Friday, August 31, 2012

मुझे चुना एक अनोखी शख्सियत के रुप में( स्टार प्लस तथा हिंदुस्तान की अनोखी पेशकश)


कितना अच्छा लग रहा है आज मै बता नही सकती। सम्मान किसी भी रूप में हो उसे पाकर इंसान खुद को महत्वपूर्ण समझने लगता है। यह एक ऎसा सच है जिसे नकारा नही जा सकता। लखनऊ से सम्मान पाकर आते ही मुझे  अनोखी क्लब में पैनलिस्ट के रूप में चुना गया।
ये प्रोग्राम स्टार प्लस के सौजन्य से हिंदुस्तान के द्वारा आयोजित था। पैनल पर होना मेरे लिये सौभाग्य की बात थी। सबसे खूबसूरत लम्हा था जब मैने इस प्रोग्राम का आगाज़ किया। सामने उपस्थित तमाम महिलाओं को आवाज़ दी की वे आगें बढ़े। जीवन को यूंही बर्बाद न होनें दे। अपनी शक्तियों को समझें और कुछ ऎसा करें जो आप को साबित कर पायें, मैने उन्हें समझाया कोई भी काम छोटा-बड़ा नही होता। मैने अपने सपनों को कैसे पंख लगाये और साकार किया। अगर इंसान के पास हौसला है, कुछ कर गुजरने का जज़बा है, तो कोई भी मुश्किल आ नही सकती। वहाँ उपस्थित तमाम महिलायें मुझसे पूछ रही थी ढेरों सवाल और उन सवाल के जवाब देते हुए मै भी खुद को मज़बूत कर रही थी, कि मै किस प्रकार इन सबकी समस्याओं को हल कर सकूं क्या कहूं की इनमें भी मै खुद को देख सकूँ।
मैने उन्हें कहा कि वो ज़माना चला गया जब कहा जाता था "अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आँचल मे है दूध और आँखों मे पानी" मेरी सखियों तुम चाहो तो मिसाल बन सकती हो एक नई जागृति ला सकती हो। मैने उन्हे समझाया कि कैसे मैने कम समय में कम साधनों मे कामयाबी हासिल की।
जहाँ तक मुझे लगता है मै उनके दिल तल पहुंच पाई हूँ। उनमे से अनेक सखियों ने मेरे पर्सनल फ़ोन नम्बर भी लिये ताकि वो बिजिनेस कैसे करें समझ सकें।
प्रोग्राम के अंत में साड़ी कॉम्पिटिशन भी हुआ और बहुत मुश्किल था मेरे लिये इतने लोगों मे से एक खूबसूरत साड़ी पहने महिला का चुनाव। लेकिन फिर भी सर्वसम्मति से ये सौभाग्य एक को मिला भी। हाँ थोड़ा सा अटपटा सा अवश्य लगा लेकिन सभी सखियां बहुत खुश थी अवार्ड पाकर। खेल ही खेल में समय पंख लगा उड़ गया और मै बटोर लाई न जाने कितनी सखियों का प्यार। शब्दों में बयां करना सचमुच बहुत मुश्किल है मेरे लिये। इस कार्य का भार हिंदुस्तान से शुभा को दिया गया गया था जिसने इतनी मुस्तैदी से सारा कार्यभार सम्भाला जिसकी जितनी तारीफ़ की जाये कम है। आज की नौजवान पीढ़ी इतनी जिम्मेदार और विनम्र होती है आज देखा भी। सर्वेश जो हिंदुस्तान में सीनियर फ़ोटोग्राफ़र है उनसे भी दोस्ती अच्छी हो गई उनकी लाजवाब फ़ोटोग्राफ़ी के बारे में तो ब्लॉग जगत में सभी जानते हैं।
अंत में मेरा मेरी तमाम सखियों से अनुरोध है कि वे भी आगे आयें। अपने आप को साबित करें जिससे वो तमाम सखियां भी आपको देखकर कुछ सीख सकें।
सुनीता शानू

Wednesday, August 22, 2012

वजूद ( राजस्थान साहित्य अकादमी में प्रकाशित)

 ये कहानी राजस्थान साहित्य अकादमी के अगस्त अंक में प्रकाशित हुई है। मुझे नही मालूम आपको पसंद आयेगी या नही। मगर यही सच है ये किसी एक की कहानी नही है। बस कोशिश की है खुद को समझने की...


