई मायने नहीं रखती।

आप समझ गये होंगे मै क्या कहना चाहती हूँ, दिल्ली सरकार द्वारा आमिर खान को हटा कर अमिताभ बच्चन को 'अतुल्य भारत' का ब्रांड एम्बेसडर बना देना कुछ लोगों को गलत लग रहा है, लेकिन सोचिये जो इंसान हिंदुस्तान में रहने से आतंकित है, और जिसकी हिंदुस्तानी पत्नी भी देश छोड़कर जाना चाहती है तो वो कैसा भारत निर्माण करेंगे? क्या संदेश देंगें?

जिस देश को हम माँ कहकर पुकारा करते हैं उसे आतंकवादियों के डर से मुसीबत में छोड़ सकते हैं? क्या अपनी माँ के साथ भी ऎसा ही सोचा जा सकता है?
मुझे लगता है एेसा ख़्याल आना भी देशद्रोह से कम नहीं है। 


आप भी यदि अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर देश छोड़ देना चाहते हैं तो उन लाखों वीर जवानों के परिवारों का क्या होगा जो देश की रक्षा में खुद को झोंक रहे हैं, आमिर खान और उसकी पत्नी सरीखे न जाने कितने परिवारों की सुरक्षा का दायित्व उठाये हुये हमारे देश के वीर कहीं जाने की नहीं सोचते, सच्चा भारत निर्माण इन्हीं से है, मुझे लगता है सरकार को किसी अभिनेता की अपेक्षा यह संदेश देने के लिये उन वीर सैनिकों को आगे लाना चाहिये, जिनकी बातों में ही नहीं खून में भी देशभक्ति का जज्बा होता है, ताकि हर देश वासी में देश के प्रति देशभक्ति पैदा हो न की मुसीबत में भाग खड़े होने की बातें हो।

जयहिंद

Friday, October 30, 2015

हाँ मै व्रत रखती हूँ...



जब बहुत छोटी थी तब माँ को देखा करती थी करवाचौथ का व्रत करते हुयें. माँ सजधज कर जब बहुत सारे पकवान बनाया करती थी, हम बच्चे आश्चर्य करते थे कि माँ ने पानी तक नहीं पिया है कहीं गिर न जाये, पिता माँ का पूरा ख्याल रखते थे, यहाँ तक की आटा लगाना सब्जी काटना जैसे काम करने से भी नहीं चूकते थे। लेकिन माँ बार-बार उन्हें मना करती थी हाथ बँटाने को। बस कमी थी तो एक की मेरे पिता माँ के सोलाह सिंगार उनकी खूबसूरती देख नहीं पाते थे सिर्फ़ उनकी आवाज में उनकी काम करने की फ़ूर्ती में महसूस कर पाते थे। करवाचौथ का व्रत मेरी माँ के लिये उत्सव जैसा होता था।

हमारे यहाँ राजस्थान में कुवाँरी लड़कियाँ भी व्रत रखती थी, मैने भी माँ को देखकर जब पहला व्रत रखा। तब माँ से पूछा था, यह व्रत आप क्यों रखती हो? तब उन्होनें बताया, तेरे पिता का स्वास्थ्य अच्छा रहे, उम्रभर वो मेरे साथ रहें घर में खुशहाली रहे बस। मैने पूछा तो मै किसके लिये रखूं? माँ ने कहा तुम्हें अच्छा सा दूल्हा मिलेगा... अब यह बात मुझे बहुत अज़ीब सी लगी... व्रत करने से दूल्हा अच्छा कैसे हो जायेगा माँ जब किस्मत में बुरा लिखा है तो बुरा ही मिलेगा न... अब जवाब मा की अपेक्षा पिता ने दिया... उन्होनें कहा प्रार्थना में बहुत बड़ी शक्ति है बेटा, आप व्रत न भी करो, दृड़ संकल्प और इच्छा शक्ति से आप कुछ भी प्राप्त कर सकती हो... नारी तो खुद एक शक्ति है जो बड़े-से बड़े संकटों से पूरे परिवार की रक्षा करती है.... सचमुच वह दिन और आजका दिन मुझे एक सा लगता है। 

