Thursday, December 24, 2009
सर्दी में कैसे नहाएं (अमर उजाला के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित...)
सुनीता शानू
सर्दी के मौसम में रजाई से निकलकर नहाने के लिए जाना भी एक विकट समस्या है। इस मौसम में शर्मा जी खुद को सबसे बदनसीब प्राणी समझते हैं। हर सुबह उस व1त उनका मूड उखड़ जाता है, जब पत्नी न नहाने पर बार-बार उलाहना देती है। आखिरकार बीवी कमांडर बनकर उन्हें बाथरूम की तरफ धकेल ही देती है। वह शहीद बनकर अंदर घुस जाते हैं। ठीक ऐसे ही समय पड़ोस से मिश्रा जी के गाने का स्वर आता है, ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए।
बस बीवी का दिमाग तमतमा जाता है, कब तक आलसी की तरह पड़े रहोगे? मिश्रा जी से कुछ सीखो, जो रोज ठंडे पानी से नहाते हैं। एक तुम हो, जो गरम पानी से नहाते हुए भी रो रहे हो। अब श्रीमती जी को कौन समझाए कि मिश्रा जी सचमुच ठंडे पानी से नहा रहे हैं या गरम पानी से। या नहा भी रहे हैं कि सिर्फ राग अलाप रहे हैं। बहरहाल बेचारे शर्मा जी को उठना ही पड़ा।अब यह कोई एक दिन की बात तो है नहीं। रोज-रोज का नहाना, सचमुच कंपकंपी-सी चढ़ जाती है
नल तेजी से चलाएं और ठिठुरते हुए गाएं, ताकि बीवी को लगे कि आप सचमुच नहा रहे हैं। हां, गीले तौलिये से शरीर पोंछना न भूलें
शर्मा जी पत्नी को समझा-समझाकर थक गए कि सर्दी में नहाना बेवकूफों का काम हैं। एक तो पसीना आता नहीं, दूसरे पानी की बरबादी। खैर ये गूढ़ रहस्य की बातें हैं, पत्नी की मोटी बुद्धि में घुसने वाली नहीं।
अचानक माथे पर चंदन का टीका लगाए मौजीराम को आए देख शर्मा जी थोड़े आश्वस्त हुए। उन्हें लगा, डूबते को तिनके का सहारा मिला। लेकिन बीवी ने मौजीराम के सामने एक बार फिर शर्मा जी के न नहाने का उलाहना दिया। मौजीराम ने आग में घी डालते हुए कहा, अरे भाभी जी, सर्दी में नहाना अति उत्तम है, और वह भी ठंडे पानी से तो समझो कि सो रोगों की दवा।
बेचारे शर्मा जी गुस्से में दांत किटकिटा रहे थे। अब तो सहन करना मुश्किल हो गया। मौजीराम रोज-रोज नहाने वाला बंदा तो है नहीं, कोई न कोई घोटाला अवश्य है। खैर शर्मा जी को विप8िा में देख मौजीराम ने दोस्त होने का फर्ज निभाया और उन्हें शीत स्नान का नुसखा बताया। शीत स्नान यानी ह3ते में बस एक दिन रविवार की छुट्टी के दिन नहाएं। बाकी दिनों बस ठंडे पानी के नल को पूरे वेग से चलाएं और ठिठुरते-ठिठुरते गुनगुनाएं, ताकि पत्नी को लगे आप सचमुच ठंडे पानी से ही नहा रहे हैं। इसके बाद तौलिया भिगोकर सिर व हाथ-पैर पोंछ लें।
कहा भी जाता है कि धोए कान हुआ स्नान, अर्थात शीतकाल में इसे ही संपूर्ण स्नान माना जाएगा। और हां, चेहरे पर क्रीम और सिर में खुशबू वाला तेल लगाना न भूलें। सप्ताह के दिन जैसे-जैसे बीतें, वैसे-वैसे तेल, परफ़्यूम आदि की मात्रा बढ़ा दें। और हां, साबुन और कपड़े गीला करना न भूलें।
मौजीराम जी के नुसखे पर अमल कर शर्मा जी सुखी हैं। रोज शीत स्नान करते हैं और पत्नी से कहते हैं, सचमुच सर्दी में नहाने का मजा ही कुछ और है। लेकिन मिसेज शर्मा यह सोच-सोचकर हैरान हैं कि शर्मा जी आखिर चमेली का तेल क्यों लगाते हैं?
