Friday, July 1, 2011

दो टके की नौकरी और ये मंहगाई....







शाम के करीब पाँच बजे थे,चाय की चुस्कियाँ लेते हुए मै अपने कम्प्यूटर पर खबरों की हैडलाइन्स पढ़ रही थी। मैने पढ़ा की आज शाम को एक मीटिंग बुलाई गई है जिसमे डीजल, और \रसोई गैस के मूल्य-वृध्दि सम्बंधी मुद्दों पर चर्चा होनी है। एक सरसरी नज़र मै खबरों पर डाल अपने दूसरे कार्यों में व्यस्त हो गई।

वक्त का पता ही नही चला कि कब रात के नौ बज गये। अभी मै कुछ सोच ही रही थी कि अचानक फ़ोन की घंटी बजी। मैने फ़ोन उठाया। उधर से एक लड़खड़ाती हुई आवाज़ आई। मैडम  क्या आपने  इंटेरनेट पर आज की ताजा खबर पढ़ी?(मेरे एक स्टॉफ़ मेम्बर का फ़ोन था।)  मैने आवाज़ को पहचानते हुए कहा हाँ क्यों कुछ खास बात?  वो बोला मैडम टी वी पर खबर आ रही है कि  डीजल तीन रूपये और गैस सिलेंडर पच्चास रूपये महंगा हो गया है। आप आज ही डाईवर को भेज कर टंकी फ़ुल करवा लीजियेगा।

मैने कहा क्या फ़र्क पड़ जायेगा आज बीस लीटर डीजल में साठ रूपये बच जायेंगे। और कल क्या होगा। उसके बाद तो बढ़ा हुआ रेट ही देना पड़ेगा। वो बोला मैडम आप लोग तो फ़िर भी बर्दाश्त कर लेंगे लेकिन हम जैसे नौकरी पेशा लोगों का क्या होगा? डीजल महगां हो जायेगा और गैस के भी पच्चास रूपये ज्यादा देने पड़ेंगे।और भी कई  चीज़ों के पैसे बढ़ जायेंगे। समझ नही आ रहा क्या किया जाये?

उसकी बातों ने अच्छी तरह पका दिया था। मैने पूछा अच्छा यह बताओ की महिने में गैस सिलेंडर कितने इस्तेमाल करते हो? शायद एक!... तो खर्चा बढ़ा पच्चास रूपये। रही बात  डीजल की तो  डीजल तुम्हे डलवाना नही होता कम्पनी डलवाती है।

अब सीधे-सीधे मेरे एक सवाल का जवाब दो दिन में कितने गुटके खा जाते हो? शायद पाँच तो गुटका जो पहले एक रूपये का आता था आज ब्लैक में दो का हो गया तो खर्चा हुआ दस रूपया एक दिन का और महिने भर का हो गया तीनसौ रूपये। और जो इस समय तुमने ये जो नशे की बोतल चढ़ा रखी है उसके दाम भी सौ रूपये प्रति बोतल बढ़ गये हैं महिने में तुम चार-पाँच सौ की तो पी ही जाते होंगे। जब ये बढ़ा हुआ खर्चा तुम एडजेस्ट कर सकते हो तो रसोई गैस के पच्चास रूपये का क्यों नही? इतना सुनना था कि उसका सारा नशा हिरन हो गया और बोला" अच्छा मैडम कल सुबह बात करेंगे। शुभरात्री।"...:) 

सुनीता शानू

Friday, March 18, 2011

श्रीमान पवन चंदन और चाय वाली





आज सुबह-सुबह अचानक मोबाइल की घंटी सुरीली आवाज़ में गा उठी। जाने कौन है किसका फ़ोन हो सकता है? सोचती हुई मै उठी और बिना ही नाम देखे कान के लगाया...


सुनीता शानू--- हल्लो.
पवन चंदन---हल्लो
सुनीता शानू---आप कौन?
पवन चंदन---मै( थोड़ा आवाज़ में मिठास लाकर) पवन चंदन
सुनीता शानू--- ओह्ह पवन जी कैसे हैं आप?