...जिस कोख से भाई जन्मा उसी कोख से मैं पराई कैसे हो गई?
‘‘बाबा तुम्हीं तो कहा करते थे, कि मैं बेटा हूं तुम्हारा, तो आज क्या हो गया बाबा? क्या विवाह होते ही सब कुछ भूला दिया जाता है।’’ कहते-कहते मेरी आँखें भर आईं।
माँ-बाबा को घर ले जाने की सारी खुशी काफूर हो गई। कितना खुश थी मैं यहां आते हुए सारे रास्ते बस एक ही विचार आ रहा था, कि अब माँ-बाबा खुश रह पायेंगे, मैं उन्हें अपने साथ घर ले जाऊंगी। जब से मेरी शादी हुई है, उनके लिए एक दिन की खुशी भी नहीं खरीद पाई हूं। बरसों से एक-एक दिन गिन रहे हैं, कि कब बेटा-बहू आयेंगे और उन्हें अपने साथ ले जायेंगे, परन्तु मैंने सदा उन्हें इन्तजार करते हुए पाया, और आज फैसला हो भी गया कि बेटा-बहू के पास उन्हें ले जाने की फुर्सत ही नहीं है, जहां चाहें, जिसके साथ चाहें, रह सकते हैं। आज जब किस्मत ने मुझे उन्हें अपने साथ रखने का मौका दिया है, तो दोनों मना कर रहे हैं।
मैं फूट-फूट कर रो पडी। कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं? ‘‘क्या हो गया बाबा? यह बेटा-बेटी का फर्क कहां से आ गया?’’
बाबा मगर कुछ भी न बोल पाये। हमेशा की तरह शांत चेहरा। मगर माँ बुदबुदाती रही, ‘‘कैसे रह सकते हैं हम तेरे घर में? लोग क्या कहेंगे? सारी बात बेटों पर आ जायेगी कि बेटे नालायक हैं। मां-बाप को रख नहीं पाये, बुढापे में बेटी के सिर पर पडे हैं और फिर तेरे सास-ससुर ! वो क्या कुछ नहीं कहेंगे ?’’
फिर अचानक जोर से बोली, ‘‘तू जा अब तू पराई हो गई है। हमारा तेरे घर में रहना ठीक नहीं।’’ इससे पहले कि मैं कुछ कहती, जैसे उन्हें ख्याल आ गया कि पराई कह कर बेटी का दिल तो नहीं दुखा दिया, मुझे समझाने लगी, ‘पाप लगता है न, बेटी के घर में रहेंगे तो नरक के भागीदार होंगे कि नहीं, बेटी! तुम बात को समझो और जवांई बाबू को भी समझाओ। हमारी फिक्र ना करें, हम रह लेंगे कैसे भी दो वक्त की रोटी ही तो चाहिए। थोडी कट गई अब थोडी और कट जायेगी राम भरोसे।’’
यही जो विचारधारा है इंसान की, जो उसे चैन से जीने भी नहीं देती। धर्म-कर्म का जामा पहने अंधविश्वास आज भी घेरे रहते हैं। मैं बेबस निःसहाय सोचती रह गई। खुद को कोसती रही, कि काश मैं बेटा बन पाती? किन्तु इसमें मेरी गलती ही क्या है? अगर नहीं तो कुदरत का ये कैसा मजाक है भगवान्? जो मुझे अपने कर्त्तव्य से विमुख करने पर आमादा है। मेरी नाकामयाबी पर मेरी अंतरात्मा मुझे धिक्कारती रही। लगता है मेरी जन्दगी आज एक सवाल बन कर रह जायेगी।
और अतीत की चादर ने मुझे अपने में लपेट लिया। मुझे मेरे तमाम सवालों के जवाब मिलने लगे, ‘‘अरे! मैं तो बचपन से ही पराई थी, मैं उनका प्यारा बेटा कैसे बन सकती थी?’’ मुझे याद है, जब कभी भी मैं घर की किसी चीज पर अपना हक जताया करती थी, माँ भाई को समझाती थी, ‘‘कोई बात नहीं बेटा, तूं फिक्र मत किया कर, जब इसे शादी कर इसके घर भेज देंगे, तब सब कुछ तेरा ही तो हो जाना है।’’ उस वक्त उनकी बातें मुझे बहुत चुभती थीं और मैं गुस्से में बाबू जी से माँ की शिकायत किया करती थी, और बाबू जी भी तो मेरी हर बात पर मुझे सराहा करते थे, कहते थे कि ‘मैं उनका प्यारा बेटा हूं’, लेकिन जब माँ उन्हें समझाती बेटियां तो पराया धन है उनसे मोह मत कीजिये, उस समय वे भी माँ की हां में हां मिला कर कहते थे, ‘हां बेटियां तो पराई अमानत होती है, एक दिन अपना घर बसाना ही है।’
अपना घर ! मगर कौनसा बाबा! मैं अचानक पूछ बैठी थी। मेरी बात सुनकर माँ ने हँस कर कहा था, ‘‘देखो, कितनी फिक्र हो गई है इसे, यह बात कितनी जल्दी गई है इसके कानों में। अरे! जिस घर तू ब्याह के जायेगी, वो तेरा ही तो घर होगा, तेरे पति का घर ही तो होगा तेरा घर, पागल लडकी।’’ और मैं शर्मा कर भाग खडी हुई थी।
.....मेरा घर! कौनसा है मेरा घर? यकायक जैसे शरीर में हरकत हुई। जैसे गहन-निद्रा से जाग गई....सचमुच कौनसा है मेरा घर? एक वो घर जिसे मैं छोडकर आई हूं, जहां बचपन बीता, जिसके हर कोने में, दीवारों से, मैं परिचित थी। फिर भी जहां मुझे पराई अमानत समझा जाता था, या फिर यह जहां आकर एक नया नाम मिला, नया रिश्ता मिला, नये लोग अपरिचित से माहौल में परिचित बन कर रहना। क्या यही है मेरा अपना घर? सहसा दिल से एक आवाज आई, ‘‘याद कर वो दिन जब घर में एक हादसा हो गया था, और सास ने तेरे लिये कहा था, अरे! यह तो पराई जाई है इसे दर्द कहां?’’ उफ! तो कौनसा घर है मेरा? मैं चीख पडी, कितना छलावा है इस दुनिया में माँ! मुझे अचानक अपने नीचे से जमीन खिसकती नजर आई, चारों तरफ बस अंधेरा ही अंधेरा था। मेरा वजूद कहां है बाबा? एक ये घर जहां मैं पराई अमानत हूं, एक वो घर जहां मैं पराई जाई हूं, मगर मेरा प्यार तो दोनों ही में बराबर है, मैंने कब चाहा था? एक नया घर, एक नया साम्राज्य, क्यों एक नये रिश्ते से बांध कर घर से बेदखल कर दिया मुझे? बोलो माँ, जिस कोख से भाई जन्मा, उसी कोख से मैं पराई कैसे हो गई? मेरा हृदय वेदना से चीत्कार कर उठा, रोम-रोम में कम्पन्न होने लगा। मैं कौन हूं? मेरा वजूद क्या है? कहां है मेरा घर? क्यों मुझे मेरे माँ-बाप को अपने साथ रखने पर रोक लगी है। माँ मुझे बताओ? तुम भी तो एक औरत हो? फिर यह कठोरता कैसी?
माँ कुछ क्षण चुप रही, फिर बोली, ‘‘जानती हो! यह सभी के बस की बात नहीं है, अपना घर छोडकर किसी और का घर बसाना। क्या पुरुष ऐसा कर सकता है? जो धैर्य, सहनशीलता, दर्द सहने की शक्ति, ईश्वर ने नारी को दी है, क्या पुरुष के पास है? इस जग की निर्मात्री नारी है, वह एक नव-जीवन का निर्माण करती है, यह सामर्थ्य बस उसी के पास है कि वो अपना घर खुद बना सकती है, तुम्हारे लिये यह बहुत बडी खुशी की बात है कि तुम्हारा अपना सुखी परिवार है और मैं भी अपने इसी घर में तुम्हारे बाबा के साथ अंतिम समय तक रहना चाहती हूं, यहां हमारी बीते दिनों की यादें हैं, यह घर मेरा और तेरे बाबा का सपना है। हम दोनों यहीं रह कर ही खुश रह सकते हैं।’’