Wednesday, December 9, 2009
दहेज के कारण पुरुषों का भी उत्पीड़न (नई दुनिया में प्रकाशित)
दहेज के कारण पुरुषों का भी उत्पीड़न
देश भर में वर्ष में ७० हजार मामले भारतीय दंड संहिता की धारा "४९८-ए" के अंतर्गत दर्ज किए जाते हैं। प्रतिदिन अनेक निर्दोष आरोपित पुरुष या नाते रिश्तेदारों को सजा हो जाती है, यहां तक की छोटे मासूम बच्चों व घर के बुजुर्गों की जिंदगी भी दांव पर लग जाती है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिवर्ष ५०,००० स्त्रियां परिवार के सदस्यों द्वारा किसी न किसी रूप में प्रताड़ित होती है। लगभग ६००० पुरुषों पर किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि अधिकांश पुरुष अपनी पत्नी को किसी न किसी रूप में शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना देते हैं अब मुद्दा यही उठता है कि पीड़ित महिला क्या करे, कहां जाए। इससे निपटने के लिए ही भारत सरकार ने सन १९८३ में आइपीसी की धारा ४९८ ए के अंतर्गत "पति या उसके रिश्तेदारों के अत्याचारों" को गैर जमानती अपराध करार दिया था, १९८६ में मुस्लिम महिला के तलाक के खिलाफ अधिकार की सुरक्षा अधिनियम के तहत स्पष्ट किया की तलाक देने वाले पति द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता दिया जाएगा, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मशहूर शाहबानो फैसला आया था, १९८७ दिवराल में फिर एक केस हुआ राजस्थान हाईकोर्ट में रूपकवर सती कांड जिसने सबके रौंगटे खड़े कर दिए, हाईकोर्ट ने फिर एक आदेश जारी किया "भारतीय सती रोकथाम अधिनियम १९८७" इसके अंतर्गत सती होना, जबरन सती बनाया जाना, फ़ुसलाना या महिमांडन करना अपराध माना गया। भारतीय दंड संहिता की धारा "४९८-ए" के अनुसार पीड़ित महिला पति या अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ याचिका दायर कर न्याय की गुहार कर सकती है। यदि पति या कोई अन्य रिश्तेदार अपराधी घोषित हो जाता है तो उसे कम से कम एक साल से लेकर तीन साल की सजा हो सकती है। इसके आलावा जुर्माना भी हो सकता है।
जेंडर ह्यूमन राइट्स सोसयटी के अध्यक्ष श्री संदीप भाटिया के अनुसार हर साल "४९८-ए" के तहत ५८ हजार मामले दर्ज किए जाते हैं। एक लाख से भी ज्यादा लोग झूठे मामलों में गिरफ्तार होते हैं। हर चार मिनट में एक पुरुष पर दहेज प्रताड़ना का झूठा आरोप लगाया जाता है। हर २.४ घंटे में एक बुजुर्ग नागरिक को दहेज की मांग के झूठे आरोप में फंसा दिया जाता है। हर रोज एक निर्दोष बच्चा इसी धारा में गिरफ्तार होता है, हर २३ मिनट में एक निर्दोष महिला धारा ४९८ए के तहत गिरफ्तार होती है तो हर पांच मिनट में एक निर्दोष सलाखों के पीछे पहुंचता है। अपनी दुश्मनी निकालने के लिए भी कुछ लोग दहेज के गलत आरोप लगा कर निर्दोष लोगों को फंसा देते हैं, जिस पर जस्टिस अशोक भान और जस्टिस डी.के. जैन ने कहा कि सेक्शन "४९८ ए" को दहेज के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए लागू किया गया था न कि मासूम व निर्दोष लोगों को फांसने के लिए। आईपीसी की धारा "४९८-ए" बनाई तो दहेजलोभियों को सबक सिखाने के लिए ही है लेकिन दुर्भाग्य से इसके दुरुपयोग के मामले भी सामने आने लगे हैं । दहेज निरोधक कानून के तहत दर्ज मामला गैर जमानती और दंडनीय होने के कारण और भी उलझ जाता है। आत्मसम्मान वाले व्यक्ति के लिए यह काफ़ी घातक हो गया है, जब तक अपराध का फ़ैसला होता है जेल में रहते-रहते वह इस तरह खुद को बेइज्जत महसूस करता है कि मर जाना पसंद करता है, जिसके पिछले दिनों में कई किस्से नजर आए थे कि कई पुरुषों ने बदनामी से बचने के लिए आत्महत्या कर ली, आत्मसम्मान वाले आदमी के लिए एक बार गिरफ्तार हो जाना काफी घातक होता है।
कई बार अविवाहित लड़कियों, छोटे बच्चों और बुजुर्गों को आरोपी बना दिया जाता है। अग्रिम जमानत का प्रावधान न होने से उन्हें जेल जाना पड़ता है। इससे लड़कियों के विवाह के अवसर समाप्त हो जाते हैं और बुजुर्गों को जिल्लत झेलनी पड़ती है। एक और सबसे बड़ी समस्या है बेकसूर बच्चे जिन्हें नाहक ही सजा भुगतनी पड़ती है, जो अपने माता-पिता, घर- परिवार से दूर होते जाते हैं व कई बार अपराधी भी बन जाते हैं । इन तमाम बातों को देखते हुए जनता की अपील पर केंद्र सरकार ने निर्देश जारी किए हैं कि दोनों तरफ न्याय बराबर हो, सजा दोषी को ही मिले निर्दोष को नहीं। एवं धारा ४९८-ए के लिए पर्याप्त सबूत मिल जाने पर अन्वेषण के बाद ही दहेज विरोधी मामले दर्ज किए जाएंगे। हो सकता है कानून के इस बदलाव से कानून की बदनामी होने के आसार भी कम हो पाएं किंतु इसके लिए समाज और प्रशासन में भी जरूरी फेरबदल किए जाने चाहिएं। इसी से परिवार का विघटन रुकेगा ।
Monday, November 23, 2009
घूरना मना है (नई दुनिया के संपादकीय पृष्ठ पर)
कॉमनवेल्थ गेम्स का एक फायदा तो है हमारी दिल्ली भी साफ-सुथरी, सुंदर हो जाएगी और सड़कें चौड़ी होंगी, फ्लाईऑवर बनेंगे, नई इमारतें, नए स्टेडियम। अरे भैया! हम कोई खयाली पुलाव नहीं पका रहे हैं, बाकायदा कागजी नक्शा तैयार किए हैं। अब तो हमारे देश का पूरी तरह से नवीनीकरण होकर रहेगा। मजाक नहीं है भई, क्या हुआ जो महँगाई ने मुँह खोल रखा है। हम दिल्ली वाले दिल भी तो बड़ा रखते हैं जी। यह और बात है कि देश के सारे भिखारियों को और रिक्शे वालों को दिल्ली से हटा देंगे। आखिर कॉमनवेल्थ गेम्स में कॉमन मैन का क्या काम?