वैसे मै व्रत बहुत कम करती हूँ लेकिन करवाचौथ का व्रत मुझमें इतनी शक्ति भर देता है कि मै पूरा दिन पानी की बूंद भी हलक से उतरने नहीं देती, सब कहते हैं तुम व्रत रोज़े की तरह मत रखा करो, लेकिन शायद बचपन से ही मुझमें वो शक्ति पैदा हो गई है जो मेरी माँ की निष्ठा मेरे पिता के विश्वास की तरह मुझमें पनपती रही है। हालांकि इस व्रत की कथा में मै विश्वास नहीं कर पाती हूँ।

तुम आज की अधुनिक नारी मुझे रूढिवादी कह सकती हो। हाँ मै व्रत करती हूँ। लेकिन अपने दिल के सुकून के लिये। अपनी माँ की निष्ठा के लिये। एक अदृष्य शक्ति जो मुझे तुम्हारे करीब खींचकर ले जाती है। जोड़े रखती है तुम्हारी सांसो से। मै व्रत रखती हूँ सिर्फ़ अपने लिये...। 


Wednesday, October 14, 2015

देखना ये विश्वास टूटने न पाये


ये बुराड़ी के एक वृध्दाश्रम की तस्वीरें हैं, जहाँ हम पूरे परिवार के साथ खाना खिलाने गये थे, जाने से पहले मन में बहुत उत्साह था, कि उन लोगों को देखूंगी जो स्वेच्छा से अपने बच्चों से दूर रहते हैं, या जिन्होनें संसार से विरक्त होकर सन्यासी जीवन जीने की चाह रखी होगी। 
लेकिन वहाँ जाकर बिलकुल उल्टा ही देखा, उन वृद्ध लोगों में सत्रह महिलायें ही थी, एक बुजूर्ग थे जो किसी सभ्य परिवार से लग रहे थे। उन सब से मिलकर पता चला कि वे अपने घर बच्चों के पास लौटना चाहते हैं, कुछ ने अपना पता देकर छोड़ आने की गुजारिश की, तो एक वृद्ध महिला ने मेरा हाथ पकड़ कर पूछा क्या मैने उसको पहले कहीं देखा है, उनकी आँखों की नमी देखकर मै कहने पर मजबूर हो गई कि हाँ मैने उन्हें देखा है, इतना सुनते ही वो रो पड़ी और बोली, बेटी है मेरे बेटे से कहना मुझे आकर ले जाये, ये जेल खाना है, मेरा मन नहीं लगता। एक बारगी उनके आँसू देखकर मन भर गया, मै परेशान हो उठी कि क्या ये अच्छी बात है कि बुजूर्गों को ताले में रखा जाये! जब उनकी देखभाल करने वाली महिलाओं से बात की तो पता चला इनमें से ज्यादातर वो महिलायें हैं जिनके बच्चे उन्हें अस्पताल में छोड़ गये थे, और फिर लेने तक नहीं आये। जिन्हें पुलिस खुद उस वृद्धाश्रम में छोड़ गई है। उन्हें देखकर बहुत तकलीफ़ हुई।

दोस्तों क्या सचमुच कोई ऎसा कर सकता है? यदि आपको ऎसा लगता है कि माता-पिता बोझ हैं तो उनसे भी बड़ा बोझ आप स्वयं हैं। आने वाले समय का आइना अवश्य देख लें कहीं आपका चेहरा इनसे भी बदतर न हो जाये.... 
मुझे लगता है हम सब मिलकर ज्यादा कुछ नहीं तो दो पल इन्हें देकर इनके चेहरे पर हँसी ला सकते हैं... और शुरूआत कीजिये सबसे पहले अपने-अपने घरों से... 


ये दोनों पैसठ से सत्तर के आस-पास हैं लेकिन वक्त से पहले ही चेहरा ये हुआ 

ये राधिका सब भूल सी गई है, इसे बिंदिया, चूड़ी पायल चाहिये

इन्हे अपने बच्चों का बेसब्री से इंतजार है और विश्वास भी कि वो आयेंगे...

Friday, July 31, 2015

बाढ़ की सम्भावनायें सामनें हैं...