सुनीता शानू


Saturday, June 30, 2012

शोर मचायें माँ को बुलायें सड़क रोके गंदगी फ़ैलाये



घर के बाहर हो रही थी भजन संध्या

बहुत दिन हो गये दिल्ली में इस तरह की घटनाये देखती आई हूँ। कभी सांई संध्या, कभी जगराता, तो कभी सुंदर काण्ड ,सम्पूर्ण रामायण, निर्जला एकादशी तो कभी भण्डारा। ऎसा नही मै नास्तिक हूँ पूजा पाठ में विश्वास नही करती लेकिन पूछना चाहती हूँ क्या जोर-जोर से चिल्लाने से भगवान चले आयेंगे? देर रात तक शोर मचाने से भगवान चले आयेंगें? किस धर्म ग्रंथ में लिखा है आप छोटी-छोटी गलियाँ रोक कर सड़कें रोक कर साई संध्या या जगराता करवायें। और करवायें भी तो सुबह पत्तलें खाकर संड़कों पर फेंक जायें? गाड़ियों का पोल्युशन क्या कम है जो सड़क पर गंदगी फ़ेंकी जाये। जिससे दुर्गंध तथा मक्खी-मच्छर पैदा होंगे जो बीमारियां फैलायेगे।  

कल तो बहुत ही खूबसूरत नज़ारा देखने को मिला। वैसे तो मै किसी भजन संध्या वगैरह में कम ही जाती हूँ। मेरे पिता कहते हैं प्रार्थना में जो शक्ति है वह घण्टे घड़ियाल बजा कर पुकारने में नहीं। बहरहाल एक भजन मंडली लगी थी माता को बुलाने में बीच मे सांई महाराज भी विराजमान थे एक तरफ़ राधा-कृष्ण विराजमान थे। बारी-बारी से भक्त ने तीनों का जयकारा लगाया और बोला मेरी भेंट ध्यान से सुनना जो नही सुनेगा उसे माता की तरफ़ से सज़ा मिलेगी। सब हाथ ऊपर उठायें। और सारी भीड़ ने हाथ ऊपर उठा लिये। अब शुरू हुआ भजन। भजन की दो पंक्तियां खत्म होती वो रुक कर पूछता बहनजी आप बतायें मै कहां रुका। अब बहनजी माता को याद करने में ताली बजाने में लीन थी, नही सुन पाई, जुर्माना हुआ इक्यावन रुपय्या चढ़ाइये। ऎसे करते-करते किसी से ग्यारह, किसी से इक्कीस रुपये चढ़वाता रहा। अब कोई समझाये भगवान ने कब किसी पर जुर्माना लगाया कि तू मेरा भजन नही सुन रहा इतना रुपया सज़ा। अजीब पागल बनाने की कोशिश लग रही थी। 

ये भजन मंडली जो भजन करवाता है उससे तो पैसा लेती ही है साथ ही जो दान चढ़ाया जाता है बटोर लेती है। अब प्रश्न ये उठता है कि कैसे समझाया जाये लोगों को कि ईश्वर की आराधना शांत-मन से बिना किसी व्यवधान के की जा सकती है। 
कबीर दास जी ने कहा है न…
कंकड़ पत्थर जोड़ के मस्ज़िद ली चिनाय, ता चढ़ मुल्ला बाग दे क्या बहरा है खुदा।

यह बात हरेक के लिये लागू होती है। हाथ उठाकर तस्वीर के आगे चिल्लाने से माँ नही आ जायेगी। इन मंडलियों में पैसा बहाने से माँ नही आ जायेगी। यदि सच्चा है इश्क ईश्वर से तो किसी असहाय की मदद करनी चाहिये। इंसानियत की मदद करनी चाहिये।
सुनीता शानू

Saturday, June 23, 2012

एक पोस्ट लिखी है अपनों के लिये आशा करती हूँ आप सभी अवश्य पढ़ेंगे...

शानू

बात अपनों की... 