पवन चंदन--- वो मेल आ गई क्या आपके पास?
सुनीता शानू---नही शायद अभी नही आई है।
पवन चंदन--- तो ठीक है आप वह काम रहने देना।
सुनीता शानू---हाँ मै आज व्यस्त भी हूँ। वैसे भी मै आपको सूचना अवश्य दे देती।


पवन चंदन--- और सुनाइये कैसे हैं सब?
सुनीता शानू--- सब ठीक है आप ऑफ़िस नही जायेंगे
पवन चंदन---मै दोपहर दो बजे जाऊँगा...
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सुनीता शानू---और भाभी जी कैसी है?
पवन चंदन--- भाभी जी ठीक हैं। यहीं पास में है बात करवाऊँ?
सुनीता शानू---हाँ करवाईये...
(भाभी जी कहते ही पत्नी से बात करवाने को तैयार)


(भाभी जी धीरे से पूछती हैं कौन है...पवन भाई कहते हैं...सुनीता जी हैं वो चाय वाली...गौर कीजियेगा चाय वाली)


भाभी जी--नमस्कार जी
सुनीता शानू---नमस्कार भाभी जी कैसी हैं आप?
भाभी जी---मै ठीक हूँ आप कहिये?
सुनीता शानू---मेरा चाय का काम है भाभी जी अभी भाईसाहब ने बताया न! एक चाय पाँच रूपये की कचौरी मुफ़्त।
भाभी जी---वाह फ़िर तो हम जरूर आयेंगे और जी कचौरी भी खायेंगे।( पता नही कैसी-कैसी चाय वालियों से फ़ुनवाते रहते हैं)
सुनीता शानू---भाभी जी पान की दुकान के पास ही खोमचा लगा रखा है मैने जरूर आना।हहहह
भाभी जी---हाँ जी खोमचा खाने जरूर आयेंगे हहहह अच्छा लीजिये बात कीजिये...( हे भगवान ये भी न)


सुनीता शानू---क्यों पवन जी आपने मेरा परीचय चाय वाली बताया भाभी जी को?
पवन जी-- ओह सॉरी सुनीता जी मै चाय की थैली बोलना भूल गया...


लो कर लो बात...हहहहह





Thursday, March 17, 2011

महाब्लॉगर सम्मेलन...अविनाश वाचस्पति के घर

आप सभी को भी निमंत्रण मिला होगा इस आयोजन का। अविनाश वाचस्पति जी वैसे भी आये दिन नई-नई ब्लॉगर मीट करते हैं लेकिन कल उनके यहाँ जो ब्लॉगर मीट थी उसका आँखों देखा प्रसारण यहाँ किया जा रहा है।  मैने तो सोचा था कि चार-पाँच लोगो को बुलाकर अविनाश जी कोई हल्की-फ़ुल्की मीट कर रहे होंगे और साथ ही इंटरनेट पर चैटिया रहे होंगे। परंतु आप सब के भी होश उड़ जायेंगे जब आप यह तस्वीर देखेंगे।





इस मीट में श्री सोहन लाल मधुप, श्री रवीन्द्र प्रभात, श्री रणवीर सिंह ‘सुमन’,  श्री राजीव तनेजा, पद्म सिंह, पवन चंदन, के केवलराम, मनोज कुमार पाण्डेय के अतिरिक्त बरेली से आए शिवशंकर यजुर्वेदी, किच्छा से नबी अहमद मंसूरी, लालकुऑ (नैनीताल) से श्रीमती आशा शैली हिमांचली, आनन्द गोपाल सिंह बिष्ट, रामनगर (नैनीताल) से सगीर अशरफ, जमीला सगीर, टनकपुर से रामदेव आर्य, चक्रधरपति त्रिपाठी, पीलीभीत से श्री देवदत्त प्रसून, अविनाश मिश्र, डा0 अशोक शर्मा, लखीमपुर खीरी से डा0 सुनील दत्त, बाराबंकी से अब्दुल मुईद, पन्तनगर से लालबुटी प्रजापति, सतीश चन्द्र, मेढ़ाईलाल, रंगलाल प्रजापति, नानकमता से जवाहर लाल, स0 स्वर्ण सिंह, खटीमा से सतपाल बत्रा, पी0एन0 सक्सेना, डा0 सिद्धेश्वर सिंह, रावेन्द्र कुमार रवि, डा0 गंगाधर राय, सतीश चन्द्र गुप्ता, वीरेन्द्र कुमार टण्डन आदि उपस्थित थे।




