Thursday, July 7, 2016

अँधेरे का मध्य बिंदु उपन्यास की समीक्षा

अँधेरे से उजाले की ओर ले जाती प्रेम-कहानी



"अँधेरे का मध्य बिंदु " वंदना गुप्ता का प्रथम उपन्यास है । इससे पहले उनकी पहचान एक कवयित्री और एक ब्लॉगर के रूप में ही थी...
सबसे पहली बात मेरे मन में जो आती है वह ये है कि जिस विषय पर हमारा समाज कभी बात करना पसंद नहीं करता, जिसे नई पीढी की उच्छंखलता, गैरजिम्मेदाराना हरकत, या पाश्चात्य समाज की नकल कह कर नक्कार दिया गया है, उसी विषय को उठाकर सामाजिक बेडियां तोड़ते हुए कलम चलना कोई मामूली बात नहीं है। शायद पाठक यह नहीं जानते कि लेखिका के मन में समाज में फैली बुराइयों के प्रति आक्रोश के बीज बहुत समय पहले से ही पनप चुके थे, जिन्हें वह अपनी कविताओं के माध्यम से कई बार समाज के सामने लेकर आई भी हैं, इसी समाज को, और सदियों से चले आ रहे वैवाहिक बंधनों को चुनौती देता यह उपन्यास वाकई काबिले तारीफ़ कहा जायेगा।
वन्दना गुप्ता के उपन्यास का नाम है, “अंधेरे का मध्य बिंदु” उपन्यास के प्रथम अध्याय में पाठक यह विचार लगातार करता है कि कहीं कुछ ऎसा मिले जिससे यह ज्ञात हो कि इसका नाम अँधेरे का मध्य बिंदु ही क्यों रखा गया है, तो सम्पूर्ण उपन्यास पढ़ने के उपरान्त ही आप भली-भांति इस बात से परीचित भी हो जायेंगें, कि सिर्फ़ विवाह के बंधन में बंध जाने से ही ज़िंदगी में उजाला नही आता, रिश्तों में दोहरापन, शक, और अभिमान ऎसे मुद्दे हैं जिनके रहते विवाह के बाद भी जीवन में अँधकार छाया रहता है, एक दूसरे के प्रति प्रेम,विश्वास और समर्पण द्वारा ही जीवन में खुशियाँ लाई जा सकती है तथा समाज में फैले अज्ञानता के अंधेरे को दूर करना ही इस उपन्यास का मकसद है...।
मै यह नहीं कहूँगी कि वन्दना का यह उपन्यास पूरी तरह से अपनी बात कह पाया है, या इसमें कोई कमी नहीं है, लेकिन यह अवश्य कहूँगी कि यह वन्दना गुप्ता का प्रथम उपन्यास है, इस नाते कुछ सामान्य गलतियों अथार्त दोहराव को नक्कारा जा सकता है, जैसे पूरे उपन्यास में एक शब्द “मानो” का प्रयोग अत्यधिक किया गया है, जिसे कम किया जा सकता है। इन छोटी-मोटी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते हुए हम कह सकते हैं कि वन्दना गुप्ता अपनी बात कहने में सफ़ल रही है। उपन्यास में निहित उनके तमाम विचार जनसाधारण को आकर्षित करते है। भाषा का फूहड़पन कहीं पर भी परिलक्षित नहीं होता है, न ही सपाट बयानी नजर आती है, वरन उपन्यास पढ़ते हुए वंदना गुप्ता की कल्पनाशक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है।
विवाह चाहे अरेंज हो या प्रेम विवाह दोनों में ही प्रेम, विश्वास, और स्वतंत्रता का होना जरूरी है, वन्दना उपन्यास के माध्यम से यह संदेश देना चाहती है कि कोई भी किसी दूसरे को जबरन रिश्तों में बाँधकर नहीं रख सकता, अगर रिश्तों में परस्पर प्रेम, विश्वास तथा स्वतंत्रता बनी रहेगी तो वह रिश्ता अधिक टिकाऊ होगा, और ज़िंदगी खुशी-खुशी जी जायेगी, वरना ज़िंदगी भर यही रोना चलता रहेगा कि विवाह करके गलती की, या प्रेम करके गलती की। उपन्यास में बहुत से उदाहरणों द्वारा वंदना ने लीव इन रिलेशन के हानिकारक परिमाणों की ओर इशारा किया है, जिन्हें पढ़कर लगता है कि वह सब सच्ची घटनायें है, इसके साथ ही कुछ ऎसे उदाहरण भी आपको पढ़ने को मिल जायेंगे जहाँ शादी-शुदा जोड़े एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते हुए जीवन जीने पर मज़बूर हैं... इन सभी बातों को रखते हुए वंदना की उपन्यास को रोचक बनाने की मेहनत साफ़ दिखाई दे रही है।
अंधेरे के मध्य बिंदु के नायक-नायिका विवाह जैसे बंधन में नहीं बँधना चाहते हैं वह चाहते हैं कि उनका रिश्ता एक दूसरे के प्रति प्रेम-समर्पण तथा विश्वास का रिश्ता हो, जिसमें कोई भी एक दूसरे से किसी प्रकार की अपेक्षाऎं न रखें वरन ज़िंदगी की जिम्मेदारियों को दोनों ही मिलकर उठायें। उपन्यास में नायक-नायिका के प्रेम-समर्पण-विश्वास को इतना अधिक दिखाया गया है कि पाठक जब स्वयं की ज़िंदगी से तुलना करने लगता है तो उसे यह सब महज़ एक कल्पना सी लगती है, क्योंकि पाठक अपने आप को नायक-नायिका की तरह नहीं देख पाता है, उसकी स्थिती “लोग क्या कहेंगे” में आकर अटक जाती है, इसी समस्या को एक सोशल वर्कर के रूप में शीना को दिखाते हुए लेखिका ने हल किया है, साथ की एड्स जैसे रोग को बड़ी सावधानी के साथ उपन्यास का एक महत्वपूर्ण अंश बनाते हुए कारण-निवारण तक समझा दिये हैं।
अंत में वंदना गुप्ता को उनके प्रथम उपन्यास पर मै शुभकामनायें देते हुए इतना ही कहना चाहूंगी कि उनकी कलम रूकनी नहीं चाहिये, साथ ही यह आशा करती हूँ कि वे जल्द ही पाठकों को एक और नया उपन्यास देगीं...