विदेशियों का स्वागत करने में कोई कसर न रह जाए इसलिए तरह-तरह के ट्रेनिंग सेंटर भी खुल गए हैं। रेलवे ने भी अपने स्टेशनों का हुलिया बदलने की ठान ली है। इसके साथ ही रेलवे ट्रेनिंग सेंटर में कुलियों को सिखा रहे हैं कि कैसे अँगरेजी में बात की जाए। अरे उन्हें अँगरेजी ही आती तो वे कुलीगिरी करते ही क्यूँ?
देखा-देखी पुलिस प्रशासन को भी जाने क्या हो गया है। पचास हजार से भी ज्यादा पुलिसकर्मियों को सारा काम-धंधा छोड़कर यही सीखने में लगा रखा है कि किस प्रकार विदेशी मेहमानों से पेश आया जाए। अब विदेशी चाहे जैसी हरकत करें, हमें अपने क्रोध को वश में रखना है। मुझे लगता है, बाबा रामदेव ही उनकी क्लास ले रहे होंगे। रोगों से छुटकारा, तनाव से मुक्ति, क्रोध पर काबू इत्यादि।
सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात तो यह है कि घूरने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अब भला यह भी कोई बात हुई? कोई यह बताए कि घूरना भी कोई अपराध हुआ भला। मेरे खयाल से हमारे देश में कम से कम दस प्रतिशत दस साल के बच्चे, तीस प्रतिशत नौजवान और साठ प्रतिशत बुढ़ऊ नौजवान से हैं, जो घूरा-घूरी में लगे रहते हैं। और नित्यप्रति घूरन प्रक्रिया द्वारा आई टॉनिक लेने का उनका नियम बना हुआ है। अब ये आई टॉनिक पर भी रोक लग गई तो सोचिए देश की आँखों का क्या होगा। और यदि सुरक्षा कर्मचारी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लेंगे यानी कि पर्यटको को घूरेंगे नहीं तो देश की सुरक्षा कैसे होगी? उनमें से किसी के पास बम निकल गया तो क्या होगा? यह अत्यंत गहन चिंतन का विषय है।
सुनीता शानू
Thursday, November 12, 2009
प्रेम मे लाठी
मियां-बीवी राजी, तो क्या करेगा काजी? लेकिन वस्तुत: ऐसा है नहीं। दो प्रेम करने वालों के बीच से दुनिया की दीवार हटने का नाम ही नहीं लेती। यह प्यार भी, समझ में नहीं आता कि ऊटपटांग परिस्थितियों में ही क्यों होता है। कभी दुश्मन की बेटी से, तो कभी अपनी जाति के बाहर इश्क होता है और घरवाले लाठियां लेकर निकल पड़ते हैं। जाने कितने ही किस्से हैं जी। किस-किस का नाम लें? हर गली-सड़क पर आशिक घूमते नजर आते हैं। उस्ताद वाली आसी ने कहा है," तू अगर इश्क में बरबाद नही हो सकता। जा तुझे कोई सबक याद नही हो सकता।"
किसी ने सच ही कहा है कि प्यार अंधा होता है, जो न उम्र देखता है, न मजहब, न गोरा, न काला। इस अंधे प्यार का परिणाम तो अंधा ही होगा। किसी ने तो यह भी कहा है कि पागल प्रेमी दीवाना। सही है, अगर प्रेमी दीवानगी में पागल न हो पाए, तो दुनिया मजनू की तरह पत्थर मार-मारकर पागल देगी। उससे भी पेट न भरा, तो समझो, राम-नाम सत्य तो कर ही देगी। इसलिए अगला जनम लेने से पहले भगवान से रिकवेस्ट कीजिएगा कि आपकी प्रेमिका या पत्नी सगोत्र न हो, वरना अंजाम तो सब जानते ही हैं। क्या फायदा, अगर अगला जन्म भी गीत गाते-गाते गुजर जाए। या फिर आपकी प्रेमिका को अनारकली की तरह दीवार में चुनवा दिया जाए। अच्छा बवाल है भैया। प्यार करे कोई और परेशानी सारी दुनिया को।
इस समस्या का कोई न कोई उपाय तो भगवान को ढूंढना ही होगा। वरना मनुष्य उसकी बनाई सृष्टि का विनाश करता ही रहेगा, और जो काम २०१२ में होने की आशंका है, इस प्रेम के चक्कर में पहले ही हो जायेगा। इस समस्या से निपटने के लिए क्यों न भगवान लड़के-लड़कियों के चेहरों पर टैटू बना कर भेजे, ताकि उन्हें प्यार करने से पहले ही पता चल जाए कि उनका गोत्र क्या है। और जहां किसी लड़की को सगोत्र लड़का दिखे, उसे राखी बांधकर भाई बना दे। सोचिए, तब कितने भाई बन जाएंगे। छेड़े जाने का डर भी नहीं रहेगा। माता-पिता चैन की बंसी बजाएंगे।
अब सरकार को ही ले लीजिए। वह भी बेवजह रोड़े अटकाती है। जब लड़की की कुंडली मिला ली, गोत्र मिला लिए, छत्तीस गुण भी मिला लिए, तब सरकार ने मेडिकल चेक अप का लफड़ा पैदा कर दिया और शादी रुक गई। अब ऐसे में भगवान भी क्या कर लेंगे, जब सरकार भी उनके बनाए हर काम में अड़चन डालने लगेगी। तो भैया, यह बात बेकार हो गई कि जोडिय़ां बनती हैं आसमानों में।