देखिये देखिये कल का ब्लॉगर महासम्मेलन जो सम्पूर्ण हुआ था मुन्ना भाई के घर पर बस एक तस्वीर मै नही दिखा पाऊँगी। जो समापन के बाद की है जिसमें आप सभी ब्लॉगरों के घर से जाने के उपरांत अविनाश जी की भाभी जी के द्वारा खींची गई थी खींची क्या गई थी समझो उतारी गई थी।




...कल की ही बात है मुझे पता चला कि अविनाश भाई चुपके-चुपके एक ब्लॉगर मीट कर रहे हैं मैने कहा मुझे तो बुलाया ही नही तो बोले सुनीता जी कुछ ही लोग आयेंगे। तो भई मुझे तो बहुत गुस्सा आया और मैने प्रेस में खबर दे दी की एक महा ब्लॉगर मीट का आयोजन है जिसमें चाय-नाश्ते के साथ भोजन का इंतजाम भी है। फ़िर क्या था ब्लॉगजगत के जाने-माने अनजाने सभी ब्लॉगर भाई टूट पड़े अविनाश जी के घर पर और वो धमाल मचाया की मत पूछिये। अविनाश जी भी क्या याद करेंगे कि पंगा किससे लिया गया है।
सभी ब्लॉगर भाईयों ने अपने-अपने ब्लॉग का वर्णन किया और इसके पश्चात अपना-अपना बोरिया बिस्तर....अरे नही-नही अभी जलपान भी है भैया। कौन पैसा लगना है। मुफ़्त का चंदन घिस मेरे नंदन...हहह्हहह कल रात एक सपना देखा था बस...



Friday, February 18, 2011

मूली बनाम मेडल





http://shikhakriti.blogspot.com/ आज शिखा जी का ब्लॉग देखा.. पढ़ कर एक  टिप्पणी याद आ गई। जो कुछ समय पहले ही लिखी थी जब दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स चल रहे थे। और कुश्ती में भारत की जीत हो रही थी। आप सब भी थोड़ा आनंद लीजिये।

कॉमनवेल्थ गेम्स के चलते आस्ट्रेलिया ने एक मीटिंग बुलाई। मीटिंग का अजेंडा था कि अचानक ऎसा क्या हुआ जो आस्ट्रेलिया के धुरन्धर कुश्तीबाज अपने आप को इंडिया वालो से छुड़ा कर अखाड़े से भाग खड़े हुए। जाँच कमैटी को ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों से पता चला कि उनके पीछा छुड़ा कर भागने की वजह इंडियन्स की पावरफ़ुल फ़्लेवर थी।जो उनकी सैंसीबिलिटी को इफ़ेक्ट करती है। जिसकी वजह से वो या तो नाक बन्द करने को मजबूर थे या मैदान छोड़ भाग जाने को। अतः नाक बंद कर वही खड़े-खड़े पिटने से अच्छा उन्हे मैदान छोड़ भागना ही लगा। ये फ़्लेवर किस तरह की है डोपिंग टैस्ट में तो कुछ पता नही चला। खिलाड़ियों की फ़िर से जाँच की गई तो पाया कि खिलाड़ियों को मूली का पराँठा खिलाया गया था। अब मूली का पराँठा कैसे डोपिंग में पकड़ा जाता। लगता है इंडिया वालों ने जीतने का ये नायाब तरीका सोच निकाला है। अब ऑस्ट्रेलिया में मूली खाई भी जाती होगी तो क्या हुआ उसके विशेष गुणों की परख तो इडियां वाले ही जानते हैं। मूली भी सदियों से कुश्ती के अखाड़े में बदनाम होती आ रही थी। जब एक खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी को ललकारता था कि तू किस खेत की मूली है। आखिर कब तक सहती आज उसकी कुर्बानी व्यर्थ नही गई। मिटते-मिटते भी देश के काम आ गई और कुश्ती में गोल्ड मेडल दिला ही गई।

