Thursday, November 12, 2009

प्रेम मे लाठी

प्रेम में लाठी ( अमर उजाला के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)




मियां-बीवी राजी, तो क्या करेगा काजी? लेकिन वस्तुत: ऐसा है नहीं। दो प्रेम करने वालों के बीच से दुनिया की दीवार हटने का नाम ही नहीं लेती। यह प्यार भी, समझ में नहीं आता कि ऊटपटांग परिस्थितियों में ही क्यों होता है। कभी दुश्मन की बेटी से, तो कभी अपनी जाति के बाहर इश्क होता है और घरवाले लाठियां लेकर निकल पड़ते हैं। जाने कितने ही किस्से हैं जी। किस-किस का नाम लें? हर गली-सड़क पर आशिक घूमते नजर आते हैं। उस्ताद वाली आसी ने कहा है," तू अगर इश्क में बरबाद नही हो सकता। जा तुझे कोई सबक याद नही हो सकता।"



किसी ने सच ही कहा है कि प्यार अंधा होता है, जो न उम्र देखता है, न मजहब, न गोरा, न काला। इस अंधे प्यार का परिणाम तो अंधा ही होगा। किसी ने तो यह भी कहा है कि पागल प्रेमी दीवाना। सही है, अगर प्रेमी दीवानगी में पागल न हो पाए, तो दुनिया मजनू की तरह पत्थर मार-मारकर पागल देगी। उससे भी पेट न भरा, तो समझो, राम-नाम सत्य तो कर ही देगी। इसलिए अगला जनम लेने से पहले भगवान से रिकवेस्ट कीजिएगा कि आपकी प्रेमिका या पत्नी सगोत्र न हो, वरना अंजाम तो सब जानते ही हैं। क्या फायदा, अगर अगला जन्म भी गीत गाते-गाते गुजर जाए। या फिर आपकी प्रेमिका को अनारकली की तरह दीवार में चुनवा दिया जाए। अच्छा बवाल है भैया। प्यार करे कोई और परेशानी सारी दुनिया को।

इस समस्या का कोई न कोई उपाय तो भगवान को ढूंढना ही होगा। वरना मनुष्य उसकी बनाई सृष्टि का विनाश करता ही रहेगा, और जो काम २०१२ में होने की आशंका है, इस प्रेम के चक्कर में पहले ही हो जायेगा। इस समस्या से निपटने के लिए क्यों न भगवान लड़के-लड़कियों के चेहरों पर टैटू बना कर भेजे, ताकि उन्हें प्यार करने से पहले ही पता चल जाए कि उनका गोत्र क्या है। और जहां किसी लड़की को सगोत्र लड़का दिखे, उसे राखी बांधकर भाई बना दे। सोचिए, तब कितने भाई बन जाएंगे। छेड़े जाने का डर भी नहीं रहेगा। माता-पिता चैन की बंसी बजाएंगे।

अब सरकार को ही ले लीजिए। वह भी बेवजह रोड़े अटकाती है। जब लड़की की कुंडली मिला ली, गोत्र मिला लिए, छत्तीस गुण भी मिला लिए, तब सरकार ने मेडिकल चेक अप का लफड़ा पैदा कर दिया और शादी रुक गई। अब ऐसे में भगवान भी क्या कर लेंगे, जब सरकार भी उनके बनाए हर काम में अड़चन डालने लगेगी। तो भैया, यह बात बेकार हो गई कि जोडिय़ां बनती हैं आसमानों में।

आजकल गॉड ने प्रेम का गिफ़्ट देना बंद कर दिया है। इसलिए युवाओं को सोच-समझकर प्रेम करना चाहिए। अच्छा होगा कि वे अपने साथ अपनी मेडिकल रिपोर्ट साथ रखें। जन्म कुंडली भले न बनवाई हो, लेकिन अपने माथे पर जाति, धर्म और गोत्र का टैटू अवश्य गुदवा लें, ताकि जब कभी प्रेम के कीटाणु आपके शरीर में प्रवेश करने की कोशिश करें, तो आप अपना बायोडाटा दिखाकर सामने वाले या वाली का उचित मार्गदर्शन करें।

सुनीता शानू

Saturday, November 7, 2009

जातीय दबाव से दम तोड़ती ममता





(नई दुनिया के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)

पिछले दिनों सगोत्रीय विवाह से नाराज एक पिता द्वारा अपनी पुत्री की नृशंस हत्या और उससे पहले क्रूररतम उत्पीड़न की खबर आई । राजधानी के महिपालपुर इलाके की इस घटना ने लोगों को दहला दिया । इसी संदर्भ में सवाल उठता है,कि क्या हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत सपिंड में विवाह करने की इजाजत नहीं है। परंतु ऐसा कोई नियम नहीं बना जिसमें यह लिखा गया हो कि सगोत्र विवाह करने पर जाति से बेदखल कर गांव से निकाल दिया जाएगा या जान से मार दिया जाएगा।

हालांकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय विवाह परंपरा के अनुसार विवाह अपनी ही जाति में होता है व सपिंड व सगोत्र के बाहर रहता है। परंतु कितने लोग हैं जो गोत्र से भलीभांति परिचित हैं? जहां तक हमारी नजर जाती है, हम अपने बच्चों को भी अपने परिवार की ही शिक्षा देते हैं। जिसे सपिंड कहा जा सकता है। तो आज छोटा सा बच्चा भी जानता है कि कौन उसकी बहन है, कौन भाई लेकिन अगर अठारह वर्ष के किसी बच्चे से पूछा जाए उसका गोत्र क्या है तो वह शायद बता नहीं सकेगा। वह जाति को जानता है, परिवार को समझता है। उसकी नजर में चाचा, ताऊ, बुआ सभी अपने परिवार के अंतर्गत आते हैं परंतु सगोत्र की परिभाषा समझाए बगैर कैसे कोई समझ पाएगा की सगोत्र होता क्या है? और एक बात जो सबसे जरूरी है, देश भर के सगोत्री अपने चेहरे पर लिखकर तो नहीं चलते कि हम भाई-भाई हैं। कैसे कोई जान पाएगा की कौन उसके गोत्र से संबंधित है और कौन नहीं?

यह सवाल सिर्फ एक-दो बच्चों का ही नहीं तमाम भारतीयों का है जिसके कानून में अंतर्जातीय विवाहों और प्रेम विवाहों को मान्यता तो दे दी है परंतु समाज अभी तक अपना नहीं पाया है। ऐसा लगता है जैसे विश्व में एक सी पाठशाला चालू हो गई है जो कौमी एकता को भंग कर सगोत्री एकता की बात कर रही है। आज जो हमारा देश आधुनिकता का दावा करता है, किसी भी कानून को मानें या नहीं मानें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन सामान्य परिवार समाज के ठेकेदारों की चपेट में आ जाते हैं।

जिस देश में नारी को मां-बहन-बेटी के रूप में सम्मानित किया जाता रहा है । ससुराल में भी गृहलक्ष्मी, गृहस्वामिनी के रूप में समझा जाता है, उसी देश में अपनी बेटी का उत्पीड़न कोई भी माता-पिता तो नहीं कर सकते, जब तक कि उन पर गहरा सामाजिक दबाव न हो । क्या इस गुनाह का समर्थन किया जाना चाहिए?