सुनीता शानू


Wednesday, May 25, 2016

मातॄ दिवस पर ...

प्यारी बेटी सुगंधा,

ढेर सारा प्यार एवं शुभाशीष

तुम जानती हो मेरे लिये तुम्हारा होना क्या मायने रखता है,  तुम्हारे होने से मै खुद को भरा-भरा महसूस करती हूँ, मुझे याद है जब तुम इस घर से विदा हुई थी कितना रोई थी, उस वक्त तुम्हारा रोना हम सबको कई हफ़्तों तक रुलाता रहा था, रातों को अचानक नींद खुल जाती थी... कहीं तुम अब भी रो तो नहीं रही हो, लेकिन ससुराल से लौट कर तुमने सास-ससुर, ननद और पति की इतनी बातें की कि तुम्हारी खुशी सारे घर की घबराहट को एक पल में भुला गई थी।
 सच कहूँ तो मै बहुत खुश हूँ तुमने ससुराल में सबके दिलों में अपना घर बना लिया है, तुम अपनी दुनिया में खुश हो, तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है, तुम्हारे लौटकर आने पर सारे घर में हंसी की लहर फैल गई थी, मै चाहती थी तुम कुछ दिन रुक जाओ, लेकिन तुमने कहा माँ मुझे जाना होगा, ससुर जी मेरे हाथ की ही चाय पीते हैं, सासु माँ मेरे बिना मंदिर नहीं जाती होगी, इनको तो यह भी नहीं मालूम कि इनकी जुराबे कहाँ रखी है? मै चुपचाप तुम्हारा चेहरा देख रही थी कि तुम कितनी जल्दी पिता की जरूरत को भूल गई कि वो तुम्हारे बिना एक कदम भी नहीं चल पाते हैं, मुझे भी खड़े रहने में दिक्कत होती है। तुम कितनी जल्दी भूल गई कि इस घर में तुमने उन्नीस साल बिताये थे, आज जल्दी जाने की जल्दी मची थी, लेकिन इसमें तुम्हारा कुसूर नहीं था, तुम्हारे जन्म के साथ ही यह निश्चित हो गया था कि एक दिन तुम हम सबको छोड़कर किसी और का घर बसाने चली जाओगी। मुझे याद है, मैने कहा था हम औरतों की ज़िंदगी में यही होता है, हमें अपने प्यार की खुशबू पूरे गुलशन में बिखेरनी होती है,
तुम्हें याद होगा कितना अच्छा लगता था जब तुम सब बहन भाई घर भर में हुड़दंग मचाया करते थे, और पूरे घर को अस्त-व्यस्त कर दिया करते थे। तुम्हें यह भी याद होगा जब तुमने अपनी गुड़ियों के लिये मेरी नई साड़ी के टुकडे-टुकड़े कर दिये थे, तब मैने तुम्हें बहुत डाँटा था, और तुमने खाना नही खाया था, बाद में अपने हाथ से मैने तुम्हे खाना खिलाया था। तुम्हारा हँसना-रोना, रूठना-मनाना बहुत याद आता है बेटी।
मै जानती हूँ तुम मेरा ही प्रतिबिम्ब हो, ज़िंदगी की हर मुश्किल का हँसते हुए सामना कर लोगी। बचपन में जब तुम नई-नई कवितायें-कहानियाँ सुनाकर इनाम जीत कर लाया करती थी, तुम्हारे चेहरे की खुशी देखते बनती थी, एक बार पन्ना धाँय के नाटक में तुमने माँ का अभिनय किया था, जिसे देखकर मै भी रो पड़ी थी, तुम किस कदर उस किरदार में खो गई थी, उसे देख कर लगता था, यह मात्र अभिनय नहीं था शायद तुम अपने भीतर उस किरदार को जी रही हो। तुम्हारा हर काम में डूब जाना ही तुम्हारी शक्ति था सुगंधा। 
मै यह भी जानती हूँ तुम बचपन से बहुत महत्वाकांक्षी रही हो, उस वक्त मै तुम्हारे पंखों को उड़ान नहीं दे पाई थी, लेकिन आज भी कुछ नहीं बिगड़ा है, मै चाहती हूँ, तुम अपने सपनों में नये रंग भरो। अपने परो को एक नई उड़ान दो, मेरी बेटी कुछ करने के लिये उम्र कभी बाधा नहीं बन सकती। तुम आज भी वह सब कर सकती हो, वह मुकाम हासिल कर सकती हो, जो कर नहीं पाई थी। 
तुम्हारे पिता और मैने तुम्हारे लिये बहुत सारे सपने देखे थे,,आज वक्त आ गया है, अपनी व्यस्तता में से अपने लिये वक्त निकाल कर अपने सपनों को आकार दो। तुम भी अपनी बेटी को मेरी बेटी जैसे संस्कार दो, ताकि उसे तुम्हारी बेटी होने का गर्व हो, माँ बनकर ही माँ की गरिमा को मै समझ पाई थी, ईश्वर से प्रार्थना है कि तुम्हारी बेटी तुम्हारा प्रतिबिम्ब नजर आये।