                             


  बाढ़ की सम्भावनायें सामनें हैं/ और नदिया के किनारे घर बने हैं... आप सोच रहे होंगे कि उस शख्स को तो फिर डूब ही जाना पड़ेगा।  लेकिन नहीं ऎसा नहीं है, आप अपने घर की दीवारे वाटर प्रूफ़ बनाईये, बाहर कुछ नाव बाँधकर रखिये, कुछ टायर ट्यूब वगैरह का भी इंतजाम करके रखिये क्योंकि आज बचने के लिये तिनकों का सहारा तलाश करना भी बेवकूफ़ी है, अरे भई जिसको हवा तक उड़ा दे वो आपको क्या बचा पायेगा। बल्कि गरियाने लगेगा कि खुद तो डूबे सनम हमें भी ले डूबे?
यदि आपने अपने चारों तरफ़ जानबूझकर दोस्तों, शुभचिंतको के रूप में कंटीले झाड़ ही उगा लिये हैं तो ये समस्या भी आपकी अपनी है सरकार की नहीं, अब सम्मान या अपमान के लिये कृपया सरकार को न गरियायें।  आपको अपनी नाक इतनी दुरुस्त रखनी ही होगी कि कहीं जरा जलने की बू आने लगे तो तुरन्त सीज़ फ़ायर का इस्तेमाल करें, या हो सके तो कूड़ा-करकट डाल कर उस आग को बुझाने का प्रयत्न करें।
 माँ हमेशा समझाती भी थी कि दौड़ में सारे एक साथ भाग रहे होते हैं, प्रथम तो कोई एक ही आता है, कई बार दौड़ में साथ चलने वाला गिर सकता है। उसको उठाने के चक्कर में पहली बात खुद उसके बराबर ही खड़े रह जाओगे। दूसरी बात तुम्हारा रूक जाना गिरने वाले को गलत संदेश देगा। वह यह नहीं सोचेगा कि तुम उसकी
फ़िक्र में रुक गये हो या तुम्हें उसकी फ़िक्र है। वह सोचेगा तुम उसके बिना चल ही नहीं पा रहे थे इसीलिये रुक गये हो। तो बहुत जरूरी है ज़िंदगी की दौड़ में निशाना मछली की आँख में लगे... दाँये-बाँये देखना या झुक जाना तो सोच लेना कि तुम्हारी ही पीठ पर पैर रखकर भागने वाले वही होंगें जिनके लिये तुम रुक गये थे।

सुनीता शानू 

Thursday, July 30, 2015

हा हा! भैंस दुर्दशा देखी न जाई (आज नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक टिप्पणी)



भैंस बहुत ही परेशान है, करे... तो क्या करे? या तो किसी तालाब में डूब मरे, लेकिन वो तो तैरना जानती है सो आत्महत्या भी नहीं कर पा रही है। कल तक पच्चीस किलो दूध और चार टाइम गोबर करके घर वालों के लिये दूध और उपलों का इंतजाम भैंस के द्वारा हो रहा था कि अचानक एक सिरफ़िरे डायरेक्टर की नजर उस पर पड़ गई थी, दोनों ने एक दूसरे को कनखियों से देखा था, घर के मालिक ने भैंस के दूध की खीर खिला कर भैंस के फ़िल्म में काम करने की बात भी पक्की कर डाली। जब गाँव भर के भैंसों को पता चला था सबने बहुत रोका लेकिन भैंस पर तो हिरोइन बनने का ऎसा भूत सवार था कि नहीं मानी।

अब भैया फ़िल्मों में भैंस भी कभी हिरोइन बन सकती है कोई सोच नहीं सकता था, खुद भैंस को भी ये यकीन नहीं हो रहा था कि कोई उसके रूप रंग पर फ़िदा होगा, और उसे फ़िल्म की हिरोइन का रोल देगा। वो बार-बार पानी की होद में अपने चेहरे को निहार रही थी, और मन ही मन खुद को ब्लैक ब्यूटी पुकार रही थी। ताज्ज़ुब तो इस बात का हुआ जब भैंस को डायरेक्टर ने मिस कहकर पुकारा, अब तक कम से कम चार पडिया को जन्म दे चुकी थी। सोच कर फ़ूली न समाई । उसे दिन में ही करीना, कैटरीना के सपने आने लगे, अब तो मुहल्ले भर के लड़के मिस बोल कर सीटी बजाने लगे। अब कोई भी उसकी तुलना काली मोटी बदसूरत महिलाओं से नहीं कर पायेगा। हो सकता है उसे भी प्यार से शाहरूख या सेफ़ मिस युनिवर्स कह कर बुलायेगा। उसकी हैल्थी बोडी को देखकर टुनटुन भी कह देंगे तो भी चलेगा। कम से कम हिरोइन तो कहलायेगी ही। 