Tuesday, May 15, 2012

ब्लॉगिंग का फ़ैलता मकड़जाल

कुछ पुराने ब्लॉगर्स और हम रंजना दी के साथ-- २००७ में हमने ब्लॉगिंग शुरू की थी


एक शिशु जो आज वयस्क हो चुका है, जिसने अपने प्रकाश से समस्त विश्व में क्रांति की लहर उत्पन्न कर दी है, और जो आज हमारे सामने अपनी बेमिसाल क्षमता के साथ एक चुनौती बन कर खड़ा हुआ है। जी हाँ! हम बात कर रहे हैं इंटरनेट की दुनियां की , जिसने सम्पूर्ण विश्व को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा दिया है। पंद्रह वर्ष पहले की ही तो बात है, अप्रैल सन १९९७ मे जब पहला अंग्रेजी ब्लॉग बना था, किसी ने सोचा भी नही था कि आने वाले समय में छोटा सा यह उपकरण सम्पूर्ण विश्व पर प्रभुता कायम कर लेगा। सर्वप्रथम पीटरमी.कॉम के पीटर मर्होल्ज ने लोगो को अपने विचार ब्लॉग पर व्यक्त करने के लिये प्रेरित किया, और लोगो को स्वयं को अभिव्यक्त करने का यह तरीका बहुत अच्छा भी लगा और तभी से नेट सर्फ़िंग का तूफ़ान सा आ गया है। परन्तु सारा दिन कम्प्यूटर के आगे बैठा आदमी मानसिक रूप से इतना अपंग हो जाता है कि उसे नेट के सिवा कुछ नजर नही आता, और आज ब्लॉगिंग रूपी मकड़ी ने उसके दिमाग में अपना जाल इस कदर बुन लिया है, कि वो एक कीट-पतंगें की तरह उसमें फ़स कर रह गया है।

यह कहने में जरा भी संदेह नही कि इंटरनेट ने अनेक विधाओं में ख्याति प्राप्त की है, जिसमें संचार और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में प्रमुख योगदान ब्लॉग जगत का ही है। हिन्दी ब्लॉग जगत को शुरू हुए दस साल की अवधी हुई है,परंतु इसने जिस तरह से प्रगती की है, वो काबिले तारीफ़ है ब्लॉग जगत ने सामुदायिकता और परस्पर सहयोग की भावना को भी जन्म दिया है। इसमें बहुत से एग्रीगेटर अपना सम्पूर्ण सहयोग दे रहे हैं, कुछ हिन्दी भाषी ऎसे भी हैं, जिन्होने हिन्दी फ़ोन्ट्स का निर्माण किया है जिसका फ़ायदा आज सम्पूर्ण वेब -जगत उठा रहा है, कुछ लोग इस नई टेकनालॉजी से अवगत करवा रहे है,व कई नये भाषा संबंधी सॉफ़्टवियर भी मुफ़्त उपलब्ध किये जा रहे हैं। यहाँ तक की राजनेताओं और अभिनेताओं को भी ब्लॉगिंग का नशा चढ़ ही गया है। लालू प्रसाद यादव, लालकृष्ण अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, फ़ारूख अब्दुल्ला, अमिताभ बच्चन, शाहरूख खान,आमिर खान, मनोज बाजपेई, आदि कई मशहूर लोगो के ब्लॉग पर दस्तक दी जा सकती है। ब्लॉगिंग करते कुछ ऎसे पत्रकार भी हैं जो अपनी बात को जनता तक आसान तरीके से पहुँचाने का जरिया ब्लॉगिंग को ही समझते हैं।ब्लॉग सिर्फ़ राजनैतिक,सामाजिक,साहित्यिक,सांस्कृतिक गतिविधियों का ही परिचायक नही है वरन बहुत सी कम्पनियाँ अपने उत्पादों का प्रचार भी कह रहीं हैं। आज ब्लॉग कमाई का साधन भी बनता जा रहा है। ब्लॉग की दुनिया एक आम हिंदुस्तानी की दुनिया बन गई है। बहुत सी पर्दानशीं औरतें जो घर से बाहर भी नही जा पाती हैं, घर बैठे ही अपने विचारों से सारी दुनिया को अवगत करवा सकती हैं। कहने की बात नही की एक आम आदमी में भी ब्लॉगिंग को लेकर जुनून पैदा हो गया है।

ब्लॉगिंग करने वाला खुद अपने आप में सम्पादक होता है अपनी ब्लॉग डायरी का, वह जो चाहे उस पर लिख सकता है। वह किसी के भी बारे में आपत्ति-जनक छाप सकता है, दूसरे ब्लॉगर चाहें तो उसे आकर टिप्पणी भी दे सकते है, और वो अपने ब्लॉग से चाहे जिसकी टिप्पणी हटा भी सकता है, इसमें एक खास बात यह भी है कि ब्लॉग लिखने वाला या टिप्पणी देने वाला खुद को अज्ञात भी रख सकता है, इससे सबसे ज्यादा परेशानी उन सम्मानित लोगो को होती है, जो यह जान भी नही पाते की उनके चरित्र पर कीचड़ उछालने वाला कौन है, इस तरह आज ब्लॉग जगत के मकड़जाल में कई ऎसे कीट भी पैदा हो गये है जो किसी सज्जन का चरित्रहनन करने से बाज़ भी नही आते, अज्ञात बन कर अपनी आवाज़ दुनियां तक पहुँचाने की सुविधा जहाँ आदमी को अपनी बात कहने की पूरी छूट देती है, वहीं दूसरी और इंसान के दब्बूपन का द्योतक भी है,

हिन्दी भाषा को सुधारने के लिये कुछ ब्लॉगर कमर कसकर मैदान में उतरे हुए है, वही कुछ लोगो ने हिन्दी पर चिंदी लगाने का काम किया हुआ है, अगर आम बोल-चाल की भाषा भी लिखी जाये तब भी गनीमत है, परंतु नेट की दुनियां मे होता गाली -गलौज यह दर्शाता है कि हम कितने पढ़े लिखे, सभ्य, हिन्दी भाषी है। इनमें से अधिकतर ऎसे ब्लॉगर भी हैं, जो अत्यधिक प्रतिभाशाली, पढ़े-लिखे है, जो अगर अपने अनुभवों को दूसरों से बाँटे तो दूसरे कई लोगों को फ़ायदा हो सकता है, परन्तु वे अपने सम्पूर्ण ज्ञान को ताक पर रख कर एक दूसरे पर कीचड़ उछालते या, बेसिर-पैर की कविता-बाज़ी करते नजर आते हैइससे समय का दुरूपयोग तो होता ही है, साथ ही आपसी वैमनस्य की भावना भी पनपने लगी है।