तुम्हारी माँ 

महानगरों में माँ बनने के मायने बदले

महानगरों में माँ बनने के मायने किस तरह बदल गये हैं, आप भी पढ़ कर अपनी राय अवश्य दें, नई दुनियां की नायिका पत्रिका में प्रकाशित एक आर्टिकल...।
मैट्रो में माँ बनने के मायने बदले
निदा फ़ाजली साहब का एक शेर है...
बाँट के अपना चेहरा, माथा, आँखें, जाने कहाँ गई
फ़टे पुराने एक एलबम में, चंचल लड़की जैसी माँ...
एक माँ की आँखों से देखती हूँ, तो लगता है कि माँ के भीतर छुपी वो चंचल लड़की जाग गई है, जिस उम्र में माँ ने बच्चों को जन्म दिया था, वह उम्र आज की लड़कियों के आसमान को छूने की है। आज लड़कियाँ अपने पैरों पर खड़ी हैं, लड़कियाँ ऊँचे-ऊँचे सपने देखती हैं, और उन सपनों में रंग भरने का जज्बा भी रखती हैं, आज लड़कियाँ यह बात अच्छे से जान गई हैं कि उनका काम विवाह करके सिर्फ़ बच्चे पैदा करना ही नहीं है, लड़कियाँ ही नहीं लड़के भी ऎसा ही जीवन साथी पसंद करते हैं, जो उनके साथ कदम से कदम मिला कर चले। उनके लिये विवाह करना और माता-पिता कहलाने से जरूरी ज़िंदगी को अच्छे से जीना है, आज जज्बात या संस्कारों की दुहाई देकर हम बच्चों के निर्णय को नहीं बदल सकते हैं...।
सेंट्रल एडॉप्शन रिसर्च अथॉरिटी( सी ए आर ए) की एक रिपोर्ट के मुताबिक पच्चास हजार बच्चे अनाथ हैं लेकिन एडॉप्शन ऎजेंसियों की लापरवाही से अथॉरिटी के पास कुल 1200 बच्चों का ही लेखाजोखा है जबकि नौ हजार भारतीय ऎसे हैं जिन्हें बच्चे गोद लेने हैं। 2015 में 1368 बच्चों को नया घर दिया गया है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गाँधी का कहना है कि कार्य प्रणाली में सुधार करके हर साल 15000 बच्चों को ऎडाप्ट किया जायेगा ताकी बच्चों का भविष्य सुदृड़ किया जा सके।
यह कहना भी गलत नहीं होगा कि आजकल की लड़कियाँ पढ़ी-लिखी और समझदार होती हैं, वे माँ बनने और बच्चों के भविष्य को लेकर हमेशा सावधान रहती हैं। एम्स की डॉ अर्चना धवन का भी यही मानना है कि आज जल्दी विवाह करने और जल्दी संतान पैदा होने की समस्या कम हो गई है क्योंकि उनके क्लिनिक में आने वाली लड़कियां बीस से चालीस साल की होती हैं जो नौकरीपेशा, पड़ी-लिखी हैं जो बच्चे को जन्म देने से पहले खुद को मजबूत करना चाहती हैं, ये वो लड़कियां हैं जो अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं हैं। डॉ धवन कहती हैं कि अधिकतर ऎसे पति-पत्नी होते हैं जिनके बच्चे नहीं हो रहे होते हैं, कुछ लड़कियाँ विवाह तो कर लेती हैं लेकिन अपना कैरियर बचाये रखने के लिये माँ बनना पसंद नहीं करती हैं, उनमें बढ़ती उम्र के कारण शारीरिक सरंचनाओं में परिवर्तन होने लगता है और हार्मोन संबंधी कई समस्यायें मातृत्व में बाधक बन जाती हैं। ऎसे में क्लिनिक में कृत्रिम विकल्पों द्वारा बच्चे पैदा किये जाने के साधन उपलब्ध हैं। उन महिलाओं को आई वी एफ़ तथा एब्रियोएडॉप्शन तकनीक द्वारा माँ बनने का सुख प्राप्त हो पाता है। कुछ स्त्री-पुरुष ऎसे भी होते हैं जो माता-पिता बनने के लिये खुद को तैयार महसूस नहीं करते, ज्यादातर ऎसी लड़कियाँ है जो विवाह तो कर लेती हैं लेकिन चालिस