मै बैठी-बैठी मिस की खूबसूरत आँखों, मतवाली पूँछ के बारे में सोच ही रही थी कि दरवाजे की घंटी बजी, मैने दरवाजा खोला, बाहर झाँका तो एक भैंस दिखाई दी, जो लाल रंग की साड़ी लपेटे गोबर में लिथड़ी खड़ी थी, ध्यान से देखा तो मै चौंक पड़ी अरे यह तो हमारी मिस है, अरे क्या हुआ बहन? सहसा मेरे मुह से निकला। मिस के चेहरे की दुर्दशा बता रही थी कि गुजरी रात उसे पार्लर ले जाया गया होगा, गाढे लाल पेंट की लिपस्टिक देखकर लगता था किसी का खून पीकर आई हो, शायद किसी ने खूनी समझ मारा भी था उसे, मोटी मगर खूबसूरत आँखों का काजल बह-बहकर उसके साथ हुये हादसे को कुछ परसेंट बयान भी कर रहा था। मुझे देखते ही वो बुक्का पाड़ कर रोने लगी, मुझसे उसका रोना देखा नहीं जा रहा था, मैने तुरंत एक बाल्टी में पानी, और कुछ फ़्रूट्स लाकर रखे, अब हिरोइन बन कर यही तो खाये होंगे बेचारी ने...

मिस रोये जा रही थी, मैने प्यार से उसके सिर पर हाथ फ़ेरा उसने बोलना शुरू किया,-  “ क्या बताऊं दीदी किस बुरी घड़ी में मैने गली के सारे भैंसों स नाता तोड़ कर उस मुये डायरेक्टर से नाता जोड़ लिया, उसने मेरी शादी भी कराई, मैने रात-दिन एक कर दिया था फ़िल्म की शूटिंग में, पच्चीस किलो दूध देती थी बिना कोई फ़ीस लिये, लेकिन जैसे ही फ़िल्म परदे पर आई मुझे कोई पूछता तक नहीं। जैसे-तैसे अपनी फ़िल्म देखने हॉल में घुस गई तो गार्ड ने मार-मार डंडे बाहर निकाल दिया। अब भला ये भी कोई बात होती है? क्या हम नारी जाति के अधिकारों का इसी प्रकार शमन होता रहेगा? मुझ बिरहन का साथी जिसके साथ शादी रचाई मुझसे बात तक नहीं करता है। भैंसे को छोड़ मैने एक इंसान से शादी कर ली, कुछ नहीं सोचा अपनी बिरादरी के बारे में कि लोग क्या कहेंगें... अब इस अवस्था में जब मै कहीं की न रही बाहर निकाल दी गई। आप ही बताईये दीदी एक शादी के रहते हमारी बिरादरी में कौन मुझसे शादी करेगा। 

उसकी नाजुक हालत थी फिर भी पूछना तो बनता ही था मैने कहा, तो तुम बताओ मै क्या मदद करूं तुम्हारी। उसने कहा दी बहुत उम्मीद के साथ आपके द्वार पर आई हूँ, आप भी एक नारी हैं मेरा दर्द अच्छे से समझेंगी और मुझे न्याय दिलवायेंगी। मुझे मेरे पति ने धोखा दिया है, सी आर पी सी की धारा 125 के तहत मुझे गुजारा भत्ता तो मिलना ही चाहिये। मिस की दलील सही थी, अदालत में याचिका दर्ज करवा दी गई, लेकिन दूल्हे और डॉयरेक्टर को कोई सज़ा मिले इसके पहले ही आऊट ऑफ़ कोर्ट सेटलमेंट हो गया, अब मिस प्रोड्यूसर के यहाँ बाड़े में रहती है, सिर्फ़ चारा खाकर दस किलो दूध देती है, इस उम्मीद के साथ की उसे अगली फ़िल्म की शूटिंग के लिये फिर बुलाया जायेगा। 