मौजूदा हालात में हम कैसे सक्षम हो पाएंगे एक सुंदर और सुगठित समाज बनाने में। कैसे पिरो पाएंगे समस्त भारतवर्ष को एक सूत्र में। जब घर में ही फ़ूट पड़ी होगी तो दुश्मनों से मुकाबला कैसे हो पाएगा। तमाम बातें इस ओर इशारा कर रही हैं कि आज भी हम पाषाण युग में जी रहे हैं।


सुनीता शानू

Friday, October 30, 2009

करामाती इंजेक्शन (नई दुनिया के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)




करामाती इंजेक्शन




एक जमाना था जब इंजेक्शन का नाम सुन कर बड़ों-बड़ो की हवा खराब हो जाती थी। बचपन में डॉक्टर जब सुई लगाने के लिये निकालता था सुई देखने के साथ ही उई निकल जाती थी। आज वही सुई करामाती इंजेक्शन बनकर देशभर में मशहूर हो गई है। एक जरा सी सुई और काम बड़े-बड़े। आज सुबह दूध वाला मुझसे बोला- "बीबीजी! सुई लगाये बिना कौन्हो भैंस दूध न देत है। हम रोज इंजेक्शन लगाई देत हैं तब ससुरी दूध देत है।" -अरे! तुम क्या डॉक्टर हो जो भैंस को इंजेक्शन लगाते हों? वो मुझ पर ऎसे हँसा जैसे कि कोई अजूबी बात कह दी हो। -"अरे बीबी जी भैंस के इंजेक्शन लगाने के लिये कौन्हो डॉक्टरी की जरूरत नाही।" सच ही तो है बेचारी भैंस के कहीं भी इंजेक्शन ठोक दो बेचारी कमप्लेन तो कर नही पायेगी। डरने वाली कोई बात ही नही। इंजेक्शन खाकर जहाँ गाय-भैंस दूध ज्यादा देने लगी वंही मुर्गी भी अण्डे ज्यादा देने लगी। है न छोटा सा इंजेक्शन और फ़ायदा दुनियां भर का।

यहाँ तक तो बात समझ में आ गई परंतु कल रात जब जोर-जोर से सिसकने की आवाज आई तो समझ नही पाई, क्या पेड़ भी रात को रोते हैं? डर के मारे रात को गार्डन में जाने का मन नही हुआ। दूसरे दिन माली से पूछने पर पता चला कि उसने गाय-भैंस को लगाने वाला प्रतिबंधित ऑक्सीटॉक्सीन इंजेक्शन लौकी, तुरई के लगा दिया था, ताकि वे रातों-रात बड़ी हो जायें। लो भई माली जी बन गये सब्जियों के डॉक्टर। इंजेक्शन नही हुआ जैसे की बच्चों का खिलौना हो गया है।

कल तक रोगी को जल्दी ठीक करने के लिये इंजेक्शन लगाये जाते थे ,आज रोग का सामान बन बैठे हैं। बाजार में बिकती हर चीज़ ऎसा लगने लगा जैसे की इस करामाती पकाऊ-बढ़ाऊ इंजेक्शन की ही देन है। सेव की चमक देख कर या केले, पपीते की रंगत देख कर यह कहना मुश्किल होगा की यह पेड पर पके हैं या किसी करामाती इंजेक्शन का कमाल है। ऎसा लगता है जैसे सभी फ़ल-सब्जियों को रात-भर सौंदर्य-प्रसाधन द्वारा सुंदर चमकदार बनाया जाता है।ताकि सुबह सवेरे ग्राहक उनकी उपरी चमक-धमक देख कर धोखा खा जाये। अब तरबूज से ही ले लीजिये गर्मियों में गला तर करने के लिये जिसे इस्तेमाल किया जाता है। रातभर इंजेक्शन खाकर बेचारा कराहता है।



बच्चे भी रोज-रोज ऎसी खबरे सुन कर मनसूबे बनाने लगे हैं कि काश भगवान हमे भी रातों-रात बड़ा करदे। हमे पढ़ाई का इंजेक्शन लगा दे। अब मै भी सोच रही हूँ कि जहाँ एक ओर मनुष्य ने इतनी प्रगति कर ली है कि परखनली शिशु और डिजानर शिशु तैयार करने लगा है। वहीं किसी दिन यह भी सुनने में आ ही जाये की कल जो बच्चा पैदा हुआ था रात-भर इंजेक्शन देकर उसे युवा बना दिया गया है। न पढ़ाई का खर्चा, न ही इतने दिन पालने-पोसने का झंझट। बस यही परेशानी है की बच्चा बोलना-पढ़ना सीखेगा कैसे? तो वैज्ञानिक उसका भी कोई न कोई तोड़ निकाल ही लेंगे। शायद कुछ करामाती इंजेक्शन्स देकर बच्चों को भाषा का ज्ञान, पढ़ाई का तजुर्बा दिया जा सके। देखिये अब ये इंजेक्शन क्या-क्या खेल दिखाता है...।

सुनीता शानू

Thursday, October 29, 2009

मिस कॉल की भाषा (अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)





मिस कॉल की भाषा

 
सबसे पहले हम पाठको को बता दें कि मिसकाली जी क्या हैं। ये वो शख्सियत हैं जिससे बड़े-बड़े भी अपनी पहचान छुपाते हैं। अब अपने शर्मा जी से ही ले लो। पिछले दो हफ़्ते से बेचारे सो नही पाये हैं। इस मिसकाली ने नाक में दम कर रखा है। कब,कहाँ,कैसे आ टपके कुछ मालूम नही। शर्मा जी का जो हाल हुआ है भगवान ही जानता है। बेचारे सोना-जागना,नहाना-धोना सब भूल गये हैं। और ये मिसकाली! इसे कोई फ़र्क ही नही पड़ता। इसे न मरघट नजर आता है न ही उत्सव। और अब लगता है, मिसेज शर्मा को भी इस मिसकाली से जलन होने लगती है। तभी तो आजकल वे मिसकाली को नींद में गालीयां निकालती हैं डेम फ़ूल,स्टूपिड इत्यादि,न मुँह गंदा न राष्ट्रभाषा का अपमान।

आप सोच रहे होंगे की यह मिसकाली है कौन? जिसने मिसेज शर्मा तक को परेशान कर दिया। कहीं ये शर्मा जी की कोई एक्स गर्लफ़्रेंड तो नही?