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Saturday, December 25, 2010

कादम्बिनी मे प्रकाशित एक लेख....मन की चाह




एक चुस्की जो चाय बन गई 
मन की चाह

हिमालय की पहाड़ियों के चारों तरफ़ ढालू जमीन से उतरतेहुए कोहरे की परत के बीच नन्ही-नन्ही कोमल पत्तियों से लिपटी ओस की बूँदो पर जब सूरज की पहली किरण पड़ती है,तो पत्तियों पर फ़ैली ओस की बूंदे चमक उठती है, उन्हे देख कर लगता है, मानो पहाड़ियों ने रत्न जड़ित हरी चुनरिया ओढ़ ली है। मन रोमांच से भर उठता है।
-- वाह! क्या बात है।
-यह कुछ और नही जनाब चाय है।
हाँ वही चाय जिसकी एक घूँट गले में उतरते ही अहसास होता है,एक सुहानी सुबह का। हाँ वही चाय जो दिन की शुरूआत कर देती है,पूरे जोश के साथ। वही चाय जो दिल और दिमाग दोनो को रखती है ताज़गी से भरपूर।

-आईये,जरा एक प्याली चाय हो जाये। अरे! चाय के लिये तकल्लुफ़ कैसा? बातों ही बातों में महफ़िल की शान कहें या दोस्ती का फ़रमान कहें, थकान मिटानी हो या दिल बहलाना हो, हर मर्ज की दवा बन बैठी है चाय।


कुछ तो चाय न पिलाने का ताना भी दे जाते हैं,-कितना कंजूस है, चाय तक नही पूछी। चाय का दस्तूर तो रिश्वतखोरों को भी मालूम है,वे भी कहते नजर आते हैं,--कुछ चाय-पानी हो जाता तो...। ऎसे ही सदियों से जिंदगी के हरेक पल में शामिल रही है चाय। लेकिन फ़िर सोचती हूँ,ऎसा क्या है इसमें? क्यों शामिल है यह हमारी जरूरतों में?
बड़े-बूढ़ों को कहते सुना था कि हनुमान जी जिस संजीवनी बूटी को लेकर आये थे वह कुछ और नही चाय ही थी जिसने लक्ष्मण की मूर्छा खत्म की थी। ये भ्रम है या सत्य परंतु सदियों से थकान मिटाने के नाम पर चाय का नाम ही आता है।

वैसे चाय का इतिहास पाँच हजार वर्ष पुराना है। कहा जाता है कि चाय की शुरुआत चीन से हुई थी। चीन का सम्राट शैन नुंग एक बार गर्म पानी का प्याला पीते हुए अपने बगीचे में घूम रहा था कि अचानक तेज़ हवा से एक जंगली झाड़ी के कुछ पत्ते आकर उसके पानी में गिर गये। गर्म पानी में गिरते ही उसमें से एक अलग सी महक आने लगी और पानी का रंग भी बदल गया। शेन ने रोंमांचित हो एक घूँट भरी और खुशी से चिल्ला उठा, और तभी से चाय का जन्म हुआ।



कुछ प्रमाणिक तथ्यों से ये उजागर होता है कि सबसे पहले सन् 1610 में कुछ डच व्यापारी चीन से चाय यूरोप ले गए और धीरे-धीरे ये समूची दुनिया का प्रिय पेय बन गया। भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड बैंटिक ने 1834 में एक समिति का गठन किया जिसमे चाय की परंपरा भारत में शुरू करने और उसका उत्पादन करने की बात रखी गई। इसके बाद 1835 में असम में चाय के बाग़ लगाए गए।




असम हमारे देश में चाय का सबसे बड़ा उत्‍पादक राज्‍य माना जाता है। इसके अतिरिक्त दार्जिलिंग, हिमालय की तराई, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु में भी चाय की पैदावार होती है। आसाम,गुवाहाटी आदि कई क्षेत्रों में हर साल नवम्बर के महिने में चाय उत्सव मनाया जाता है।