Sunday, July 19, 2015

ऑनलाइन पूजा कर भगवान को प्राप्त करें




जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा और हर साल उमड़-घुमड़ कर आने वाले श्रद्धालुओं की भक्ति देख कर मन प्रफ़ुल्लित हो उठता है, लेकिन पुलिस की चौकस निगरानी, सरकार की ओर से भक्तों के लिये सभी प्रकार की सुविधाये, साधु-संतो के पहचान पत्र तक बन जाने के बाद भी जगन्नाथ पुरी में इतनी प्राणघातक भगदड़ का मचना आश्चर्य में डाल देता है। 

धार्मिक स्थलों का हमारे जीवन में बड़ा महत्व है। जितने भी पाप-पुण्य किये जाते हैं, यहाँ जाकर ही इनकी धुलाई हो पाती है। मै भी एक बार ऎसे ही एक तीर्थ स्थल पर गई थी, उस वक्त यह महसूस किया कि आम आदमी को भगवान के दर्शन करने के लिये कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, रस्से के इस बार हम और रस्से के उस पार भगवन और बीच में ही वी आई पी समुदाय जो बड़ी आसानी से भगवान तक पहुंच जाता है, दर्शन करता है, स्तुति करता है, नहला धुला भी सकता है, इसके विपरीत हम दर्शन के प्यासे साथ ही भूखे-प्यासे, गर्मी सहते, पसीने की दुर्गंध सहते धूप में घंटो सिकते रहते हैं, तब जाकर भगवान की कंदरा के समीप आते हैं, लेकिन यह क्या! पंडे-पुजारियों के हाथों द्वारा ऎसे खदेड़ कर बाहर निकाल दिये जाते हैं जैसे हमसे बड़ा भिखारी कोई दूसरा है ही नहीं,...

अब आपको क्या लगता है किसी बच्चे को इतना ज्यादा सताया जायेगा तो क्या वो रोयेगा चिल्लायेगा नहीं? हुड़दंग भी मचायेगा, रस्सा तोड़ कर भगवान के पास जाने का पूरा प्रयास करेगा। लेकिन सफ़ल नहीं हो पायेगा... तो अब इस धक्का-मुक्की का मर्म समझ आया है, और भगवान के प्रेमियों से मेरी गुहार है, वो जो हमारे हृदय में विराजमान है उसे रथ खींचकर या गंगा-जमुना में डुबकी लगाकर प्राप्त नहीं किया जा सकता।
सोचो अगर भगवान को मिलना ही होता तो तुम यूँ जलील न होते, तो घर बैठिये और ईश्वर को खुद में ही तलाश करिये ताकि पुलिस और सरकार का समय बर्बाद न हो हम भी सुबह-सुबह चाय के साथ कोई अच्छी सी खबर पढ़ सकें कि इस साल सभी श्रद्धालुओं ने ऑनलाइन पूजा की और भगवान जगन्नाथ का रथ भी खींचा। जब भगवान खुद इंटरनेट पर उपलब्ध है तो ये मार-धाड़ किसके लिये कर रहे हो।

सुनीता शानू

Thursday, July 2, 2015

मुहल्ला अस्सी क्यों नहीं देखेंगें...?







मुहल्ला अस्सी का ट्रेलर देखा, देखते ही बचपन में होने वाली रामलीला याद आ गई, याद आ गये वे सभी भांड जो देवी-देवताओं का स्वाँग धरकर पैसा माँगते फिरते हैं, मुहल्ला अस्सी में भी देवी-देवताओं का स्वाँग रचकर गाली-गलौज की गई है, हम बेशक सारा दिन मंदिर की घंटियाँ न बजायें लेकिन फ़िल्म में एेसा कुछ देखते ही हमारी भावनायें आहत होने लगती हैं तो हैं। एक बार की बात है जब हम बच्चे रामलीला देख रहे थे अचानक पर्दा खुल गया तब देखा हनुमान जी और सीता जी बैठे बीड़ी पी रहे थे, ये बात तो हिंदुओं की रामलीला की है, हमारी जमादारनी ने आकर बताया कि हनुमान जी संजीवनी लाते वक़्त तार पर से गिर गये थे, जैसे ही श्री राम ने कहा हे तात तुम अब तक नहीं आये हनुमान जी ग़ुस्से में चिल्लाये," सुसरा के तात तात करै है, मेरी तो टाँग टूट गई है..." सुनकर हम सबको हँसी आ गई। कहने का तात्पर्य यह है कि इंसान स्वाँग धर सकता है, उससे राम या शिव रूपी आचरण की उम्मीद करना बेवक़ूफ़ी है, सच हमेशा विभत्स ही हुआ है, मुहल्ला अस्सी में भी इंसान का असली रूप सामने आया है कि इंसान इतना कुरूप है जो भगवान का रूप धर कर भी उन जैसा आचरण नहीं कर सकता। मुझे लगता है फ़िल्म का मक़सद सच को सामने लाना है, तो देखें और समझे कैसे भांड देवी-देवताओं का स्वाँग रच कर सबका मनोरंजन करते हैं असल जिंदगी उनकी भी यही है परदे के पीछे का चेहरा देखने में गुरेज़ क्यों? बस मनोरंजन करें और हँसे-हँसाये। 
जहाँ तक हो सके गाली-गलौज नहीं होने चाहिये, लेकिन कुछ लोगों को छोड़ दें तो बाकी बिना गाली के बात करते नजर ही नहीं आते हैं, आधे से ज्यादा टी वी शोज़ में भी गालियां प्रधान हैं, ऎसे में मुहल्ला अस्सी न देखना कोई तुक नहीं बनता। विरोध करना है तो सबका करो और जमकर करो। और शुरुआत खुद से करो,...वरना कहना पड़ेगा "पर उपदेश कुशल बहुतेरे",,,।