से पहले माँ नहीं बनना चाहती, वे एक लम्बे समय के लिये अण्ड और शुक्राणुओं को सरंक्षित करवा देते हैं, जिससे बड़ी उम्र में भी वह इच्छानुसार माँ बन सकती हैं। एक वजह सोशल मीडिया, फ़िल्म सिटी का प्रभाव भी कह सकते हैं जिसमें लड़कियाँ फ़िल्म की अभिनेत्रियों की तरह विवाह करना या माँ बनना समय की बर्बादी समझती हैं। कुछ को फ़िक्र रहती है अपने फ़िगर खराब हो जाने की, तो कुछ खुद को जिम्मेदारियों में बाँधना नहीं चाहती हैं।
यह सब देख सुन कर काफ़ी हद तक आप कह सकते हैं कि उस माँ की छवि धुँधली होती जा रही है, जिसके पाँच से सात बच्चे होने पर भी माथे पर शिकन नहीं आया करती थी, जो बच्चों को डाँटते, दुलारते अपने माँ होने पर फूली न समाती थी, एक ऎसी माँ जो बच्चों का होना पहली जरूरत समझा करती थी, मै याद करती हूँ तो आज भी माँ का नाम लेने पर मुझे वही सर पर आँचल ओढे एक चेहरा नजर आता है जो हर पल साये की हमारे साथ रहा करता था, जो हम बच्चों के जागने से पहले जाग जाता था, हमारी जरूरत की हर चीज़ उसके पास होती थी, कभी-कभी माँ हमे जादू का पिटारा सी लगती थी, बड़े भाई-बहनों के कपड़े छोटे और उनके पुराने कपड़े घर के डस्टर बन जाया करते थे, लेकिन घर में किसी भी चीज़ का अभाव माँ महसूस ही नहीं करने देती थी।
आज देखती हूँ तो घर से उस माँ का साया भी आँचल की तरह उड़ गया है, सर दर्द होने पर माथे पर माँ का हाथ नहीं होता न तेल ही मलने का समय हो पाता है, बच्चे नहीं जानते कि भारतीय व्यंजन कितने प्रकार के होते हैं, क्योंकि पकवान बनाना तो दूर, भोजन में फ़ास्ट फ़ूड का समावेश अधिक हो गया है, आये दिन होटल का खाना खाने से स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है, घर- परिवार, बच्चों की जिम्मेदारी से कतराते बच्चे एकांत चाहते हैं इसका एक दुष्परिणाम संयुक्त परिवारों का विघटन भी है, बच्चे दादा-दादी, नाना-नानी के दुलार से वंचित रह जाते हैं, आज चार-पाँच बच्चों की देखभाल तो दूर एक बच्चे की देखभाल का समय भी माँ के पास नही होता, बच्चे या तो आया के पास पलते हैं या क्रैच में पल रहे होते हैं। इससे बच्चों में घर के बड़ो के प्रति सेवा भाव नहीं पनप पाता, और धीरे-धीरे भारतीय संस्कारों का ह्वास भी हो रहा है।
इन सब बातों के बावजूद एक बहुत अच्छा पहलू भी है, वह यह कि बच्चे के जन्म से पहले ही माता-पिता अपनी संतान का भविष्य सुनिश्चित कर लेते हैं, ताकि बड़े होने पर बच्चों को परेशानी का सामना न करना पड़े। एक और अच्छी बात यह है कि भारत जैसे घनी आबादी के देश में जहाँ बहुत से बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं है वहीं अधिकतर लड़के-लड़कियाँ अनाथ बच्चों को गोद लेकर उन्हें पालने-पोसने में विश्वास करते हैं, एक तरह से देखा जाये तो यह सबसे अच्छा काम है, जिन बच्चों को समाज नाजायज या अनाथ कह कर प्रताड़ित करता आ रहा था, उन बच्चों को नया घर मिलने की सम्भावना बढ़ गई है।
मुझे लगता है बदलते परिवेश में नई पीढ़ी द्वारा अनाथ बच्चों को पढ़ाना लिखाना, माता-पिता का प्यार देना, एक नया घर देना ही सच्चे मातृत्व का सुख है।