इंटरनेट की सुविधा ने जहाँ बहुत से काम आसान कर दिये हैं, वहीं आदमी को निक्कमा और आलसी भी बना दिया है, सब कुछ ऑनलाइन उपलब्ध होने से कोई मेहनत ही नही करना चाहता। घर बैठे बिठाये इंटरनेट पर शॉपिंग, बुकिंग, ऑनलाइन बैंकिंग सब कुछ हो जाता है , इसके अतिरिक्त नेट पर गुगल बाबा सर्च इंजन ने तो कमाल कर दिया है, कब कहाँ क्या हो रहा है, कौन कहाँ रहता है, हर बात का पता मिल जाता है बस जिस चीज़ की जानकारी चाहिये उससे संबंधित शब्द लिखो और सर्च करो। पल भर में गुगल के वेब पेज पर उससे संबंधित तमाम सामग्री मिल जाती है, और तो और बच्चों की स्कूल में मिलने वाला होली-डे होम-वर्क भी बच्चे आजकल नेट से ही करते हैं।

सच कहें तो जिस अकेले पन को दूर करने के लिये हम ब्लॉग जगत में अपनी पैठ बना रहे थे , आज उसी की वजह से अपनो से दूर होते जा रहे हैं, सुबह-शाम उठते-बैठते ब्लॉगिंग करती महिलायें अक्सर घर के कार्य, बच्चे, पति, घर के बड़े बुजुर्ग सभी की अवज्ञा कर बैठती है, सुबह शाम बस एक ही धुन सवार होती है उन पर की फ़लां ब्लॉग पर आज क्या छपा है? किसको कितनी टिप्पणी मिली, मुझे कितने लोग टिप्पिया कर गये है, और जिसे देखिये वही एक दूसरे को ब्लॉग यू आर एल देता नजर आता है, यहाँ तक की पार्टियों मे लोग एक दूसरे को ब्लॉग एड्रस देते हुए इतना तक कह देते है कमैंट जरूर दिजियेगा और फ़िर सिलसिला शुरू हो जाता है ,सब काम-धाम छोड कर अधिक से अधिक लोगो को टिपियाने का ताकि वो भी आकर अपना ब्लॉगर धर्म पूरा करें, जैसे कह रहें हो तू मेरी पीठ खुजला मै तेरी खुजलाता हूँ।

वैसे तो माना जाता है कि ब्लॉगिंग करना खुद को दुनियां के सामने रखना हैं, ब्लॉगिंग का फ़ायदा उन बुजुर्ग लोगो को अवश्य हुआ है, जो रिटायरमेंट के बाद जिन्दगी से ऊब महसूस कर रहे थे, ब्लॉग जगत में उन्हे नये दोस्त मिल गये है। जिन्दगी को जीने का एक जरीया मिल गया है। परन्तु आज अंतर्जाल का सबसे अधिक प्रयोग  युवा जगत कर रहा है, आज हर कम्पनी में नेट की व्यवस्था होने से युवा वर्ग काम-काज छोड़ कर चोरी-छिपे फ़ेसबुक, हाय फ़ाइव, ऑर्कुटिंग,यू ट्यूब व ब्लॉग बनाने में लगा हुआ है।

जहाँ तक नई तकनीक का सवाल है वह तभी अच्छी तरह से फ़लीभूत होती है,जब वह जीवन को गतिमय बनाऎ रखे एक नई दिशा प्रदान करे। परन्तु यदि कोई भी तकनीक हमारे जीवन में गत्यवरोध का कार्य करे और इस कदर घुस-पैठ करे की हम बंध कर रह जायें, तो वह हमारे जीवन के लिये दुखदायी है अतः आवश्यकता है समझदारी की ताकि इस नई तकनीक द्वारा जीवन को गतिमान बनाया जा सके।

सुनीता शानू

Thursday, April 12, 2012

जब चाहा इस्तेमाल किया जब चाहा फ़ेंक दिया वाह!



जब चाहा इस्तेमाल किया जब चाहा फ़ेंक दिया। क्या है यह सब? मै समझ नही पाती हूँ। जब भी किसी ने पुरूष के खिलाफ़ एक शब्द भी लिखा, उसका विरोध किया गया। स्त्री-विमर्श से जोड़ दिया गया। पुरूषों ने ही नही खुद औरत ने भी किया। हाँ पुरूष मेरे पिता भी है मेरा बेटा भी है। लेकिन यहाँ बात एक ही पुरूष की नही हो रही सम्पूर्ण पुरूष वर्ग की है।

कुछ दिनों से मन आहत है मै पूछना चाहती हूँ क्या पुरूष के लिये स्त्री मात्र खिलौना है बस एक खिलौना। पुरूष कहता है स्त्री पुरूष को खिलौना समझती है उल्टे-सीधे कपड़े पहन पुरूषों को भड़काती हैं, स्त्रीयाँ मेक अप भी पुरूष के लिये करती है स्त्री अपने अंगों का प्रदर्शन करती है तो बेचारे पुरूष का क्या दोष जो बलात्कार हो। तो कृपया ऎसा पुरूष वर्ग ये बताने की जहमत करेगा कि छोटी सी नन्ही बच्ची क्यों बलात्कार का शिकार होती है?