Friday, June 19, 2015

देखना कहीं हमारी जीभ गायब न हो जाए (नवभारत में प्रकाशित)


सुनीता शानू
एक कमरे में ऎसे गुमसुम बैठे हैं, जैसे किसी शोक सभा में मौजूद हों। कभी लगता है सब के सब गूंगे-बहरे हो गए हैं। कान में मशीन घुसा ली है। कुछ लोग बीच-बीच में मुस्कुराते हैं, कभी गुस्सा करते हैं तो कभी हंसते भी हैं। लेकिन एक-दूसरे को देखते तक नहीं। यूं कहें कि एक दूसरे को देखने भर की फुरसत तक नहीं है बेचारों के पास। हां जी, बहुत व्यस्तता है। यदि आप चाहेंगें तो मोबाइल पर उन्हें देखने की इच्छा जाहिर कर सकते हैं। देखिए तो खट से मुस्कराती हुई खूबसूरत सेल्फी हाजिर हो जाएगी। मोबाइल हो या कम्प्यूटर, उंगलियां हिलती हैं अक्षर बोलते हैं, पर स्वर खामोश हो गए हैं।
जी हां, यही सच है जो दिखाई दे रहा है। अक्षर उग रहे हैं। लोग अब उंगलियों से बात करते हैं। सबके हाथ में एक खिलौना है और हर उम्र के लोग इससे खेल रहे हैं। ये खिलौना कुछ भी हो सकता है- मोबाइल, टेब्लेट या कम्प्यूटर, लेकिन सबके सब इतने ज्यादा व्यस्त हैं कि न खाने की फुरसत है न पानी की प्यास। खाना भी होगा तो एक हाथ पास पड़ी प्लेट में कुछ ढूंढता-सा जाएगा और लौटकर मुंह तक आ जाएगा। यह देखने की फिक्र भी नहीं कि उस पड़े हुए खाने पर कोई कीड़ा तो नहीं बैठ गया।
यदि कोई कान में हैड फोन घुसेड़े, आंखें मोबाइल पर टिकाए बैठा-बैठा तरह-तरह की भाव-भंगिमाएं बनाए जा रहा है तो खुद ही समझ जाइए, वो बहुत जरूरी मीटिंग में बिजी है। वैसे ये भी कोई बड़ी बात नहीं कि वो उसी कमरे में बैठे किसी शख्स से गुफ्तगू कर रहा हो। सच यह है कि जो लोग सामने देखकर भी नमस्ते नहीं कहते थे, पहचान भी न पाते थे, अब फेसबुक और वॉट्स ऎप पर नियम से माते गुड मॉर्निंग, लव यू माते, या कुछ ज्यादा ही अपनापन दिखाते हुए पूछते हैं- दोस्त भूल गए क्या? कहना गलत नहीं होगा कि मोबाइल से बच्चों में गुड मॉर्निंग और गुड नाइट कहने का शऊर आ गया है। वरना जब हम बच्चे थे, माता-पिता हमें समझाते ही रहते थे कि बेटा सुबह सबको नमस्ते कहा करो, किसी अनजान को नमस्ते कहते हुए तो सच नानी याद आ जाती थी, लेकिन मोबाइल और फेसबुक की दुनिया ने हमारे बच्चों को ये सारे एटिकेट्स फॉलो करवा ही दिए हैं। घर वालों को बेशक नमस्ते बोलने में देर लगे, दुनिया-जहान के दोस्तों को सुबह उठने के साथ ही गुड मॉर्निंग और रात के समय गुड नाइट लिखकर सोना नहीं भूलते।
इन साइट्स पर बहुत सारे ग्रुप बन गये हैं जिसमें दीदी, मम्मी, चाची, ताई, भाई सा, बिटिया, मित्र जैसे संबोधन इस्तेमाल होते हैं। देखकर लगता है, संयुक्त परिवार का निर्माण यहीं होने वाला है। घर के लोग बेशक पराये से हो गए हों, लेकिन दूर-दूर के लोग जिनके दर्शन भी दुर्लभ थे, क्लॉज फ्रेंड बन गए हैं। इससे साबित होता है कि हम सब में वसुधैव कुटुंबकम की भावना अधिक घर कर गई है।
कहने का मतलब यही है कि हमारे देश के लोग शांतिप्रिय हो गए हैं। आज पत्नी भी महंगी साड़ी या गहनों की डिमांड नहीं करती, सीधे कहेगी- जानू एक आई फोन ला देना बस। ज्यादा खर्चा करने की जरूरत नहीं है। बच्चों को भी बर्थ डे पर फोन विद रिचार्ज कूपन दे दो, फिर देखो। सच्चा सुख इसी में मिल जाएगा जब आप दुनिया के सबसे अच्छे पापा और पति कहलाएंगे।
अब आप जरूर सोच रहे होंगे कि जब सब अच्छा हो रहा है तो मैं क्यों परेशान हूं। तो भैया मुझे फिक्र है मेरी खूबसूरत जीभ की। सोचिए तो, जिस प्रकार पूंछ उपयोग में न आने के कारण हमारे शरीर से लुप्त ही हो गई, अब हमारा प्रबल हथियार हमारी जीभ ही न रहेगी तो क्या होगा?