सुनीताशानू

Friday, January 8, 2016

अतुल्य भारत अभियान का स्वप्न

पहरेदारी मुल्क की सौंप हमारे हाथ ..
सारा भारत चैन से सोये सारी रात .

भारतीय सेना के एक ऑफ़िसर विजेंद्र शर्मा की यह पंक्तियाँ बरबस ही याद आ रही हैं, आप भी सोचिये इस विषय में। हमारे बुजूर्ग कहा करते थे, "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" यानि जिनकी कथनी और करनी में फ़र्क होता है उनकी बात कोई मायने नहीं रखती।

आप समझ गये होंगे मै क्या कहना चाहती हूँ, दिल्ली सरकार द्वारा आमिर खान को हटा कर अमिताभ बच्चन को 'अतुल्य भारत' का ब्रांड एम्बेसडर बना देना कुछ लोगों को गलत लग रहा है, लेकिन सोचिये जो इंसान हिंदुस्तान में रहने से आतंकित है, और जिसकी हिंदुस्तानी पत्नी भी देश छोड़कर जाना चाहती है तो वो कैसा भारत निर्माण करेंगे? क्या संदेश देंगें?

जिस देश को हम माँ कहकर पुकारा करते हैं उसे आतंकवादियों के डर से मुसीबत में छोड़ सकते हैं? क्या अपनी माँ के साथ भी ऎसा ही सोचा जा सकता है?
मुझे लगता है एेसा ख़्याल आना भी देशद्रोह से कम नहीं है। 


आप भी यदि अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर देश छोड़ देना चाहते हैं तो उन लाखों वीर जवानों के परिवारों का क्या होगा जो देश की रक्षा में खुद को झोंक रहे हैं, आमिर खान और उसकी पत्नी सरीखे न जाने कितने परिवारों की सुरक्षा का दायित्व उठाये हुये हमारे देश के वीर कहीं जाने की नहीं सोचते, सच्चा भारत निर्माण इन्हीं से है, मुझे लगता है सरकार को किसी अभिनेता की अपेक्षा यह संदेश देने के लिये उन वीर सैनिकों को आगे लाना चाहिये, जिनकी बातों में ही नहीं खून में भी देशभक्ति का जज्बा होता है, ताकि हर देश वासी में देश के प्रति देशभक्ति पैदा हो न की मुसीबत में भाग खड़े होने की बातें हो।

जयहिंद

Friday, October 30, 2015

हाँ मै व्रत रखती हूँ...



जब बहुत छोटी थी तब माँ को देखा करती थी करवाचौथ का व्रत करते हुयें. माँ सजधज कर जब बहुत सारे पकवान बनाया करती थी, हम बच्चे आश्चर्य करते थे कि माँ ने पानी तक नहीं पिया है कहीं गिर न जाये, पिता माँ का पूरा ख्याल रखते थे, यहाँ तक की आटा लगाना सब्जी काटना जैसे काम करने से भी नहीं चूकते थे। लेकिन माँ बार-बार उन्हें मना करती थी हाथ बँटाने को। बस कमी थी तो एक की मेरे पिता माँ के सोलाह सिंगार उनकी खूबसूरती देख नहीं पाते थे सिर्फ़ उनकी आवाज में उनकी काम करने की फ़ूर्ती में महसूस कर पाते थे। करवाचौथ का व्रत मेरी माँ के लिये उत्सव जैसा होता था।

हमारे यहाँ राजस्थान में कुवाँरी लड़कियाँ भी व्रत रखती थी, मैने भी माँ को देखकर जब पहला व्रत रखा। तब माँ से पूछा था, यह व्रत आप क्यों रखती हो? तब उन्होनें बताया, तेरे पिता का स्वास्थ्य अच्छा रहे, उम्रभर वो मेरे साथ रहें घर में खुशहाली रहे बस। मैने पूछा तो मै किसके लिये रखूं? माँ ने कहा तुम्हें अच्छा सा दूल्हा मिलेगा... अब यह बात मुझे बहुत अज़ीब सी लगी... व्रत करने से दूल्हा अच्छा कैसे हो जायेगा माँ जब किस्मत में बुरा लिखा है तो बुरा ही मिलेगा न... अब जवाब मा की अपेक्षा पिता ने दिया... उन्होनें कहा प्रार्थना में बहुत बड़ी शक्ति है बेटा, आप व्रत न भी करो, दृड़ संकल्प और इच्छा शक्ति से आप कुछ भी प्राप्त कर सकती हो... नारी तो खुद एक शक्ति है जो बड़े-से बड़े संकटों से पूरे परिवार की रक्षा करती है.... सचमुच वह दिन और आजका दिन मुझे एक सा लगता है। 

वैसे मै व्रत बहुत कम करती हूँ लेकिन करवाचौथ का व्रत मुझमें इतनी शक्ति भर देता है कि मै पूरा दिन पानी की बूंद भी हलक से उतरने नहीं देती, सब कहते हैं तुम व्रत रोज़े की तरह मत रखा करो, लेकिन शायद बचपन से ही मुझमें वो शक्ति पैदा हो गई है जो मेरी माँ की निष्ठा मेरे पिता के विश्वास की तरह मुझमें पनपती रही है। हालांकि इस व्रत की कथा में मै विश्वास नहीं कर पाती हूँ।

तुम आज की अधुनिक नारी मुझे रूढिवादी कह सकती हो। हाँ मै व्रत करती हूँ। लेकिन अपने दिल के सुकून के लिये। अपनी माँ की निष्ठा के लिये। एक अदृष्य शक्ति जो मुझे तुम्हारे करीब खींचकर ले जाती है। जोड़े रखती है तुम्हारी सांसो से। मै व्रत रखती हूँ सिर्फ़ अपने लिये...। 


Wednesday, October 14, 2015

देखना ये विश्वास टूटने न पाये


ये बुराड़ी के एक वृध्दाश्रम की तस्वीरें हैं, जहाँ हम पूरे परिवार के साथ खाना खिलाने गये थे, जाने से पहले मन में बहुत उत्साह था, कि उन लोगों को देखूंगी जो स्वेच्छा से अपने बच्चों से दूर रहते हैं, या जिन्होनें संसार से विरक्त होकर सन्यासी जीवन जीने की चाह रखी होगी। 
लेकिन वहाँ जाकर बिलकुल उल्टा ही देखा, उन वृद्ध लोगों में सत्रह महिलायें ही थी, एक बुजूर्ग थे जो किसी सभ्य परिवार से लग रहे थे। उन सब से मिलकर पता चला कि वे अपने घर बच्चों के पास लौटना चाहते हैं, कुछ ने अपना पता देकर छोड़ आने की गुजारिश की, तो एक वृद्ध महिला ने मेरा हाथ पकड़ कर पूछा क्या मैने उसको पहले कहीं देखा है, उनकी आँखों की नमी देखकर मै कहने पर मजबूर हो गई कि हाँ मैने उन्हें देखा है, इतना सुनते ही वो रो पड़ी और बोली, बेटी है मेरे बेटे से कहना मुझे आकर ले जाये, ये जेल खाना है, मेरा मन नहीं लगता। एक बारगी उनके आँसू देखकर मन भर गया, मै परेशान हो उठी कि क्या ये अच्छी बात है कि बुजूर्गों को ताले में रखा जाये! जब उनकी देखभाल करने वाली महिलाओं से बात की तो पता चला इनमें से ज्यादातर वो महिलायें हैं जिनके बच्चे उन्हें अस्पताल में छोड़ गये थे, और फिर लेने तक नहीं आये। जिन्हें पुलिस खुद उस वृद्धाश्रम में छोड़ गई है। उन्हें देखकर बहुत तकलीफ़ हुई।