कभी-कभी ईश्वर से भी शिकायत होती है कि उसने भी स्त्री के साथ बेईंसाफ़ी की है। क्यों नही उसे ऎसा कोई हथियार सौपां जिससे वो जब चाहे जितने चाहे पुरुषों का सामना कर सके। बलात्कार का शिकार होने से बच सके। अरे बिल्ली तक अपने बचाव में झप्पटा मार खुद को बचा लेती है। तो नन्ही सी बच्ची हो या औरत खुद को बचा क्यों नही पाती।

सदियों से देखती हूँ कभी तुलसीदास जी ने कहा तो कभी चाणक्य ने ऎसा लिखा कितने ही महापुरूषों का हवाला दे देकर लेखकों ने भी औरत का ही तिरस्कार किया। जबकि सच यह है पुरूष आजतक औरत को समझ ही नही पाया। आज एक लेख में पढ़ा चाणक्य ने कहा चंचल स्त्री का विश्वास मत करों तो क्या चंचल पुरूष विश्वास के काबिल है?

पुरूष का प्रेम क्या स्त्री के शरीर तक सीमित है? क्यों औरत इक पहेली बन कर रह जाती है। सुंदर, गोरा, छरहरा, बदन ही पैमाना रह गया खूबसूरती का। और जैसे ही औरत पुरूष के पैमाने पर खरी नही उतरती वो तलाश करता है एक और नई औरत की। मुझे लगता है औरत नही पुरूष को बदलना होगा अपनी मानसिकता को।

सबसे खूबसूरत औरत तब लगती है जब एक नन्हा मासूम उसकी छाती से लिपट दूध पीता है और वो उसे बड़े प्यार से निहारती है। औरत की खूबसूरती का पैमाना उसका सुन्दर शरीर नही वरन उसकी सुंदर आत्मा होती है जो परिवार के हर रिश्ते को जोड़ कर रखती है। मेरी नज़र में सबसे खूबसूरत मेरी माँ है उनकी बूढ़ी काया अधकचरे सफ़ेद बाल चेहरे की झुरियों के पीछे छिपी मुस्कान मुझे एहसास दिलाती है कि औरत की खूबसूरती उसकी चाहत में है। चाहत जो इंसान को इंसान से जोड़ती है। चाहत जो संसार बसाती है। वृक्ष की भाँती हर शाख का पोषण करती है।

कितना लिखा जाये? जितना लिखूंगी बहुत कम है। यह भी सच है जब-जब औरत ने अपनी ज़रूरतों को अपने प्रेम का विश्लेषण किया है पुरूष ने बेहया शब्द इस्तेमाल किया है। और ये शीलवान संस्कार वान पुरूष गालियों में भी औरत का ही प्रयोग करते है चाहे वो माँ हो या बहन या बेटी।


Monday, April 9, 2012

ब्लॉग इन मीडिया गर न देखा तो न मालूम कहाँ छप गये...

ये जो पाबला जी हैं सचमुच डिफ़्रेंट ही हैं। कभी-कभी दिल कहता है इनका नाम करमचंद जासूस रख दूँ। मगर डर लगता है डर पाबला जी से नही उनसे पंगा लेने से लगता है। अब आप कहेंगे की सबसे पंगा ले सकती हैं पाबला जी से नही तो यह भी एक रहस्य वाली बात है आजमाना चाहते हैं तो बस जरा सा काम कीजिये उन्हे हल्लो कह हाथ मिलाईये बस.... मैने ...न न न मैने भाई साहब से पंगा लिया  ही नही। यह तो मन पखेरू फ़िर उड़ चला का पंगा था जो हमेशा हर जगह उड़ जाता है।
अब देखिये ब्लॉग इन मीडिया पर की मन पखेरू कहाँ उड़ा...

बहुत- बहुत शुक्रिया पाबला जी।






Thursday, March 1, 2012

हमारी प्रयोगशाला और श्वेत मूषक



मनुष्य जो एक सामाजिक प्राणी है,यानि की सोशियल एनिमल जिसे की सामाजिक जानवर कहें तो भी कुछ गलत नही। अंग्रेजी भाषा का अनुवाद हम अपनी मातृ भाषा मे चाहे जैसे करें,यह हमारी विचारधारा है भई। तो बात आती है मनुष्य के दुर्लभ प्रयोगों की। एक समय था जब मरे हुए जानवर या आदमी के शरीर की ही चीर-फ़ाड़ करके नये-नये प्रयोग किये जाते थे। और तो और स्कूल में भी बेहोश कॉक्रोच, चूहों व मेढ़को पर बच्चों द्वारा प्रयोग किये जाते थे। किन्तु आज हालत यह है कि आदमी के प्रयोगों का शिकार सभी जानवर हो रहे हैं। जानवरों पर  प्रयोग कर-कर के ही मनुष्य जान पाया है कि खुद कैसे ज्यादा दिनो तक निरोग रह सकता है व किस रोग में क्या खायें? व किस चीज की अधिकता से कौनसा रोग हो जाता है।


अब इसी रिपोर्ट से देखिये की वैज्ञानिकों ने ७६ रीहसस बंदरो पर प्रयोग करके पता लगाया की कम कैलोरी वाला भोजन करने से मनुष्य ज्यादा दिन तक जीवित रह पायेगा।कम कैलोरी वाला भोजन जब बंदरों को दिया तो वैज्ञानिको को पता चला की इससे न कैंसर होगा न दिल की बीमारी।बात ठीक भी है वानर हमारे वंशज थे तो सिमिलरिटीज तो होंगी ही न। किन्तु कुते, बिल्ली, चूहों के वंश में हम कब आये याद नही आ रहा।न ही इसकी कोई पौराणिक कथा है न ही शोधग्रंथ। बाहर के देशों में तकरिबन १.२ करोड़ जानवरों का प्रयोग हर साल किया जाता है। अब चाहे बर्ड फ़्लू हो या स्वाईन फ़्लू जानवरों पर टीके लगा-लगा कर प्रयोग किया जाता है फ़िर जाकर पता चलता है कि मनुष्य रूपी जानवर को कौनसा टीका लगाया जाये? वैसे तो मनुष्य सबसे स्वार्थी प्राणी है, जब भी करता है प्रयोग दूसरों पर ही करता है।