Friday, June 5, 2015

पर्यावरण विशेष

पेड़-पौधे परिवार के सदस्यों की तरह समझे जायेंगे तो वातावरण भी हमारे घर में रिश्तों में आई मिठास सा घुल जायेगा, जैसे परिवार का हर सदस्य घर में कुछ न कुछ योगदान देता ही है, पेड़-पौधे भी मनुष्य जीवन के लिये अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं...
एक समय था जब हम अपने घर की क्यारियों में ही पालक, मैथी, धनिया, टमाटर, ग्वार फली, चौलाई, भिंडी, बैंगन, आलू, फूल गौभी सब उगाया करते थे, हमें आज भी ज़मीन में बीज बोने से लेकर घर में सब्ज़ी बनाने तक का स्वाद याद है, लेकिन ये पिलानी की बात थी...
 दर असल इंसान जो भी करता है, फल की इच्छा में करता है, कुछ पेड़ पौधों से फल तो कुछ से फूल प्राप्त होते हैं, कुछ से हरियाली मिलती है जो कि डॉक्टर की माने तो आँखो को दुरुस्त, मन को महका देती है, जैसे चाय के बाग़ान में जायेंगे तो हरियाली देखकर, पत्तियों की महक पाकर ही दिल बाग-बाग़ हो जायेगा, कहने का मतलब यह है कि कुछ न कुछ तो मिलता ही है, सो पर्यावरण के नाम एक दिन नहीं हर दिन समर्पित कर हमें इसका लाभ उठा ही लेना चाहिये...
आज दिल्ली जैसे महानगर में गमलों में ही हमनें कुछ पौधे जैसे,- साइकस, फाइकस, चमेली, गुड़हल, बोगनविलिया, ग्वार पाठा, गुलाब... आदि विभिन्न प्रकार के पौधे लगा आत्म संतुष्टि हासिल करने की कोशिश की है... साथ ही हरियाली तो रहती ही है, ताकी आँखें तेज की जा सके...बग़ीचे की देखभाल, नये पौधे लगाना, गुड़ाई निराई का हम दोनों को आज भी बहुत शौक़ है, नन्हें पौधों को बच्चों की तरह समय-समय पर खाद पानी देकर पाला जाये, और बुज़ुर्ग पेड़ो को भी जो फलदार हैं या सिर्फ छांवदार है, समय-समय पर कटाई निराई की आवश्यकता, समझ देखभाल की जाये तो ऑक्सीजन का स्तर बढ़ेगा और दम घोटूँ वातावरण से निजात पाई जायेगी...
पर्यावरण की आवश्यकता आप भी समझें...।