आजकल गॉड ने प्रेम का गिफ़्ट देना बंद कर दिया है। इसलिए युवाओं को सोच-समझकर प्रेम करना चाहिए। अच्छा होगा कि वे अपने साथ अपनी मेडिकल रिपोर्ट साथ रखें। जन्म कुंडली भले न बनवाई हो, लेकिन अपने माथे पर जाति, धर्म और गोत्र का टैटू अवश्य गुदवा लें, ताकि जब कभी प्रेम के कीटाणु आपके शरीर में प्रवेश करने की कोशिश करें, तो आप अपना बायोडाटा दिखाकर सामने वाले या वाली का उचित मार्गदर्शन करें।
सुनीता शानू
Saturday, November 7, 2009
जातीय दबाव से दम तोड़ती ममता

(नई दुनिया के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)
पिछले दिनों सगोत्रीय विवाह से नाराज एक पिता द्वारा अपनी पुत्री की नृशंस हत्या और उससे पहले क्रूररतम उत्पीड़न की खबर आई । राजधानी के महिपालपुर इलाके की इस घटना ने लोगों को दहला दिया । इसी संदर्भ में सवाल उठता है,कि क्या हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत सपिंड में विवाह करने की इजाजत नहीं है। परंतु ऐसा कोई नियम नहीं बना जिसमें यह लिखा गया हो कि सगोत्र विवाह करने पर जाति से बेदखल कर गांव से निकाल दिया जाएगा या जान से मार दिया जाएगा।
हालांकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय विवाह परंपरा के अनुसार विवाह अपनी ही जाति में होता है व सपिंड व सगोत्र के बाहर रहता है। परंतु कितने लोग हैं जो गोत्र से भलीभांति परिचित हैं? जहां तक हमारी नजर जाती है, हम अपने बच्चों को भी अपने परिवार की ही शिक्षा देते हैं। जिसे सपिंड कहा जा सकता है। तो आज छोटा सा बच्चा भी जानता है कि कौन उसकी बहन है, कौन भाई लेकिन अगर अठारह वर्ष के किसी बच्चे से पूछा जाए उसका गोत्र क्या है तो वह शायद बता नहीं सकेगा। वह जाति को जानता है, परिवार को समझता है। उसकी नजर में चाचा, ताऊ, बुआ सभी अपने परिवार के अंतर्गत आते हैं परंतु सगोत्र की परिभाषा समझाए बगैर कैसे कोई समझ पाएगा की सगोत्र होता क्या है? और एक बात जो सबसे जरूरी है, देश भर के सगोत्री अपने चेहरे पर लिखकर तो नहीं चलते कि हम भाई-भाई हैं। कैसे कोई जान पाएगा की कौन उसके गोत्र से संबंधित है और कौन नहीं?
यह सवाल सिर्फ एक-दो बच्चों का ही नहीं तमाम भारतीयों का है जिसके कानून में अंतर्जातीय विवाहों और प्रेम विवाहों को मान्यता तो दे दी है परंतु समाज अभी तक अपना नहीं पाया है। ऐसा लगता है जैसे विश्व में एक सी पाठशाला चालू हो गई है जो कौमी एकता को भंग कर सगोत्री एकता की बात कर रही है। आज जो हमारा देश आधुनिकता का दावा करता है, किसी भी कानून को मानें या नहीं मानें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन सामान्य परिवार समाज के ठेकेदारों की चपेट में आ जाते हैं।
जिस देश में नारी को मां-बहन-बेटी के रूप में सम्मानित किया जाता रहा है । ससुराल में भी गृहलक्ष्मी, गृहस्वामिनी के रूप में समझा जाता है, उसी देश में अपनी बेटी का उत्पीड़न कोई भी माता-पिता तो नहीं कर सकते, जब तक कि उन पर गहरा सामाजिक दबाव न हो । क्या इस गुनाह का समर्थन किया जाना चाहिए?
मौजूदा हालात में हम कैसे सक्षम हो पाएंगे एक सुंदर और सुगठित समाज बनाने में। कैसे पिरो पाएंगे समस्त भारतवर्ष को एक सूत्र में। जब घर में ही फ़ूट पड़ी होगी तो दुश्मनों से मुकाबला कैसे हो पाएगा। तमाम बातें इस ओर इशारा कर रही हैं कि आज भी हम पाषाण युग में जी रहे हैं।
सुनीता शानू
Friday, October 30, 2009
करामाती इंजेक्शन (नई दुनिया के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)
एक जमाना था जब इंजेक्शन का नाम सुन कर बड़ों-बड़ो की हवा खराब हो जाती थी। बचपन में डॉक्टर जब सुई लगाने के लिये निकालता था सुई देखने के साथ ही उई निकल जाती थी। आज वही सुई करामाती इंजेक्शन बनकर देशभर में मशहूर हो गई है। एक जरा सी सुई और काम बड़े-बड़े। आज सुबह दूध वाला मुझसे बोला- "बीबीजी! सुई लगाये बिना कौन्हो भैंस दूध न देत है। हम रोज इंजेक्शन लगाई देत हैं तब ससुरी दूध देत है।" -अरे! तुम क्या डॉक्टर हो जो भैंस को इंजेक्शन लगाते हों? वो मुझ पर ऎसे हँसा जैसे कि कोई अजूबी बात कह दी हो। -"अरे बीबी जी भैंस के इंजेक्शन लगाने के लिये कौन्हो डॉक्टरी की जरूरत नाही।" सच ही तो है बेचारी भैंस के कहीं भी इंजेक्शन ठोक दो बेचारी कमप्लेन तो कर नही पायेगी। डरने वाली कोई बात ही नही। इंजेक्शन खाकर जहाँ गाय-भैंस दूध ज्यादा देने लगी वंही मुर्गी भी अण्डे ज्यादा देने लगी। है न छोटा सा इंजेक्शन और फ़ायदा दुनियां भर का।