विश्व के अन्य देशों में जापान, श्रीलंका,केनिया,जावा, सुमात्रा, चीन, अफ्रीकाताईवान, इण्डोनेशिया इत्यादि भी चाय का उत्पादन करते हैं ।जापान में भी हर साल कुछ संगठनों द्वारा चाय समारोह मनाया जाता हैं।
भारत में सन 1953 में टी बोर्ड की स्थापना की गई। जिसने भारत में ही नही अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में भी चाय के उत्पादन को फ़ैलाया। टी बोर्ड ने लोगों को चाय की गुणवत्ता बताते हुए चाय के प्रति जागरुक किया।
चाय कैमेलियासिनेसिस नामक पौधे से मिलती है, इसका वैज्ञानिक नाम थियौसिनेसिस है। परंतु प्रत्येक प्रांत मे उगने वाली चाय की किस्में अलग-अलग होती है। प्रांत की जलवायु तथा मिट्टी, चाय की महक व स्वाद में परिवर्तन करती है। जैसे दार्जीलिंग की चाय एक मीठा सा कोमलता का अहसास जगाती है। आसाम की चाय कड़क स्वाद और चुस्ती के लिये दुनिया भर में मशहूर है। वैसे ही काँगड़ा की हरी चाय औषधी के रूप में जानी जाती है। चीन की ऊलोंग टी डिज़ाइनर चाय के रूप में भी अपनी अलग पहचान बनाये हुए हैं
चाय की पत्तियों का आकार व उनके उत्पादन की विधि ही नही चाय की पत्तियों का
तोड़ना-सुखाना भी चाय के गुणों में अंतर करता है।
आजकल बाज़ार में ऑर्गनिक चाय का भी चलन बहुतायात से है। ज्यादातर ऑर्गनिक चाय की खरीदारी फ़्रांस,जर्मनी,जापान,अमरीका तथा ब्रिटेन द्वारा की जाती है।
अनुभवी टी टेस्टर्स के द्वारा चाय को छूकर,चखकर,उसकी पत्तियों का रंग देख कर और उसकी महक से गुणवत्ता का पता लगाया जाता है।


चाय निर्यातक स्पाईटैक्स कम्पनी के निर्माता पवन चोटिया कहते है कि बेहतरीन चाय की जाँच उसके लीकर से की जा सकती है। जिसमें सभी अलग-अलग किस्म की चाय पत्ती ढक्कन लगे बर्तन में कुछ मात्रा में डाल दी जाती है। इसके बाद उसमें उबलता हुआ पानी डाल कर ढक दिया जाता है। दो मिनट बाद चाय के रंग,खुशबू एवं स्वाद द्वारा चाय का पता लगाया जा सकता है।
मुख्यतःचाय चार ही प्रकार की होती है ग्रीन टी, ब्लैक टी, व्हाइट टी तथा ऊलोंग टी।


ग्रीन टी:  इसे 5% से 15 % तक ऑक्सिडाईज़ किया जाता है। भारत,चीन तथा जापान में चाय की क्वालिटी देखकर ही ग्रेडिंग की जाती है। चीन में ग्रीन पियोनी, ड्रेगन पर्ल, ड्रेगन वेल, जैस्मीन, पर्ल इत्यादि,जापान में सेन्चा, माचा, गेकुरो आदि तथा भारत में चीन के समान ही ग्रेडिंग की जाती है। ग्रीन टी एंटी-एजिंग के साथ-साथ एंटी-ऑक्सीडेंट का काम भी करती है। इसे औषधी के रूप में प्रयोग में लिया जाता है। इससे
कहवा,हर्बल टी तथा आर्गेनिक टी भी तैयार की जाती है।
यह कॉलेस्ट्रोल तथा वजन को
नियंत्रित करने,गले के संक्रमण तथा हृदय रोग के लिये उपयोगी है। ग्रीन टी में
पॉलीफ़िनोल्स होते है,जो दाँतों को केविटी से बचाते हैं।इसके अलावा महिलाओं में
गर्भाशय कैंसर, पेट कैंसर में भी लाभदायक है। इसमें कैफ़िन की मात्रा बहुत कम होती
है, अतः रात में भी पी सकते हैं।