Wednesday, June 3, 2015

ये सोशल साइट्स कहीं समाज में दहशत फैलाने का कार्य तो नहीं कर रही हैं?



आईये विचार करें..

सोशल साइट्स के ज़रिये जनता ने दामिनी, सुनंदा जैसे कई केस ऎसे हैं जिनमें अपराधियों को अंजाम तक पहुंचाया है, लेकिन अब तो ऎसा चलन हो गया है। कुछ समय से व्हाट्स एप जैसी साइट्स पर लोग दहशत फैलाने वाले विडियों अपलोड करते हैं साथ ही हिदायत देते हैं कि इस विडियो को जितना हो सके ज्यादा से ज्यादा फैलाया जाये।

आज ऎसा ही एक वाकया मेरे ग्रुप में हुआ किसी महिला के पास कहीं से एक विडियो आया और उन्होनें तैश में आकर उसे सभी ग्रुप्स में इस हिदायत के साथ पेश किया कि इसे जितना फैला सकते हो फैलाओ, ताकि मोदी तक ये बात पहुंचे और इस कुकृत्य पर सरकार कोई एक्शन भी ले सके। अपना फ़र्ज़ समझ सब यही करने लगें होंगे, ग्रुप में एक लड़की की इस विडियो को देख कर तबीयत भी बिगड़ गई।  लिखना तो नहीं चाहती थी, लेकिन लिखने पर विवश हो गई हूँ...

आप सोच रहे होंगे उस विडियो मे ऎसा क्या था, उसके साथ भेजे नोट पर लिखा था कि यह आंध्र प्रदेश की घटना है, इस लड़की को कुछ लोगों ने मिलकर मारा और जिंदा जला दिया। अब विडियो ऎसा था कि देखकर रौगंटे खड़े हो जाना स्वाभाविक सी बात थी, लेकिन उस भीड को देख कर मै दंग रह गई, करीब सौ सवा सौ लोगों की भीड़ में सिर्फ़ चार या पाँच लोगों का इस अज़ीब कारनामें को अंजाम देना।  जिसमें दो महिलायें भी शामिल थी, मन में कुछ प्रश्न उठे,... क्या इस तरह के विडियो हमें यहाँ-वहाँ फैला देनें चाहिये? क्या ऎसा करने से हम समाज में दहशत नही फ़ैला रहे हैं, वो भीड़ क्यों खामोश थी, किसी ने बीच बचाव क्यों नहीं किया, पुलिस को खबर क्यों नहीं दी? उस लड़की ने ऎसा क्या किया था,,, वगैरह-वगैरह। मुझे लगा मुझे इसकी जानकारी किसी बड़े अधिकारी को देनी चाहिये...

आप सबको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह घटना आँध्रप्रदेश की थी ही नहीं। ये किसी बाहर के देश (Guatemala) का विडियो था जिसमें किसी लड़की को ड्राइवर के खून और लूट के इल्ज़ाम में भीड़ के द्वारा पीटा जा रहा था। जब मैने यह घटना लिंक के साथ ग्रुप में डाली तो उस विडियो डालने वाली लड़की ने माफ़ी मांगते हुए कहा कि मुझे किसी ने भेजा था, मैने भी आगे भेज दिया...

दोस्तों आप सभी से निवेदन है इस आगे भेजने वाली बीमारी से बचे, यदि कहीं से कोई सूचना आती थी है तो पुलिस में खबर करें या तुरंत डिलिट मारे भेजने वाले को हिदायत भी दे दें की हम इसे पुलिस में तुम्हारे नाम और फोन नम्बर के साथ दे रहे हैं, हो सकता है आपके द्वारा यह दहशत फैलने का कार्य यहीं पर समाप्त हो जाये।
सुनीता शानू