...नही भई नही। ये मिसकाली हैं मौजीराम। शर्मा जी के लंगोटियां यार। जिन्होनें नया-नया मोबाईल लिया है। मोबाईल में है बस बीस रूपये का बैलेंस और मिस कॉल करने की तगड़ी बीमारी, जिसका शिकार हुए बेचारे शर्मा जी। मिसकॉल करते समय कभी नही सोचते की काम किसे है। तीस पे तुर्रा भी यह कि अम्मा यार तुम तो याद ही नही करते। एक मै हूँ जो हर वक्त तुम्हे याद करता रहता हूँ। और तुम इतने कंजूस की एक मिसकॉल भी नही कर सकते।
ग़ज़ब की बात तो यह होती है कि इन मिसकालियों की डिमाण्ड भी मिसकॉल ही होती है। अपने दिल की बात बस मिसकॉल के माध्यम से ही कह देते हैं। अक्सर देखा जाता है कि प्रेमिका अपने प्रेमी को मिसकॉल करती है, फ़िर प्रेमी भी मिसकॉल देकर अपने प्यार का इजहार करता है। जहाँ भावनाओं की ही जरूरत है, भला बात करके क्या हॉसिल होगा? सो मिसकॉल सबसे उत्तम उपाय है, यह बताने का की किसे,किसकी, कितनी याद सता रही है। यह तो वह बात हुई न हींग लगै न फ़िटकरी, रंग भी चोखो आये। तो भैया मिसकॉल का स्वाद एक बार जो चखले वो कॉल क्यूँ करे?

कुछ लोगों के लिये मिसकॉल अच्छा-खासा लव लेटर है, तो किसी के लिये हाल-चाल पूछने का तरीका। कोई बस डायलर टोन सुनने के लिये ही मिसकॉल करता रहता है। मुझे तो लगता है, यह मैथड भी भाषा-विज्ञान के अंतर्गत आता है। जहाँ पहले से डिसाईड होता है कि मिसकॉल आने वाला है। मिसकॉल आते ही चहरे पर एक चिरपरीचित सी मुसकान देखी जा सकती है।

मिसकॉल के किटाणु डेंगू,मलेरिया,स्वाईन फ़्लू की तरह चारों तरफ़ फ़ैल गये है। जिस दिन मिसकॉल न आये तो घर भी सूना-सूना सा लगता है। वैसे भी जितनी बार मोबाईल बजेगा देखने वाले को तो यही लगेगा न की बंदा कितना बिजी है भई।

मौजीराम की मिसकॉल ऎसी रंगत लाई की शर्मा जी के भीतर भी इसके किटाणु प्रवेश कर ही गये। अब मौजीराम की मिसकॉल पर शर्मा जी भी मिसकॉल करते हैं।अब दोनो में न शिकवे हैं न शिकायत है। एक राजस्थानी गीतकार ने इस मिसकॉल से प्रेरित होकर एक गीत तक लिख डाला है जो जगह-जगह मोबाईल पर सुनने को मिल जाता है, बनड़ी रो मिसकॉल म्हारे मोबाईल पर आवेगो, रे नया जमाने वाली बनड़ी फ़ोन मिलावे रे... शुक्र है कि मिसकालियों की यह मूक भाषा किसी ने तो समझी।

सुनीता शानू

Wednesday, October 21, 2009

भ्रूण हत्या पर आधारित...मिस इंडिया की पहल से उपजे प्रश्न



मिस इंडिया की पहल से उपजे प्रश्न

( अमर उजाला के काम्पेक्ट में प्रकाशित)

मिस इंडिया पूजा चोपड़ा सेव द गर्ल चाइल्ड के लिए 10 लाख रूपए जुटाने के एक अभियान पर हैं। पूजा खुद एक ऐसे परिवेश से आती है, जहां उनके पिता ने उनकी मां को छोड़ दिया। पूजा की मां की हिम्मत और खुद के संकल्प ने उसे यह मुकाम दिया कि वह लड़कियों को बचाने के किसी मुहिम के अभियान को पहचान दे सके। पूजा के जज्बे को सलाम करने के साथ एक सवाल करने का भी मन कर रहा है। देश में लड़कियों की घटती संख्या के प्रश्न का हल साधन जुटाने से नहीं सामाजिक सोच में बदलाव से होगा। पूजा का काम ज्यादा बड़ा प्रेरणास्पद काम है, बजाए कि किसी संगठन के लिए कुछ लाख जुटाना। पूजा चोपड़ा के जरिए इस जरूरी विषय पर एक व्यापक बहस हो यह भी एक बड़ी पहल का हिस्सा होगा।
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लासेंट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 5,00,000 कन्या भ्रूण हत्या होती हैं,व पिछले दो दशक में एक करोड़ लड़कियां कम हो गई हैं। जो या तो दहेज की भेंट चढ़ गई हैं या वारिस पाने की चाह में मार दी गई हैं।
भारत वर्ष में लगभग दो दशक पूर्व अल्ट्रासाउंड मशीन के द्वारा भ्रूण-परीक्षण पद्धति की शुरुआत हुई थी, जिसे एमिनो सिंथेसिस कहा जाता था। इसका उद्देश्य सिफऱ् गर्भस्थ शिशु के क्रोमोसोम के संबंध में जानकारी हासिल करना था। यदि इनमें किसी भी तरह की विकृति हो, जिससे शिशु की मानसिक व शारीरिक स्थिति बिगड़ सकती हो, तो उसका उपचार करना होता था । किन्तु अल्ट्रासाउंड मशीन का इस्तेमाल गर्भ में बेटा है या बेटी है की जाँच के लिये किया जाने लगा। अगर गर्भ में लड़का है तो उसे रहने दिया जाता है व लड़की होने पर गर्भ में ही खत्म कर दिया जाने लगा। इस लिंग चयनात्मक पद्धति को अवैध बताते हुए सन 1994 में प्रसव पूर्व नैदानिक तकनीक (विनियमन और दुरूपयोग निवारण) अधिनियम बनाया गया जिसे सन1996 में प्रचलन में लाया गया। ताकि कन्या भ्रूण हत्या रोकी जा सके। इस अधिनियम के अंतर्गत, लिंग चयन करने में सहायता लेने वाले व्यक्ति को तीन वर्ष की सजा ,तथा 50,000 रूपये का जुर्माना घोषित किया गया। तथा लिंग चयन में शामिल चिकित्सा व्यवसायियों का पंजीकरण रद्द किया जा सकने और प्रैक्टिस करने का अधिकार समाप्त किये जाने का कानून बना। पब्लिक हैल्थ ऑफि़सर्स का कहना है कि पिछले दो सालों में 21,072 अल्ट्रासाउँड की मशीने रजिस्टर्ड की गई थी। जो कि तब तक ही कानूनन वैद्य थी जब तक की उनसे भ्रूण की जाँच नही की जाती। इसी दौरान 199 मशीनो को भ्रूण जाँच करने के जुर्म में सील कर दिया गया व 405 डॉक्टर्स पर भी गैरकानूनी टैस्ट को करने का चार्ज लगा दिया गया।फिऱ भी चोरी छिपे भ्रूण परीक्षण करवाया जाता रहा। जिसे रोकने के लिये सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में राष्ट्रीय निरीक्षण और निगरानी कमेटी बनाई गई। किन्तु सरकार की तमाम कोशिशे कन्या भ्रूण हत्या को रोकने में नाकाम ही रही।
यूनिसेफ़ की रिपोर्ट के अनुसार लड़कियों के मामले में भारत की स्थिती चिंताजनक है। कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते आकड़ों ने भारत के कुछ राज्यों में लिंगानुपात में भारी गिरावट ला दी है।देश की जनगणना 2001के अनुसार 1000 लड़को पर लड़कियों की संख्या 0से6 वर्ष तक की आयु का अनुपात दिल्ली में 845,पंजाब में 798,हरियाणा में 819, गुजरात में 883 था। यूनिसेफ़ की रिपोर्ट बताया कि भारत में प्रतिदिन 7,000 लड़कियों की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है।आज की ताजा स्थिती में संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में अवैध रूप से अनुमानित तौर पर प्रतिदिन 2,000 अजन्मी कन्याओं का गर्भपात किया जाता है।यह स्थिति धीरे-धीरे इतनी विस्फोटक हो सकती है कि महिलाओं की संख्या में कमी उनके खिलाफ अपराधों को भी बढा सकती है ।
कन्या भ्रूण हत्या से 2007 में देश के 80 प्रतिशत जिलो में लिंगानुपात में गिरावट आ गई थी। प्रति 1000 लड़कों पर भारत में लिंगानुपात 927, पाकिस्तान में 958,नाइजीरिया में 965 आकां गया था। आज यह मानना गलत साबित हो गया है कि भ्रूण हत्या का कारण अशिक्षा व गरीबी है, वरन शिक्षित व सम्पंन परिवार भी इस तरह के कृत्य में शामिल है। कन्या भ्रूण हत्याओं का पहला और प्रमुख कारण तो यही है कि आज भी बेटे को बुढापे की लाठी ही समझा जा रहा है और कहा जाता है की पुत्र ही माँ-बाप का अंतिम संस्कार करता है व वंश को आगे बढ़ाता है।
इधर शुरू हुए कुछ सामाजिक संस्थानिक प्रयास इस अवधारणा को बदलने में लगे हैं। गुजरात में ऐसा ही एक डिकरी बचाओ अभियान चलाया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश ने भी कन्या भ्रूण हत्या करवाने वाले की खबर देने वाले को दस हजार का इनाम देने की घोषणा कर डाली है। सरकार अमेरिका व कनाडा से आयातित लिंग परीक्षण किट पर भी रोक लगा रही है।
सरकार को भी इस दृष्टि को विस्तार देना होगा कि फंड उपलब्ध कराने और कानून बनाने से तो इस मुश्किल का हल नहीं दिख रहा। सामाजिक स्तर पर बदलाव के लिए जरूरी है कि लड़कियों की भूमिका को विस्तार दिया जाए। उन्हें ज्यादा से ज्यादा अवसर दिए जाएं। ऐसे समय में जब राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, सत्ताधारी दल की शीर्ष नेत्री और देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री महिलाएं हों तो इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है, कि देश के एक दूरवर्ती गांव में बेटियों को बोझ न समझने की कोशिशों को शक्ति मिलेगी।