ब्लैक टी--- यह कड़क स्वाद तथा कड़क खुशबू वाली चाय है।
इसे चीन में रेड टी के नाम से जाना जाता है,
इसे आम चाय भी कहा जाता है ।जो चीनी तथा दूध के साथ मिला कर बनाई जाती है। इसे गर्म व बर्फ़ डाल कर दोनो तरह से प्रयोग में लिया जाता है। इसमें कुछ विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक फ़्लेवर मिला कर फ़्लेवर टी के रूप में बनाया जाता है।जैसे,--जिंजर, रोज़, चोकोलेट, जस्मीन,स्ट्राबेरी, कार्डेमम, बनाना, ऑरेंज, लेमन, मंगो, एप्पल, मिंट, तुलसी, पीच सिनेमोन, अर्ल ग्रे आदि फ़्लेवर्ड चाय आजकल मार्केट में उपलब्ध है। यह पूरी तरह से फ़रमेंटेड होती है। इसे दो तरह से तैयार किया जाता है। पहली प्रक्रिया में चाय  की पत्तियों को सी.टी.सी. (कट,टियर,कर्ल) प्रोसेस के द्वारा तैयार किया जाता है। इससे निम्न कोटि
की चाय तैयार होती है। दूसरी प्राक्रिया ओर्थोडोक्स कहलाती है। इसके ऑक्सिडेशन में
एक नियंत्रित तापमान तथा नमी का प्रयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया हाथ व मशीन के द्वारा की जाती है। इस दौरान पत्तियां रोल हो जाती हैं। अब चाय को तीन श्रेणियों
में किया जाता है। डस्ट टी--ज्यादातर कैटरिंग में  कड़क चाय के रूप में प्रयोग की
जाती है।फ़ैनिंग टी--ये निम्न कोटि की चाय होती है, जो टी बैग बनाने के काम
आती है।व्होल लीफ़—यह उच्च गुणवत्ता की चाय है।




इसके बाद चाय विशेषज्ञो द्वारा चाय की गुणवत्ता को ध्यान में रख कर ग्रेडिंग होती है---
१--ब्रोकन ऑरेंज पिको (BOP)-- इसमें चाय के छोटे-बड़े सभी तरह के पत्ते होते हैं।
२--ऑरेंज पिको(OP)---इसमें चाय के
पूरे पत्ते को बिना कली के तोड़ा जाता है।
३--फ़्लावरी ऑरेंज पिको(FOP)---
इसमें सभी चाय की पत्तियां फूलों के साथ होती हैं।
फ़्लावरी ऑरेंज पिको भी दो तरह की होती है।
१--गोल्डन फ़्लावरी ऑरेंज पीको(GFOP)---इसमें पत्तियों पर सुनहरे दाने होते हैं, जो इसकी  गुणवत्ता को और भी निखार देते हैं।


२---टिप्पी गोल्डन फ़्लावरी ऑरेंज पीको(TGFOP)--इसमें चाय की कलियां और पौधों की दो ऊपर वा्ली पत्तियां शामिल होती हैं
इसके भी दो वर्ग होते हैं।


१--फ़ाइन टिप्पी गोल्डन फ़्लावरी
ऑरेंज पीको(FTGFOP)
२---सुपर फ़ाइन टिप्पी गोल्डन
फ़्लावरी ऑरेंज पीको। (SFTGFOP)
व्हाइट टी--- यह सबसे कम प्रोसेस्ड
टी है।इसमें कैफीन सबसे कम और एंटी
-ऑक्सिडेंट सबसे ज्यादा होते हैं।
यह कैंसर से बचाती है। तथा हड्डियों को मजबूत करती है। इसका
उत्पादन बहुत कम होता है।
ये साल में वसंत ऋतु के आरम्भ मे दो दिन तोड़ी जाती हैं।इसके अंतर्गत आती हैं सिल्वर निडल व्हाइट, व्हाइट पिओनी,लोंग लाइफ़ आइब्रो,ट्राइब्यूट आइब्रो आदि।
सिल्वर निडल व्हाइट टी- ताजा कलियों को हाथ से तोड़ा जाता है। ये कलिया चारों तरफ़ से सफ़ेद बाल जैसी रचना से ढकी होती है। व्हाइट टी को पानी में डालते ही बहुत हल्का सा कलर आता है, व इसका हल्का मीठा स्वाद शरीर को ताज़गी देता प्रतीत होता है।