हम महिलायें भी वैसे किसी शोधकर्ता से कम नही हैं। जब देखो हम भी अपनी रसोई नामक प्रयोगशाला में पति पर प्रयोग करती ही रहती हैं। और बेचारे पतिदेव उन्हे क्या कहिये श्वेत मूषक बने हमारी नित नई रेसिपीज का स्वाद चखते रहते हैं। अब स्वादु हो या बेस्वादु प्रयोग तो प्रयोग ठहरा न।


चलो माना हमसे बच भी जाये मगर आजकल के डॉक्टर मरीज़ का बार-बार सिरींज में ब्लड लेकर टैस्ट करते रहते है कि मरीज को ऎसी कौनसी बीमारी बताई जाये,जो लम्बी हो और जिसके लक्षण भी दिखायें जा सके। और जब कोई बीमारी न निकले तो डॉक्टर का बिल देख कर मरीज को हर्ट की बीमारी होने का डर तो लगा ही रहता है।


सुनने में आया है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने डीडी असिस्ट नामक ऎसा सॉफ़्टवेयर बनाया है जिस पर दवाओं का शोध किया जा सकेगा।जिससे बेचारे जानवर तो बच ही सकेंगे। किन्तु फ़िर भी बेचारे पतिदेव मूषक बनने से बच नही पायेंगे। बचेंगे भी कैसे यह नारी जाति की प्रयोगशाला है सरकारी नही।


सुनीता शानू

Tuesday, August 2, 2011

बच के रहना रे बाबा बच के रहना तुझ पे नज़र है...



बाल ब्रह्मचारी मै हूँ कन्या कुँवारी...तेरे मन में प्रीत का रंग भर दूँ आज तपस्या भँग कर दूँ..:)


यह नवभारत ब्लॉग पर पोस्ट की थी। आज अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर रही हूँ जो लोग नही पढ़ पाये उनके लिये। शुक्रिया।
आज सुबह से हमारे शर्मा जी एक ही धुन गा रहे है। राखी बदनाम हुई बाबा तेरे लिये। समझ नही आया राखी तो पहले से ही बदनाम है, तो किसी बाबा पर इल्जाम क्यों लगाया जा रहा है। आखिर पूछना तो पड़ेगा ही न। -“अरे भई शर्मा जी राखी तो पहले ही से बदनाम हुई गई। आप बाबा को काहे लपेट रहे हो जी।“ शर्मा जी मुस्कुराये और बोले,”अरे मुनिया की अम्मा इस मुई पब्लिक ने हमार मुनिया का नाम बहुतहीं बदनाम कर दिये अब मौका मिलई गय तो गाने में से मुनियां को निकाल इस ससुरी राखी को घुसाई दे रहे हैं। पहलई ही से बदनाम है और का बदनाम होयेबे।“ बात तो ठीक है जो पहले से ही बदनाम है, उसका और क्या बदनाम होना। और फ़िर गाने से मुन्नी तो निकल जायेगी कम से कम। इस गाने की वजह से पहले ही कई मुन्नियों का बाहर निकलना मुश्किल हो गया था।


राखी को आखिर क्या ऊल-जुलूल सूझता रहता है? कल तक तो बाबा को भ्रष्ट बता रही थी, बाबा के अनशन को बाबा की नौटंकी बता रही थी। अचानक इतनी मेहरबान कि बाबा से शादी करने को तड़प रही है। कारण कुछ भी हो बाबा की तो हो गई “मौजा ही मौजा”। वैसे बाबा भी कम नौंटकी-बाज नही है। योग सिखाते-सिखाते कहाँ उछाल मारी है। सीधा हिरोईन से आँख टकराई। मुझे लगता है राखी को बाबा की ऊँची कूद वाला स्टंट पसंद आ गया होगा।


अरे हाँ! राखी कहीं शिल्पा शेट्टी से जल तो नही गई? मुझे याद है एक बार शिल्पा शेट्टी बाबा से अनुलोम-विलोम सीखने गई थी। एक बात समझ नही आती। ये बाबा जब भी कोई बात करता है, अपनी टमी को पिचका कर कमर से सटा दिखाता है। सोचता भी नही बेचारे टमीधारी पुरूष कितना बेईज्जत महसूस करते होंगे। उसके इन आसनों की वजह से स्विट्जरलैण्ड के एक भक्त ने बाबा को पूरा का पूरा टापू दान में दे दिया था। कहीं इस नैन मटक्का राखी को बाबा की पतली कमर ने दीवाना तो नही बना दिया है। तभी तो खुद भी वजन घटा कर और स्लिम-ट्रिम बन गई है। वाह भई राखी तेरा भी जवाब नही। मिलाओ-मिलाओ खूब मीठा मिलाओ, कभी अभिषेक कभी मीका तो कभी इलेश, कभी राहुल गाँधी तो कभी रामदेव, भई मन के लड्डू फ़िके भी क्यूँ हों?