यहाँ तक तो बात समझ में आ गई परंतु कल रात जब जोर-जोर से सिसकने की आवाज आई तो समझ नही पाई, क्या पेड़ भी रात को रोते हैं? डर के मारे रात को गार्डन में जाने का मन नही हुआ। दूसरे दिन माली से पूछने पर पता चला कि उसने गाय-भैंस को लगाने वाला प्रतिबंधित ऑक्सीटॉक्सीन इंजेक्शन लौकी, तुरई के लगा दिया था, ताकि वे रातों-रात बड़ी हो जायें। लो भई माली जी बन गये सब्जियों के डॉक्टर। इंजेक्शन नही हुआ जैसे की बच्चों का खिलौना हो गया है।
कल तक रोगी को जल्दी ठीक करने के लिये इंजेक्शन लगाये जाते थे ,आज रोग का सामान बन बैठे हैं। बाजार में बिकती हर चीज़ ऎसा लगने लगा जैसे की इस करामाती पकाऊ-बढ़ाऊ इंजेक्शन की ही देन है। सेव की चमक देख कर या केले, पपीते की रंगत देख कर यह कहना मुश्किल होगा की यह पेड पर पके हैं या किसी करामाती इंजेक्शन का कमाल है। ऎसा लगता है जैसे सभी फ़ल-सब्जियों को रात-भर सौंदर्य-प्रसाधन द्वारा सुंदर चमकदार बनाया जाता है।ताकि सुबह सवेरे ग्राहक उनकी उपरी चमक-धमक देख कर धोखा खा जाये। अब तरबूज से ही ले लीजिये गर्मियों में गला तर करने के लिये जिसे इस्तेमाल किया जाता है। रातभर इंजेक्शन खाकर बेचारा कराहता है।
बच्चे भी रोज-रोज ऎसी खबरे सुन कर मनसूबे बनाने लगे हैं कि काश भगवान हमे भी रातों-रात बड़ा करदे। हमे पढ़ाई का इंजेक्शन लगा दे। अब मै भी सोच रही हूँ कि जहाँ एक ओर मनुष्य ने इतनी प्रगति कर ली है कि परखनली शिशु और डिजानर शिशु तैयार करने लगा है। वहीं किसी दिन यह भी सुनने में आ ही जाये की कल जो बच्चा पैदा हुआ था रात-भर इंजेक्शन देकर उसे युवा बना दिया गया है। न पढ़ाई का खर्चा, न ही इतने दिन पालने-पोसने का झंझट। बस यही परेशानी है की बच्चा बोलना-पढ़ना सीखेगा कैसे? तो वैज्ञानिक उसका भी कोई न कोई तोड़ निकाल ही लेंगे। शायद कुछ करामाती इंजेक्शन्स देकर बच्चों को भाषा का ज्ञान, पढ़ाई का तजुर्बा दिया जा सके। देखिये अब ये इंजेक्शन क्या-क्या खेल दिखाता है...।
सुनीता शानू
Thursday, October 29, 2009
मिस कॉल की भाषा (अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)
मिस कॉल की भाषा
सबसे पहले हम पाठको को बता दें कि मिसकाली जी क्या हैं। ये वो शख्सियत हैं जिससे बड़े-बड़े भी अपनी पहचान छुपाते हैं। अब अपने शर्मा जी से ही ले लो। पिछले दो हफ़्ते से बेचारे सो नही पाये हैं। इस मिसकाली ने नाक में दम कर रखा है। कब,कहाँ,कैसे आ टपके कुछ मालूम नही। शर्मा जी का जो हाल हुआ है भगवान ही जानता है। बेचारे सोना-जागना,नहाना-धोना सब भूल गये हैं। और ये मिसकाली! इसे कोई फ़र्क ही नही पड़ता। इसे न मरघट नजर आता है न ही उत्सव। और अब लगता है, मिसेज शर्मा को भी इस मिसकाली से जलन होने लगती है। तभी तो आजकल वे मिसकाली को नींद में गालीयां निकालती हैं डेम फ़ूल,स्टूपिड इत्यादि,न मुँह गंदा न राष्ट्रभाषा का अपमान।
आप सोच रहे होंगे की यह मिसकाली है कौन? जिसने मिसेज शर्मा तक को परेशान कर दिया। कहीं ये शर्मा जी की कोई एक्स गर्लफ़्रेंड तो नही?
...नही भई नही। ये मिसकाली हैं मौजीराम। शर्मा जी के लंगोटियां यार। जिन्होनें नया-नया मोबाईल लिया है। मोबाईल में है बस बीस रूपये का बैलेंस और मिस कॉल करने की तगड़ी बीमारी, जिसका शिकार हुए बेचारे शर्मा जी। मिसकॉल करते समय कभी नही सोचते की काम किसे है। तीस पे तुर्रा भी यह कि अम्मा यार तुम तो याद ही नही करते। एक मै हूँ जो हर वक्त तुम्हे याद करता रहता हूँ। और तुम इतने कंजूस की एक मिसकॉल भी नही कर सकते।
ग़ज़ब की बात तो यह होती है कि इन मिसकालियों की डिमाण्ड भी मिसकॉल ही होती है। अपने दिल की बात बस मिसकॉल के माध्यम से ही कह देते हैं। अक्सर देखा जाता है कि प्रेमिका अपने प्रेमी को मिसकॉल करती है, फ़िर प्रेमी भी मिसकॉल देकर अपने प्यार का इजहार करता है। जहाँ भावनाओं की ही जरूरत है, भला बात करके क्या हॉसिल होगा? सो मिसकॉल सबसे उत्तम उपाय है, यह बताने का की किसे,किसकी, कितनी याद सता रही है। यह तो वह बात हुई न हींग लगै न फ़िटकरी, रंग भी चोखो आये। तो भैया मिसकॉल का स्वाद एक बार जो चखले वो कॉल क्यूँ करे?