सुनीता शानू

Wednesday, September 2, 2009

छप्पर फ़ाड़ के (आई नेक्स्ट के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)




छप्पर फाड़ के

सुनीता शानू


( १ सितम्बर आई नेक्स्ट के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित )




माफ़ कीजियेगा मै यहाँ ऎसा कुछ लिखने नही जा रही कि बच्चों ने छप्पर फ़ाड़ा होगा। यहाँ बात ऊपर वाले की है कि ऊपर वाला जब भी देता है लेकिन ऎसा वो करता क्यों है? जिसे चाहिये एक उसे दस दे देता है।कुछ दिनों पहले अमेरिका की नाद्या सुलेमान ने एक साथ आठ बच्चे पैदा किये।और इसके बाद एक ट्यूनिशियाई महिला ने भगवान से दो जुड़वा बच्चों की डिमांड की और भगवान ने बारह बच्चे एक साथ उसकी झोली में टपका दिये।


मुझे लगता है भगवान को फ़ैमिली प्लानिंग के बारे में नॉलेज नही है। या इसमें सरकार और भगवान दोनो की कोई साठ-गाँठ भी हो सकती है। वरना हम भारतवासी तो आस लगाये बैठे रहते हैं कि कब छप्पर रूपी सीमेंट की छत फ़टेगी और कब मोती बरसेंगे।वैसे भी हम हर बात का जिम्मेदार भगवान या सरकार को ही ठहराते हैं। एक जमाना वह भी था जब कोई पूछता था कितने बच्चे हैं तो बच्चे कहते थे छ भाई है जी छह बहन हैं।अरे इतने बच्चे तो झट से घर का मुखिया कहता सब भगवान की देन है जी।


लेकिन सरकार और भगवान ने मिल कर भारत का नक्शा ही बदल दिया। कभी पाँच बच्चों की या तीन बच्चों की फ़ैमिली प्लानिंग ही हुई थी। लेकिन बाद में सरकार ने एक या दो बच्चे के बाद ही रोक लगा दी। किन्तु भगवान ने दूसरे देशों मे यह प्लानिंग लागू नही की, तभी तो वो लगे हैं वर्ड रिकार्ड तोड़ने में। सबसे मजेदार बात तो तब पैदा हुई जब दो जुड़वा बच्चों की जगह छ जुड़वा यानि कि बारह बच्चे पैदा होने पर ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रजनन विशेषज्ञ सिमन ने डॉक्टरों को दोषी बताया। अब भला उन बच्चों के पैदा होने में डॉक्टर का क्या कुसूर? जब ऊपर वाला देता है तो डॉक्टरों की इजाजत थोड़े ही लेता है।


अब जितने बच्चे उतने नाम। आप चाहें तो महीनों के नाम सप्ताह के नाम या फ़िर ज्यादा ही दिक्कत खड़ी करे तो एक ही नाम रखके ग्रेडिंग कर दो। अगर बच्चों के रंग में भी भेद हो। जैसे जैनी(बिल्ली) ने दस बच्चे दिये थे, दो काले थे बाकि की बस पूछँ ही काली थी। तो हो सकता है नाम रखना और भी आसान हो जाये। ट्वीन्स में सबसे ज्यादा दिक्कत पहचानने की ही होती है।


आजकल जो ये टैटू का जमाना है तो चाहें तो माता-पिता अपने बच्चे पर रूचि के अनुसार टैटू बना दें ताकि पहचान कर पुकारा जा सके। वैसे भी सुनने में आया है कि लॉस एंजिलिस क्लीनिक ने एक प्रयोग के द्वारा भ्रूण में मोडिफ़िकेशन करके डिजानर बच्चे पैदा करने का दावा किया है।हो सकता है कि बच्चों के पेट पर जिप लग जाये या बटन लग जाये। हाथ -पैर में फ़ोल्डिंग सिस्टम हो तो संड़क पार करवाने में भी सुविधा रहेगी। एक ही पलंग पर सब को ऎड्जेस्ट किया जा सकेगा। बस डर इस बात का लगता है कि कहीं माता-पिता सूट की तरह बच्चे भी पुराने फ़ैशन के समझ बाज़ार में एक्सचेंज ऑफ़र में बदलने की न सोचें।या फ़िर माँ बच्चों की शकल शाहरूख खान या सलमान जैसी बनवा ले और बाप सच का सामना में बैठा शाहरूख या सलमान पर इल्जाम लगाये। देख लेना भैया जब बुरे दिन आये भगवान भी कल्टी न कर जाये।

...