दोस्तों क्या सचमुच कोई ऎसा कर सकता है? यदि आपको ऎसा लगता है कि माता-पिता बोझ हैं तो उनसे भी बड़ा बोझ आप स्वयं हैं। आने वाले समय का आइना अवश्य देख लें कहीं आपका चेहरा इनसे भी बदतर न हो जाये.... 
मुझे लगता है हम सब मिलकर ज्यादा कुछ नहीं तो दो पल इन्हें देकर इनके चेहरे पर हँसी ला सकते हैं... और शुरूआत कीजिये सबसे पहले अपने-अपने घरों से... 


ये दोनों पैसठ से सत्तर के आस-पास हैं लेकिन वक्त से पहले ही चेहरा ये हुआ 

ये राधिका सब भूल सी गई है, इसे बिंदिया, चूड़ी पायल चाहिये

इन्हे अपने बच्चों का बेसब्री से इंतजार है और विश्वास भी कि वो आयेंगे...

Friday, July 31, 2015

बाढ़ की सम्भावनायें सामनें हैं...

                             


  बाढ़ की सम्भावनायें सामनें हैं/ और नदिया के किनारे घर बने हैं... आप सोच रहे होंगे कि उस शख्स को तो फिर डूब ही जाना पड़ेगा।  लेकिन नहीं ऎसा नहीं है, आप अपने घर की दीवारे वाटर प्रूफ़ बनाईये, बाहर कुछ नाव बाँधकर रखिये, कुछ टायर ट्यूब वगैरह का भी इंतजाम करके रखिये क्योंकि आज बचने के लिये तिनकों का सहारा तलाश करना भी बेवकूफ़ी है, अरे भई जिसको हवा तक उड़ा दे वो आपको क्या बचा पायेगा। बल्कि गरियाने लगेगा कि खुद तो डूबे सनम हमें भी ले डूबे?
यदि आपने अपने चारों तरफ़ जानबूझकर दोस्तों, शुभचिंतको के रूप में कंटीले झाड़ ही उगा लिये हैं तो ये समस्या भी आपकी अपनी है सरकार की नहीं, अब सम्मान या अपमान के लिये कृपया सरकार को न गरियायें।  आपको अपनी नाक इतनी दुरुस्त रखनी ही होगी कि कहीं जरा जलने की बू आने लगे तो तुरन्त सीज़ फ़ायर का इस्तेमाल करें, या हो सके तो कूड़ा-करकट डाल कर उस आग को बुझाने का प्रयत्न करें।
 माँ हमेशा समझाती भी थी कि दौड़ में सारे एक साथ भाग रहे होते हैं, प्रथम तो कोई एक ही आता है, कई बार दौड़ में साथ चलने वाला गिर सकता है। उसको उठाने के चक्कर में पहली बात खुद उसके बराबर ही खड़े रह जाओगे। दूसरी बात तुम्हारा रूक जाना गिरने वाले को गलत संदेश देगा। वह यह नहीं सोचेगा कि तुम उसकी
फ़िक्र में रुक गये हो या तुम्हें उसकी फ़िक्र है। वह सोचेगा तुम उसके बिना चल ही नहीं पा रहे थे इसीलिये रुक गये हो। तो बहुत जरूरी है ज़िंदगी की दौड़ में निशाना मछली की आँख में लगे... दाँये-बाँये देखना या झुक जाना तो सोच लेना कि तुम्हारी ही पीठ पर पैर रखकर भागने वाले वही होंगें जिनके लिये तुम रुक गये थे।

सुनीता शानू 

Thursday, July 30, 2015

हा हा! भैंस दुर्दशा देखी न जाई (आज नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक टिप्पणी)



भैंस बहुत ही परेशान है, करे... तो क्या करे? या तो किसी तालाब में डूब मरे, लेकिन वो तो तैरना जानती है सो आत्महत्या भी नहीं कर पा रही है। कल तक पच्चीस किलो दूध और चार टाइम गोबर करके घर वालों के लिये दूध और उपलों का इंतजाम भैंस के द्वारा हो रहा था कि अचानक एक सिरफ़िरे डायरेक्टर की नजर उस पर पड़ गई थी, दोनों ने एक दूसरे को कनखियों से देखा था, घर के मालिक ने भैंस के दूध की खीर खिला कर भैंस के फ़िल्म में काम करने की बात भी पक्की कर डाली। जब गाँव भर के भैंसों को पता चला था सबने बहुत रोका लेकिन भैंस पर तो हिरोइन बनने का ऎसा भूत सवार था कि नहीं मानी।