जबसे राखी ने बाबा का बनाया लौकी का जूस पी लिया है बाबा को स्वामी, स्वामी कहती रहती है। वैसे राखी का कोई भरोसा भी नही बाबा की ग्यारह सौ करोड़ की प्रोपर्टी डकार संतरे का रस पी ले। उसे तो आदत है रे बाबा। अरे बाबा हाँ मत कर देना। बच के रहना रे बाबा बच के रहना तुझ पे नज़र है।

Wednesday, July 27, 2011

चाहे जैसे भी हो, बस कोई मुझे फ़ैमस कर दे( नवभारत के व्यंग्यबाण कॉलम में प्रकाशित)



यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। दिल्ली में पृष्ठ १६(http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9373017.cms
लिखते-लिखते कलम घिस गई। सम्पादकों की मनुहार में बाल पक गये, और मुई ये चप्पल तो न जाने कितनी बार मोची की दूकान पर हो आई। लेकिन जिसको पाने की चाहत में उम्र बीती निगोड़ी वही न मिली। आजकल मिलता भी क्या है? और हमने किया ही क्या है। सोचो तो न चोरी की, न डकैती डाली, न किसी का खून किया, तो भला वो कैसे मिलती? वाह मियाँ खुद को बहलाने के अंदाज़ निराले है... बचपन में सीखा चोरी डकैती लूटमार यह सब काम अच्छे लोगो के नही। फ़िर सुना नफ़रत पापी से नही पाप से करो। पर आज जिंदगी की परिभाषा ही बदल जाये तो हम क्या करें? बस कैसे भी करके हे प्रभु तूं मुझे फ़ैमस कर दे, मै सवा पाँच रूपये का प्रसाद चढ़ाऊंगी। ओह्ह सवाया कहां से लाऊँगी चवन्नी तो गई।




भगवान भी क्या सोचता होगा कैसे भूखे नंगे लोग हैं, ये कलम घसीटॆ कभी मंदिर आते नही, सोना चढ़ाते नही, बिना कुछ किये सब पाना चाहते हैं। सोने की बात पर याद आया आजकल हर रोज खबर मिल रही है कि फ़लाँ मंदिर से सोना बरामद हो रहा है। फ़लाँ बाबा के पास से करोड़ो रूपये का सोना-चाँदी और रूपया-पैसा बरामद हुआ। तो भैया वह सब हमारा, आपका ही तो है। हमारे पुरखों ने भगवान को चढ़ाया। क्या फ़र्क पड़ जायेगा अगर मै उसी में से थोड़ा सा उठा कर भगवान को चढ़ा दूँ। वो सुना तो होगा… तेरा तूझको अर्पण, क्या लागे मेरा। लेकिन एक परेशानी फ़िर भी आड़े आ रही है। सुना है वह काला धन है, माँ कहती है पाप की कमाई भगवान नही लेते। तो क्या आजकल भगवान भी बदल गये हैं। हो सकता है वक्त के साथ भगवान भी मॉर्डन हो गये हों। और उन्होनें काले धन को गोरा करने का कॉन्ट्रेक्ट लिया हो तो सबने काला धन जमा करवा दिया। आज तो कैसे भी भगवान को पटाओ, पैसा लक्ष्मी जी है माथे के लगाओ तो भैया चाहे गोरा हो या काला स्लेटी हो या लाल पैसे के बिना तो भगवान भी नही सुनने वाले। चलो छोड़ो मुझे लगता है, कुछ और सोचना होगा।




शायद फ़ैमस होने के लिये कुछ बुक्स तो अवश्य होंगी मार्केट में जैसे,- फ़ूलन के टिप्स, बंटी की सफ़लतायें, कनिमोझी के सपने या फिर जेल जाने के आसान तरीके। हो सकता है किसी नीम-हकीम ने ऎसा कोई अर्क बनाया हो जिसे पीकर मै भी फ़ूलन जैसी शूरवीर, बंटी जैसी उस्ताद बन जाऊँ। और हो सकता है इसके बाद मुझे भी बिग बॉस बुला ले या फ़िर रामू अपनी फ़िल्म की हिरोईन बना ले। हे भगवान बस एक बार कनिमोझी का इंटरव्यू ही मेरे द्वारा करवा दे।




करना तो होगा कुछ न कुछ वैसे भी खाली दिमाग शैतान का दिमाग होता है। खाली दिमाग में गाँघी जी के सिध्दांत, बिनोवा भावे के विचार और न जाने कितने ही महापुरूषो की रूहों ने अड्डा जमा रखा है, अब इन्हे तो वर्तमान से कोई सरोकार ही नही। क्या फ़ायदा ऎसे लोगो का? आज ही गाँधी जी, बिनोवा भावे खोपड़ी से आऊट और फ़ूलन देवी, बंटी उस्ताद, कनिमोझी इन। ऎसे लोगो को रखूँगी न, जो आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। जिनमें दूसरे का पैसा लूटने की क्षमता है। जो मार्ग मे आने वाली हर बाधा को मसल कर रख दें। और जरा सोचिये लाइफ़ में एक बार भी जेल की सुख सुविधाये प्राप्त न की तो क्या पाया। चलो राह तो मिली सबसे पहले अपने पड़ौसी शर्मा को ही चाकू दिखा कर लूटा जाये। और नही माना तो टपका देंगे साले को भैया अपने को तो कैसे भी हो फ़ैमस होना है।






लूट… बाप रे बचपन में दो रूपये चुरा लेने पर अम्मा ने खूँटी पर उल्टा लटका दिया था। अरे छॊड़ो आज अम्मा भी बंटी चोर के साहस को देख रही हैं न उन्हे भी अपने किये पर पछतावा होगा कि काश चोरी करना सीखा पाती तो आज मेरी बेटी भी धूम मचाती।..ओह्ह अम्मा काश तुम समझ पाती, तो आज मै भी सेलिब्रिटी बन पाती।...







सुनीता शानू