कुछ लोगों के लिये मिसकॉल अच्छा-खासा लव लेटर है, तो किसी के लिये हाल-चाल पूछने का तरीका। कोई बस डायलर टोन सुनने के लिये ही मिसकॉल करता रहता है। मुझे तो लगता है, यह मैथड भी भाषा-विज्ञान के अंतर्गत आता है। जहाँ पहले से डिसाईड होता है कि मिसकॉल आने वाला है। मिसकॉल आते ही चहरे पर एक चिरपरीचित सी मुसकान देखी जा सकती है।
मिसकॉल के किटाणु डेंगू,मलेरिया,स्वाईन फ़्लू की तरह चारों तरफ़ फ़ैल गये है। जिस दिन मिसकॉल न आये तो घर भी सूना-सूना सा लगता है। वैसे भी जितनी बार मोबाईल बजेगा देखने वाले को तो यही लगेगा न की बंदा कितना बिजी है भई।
मौजीराम की मिसकॉल ऎसी रंगत लाई की शर्मा जी के भीतर भी इसके किटाणु प्रवेश कर ही गये। अब मौजीराम की मिसकॉल पर शर्मा जी भी मिसकॉल करते हैं।अब दोनो में न शिकवे हैं न शिकायत है। एक राजस्थानी गीतकार ने इस मिसकॉल से प्रेरित होकर एक गीत तक लिख डाला है जो जगह-जगह मोबाईल पर सुनने को मिल जाता है, बनड़ी रो मिसकॉल म्हारे मोबाईल पर आवेगो, रे नया जमाने वाली बनड़ी फ़ोन मिलावे रे... शुक्र है कि मिसकालियों की यह मूक भाषा किसी ने तो समझी।
सुनीता शानू
Wednesday, October 21, 2009
भ्रूण हत्या पर आधारित...मिस इंडिया की पहल से उपजे प्रश्न
मिस इंडिया की पहल से उपजे प्रश्न
( अमर उजाला के काम्पेक्ट में प्रकाशित)
मिस इंडिया पूजा चोपड़ा सेव द गर्ल चाइल्ड के लिए 10 लाख रूपए जुटाने के एक अभियान पर हैं। पूजा खुद एक ऐसे परिवेश से आती है, जहां उनके पिता ने उनकी मां को छोड़ दिया। पूजा की मां की हिम्मत और खुद के संकल्प ने उसे यह मुकाम दिया कि वह लड़कियों को बचाने के किसी मुहिम के अभियान को पहचान दे सके। पूजा के जज्बे को सलाम करने के साथ एक सवाल करने का भी मन कर रहा है। देश में लड़कियों की घटती संख्या के प्रश्न का हल साधन जुटाने से नहीं सामाजिक सोच में बदलाव से होगा। पूजा का काम ज्यादा बड़ा प्रेरणास्पद काम है, बजाए कि किसी संगठन के लिए कुछ लाख जुटाना। पूजा चोपड़ा के जरिए इस जरूरी विषय पर एक व्यापक बहस हो यह भी एक बड़ी पहल का हिस्सा होगा।
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लासेंट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 5,00,000 कन्या भ्रूण हत्या होती हैं,व पिछले दो दशक में एक करोड़ लड़कियां कम हो गई हैं। जो या तो दहेज की भेंट चढ़ गई हैं या वारिस पाने की चाह में मार दी गई हैं।
भारत वर्ष में लगभग दो दशक पूर्व अल्ट्रासाउंड मशीन के द्वारा भ्रूण-परीक्षण पद्धति की शुरुआत हुई थी, जिसे एमिनो सिंथेसिस कहा जाता था। इसका उद्देश्य सिफऱ् गर्भस्थ शिशु के क्रोमोसोम के संबंध में जानकारी हासिल करना था। यदि इनमें किसी भी तरह की विकृति हो, जिससे शिशु की मानसिक व शारीरिक स्थिति बिगड़ सकती हो, तो उसका उपचार करना होता था । किन्तु अल्ट्रासाउंड मशीन का इस्तेमाल गर्भ में बेटा है या बेटी है की जाँच के लिये किया जाने लगा। अगर गर्भ में लड़का है तो उसे रहने दिया जाता है व लड़की होने पर गर्भ में ही खत्म कर दिया जाने लगा। इस लिंग चयनात्मक पद्धति को अवैध बताते हुए सन 1994 में प्रसव पूर्व नैदानिक तकनीक (विनियमन और दुरूपयोग निवारण) अधिनियम बनाया गया जिसे सन1996 में प्रचलन में लाया गया। ताकि कन्या भ्रूण हत्या रोकी जा सके। इस अधिनियम के अंतर्गत, लिंग चयन करने में सहायता लेने वाले व्यक्ति को तीन वर्ष की सजा ,तथा 50,000 रूपये का जुर्माना घोषित किया गया। तथा लिंग चयन में शामिल चिकित्सा व्यवसायियों का पंजीकरण रद्द किया जा सकने और प्रैक्टिस करने का अधिकार समाप्त किये जाने का कानून बना। पब्लिक हैल्थ ऑफि़सर्स का कहना है कि पिछले दो सालों में 21,072 अल्ट्रासाउँड की मशीने रजिस्टर्ड की गई थी। जो कि तब तक ही कानूनन वैद्य थी जब तक की उनसे भ्रूण की जाँच नही की जाती। इसी दौरान 199 मशीनो को भ्रूण जाँच करने के जुर्म में सील कर दिया गया व 405 डॉक्टर्स पर भी गैरकानूनी टैस्ट को करने का चार्ज लगा दिया गया।फिऱ भी चोरी छिपे भ्रूण परीक्षण करवाया जाता रहा। जिसे रोकने के लिये सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में राष्ट्रीय निरीक्षण और निगरानी कमेटी बनाई गई। किन्तु सरकार की तमाम कोशिशे कन्या भ्रूण हत्या को रोकने में नाकाम ही रही।
यूनिसेफ़ की रिपोर्ट के अनुसार लड़कियों के मामले में भारत की स्थिती चिंताजनक है। कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते आकड़ों ने भारत के कुछ राज्यों में लिंगानुपात में भारी गिरावट ला दी है।देश की जनगणना 2001के अनुसार 1000 लड़को पर लड़कियों की संख्या 0से6 वर्ष तक की आयु का अनुपात दिल्ली में 845,पंजाब में 798,हरियाणा में 819, गुजरात में 883 था। यूनिसेफ़ की रिपोर्ट बताया कि भारत में प्रतिदिन 7,000 लड़कियों की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है।आज की ताजा स्थिती में संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में अवैध रूप से अनुमानित तौर पर प्रतिदिन 2,000 अजन्मी कन्याओं का गर्भपात किया जाता है।यह स्थिति धीरे-धीरे इतनी विस्फोटक हो सकती है कि महिलाओं की संख्या में कमी उनके खिलाफ अपराधों को भी बढा सकती है ।