अब भैया फ़िल्मों में भैंस भी कभी हिरोइन बन सकती है कोई सोच नहीं सकता था, खुद भैंस को भी ये यकीन नहीं हो रहा था कि कोई उसके रूप रंग पर फ़िदा होगा, और उसे फ़िल्म की हिरोइन का रोल देगा। वो बार-बार पानी की होद में अपने चेहरे को निहार रही थी, और मन ही मन खुद को ब्लैक ब्यूटी पुकार रही थी। ताज्ज़ुब तो इस बात का हुआ जब भैंस को डायरेक्टर ने मिस कहकर पुकारा, अब तक कम से कम चार पडिया को जन्म दे चुकी थी। सोच कर फ़ूली न समाई । उसे दिन में ही करीना, कैटरीना के सपने आने लगे, अब तो मुहल्ले भर के लड़के मिस बोल कर सीटी बजाने लगे। अब कोई भी उसकी तुलना काली मोटी बदसूरत महिलाओं से नहीं कर पायेगा। हो सकता है उसे भी प्यार से शाहरूख या सेफ़ मिस युनिवर्स कह कर बुलायेगा। उसकी हैल्थी बोडी को देखकर टुनटुन भी कह देंगे तो भी चलेगा। कम से कम हिरोइन तो कहलायेगी ही। 

मै बैठी-बैठी मिस की खूबसूरत आँखों, मतवाली पूँछ के बारे में सोच ही रही थी कि दरवाजे की घंटी बजी, मैने दरवाजा खोला, बाहर झाँका तो एक भैंस दिखाई दी, जो लाल रंग की साड़ी लपेटे गोबर में लिथड़ी खड़ी थी, ध्यान से देखा तो मै चौंक पड़ी अरे यह तो हमारी मिस है, अरे क्या हुआ बहन? सहसा मेरे मुह से निकला। मिस के चेहरे की दुर्दशा बता रही थी कि गुजरी रात उसे पार्लर ले जाया गया होगा, गाढे लाल पेंट की लिपस्टिक देखकर लगता था किसी का खून पीकर आई हो, शायद किसी ने खूनी समझ मारा भी था उसे, मोटी मगर खूबसूरत आँखों का काजल बह-बहकर उसके साथ हुये हादसे को कुछ परसेंट बयान भी कर रहा था। मुझे देखते ही वो बुक्का पाड़ कर रोने लगी, मुझसे उसका रोना देखा नहीं जा रहा था, मैने तुरंत एक बाल्टी में पानी, और कुछ फ़्रूट्स लाकर रखे, अब हिरोइन बन कर यही तो खाये होंगे बेचारी ने...

मिस रोये जा रही थी, मैने प्यार से उसके सिर पर हाथ फ़ेरा उसने बोलना शुरू किया,-  “ क्या बताऊं दीदी किस बुरी घड़ी में मैने गली के सारे भैंसों स नाता तोड़ कर उस मुये डायरेक्टर से नाता जोड़ लिया, उसने मेरी शादी भी कराई, मैने रात-दिन एक कर दिया था फ़िल्म की शूटिंग में, पच्चीस किलो दूध देती थी बिना कोई फ़ीस लिये, लेकिन जैसे ही फ़िल्म परदे पर आई मुझे कोई पूछता तक नहीं। जैसे-तैसे अपनी फ़िल्म देखने हॉल में घुस गई तो गार्ड ने मार-मार डंडे बाहर निकाल दिया। अब भला ये भी कोई बात होती है? क्या हम नारी जाति के अधिकारों का इसी प्रकार शमन होता रहेगा? मुझ बिरहन का साथी जिसके साथ शादी रचाई मुझसे बात तक नहीं करता है। भैंसे को छोड़ मैने एक इंसान से शादी कर ली, कुछ नहीं सोचा अपनी बिरादरी के बारे में कि लोग क्या कहेंगें... अब इस अवस्था में जब मै कहीं की न रही बाहर निकाल दी गई। आप ही बताईये दीदी एक शादी के रहते हमारी बिरादरी में कौन मुझसे शादी करेगा। 

उसकी नाजुक हालत थी फिर भी पूछना तो बनता ही था मैने कहा, तो तुम बताओ मै क्या मदद करूं तुम्हारी। उसने कहा दी बहुत उम्मीद के साथ आपके द्वार पर आई हूँ, आप भी एक नारी हैं मेरा दर्द अच्छे से समझेंगी और मुझे न्याय दिलवायेंगी। मुझे मेरे पति ने धोखा दिया है, सी आर पी सी की धारा 125 के तहत मुझे गुजारा भत्ता तो मिलना ही चाहिये। मिस की दलील सही थी, अदालत में याचिका दर्ज करवा दी गई, लेकिन दूल्हे और डॉयरेक्टर को कोई सज़ा मिले इसके पहले ही आऊट ऑफ़ कोर्ट सेटलमेंट हो गया, अब मिस प्रोड्यूसर के यहाँ बाड़े में रहती है, सिर्फ़ चारा खाकर दस किलो दूध देती है, इस उम्मीद के साथ की उसे अगली फ़िल्म की शूटिंग के लिये फिर बुलाया जायेगा। 

Sunday, July 19, 2015

ऑनलाइन पूजा कर भगवान को प्राप्त करें




जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा और हर साल उमड़-घुमड़ कर आने वाले श्रद्धालुओं की भक्ति देख कर मन प्रफ़ुल्लित हो उठता है, लेकिन पुलिस की चौकस निगरानी, सरकार की ओर से भक्तों के लिये सभी प्रकार की सुविधाये, साधु-संतो के पहचान पत्र तक बन जाने के बाद भी जगन्नाथ पुरी में इतनी प्राणघातक भगदड़ का मचना आश्चर्य में डाल देता है। 