Tuesday, August 18, 2009

बीमारी का लाभ


अमर उजाला पर प्रकाशित एक व्यंग्य....

इधर जब से शर्मा जी को हल्की सी खाँसी आई हैं, ऑफ़िस में रूबी भी हाथ मिलाने से हिचकिचाती है।शर्मा जी बहुत परेशान हैं। बाहर स्वाइन फ़्लू का बढ़ता हुआ आतंक और घर में बीबी का। बार-बार हाथ धोते-धोते परेशान हो गये थे। गले लगाना तो दूर लोग हाथ मिलाते हुए भी कतराते थे। अगर स्वाइन फ़्लू सचमुच हो गया तो? रूबी की बात तो छोड़ो बीबी भी पास न आयेगी। शर्माजी उलझल में थे कि उनके दोस्त मौजीराम आ धमके। शर्मा जी ने उन्हे आपबीती सुनाई।मौजीराम ठहरे ऑल टाइम मौजी। लगे स्वाईन फ़्लू के फ़ायदे गिनाने। यार घबराते क्यों हो?फ़ायदा क्यों नही उठाते।आराम का आराम और बिना आरक्षण सीट पर विश्राम।शर्मा जी-वो कैसे? अरे यार स्वाइन फ़्लू के मरीज के पास कौन बैठेगा सोचो? तुम आराम से मैट्रो मे सफ़र कर पाओगे। घर के सारे काम भी बीबी चुपचाप किया करेगी। दिन भर तुम्हारी सेवा करेगी।एक सबसे बढिया बात, ऑफ़िस से बॉस भी छुट्टी दे देगा। मौजीराम की बात शर्मा जी के दिमाग में फ़िट हो गई।
योजनानुसार शर्मा जी एन 95 स्पेशियल मास्क पहन आये। तैयार होकर जैसे ही मैट्रो पर चढे़। तैसे ही खाँसी आई सारी भीड़ छट गई,पास बैठी खूबसूरत बाला उन्हे छोड़ मौजीराम के साथ बैठ गई।ऑफ़िस मे भी बॉस उन पर बरसता उससे पहले ही खाँसी आई और बॉस नरम होकर बोला-अरे पहले बताया होता न तुम बीमार हो। जाओ आराम करो। शर्मा जी मन ही मन मौजीराम को थैंक्यू पकडा रहे थे।तभी उनकी नजर रूबी पर पड़ी जो मौजीराम से हाथ मिलाते हुए कह रही थी कि आप कितने नेक हैं,जो जान की परवाह किये बगैर स्वाइन फ़्लू के मरीज के साथ है। शर्मा जी बेचारे तिलमिला कर रह गये।
मौजीराम के सौजन्य से मिसेज शर्मा को पता लग चुका था,अब तक सभी रिश्तेदारों को फोन किये जा चुके थे। शर्मा जी को घर पहुँचते ही सबने दूर से ही देखा। उनके कपड़े उनका सामान सब पृथक कर दिया गया। पत्नी की आँखों के आसूँ शर्मा जी को बेहाल कर रहे थे,कि अचानक मौजीराम की आवाज आई आप फ़िक्र क्यों करती हैं भाभी जी,मै हूँ न। और बस घर के सभी सदस्य मौजीराम की आवभगत में ।
शर्मा जी को हॉस्पिटल भर्ती करवाया गया। डॉक्टर को मौजीराम ने जाने क्या समझाया की उसने भी स्वाइन फ़्लू की बीमारी कन्फ़र्म कर दी, अब शर्मा जी का बुरा हाल, मौजीराम की मौज,लोग मौजी राम को मसीहा कहने लगे।
हॉस्पिटल से छूट कर शर्मा जी जब ऑफ़िस पहुँचे तब ४४० वाट का करंट उनसे चिपक चुका था।रूबी बन गई थी मिसेज मौजीराम। मौजीराम को बॉस के द्वारा प्रोमोशन मिला था। और शर्मा जी के घर में ही नही उनकी बीबी के दिल में भी मौजीराम ने गहरा असर छोड़ा था कि जिन्दगी भर उनके परिवार की रक्षा का बन्धन बीबी ने उसके हाथ पर बाँध दिया। शर्मा जी मौजीराम को हड़काते,या अपना फ़ायदा उठाने पर डाँट लगाते मगर खाँसी आई और शर्मा जी चुप होकर रह गये। मौजीराम मुस्कुराते हुए गुनगुना रहे थे-स्वाइन फ़्लू बड़े काम की चीज है...

सुनीता शानू

Thursday, July 23, 2009

आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ




आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ (२० जुलाई को अमर उजाला में प्रकाशित)