कन्या भ्रूण हत्या से 2007 में देश के 80 प्रतिशत जिलो में लिंगानुपात में गिरावट आ गई थी। प्रति 1000 लड़कों पर भारत में लिंगानुपात 927, पाकिस्तान में 958,नाइजीरिया में 965 आकां गया था। आज यह मानना गलत साबित हो गया है कि भ्रूण हत्या का कारण अशिक्षा व गरीबी है, वरन शिक्षित व सम्पंन परिवार भी इस तरह के कृत्य में शामिल है। कन्या भ्रूण हत्याओं का पहला और प्रमुख कारण तो यही है कि आज भी बेटे को बुढापे की लाठी ही समझा जा रहा है और कहा जाता है की पुत्र ही माँ-बाप का अंतिम संस्कार करता है व वंश को आगे बढ़ाता है।
इधर शुरू हुए कुछ सामाजिक संस्थानिक प्रयास इस अवधारणा को बदलने में लगे हैं। गुजरात में ऐसा ही एक डिकरी बचाओ अभियान चलाया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश ने भी कन्या भ्रूण हत्या करवाने वाले की खबर देने वाले को दस हजार का इनाम देने की घोषणा कर डाली है। सरकार अमेरिका व कनाडा से आयातित लिंग परीक्षण किट पर भी रोक लगा रही है।
सरकार को भी इस दृष्टि को विस्तार देना होगा कि फंड उपलब्ध कराने और कानून बनाने से तो इस मुश्किल का हल नहीं दिख रहा। सामाजिक स्तर पर बदलाव के लिए जरूरी है कि लड़कियों की भूमिका को विस्तार दिया जाए। उन्हें ज्यादा से ज्यादा अवसर दिए जाएं। ऐसे समय में जब राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, सत्ताधारी दल की शीर्ष नेत्री और देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री महिलाएं हों तो इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है, कि देश के एक दूरवर्ती गांव में बेटियों को बोझ न समझने की कोशिशों को शक्ति मिलेगी।
सुनीता शानू
Wednesday, September 2, 2009
छप्पर फ़ाड़ के (आई नेक्स्ट के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)
छप्पर फाड़ के
सुनीता शानू
( १ सितम्बर आई नेक्स्ट के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित )
माफ़ कीजियेगा मै यहाँ ऎसा कुछ लिखने नही जा रही कि बच्चों ने छप्पर फ़ाड़ा होगा। यहाँ बात ऊपर वाले की है कि ऊपर वाला जब भी देता है लेकिन ऎसा वो करता क्यों है? जिसे चाहिये एक उसे दस दे देता है।कुछ दिनों पहले अमेरिका की नाद्या सुलेमान ने एक साथ आठ बच्चे पैदा किये।और इसके बाद एक ट्यूनिशियाई महिला ने भगवान से दो जुड़वा बच्चों की डिमांड की और भगवान ने बारह बच्चे एक साथ उसकी झोली में टपका दिये।
मुझे लगता है भगवान को फ़ैमिली प्लानिंग के बारे में नॉलेज नही है। या इसमें सरकार और भगवान दोनो की कोई साठ-गाँठ भी हो सकती है। वरना हम भारतवासी तो आस लगाये बैठे रहते हैं कि कब छप्पर रूपी सीमेंट की छत फ़टेगी और कब मोती बरसेंगे।वैसे भी हम हर बात का जिम्मेदार भगवान या सरकार को ही ठहराते हैं। एक जमाना वह भी था जब कोई पूछता था कितने बच्चे हैं तो बच्चे कहते थे छ भाई है जी छह बहन हैं।अरे इतने बच्चे तो झट से घर का मुखिया कहता सब भगवान की देन है जी।
लेकिन सरकार और भगवान ने मिल कर भारत का नक्शा ही बदल दिया। कभी पाँच बच्चों की या तीन बच्चों की फ़ैमिली प्लानिंग ही हुई थी। लेकिन बाद में सरकार ने एक या दो बच्चे के बाद ही रोक लगा दी। किन्तु भगवान ने दूसरे देशों मे यह प्लानिंग लागू नही की, तभी तो वो लगे हैं वर्ड रिकार्ड तोड़ने में। सबसे मजेदार बात तो तब पैदा हुई जब दो जुड़वा बच्चों की जगह छ जुड़वा यानि कि बारह बच्चे पैदा होने पर ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रजनन विशेषज्ञ सिमन ने डॉक्टरों को दोषी बताया। अब भला उन बच्चों के पैदा होने में डॉक्टर का क्या कुसूर? जब ऊपर वाला देता है तो डॉक्टरों की इजाजत थोड़े ही लेता है।
अब जितने बच्चे उतने नाम। आप चाहें तो महीनों के नाम सप्ताह के नाम या फ़िर ज्यादा ही दिक्कत खड़ी करे तो एक ही नाम रखके ग्रेडिंग कर दो। अगर बच्चों के रंग में भी भेद हो। जैसे जैनी(बिल्ली) ने दस बच्चे दिये थे, दो काले थे बाकि की बस पूछँ ही काली थी। तो हो सकता है नाम रखना और भी आसान हो जाये। ट्वीन्स में सबसे ज्यादा दिक्कत पहचानने की ही होती है।
आजकल जो ये टैटू का जमाना है तो चाहें तो माता-पिता अपने बच्चे पर रूचि के अनुसार टैटू बना दें ताकि पहचान कर पुकारा जा सके। वैसे भी सुनने में आया है कि लॉस एंजिलिस क्लीनिक ने एक प्रयोग के द्वारा भ्रूण में मोडिफ़िकेशन करके डिजानर बच्चे पैदा करने का दावा किया है।हो सकता है कि बच्चों के पेट पर जिप लग जाये या बटन लग जाये। हाथ -पैर में फ़ोल्डिंग सिस्टम हो तो संड़क पार करवाने में भी सुविधा रहेगी। एक ही पलंग पर सब को ऎड्जेस्ट किया जा सकेगा। बस डर इस बात का लगता है कि कहीं माता-पिता सूट की तरह बच्चे भी पुराने फ़ैशन के समझ बाज़ार में एक्सचेंज ऑफ़र में बदलने की न सोचें।या फ़िर माँ बच्चों की शकल शाहरूख खान या सलमान जैसी बनवा ले और बाप सच का सामना में बैठा शाहरूख या सलमान पर इल्जाम लगाये। देख लेना भैया जब बुरे दिन आये भगवान भी कल्टी न कर जाये।
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Tuesday, August 18, 2009
बीमारी का लाभ
अमर उजाला पर प्रकाशित एक व्यंग्य....