धार्मिक स्थलों का हमारे जीवन में बड़ा महत्व है। जितने भी पाप-पुण्य किये जाते हैं, यहाँ जाकर ही इनकी धुलाई हो पाती है। मै भी एक बार ऎसे ही एक तीर्थ स्थल पर गई थी, उस वक्त यह महसूस किया कि आम आदमी को भगवान के दर्शन करने के लिये कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, रस्से के इस बार हम और रस्से के उस पार भगवन और बीच में ही वी आई पी समुदाय जो बड़ी आसानी से भगवान तक पहुंच जाता है, दर्शन करता है, स्तुति करता है, नहला धुला भी सकता है, इसके विपरीत हम दर्शन के प्यासे साथ ही भूखे-प्यासे, गर्मी सहते, पसीने की दुर्गंध सहते धूप में घंटो सिकते रहते हैं, तब जाकर भगवान की कंदरा के समीप आते हैं, लेकिन यह क्या! पंडे-पुजारियों के हाथों द्वारा ऎसे खदेड़ कर बाहर निकाल दिये जाते हैं जैसे हमसे बड़ा भिखारी कोई दूसरा है ही नहीं,...

अब आपको क्या लगता है किसी बच्चे को इतना ज्यादा सताया जायेगा तो क्या वो रोयेगा चिल्लायेगा नहीं? हुड़दंग भी मचायेगा, रस्सा तोड़ कर भगवान के पास जाने का पूरा प्रयास करेगा। लेकिन सफ़ल नहीं हो पायेगा... तो अब इस धक्का-मुक्की का मर्म समझ आया है, और भगवान के प्रेमियों से मेरी गुहार है, वो जो हमारे हृदय में विराजमान है उसे रथ खींचकर या गंगा-जमुना में डुबकी लगाकर प्राप्त नहीं किया जा सकता।
सोचो अगर भगवान को मिलना ही होता तो तुम यूँ जलील न होते, तो घर बैठिये और ईश्वर को खुद में ही तलाश करिये ताकि पुलिस और सरकार का समय बर्बाद न हो हम भी सुबह-सुबह चाय के साथ कोई अच्छी सी खबर पढ़ सकें कि इस साल सभी श्रद्धालुओं ने ऑनलाइन पूजा की और भगवान जगन्नाथ का रथ भी खींचा। जब भगवान खुद इंटरनेट पर उपलब्ध है तो ये मार-धाड़ किसके लिये कर रहे हो।

सुनीता शानू

Thursday, July 2, 2015

मुहल्ला अस्सी क्यों नहीं देखेंगें...?







मुहल्ला अस्सी का ट्रेलर देखा, देखते ही बचपन में होने वाली रामलीला याद आ गई, याद आ गये वे सभी भांड जो देवी-देवताओं का स्वाँग धरकर पैसा माँगते फिरते हैं, मुहल्ला अस्सी में भी देवी-देवताओं का स्वाँग रचकर गाली-गलौज की गई है, हम बेशक सारा दिन मंदिर की घंटियाँ न बजायें लेकिन फ़िल्म में एेसा कुछ देखते ही हमारी भावनायें आहत होने लगती हैं तो हैं। एक बार की बात है जब हम बच्चे रामलीला देख रहे थे अचानक पर्दा खुल गया तब देखा हनुमान जी और सीता जी बैठे बीड़ी पी रहे थे, ये बात तो हिंदुओं की रामलीला की है, हमारी जमादारनी ने आकर बताया कि हनुमान जी संजीवनी लाते वक़्त तार पर से गिर गये थे, जैसे ही श्री राम ने कहा हे तात तुम अब तक नहीं आये हनुमान जी ग़ुस्से में चिल्लाये," सुसरा के तात तात करै है, मेरी तो टाँग टूट गई है..." सुनकर हम सबको हँसी आ गई। कहने का तात्पर्य यह है कि इंसान स्वाँग धर सकता है, उससे राम या शिव रूपी आचरण की उम्मीद करना बेवक़ूफ़ी है, सच हमेशा विभत्स ही हुआ है, मुहल्ला अस्सी में भी इंसान का असली रूप सामने आया है कि इंसान इतना कुरूप है जो भगवान का रूप धर कर भी उन जैसा आचरण नहीं कर सकता। मुझे लगता है फ़िल्म का मक़सद सच को सामने लाना है, तो देखें और समझे कैसे भांड देवी-देवताओं का स्वाँग रच कर सबका मनोरंजन करते हैं असल जिंदगी उनकी भी यही है परदे के पीछे का चेहरा देखने में गुरेज़ क्यों? बस मनोरंजन करें और हँसे-हँसाये। 
जहाँ तक हो सके गाली-गलौज नहीं होने चाहिये, लेकिन कुछ लोगों को छोड़ दें तो बाकी बिना गाली के बात करते नजर ही नहीं आते हैं, आधे से ज्यादा टी वी शोज़ में भी गालियां प्रधान हैं, ऎसे में मुहल्ला अस्सी न देखना कोई तुक नहीं बनता। विरोध करना है तो सबका करो और जमकर करो। और शुरुआत खुद से करो,...वरना कहना पड़ेगा "पर उपदेश कुशल बहुतेरे",,,।