आज तो बहुत जोर-जोर से गला फ़ाड़ देने वाली आवाज़ में गाया जा रहा है...आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ... जाने क्या बात है आज सुबह से शर्मा जी बहुत बन-ठन के घूम रहे हैं, घर में बहुत चहल-पहल है, पिन्क शर्ट बालो में भी गुलाबी फ़ूल क्या हो गया शर्मा जी को? ये बात सबको मालूम है की उन्हे महिलाओं जैसे रंग बहुत पसंद हैं लेकिन आज तो हद ही कर दी।...ओह्ह! अब समझ में आया वो रोज बालकनी में खड़े होकर फ़िल्म का यही गाना क्यों गाते थे? हाय-हाय बेचारी मिसेज शर्मा क्या होगा अब उनका? कहाँ,किसने,कब सोचा था कि मुकेश जी का गाया पहचान फ़िल्म का यह गाना एक अलग ही पहचान बना जायेगा, मुकेश दादा क्या आपको पूर्वानुमान हो गया था? कि आने वाला समय इतना बदल जायेगा की आदमी आदमी से और औरत औरत से प्यार करने लग जायेंगे, जहाँ तक प्यार करने का प्रश्न हैं प्यार करना बहुत अच्छी बात है, हर इन्सान के दिल में प्यार होना चाहिये, कुत्ता बिल्ली जानवर सबसे प्यार हो जाता है इंसान को। साथ रहते-रहते खेलते-कूदते अपने सह मित्र से प्यार होना कोई विचित्र बात नजर नही आती, मगर हे सृष्टि के पालन हार हे ब्रह्मा इतना तो बता दीजिये अब सृष्टि का निर्माण होगा कैसे? आज का इन्सान तो आपके बनाये नियमों को ही तोड़ने लगा! आदमी अगर आदमी से विवाह कर लेगा तो कौन बनेगा मम्मी? कौन बनेगा डैडी? कैसे कोई कहेगा माँ का दूध पिया है तो आजा अखाड़े में, हे ब्रह्मा तनिक ये भी बतलायें उसकी रगो में पिता का खून भी दौड़ेगा की नही? मुझे तो डर है की परखनली शिशु ही न फ़ैल जायें विश्व भर में! कैसी अजब बात लगती है!! मुझे तो लगता है लड़कियों ने आजकल लड़को को नखरे दिखाने शुरू कर दिये हैं और आपस में विवाह करने लग गई हैं, या फ़िर ये लड़के थक गये लड़कियों को गिफ़्ट दे दे कर। शक तो तभी से हो गया था जब खबर सुनी थी की अमुक जगह की नारीयाँ जनेऊ धारण करने लगी है और लड़कों ने कान में बाली पहन कर अपने बाल लम्बे करने शुरू कर दिये हैं...
बचपन में माँ पूछती थी बेटी किसके साथ सिनेमा जा रही है, बताने पर की सुगंधा के साथ सरला के साथ तुरन्त परमिशन मिल जाती थी, गोविंद अगर गोपाल के गले मे बाहें डाल कर घूमता था तो माँ-बाप खुश होकर कहते थे, मेरा बेटा कितना सदाचारी है, कभी किसी कन्या की तरफ़ नही देखता। मगर आज क्या करेंगे माता-पिता जब बेटी अपनी ही सहेली को सूट-बूट पहना दूल्हा बना घर ले आये या बेटा अपने ही दोस्त को साड़ी पहना दुल्हन बताये। इन्होने अपनी एक पहचान भी बना ली है दायें कान में बाली और सतरंगी छतरी हाथ में लिये जैसे की इनका भी एक चुनाव चिंह बन गया हो...वो दिन भी दूर नही जब इनमे से कोई एक हमारे देश का नेता भी बन जाये,क्योंकि नेताओं ने तो इस सारे मामले में गाँधीजी के बंदरों की तरह चुप्पी साध ली है,उन्हे वोट जो लेने हैं,अबके बरस तो लगता है गणतंत्र दिवस की परेड भी निराली होगी, सैमलंगिकों की परेड जो शुरू हो गई है, इसे देख कर तो लगता है की रिहर्सल चालू हो गई भैया। अब सरकार भी क्या करे यह भी ग्लोब्लाईजेशन का एक हिस्सा ही समझिये, काम प्रगति पर है, कुछ सीखें न सीखें हमारे देशवासी पर अपनी संस्कृति छोड ता ता थैया करते जरूर नजर आयेंगे....
सुनीता शानू

Monday, July 20, 2009

समलैंगिकता: संस्कृति और संविधान

डेली न्यूज एक्टिविस्ट में प्रकाशित

समलैंगिकता: संस्कृति और संविधान

सुनीता शानू

समलैंगिगकता के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ही अंतिम फ़ैसला करेगा, फ़िर भी इस विषय पर वैचारिक बहस शुरू हो चुकी है।ये सच है कि स्त्री-पुरूष के बीच आपसी संबंध ही एक सुन्दर समाज का निर्माण कर सकता हैं, किन्तु धारा ३७७ के असवैंधानिक करार होते ही कुछ पाशविक प्रवृति के लोगो का जागरूक हो जाना कोई आश्चर्य वाली बात नही होगी, आये दिन सामाज में ऎसी घटनाएं देखने को मिल रही हैं कि अमुक संस्था के पालक ने वहाँ के अबोध बालको का शारीरिक शोषण किया, या नौकरी देने का झांसा देकर बुलाया और उसके साथ अश्लील हरकते की। क्या ऎसा नही लगता की बरसों पुराने कानून को असवैधानिक करार कर हमने अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली है?

अधिसंख्य प्राणी काम और संतानोत्पति की एक-सी प्रक्रिया ही अपनाते हैं, किन्तु एक छोटा सा वर्ग ऎसा भी है जो कुछ अलग हट के है। जिनकी इच्छा अपने ही जैसे लोगो से प्यार करना है, कल तक इसे अपराध माना जाता था, और याचिका दायर करने वाले संगठन नाज फ़ाऊँडेशन का कहना है कि इस कानून की वजह से ही भारत में इस तबके को परेशानी का सामना करना पड़ रहा था, लोग इन्हे उपेक्षा की नजरों से देखते हैं, कई बार ऎसे स्त्री व पुरूष जो समलैंगिक,उभयलिंगी और ट्रांसजेंडर है कुछ अपराधिक प्रवृतियों की नजर में चढ़ जाते हैं, व समाज के डर से उनके द्वारा ब्लैकमेल भी होते रहते है, जिनमे से बहुत बार कुछ प्रतिष्ठित लोग बदनामी से बचने के लिये आत्महत्या तक कर लेते हैं। इन सब बातों के रहते सरकार ने ये फ़ैसला किया ताकि समलैंगिकको को भी समाज में बराबरी का स्थान मिल सके। सरकार उन लोगो को भी समाज में पूरा स्थान देना चाहती है, जो अपने इस कृत्य से उपेक्षित माने जाते हैं, बहुत से डॉक्टर्स का यह भी फ़ैसला है कि यह अपराध नही है न ही कोई बीमारी है, तो फ़िर यह क्या है? बस यही सवाल एक आम नागरिक को झकझोर रहा है।

मानवियता से हटकर पशुओं की भाँती यौनाचार की पद्धति को क्या अपराध नही माना जायेगा? क्या इसे कोई मानसिक बीमारी नही मानी जायेगी? जब कोई व्ययस्क किसी दूसरे व्ययस्क की मर्जी के खिलाफ़ उसे यौन-उत्पीड़न का शिकार बना लेता है क्या वह भी अपराध नही माना जायेगा? कितनी ओर ऎसी धाराएं हैं जो निरस्त की जायेंगी। और निरस्त ही करना था उन्हे बनाया क्यों गया? एक दूसरा पहलू यह भी है कि यह धारा नाबालिगों पर हो रहे यौन-उत्पीड़न पर अपराधियों को सजा देने के लिये भी बनाई गई थी, इसका प्रयोग भूतपूर्व न्यायाधीश जे एन सल्डाहा ने भी एक नाबालिग बच्चे को इन्साफ़ दिलाने के लिये किया था। इस धारा का उपयोग देखते हुए तो इसे निरस्त करना बेबुनियाद है। इस फ़ैसले की आड़ में वो पुरूष व स्त्री भी स्वतंत्र हो जायेंगे जो अवैध तरीको से यौनाचार में लिप्त रहते हैं, जो समलिंगी नही हैं परन्तु जिनमें सैक्स को लेकर पाशविक प्रवृति जागरूक है, ऎसे व्यक्ति जो अपने सहचर को छोड़ दूसरे लोगों से सम्बंध बनायेंगे। ऎसे व्यक्तियों से उनके परिवार में अनेक बीमारियों का पैदा हो जाना लाजमी है।

वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गनाईजेशन के मुताबिक समलैंगिकता दिमागी बीमारी नही हैं,यह एक व्यवहारिक दिक्कत है, अब इस व्यवहारिक दिक्कत से उनका क्या तात्पर्य है व्यवहारिक दिक्कते तो सुलझाई जा सकती हैं, अगर किसी विपरीत लिंगी से सम्बंध व्यवहारिक दिक्कतों की सूची में आता है तो प्रकृति के बनाये नियमों में उलट-फ़ेर कैसे सम्भव है? क्या आज का इन्सान पशुओं से भी गया-गुजरा हो गया है? क्यों नही देश की भलाई को ध्यान में रखते हुए, आज का इन्सान एक स्वस्थ समाज के निर्माण में सहायक हो पाता। आज एक से बढ़ कर एक उपचार हैं, योग और ध्यान के द्वारा भी इससे निजात पाई जा सकती है, अगर सरकार चाहे तो ऎसे सुधार केंद्र खोल सकती है जहाँ राह से भटके हुए लोगो को सही दिशा की ओर ले जाया जा सकता है।

कोर्ट का यह फ़ैसला की आपसी सहमति से समलैंगिक रिश्ता कोइ जुर्म नही हैं, कहना समाज को एक गलत दिशा की ओर मोड़ता है। एक ऎसा समाज जहाँ सिर्फ़ अप्राकृतिक वातावरण ही जन्म ले सकता है। जहाँ रिश्तों की कोई अहमियत नही रहती।एक वक्त ऎसा भी आ जायेगा, जब माँ बाप अपने बच्चों को चाहे वो अपने समलिंगी सहपाठी के सिर्फ़ मित्र ही हों शक की नजर से देखेंगे। और अगर एसे ही समाज का विकास होता चला गया, परिवार कैसे बन पायेगा? आज की नौजवान पीढ़ी बस आज के साथ जी रही है, इसी कारण आये दिन बुजुर्गों का अपमान होता है, परिवार का विघटन होता जा रहा है, संयुक्त परिवारों से आज एकाकी परिवार ज्यादा नजर आते हैं, भारत की मर्यादा, संस्कृति को ये वर्ग ताक पर रख एक ऎसे समाज की सरंचना करना चाहता है जहाँ से शुरू होता है भारत की संस्कृति का पतन।
 
मुझे नही लगता की इससे किसी के मौलिक अधिकारों पर अकुंश लगाया जा रहा है, या स्वाधीन भारत में इस वर्ग की स्वतंत्रता को छिन्न-भिन्न किया जा रहा है, क्या कभी ऎसा देखा है कि किसी पागल आदमी को खुला छोड दिया गया हो? या किसी बीमार का इलाज किये बिना बीमारी ठीक हो गई हो? शायद यह भी एक ऎसी बीमारी है जो किन्ही विशेष कारणों से पनपति है, एक पहलू तो यही सामने आया है कि जो लोग पाशविक प्रवृति के हैं वो नाबालिग बच्चों को अपना शिकार बना लेते हैं और उनमें बचपन से ही यह कुंठा जन्म ले लेती है, या फ़िर किसी विशेष परिस्थिति में विपरीत लिंगी से नफ़रत पैदा हो जाये। कोई भी कारण हो सकता है। एक सर्वेक्षण से यह भी पता चला है कि नर हो या मादा सभी में कुछ प्रतिशत दोनो ही गुण पाये जाते हैं, किन्तु कभी-कभी ऎसा भी होता है कि नर में मादा के और मादा में नर के अधिक मात्रा में गुण पाये जाते हैं, यह आनुवंशिक होता है। किन्तु इसका यह मतलब कतई नही की उसे इलाज देने की अपेक्षा समाज को गंदा करने की पूरी छूट दे दी जाये। बेहतर समाज बनाने के लिये यह आवश्यक है की इसका निर्माण पुरूष व स्त्री दोनो मिलकर करें। सलैंगिकों को खुली छूट देकर ऎसा लगता है सरकार ने कोई नई परेशानी मोल ले ली है। यह धमाका भी किसी एटम बम से कम तो नही है?

डी एम ए के पूर्व अध्यक्ष डॉ के अग्रवाल यह मानते है कि 99 पर्सेंट देशों में पाँच फ़िसदी आबादी का उसी सैक्स के प्रति आकर्षण होता है, और इस जानकारी का फ़ायदा उठाने में वोटो की चाह रखने वाले भी कम नही हैं, देश हो या विदेश हर तरफ़ इस तबके के प्रति सवेंदना व्यक्त करके, इन्हे बड़े-बड़े वायदो में लपेट के, इनक भरपूर फ़ायदा उठाया जा रहा है।किन्तु भारत वासी यह क्यों भूल रहे हैं कि भारत की संस्कृति भारत की शान है। इसी संस्कृति ने बड़े-से बड़े खतरों का सामना बहादूरी के साथ किया है। विदेशों में हो रहे पारिवारिक मूल्यों के विघटन की जिम्मेदार वहाँ की संस्कृति है, परन्तु भारत देश में यही संस्कृति मानविय मूल्यों को समेटे एक स्वस्थ समाज के निर्माण की परिचायक है

समलैंगिकता किसी महामारी से कम नही है, इसे दिमागी दिक्कत का नकाब पहना कर कुछ सिरफ़िरों ने समाज में शामिल किया तो है, मगर आने वाले कल में वह दिन दूर नही जब भारत में भी अनैतिकता का बोलबाला होगा। आये दिन पति अपनी पत्नी से और पत्नी अपने पति से यह कह कर छुटकारा पा लेगी की हम किसी से भी यौनसम्बंध रखने के लिये स्वतंत्र हैं।और एक ऎसा समाज विकसित हो जायेगा जहाँ माता-पिता भाई बहन के रिश्तों का कहीं कोई नाम भी न होगा।

सुनीता शानू

Tuesday, June 16, 2009

यंगिस्तान में बुजुर्गों की जगह कहाँ है(अमर उजाला पर प्रकाशित)