इधर जब से शर्मा जी को हल्की सी खाँसी आई हैं, ऑफ़िस में रूबी भी हाथ मिलाने से हिचकिचाती है।शर्मा जी बहुत परेशान हैं। बाहर स्वाइन फ़्लू का बढ़ता हुआ आतंक और घर में बीबी का। बार-बार हाथ धोते-धोते परेशान हो गये थे। गले लगाना तो दूर लोग हाथ मिलाते हुए भी कतराते थे। अगर स्वाइन फ़्लू सचमुच हो गया तो? रूबी की बात तो छोड़ो बीबी भी पास न आयेगी। शर्माजी उलझल में थे कि उनके दोस्त मौजीराम आ धमके। शर्मा जी ने उन्हे आपबीती सुनाई।मौजीराम ठहरे ऑल टाइम मौजी। लगे स्वाईन फ़्लू के फ़ायदे गिनाने। यार घबराते क्यों हो?फ़ायदा क्यों नही उठाते।आराम का आराम और बिना आरक्षण सीट पर विश्राम।शर्मा जी-वो कैसे? अरे यार स्वाइन फ़्लू के मरीज के पास कौन बैठेगा सोचो? तुम आराम से मैट्रो मे सफ़र कर पाओगे। घर के सारे काम भी बीबी चुपचाप किया करेगी। दिन भर तुम्हारी सेवा करेगी।एक सबसे बढिया बात, ऑफ़िस से बॉस भी छुट्टी दे देगा। मौजीराम की बात शर्मा जी के दिमाग में फ़िट हो गई।
योजनानुसार शर्मा जी एन 95 स्पेशियल मास्क पहन आये। तैयार होकर जैसे ही मैट्रो पर चढे़। तैसे ही खाँसी आई सारी भीड़ छट गई,पास बैठी खूबसूरत बाला उन्हे छोड़ मौजीराम के साथ बैठ गई।ऑफ़िस मे भी बॉस उन पर बरसता उससे पहले ही खाँसी आई और बॉस नरम होकर बोला-अरे पहले बताया होता न तुम बीमार हो। जाओ आराम करो। शर्मा जी मन ही मन मौजीराम को थैंक्यू पकडा रहे थे।तभी उनकी नजर रूबी पर पड़ी जो मौजीराम से हाथ मिलाते हुए कह रही थी कि आप कितने नेक हैं,जो जान की परवाह किये बगैर स्वाइन फ़्लू के मरीज के साथ है। शर्मा जी बेचारे तिलमिला कर रह गये।
मौजीराम के सौजन्य से मिसेज शर्मा को पता लग चुका था,अब तक सभी रिश्तेदारों को फोन किये जा चुके थे। शर्मा जी को घर पहुँचते ही सबने दूर से ही देखा। उनके कपड़े उनका सामान सब पृथक कर दिया गया। पत्नी की आँखों के आसूँ शर्मा जी को बेहाल कर रहे थे,कि अचानक मौजीराम की आवाज आई आप फ़िक्र क्यों करती हैं भाभी जी,मै हूँ न। और बस घर के सभी सदस्य मौजीराम की आवभगत में ।
शर्मा जी को हॉस्पिटल भर्ती करवाया गया। डॉक्टर को मौजीराम ने जाने क्या समझाया की उसने भी स्वाइन फ़्लू की बीमारी कन्फ़र्म कर दी, अब शर्मा जी का बुरा हाल, मौजीराम की मौज,लोग मौजी राम को मसीहा कहने लगे।
हॉस्पिटल से छूट कर शर्मा जी जब ऑफ़िस पहुँचे तब ४४० वाट का करंट उनसे चिपक चुका था।रूबी बन गई थी मिसेज मौजीराम। मौजीराम को बॉस के द्वारा प्रोमोशन मिला था। और शर्मा जी के घर में ही नही उनकी बीबी के दिल में भी मौजीराम ने गहरा असर छोड़ा था कि जिन्दगी भर उनके परिवार की रक्षा का बन्धन बीबी ने उसके हाथ पर बाँध दिया। शर्मा जी मौजीराम को हड़काते,या अपना फ़ायदा उठाने पर डाँट लगाते मगर खाँसी आई और शर्मा जी चुप होकर रह गये। मौजीराम मुस्कुराते हुए गुनगुना रहे थे-स्वाइन फ़्लू बड़े काम की चीज है...
सुनीता शानू