भारत की युवा आबादी को देखते हुए ही इसे भविष्य की एक ताकत के रूप में आंका जा रहा है।लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है की युवा होते भारत में बुजुर्ग दयनीय और उपेक्षित जीवन बिताने को मजबूर हो रहे हैं।अब तो वैश्विक संस्थाएं भी इसकी तसदीक करने लगी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक ताज़ा रिपोर्ट बताती है किभारत में बुर्जुग सिर्फ अपनों की उपेक्षा, मानसिक-आर्थिक तनाव ही नहीं झेलते कानूनी ज्यादातियों का सामना भी करते हैं। देश में इस समय 7 करोड़ 70 लाख बुर्जुग है, जो आने वाले 25 बरसों में 17 करोड़ 70 लाख होगी। बढ़ती औसत आयु के परिप्रेक्ष्य में बूढ़ों की तादाद भी बढ़ती जा रही हैं और उनकी मुश्किलें भी। देश यंगिस्तान की बात कर रहा है। ये बूढ़े जो घर के दरवाजे की सांकल होने का महत्व रखते थे, उनके बारे में कुछ करने की बात अलग, लोग सोचने को तैयार नहीं है। डब्लूएचओ की रिपोर्ट पुरूष और स्त्री बुजुर्गो की समस्याओं को अलग-अलग और संयुक्त रूप से भी देखने की दृष्टि देती है। निम्न मध्य वर्ग के बुर्जग स्वास्थ्य और आर्थिक संकट से, मध्य वर्ग के बुजुर्ग आर्थिक संकट से और उच्च वर्ग के बुजुर्ग मानसिक तनाव से लगातार जूझते रहते हैं।

डब्लूएचओ की एक और रिपोर्ट पर उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार और सामाजिक संगठन और दूसरी इकाईयां कुछ गंभीरता दिखाएंगी। यह रिपोर्ट वर्ल्ड एल्डर एब्यूज अवेयरनेस डे के आसपास आई है, इसलिए इसे एक सकारात्मक शुरूआत की नींव के तौर पर देखा जा सकता है । आईएनपीईए (इंटरनेशनल नेटवर्क फार द प्रिवेंशन आफ एल्डर एब्यूज) की तरफ से 2006 में 15 जून को वर्ल्ड एल्डर एब्यूज एवेयरनेस डे के नाम से घोषित कर दिया जिसका संयुक्त राज्य तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पूर्ण समर्थन किया। ऐसे में कम से कम एक दिन तो हुआ जब हम पिछली गलतियों पर सोचने की और नए संकल्प की शुरूआत कर सकते हैं।

आईएनपीए ने भी डब्लूएचओ की ताजा रिपोर्ट के पहले एक अपनी रिपोर्ट जारी की। उसके सर्वेक्षण के तथ्य भी भयावहता की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। बुजुर्गों के लिए इस एक दिन के हवाले से ही उन पर गौर करने की पहल शुरू होनी चाहिए। आईएनपीए के मुताबिक भारत में 47.3 प्रतिशत ऐसे हैं जो अपने परिवार की तरफ़ से नफऱत के पात्र बन जाते हैं। देश में 48 प्रतिशत बुजुर्ग ऐसे हैं जो आर्थिक और भावनात्मक रूप से अपमानित होते हैं।उन्हे अपने ही बनाये आशियाने में रहने को जगह नही मिल पाती। ज्यादातर देखा जाता है कि इस उम्र में बुजुर्गों को अलग-थलग एक कोठरी में रखा जाता है, और वे अकेलापन महसूस करने लगते हैं, खुद-ब-खुद बड़बड़ाना शुरू हो जाता है या दीवारों से बाते करने लगते हैं। दरअसल 58 से 60 साल की उम्र से ही बुजुर्गों को मदद की आवश्यकता होने लगती है। परन्तु इसी समय बड़े हो गए उनके बच्चों की दुनिया में बुजुर्ग गैर जरूरी हो जाते हैं। अधिकतर मामलों में देखा गया है कि बच्चे अपने बुजुर्गों को अनदेखा करने लगते हैं, उनकी सेहत के बारे में चिन्ता करने और समय देने की तो बात ही अलग है।

कहते हैं जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, बचपन लौट आता है, माता-पिता भी कई बार बच्चों की सी हरकते या हँसी मजाक करने लगते हैं, और बच्चे उन्हे सठियाने का नाम देकर अपमानित करते हैं। बार-बार अपनों से अपमानित हो उनमें असुरक्षा की भावना घर कर लेती हैं,और यही भावना बुढ़ापे को एक बीमारी का नाम दे देती है। टरटियरी केयर हास्पिटल के एक सर्वे कहा गया है कि 85 प्रतिशत बुजुर्ग अपनो से प्यार की कामना करते हैं,केवल 10 प्रतिशत ऐसे हैं जो जैसा माहौल मिले रहने को तैयार हैं, और 4 प्रतिशत ऐसे है जो वृध्दाश्रम में जाने को तैयार हैं, 1 प्रतिशत वे भी हैं जो इस विषय में कुछ भी कहने को तैयार नही। ये वो लोग हैं, जो ये समझते हैं कि उनके शिकायत करने से उन्ही के बच्चों की बदनामी होगी।

बड़े-बूढ़े सिर्फ अपनों की उपेक्षा के शिकार हों ऐसा नहीं है। तरह-तरह की कानूनी ज्यादातियां भी उनके हिस्से आती है। जेंडर ह्यूमन राइट्स सोसायटी के अनुसार धारा 498-ए के तहत 58000 मामले दर्ज किये जाते हैं। एक लाख से भी ज्यादा लोग झूठे मामलो में गिरफ़्तार होते है । हर 4 मिनिट में एक पुरूष पर दहेज प्रताडऩा का झूठा आरोप लगा दिया जाता है, व हर 2 घंटे 40 मिनट में एक बुजुर्ग नागरिक को दहेज की माँग के झूठे आरोप में फ़ंसा दिया जाता है। अलग-अलग सामाजिक संगठनों से इस संबंध में आवाज उठी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस संबंध में पड़ताल करके रिपोर्ट जारी की है।

डब्लूएचओ की रिपोर्ट एक आधार बनी जिसके चलते सन 2007 में एक बिल पारित हुआ जो बुजुर्गों की देखभाल व कल्याण के लिये था,जिसका मुख्य उद्देश्य था, बुजुर्गों की सहायता करना व उनके सम्मान की रक्षा करना था। सर्वोच्च न्यायालय ने भी निर्देश दिए कि संतान को मां-बाप की देखभाल करनी ही होगी। इस कानूनी मजबूती से बुजुर्गों के पक्ष में एक रास्ता तो बना, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में कितने बुजुर्ग अपनी औलादों के खिलाफ अदालतों में खड़े मिलेगें। कितने अजीबो-गरीब बात है कि देश के हर सरकारी दफ्तर में तबादले के लिए दिए जाने वाले आवेदन में एक खास मजमून लिखा होता है कि फलां की मां की तबियत खराब रहती है या पिता अतिवृद्ध हैं और उनकी देखभाल की जरूरत है। लेकिन हकीकत क्या है, इसको विश्व स्वास्थ्य संगठन और दूसरी रिपोर्टस बताती हैं। भारतीय परंपरा के किस्सों और बुजुर्गो के सम्मान से भरे साहित्य के बीच मौजूदा हकीकत से साक्षात करने का साहस हम कब जुटाएंगे।