व्हाइट पिओनी टी- इसका उत्पादन चीन में होता है। इसमें बड्स के साथ कोमल पत्तियों को भी तोड़ा जाता है। इसका स्वाद सिल्वर निडल टी से थोड़ा कड़क और रंग भी थोड़ा ज्यादा होता है।
लोंग लाईफ़ आइब्रो —यह सिल्वर निडिल,तथा पिओनी टी के बाद बची हुई पत्तियों से प्राप्त होती है। यह निम्न कोटि की चाय है।
ट्राइब्यूट आइब्रो—यह सबसे कम कीमत की व्हाइट टी की किस्म है जो विशेष प्रकार की झाड़ियों से प्राप्त की जाती है।
ऊलोंग टी---यह सेमी फ़रमेंटेड टी है।जिसे कुछ अधिक या कुछ कम ऑक्सिडाइज़
करके डिजाईनर बनाया जाता है। यह कुछ हिस्से से हरी तथा कुछ हिस्से से ब्लैक होती
है। चाय की यही विशेषता इसके स्वाद में परिवर्तन करती है। यह पेट के लिये लाभदायक । ग्रीन टी की तरह ही इसमें भी एंटिऑक्सिडेंट होते है। स्वाद में ही ग्रीन टी के समान है वरन यह भी हमारे शरीर की अनेक रोगों से रक्षा करती है।


चाय के  छोटे से पौधे ने सम्पूर्ण विश्व में अपनी पहचान बना ली है। इसकी हर घूँट के साथ अहसास होता है- सुकून,ताजगी और सेहत भरी जिंदगी का




सुनीताशानू

Friday, September 3, 2010

नरक में डिस्काउंट ऑफर(अमर उजाला में प्रकाशित)

नरक में डिस्काउंट ऑफर


सेल की दुकान देखते-देखते एक आदमी नरक के दरवाजे तक चला आया। जैसे ही यमराज पर उसकी नजर पड़ी, वह घबराकर चिल्लाया, हे महाराज! अभी तो मेरा टाइम ही नहीं आया। न मैं बीमार हुआ, न सीने में दर्द उठा, फिर आपने मुझे इतनी जल्दी क्यों बुलाया? यमराज थोड़ा मुसकराकर बोला, बालक, यह तो सेल का कमाल है। हमने तुझे यहां नहीं बुलाया। तू तो खुद-ब-खुद चला आया। धरती पर हमने नाइंटीन पर्सेंट ऑफ का जो बोर्ड लगाया है, तू उसे देखते-देखते यहां तक चला आया।



वह आदमी गिड़गिड़ाते हुए बोला, पर हुजूर, नरक तो यातनागृह है। यहां कैसा ऑफर? किस बात का डिस्काउंट? यहां तो वे लोग आते हैं, जो धरती पर पाप कमाते हैं। यमराज झल्लाकर बोला-मिस्टर मानव, हमें क्या मूर्ख समझ रखा है? खुद धरती पर तू दिन-रात नए-नए चमत्कार कर रहा है। फल, सब्जियां ही नहीं, तूने परखनली शिशु का भी निर्माण किया है। कहीं किसी रोज अमरत्व का टीका भी बना डाला, तो कोई मरेगा ही नहीं। धीरे-धीरे हमारे सारे कार्य तू ही कर लेगा, तो हमें कौन पूछेगा? इसलिए हमने नरक में धरती से भी अधिक सुख-सुविधाएं मुहैया कराने का प्लान बनाया है।



आदमी यह सब सुनकर चकराया, महाराज, अपने ऑफर के बारे में विस्तार से बताइए, ताकि मैं कुछ फैसला ले सकूं। यमराज ने तुरंत एक पेंपलेट निकाला और कहा- धरती पर यह बंटवा देना। जो पहले नरक में आएगा, स्पेशल डिस्काउंट पाएगा। आदमी खुश होकर बोला- महाराज, सुना है, नरक में चोर-उचक्के ही आते हैं। मैं तो शरीफ आदमी हूं। क्या आपने शरीफों के लिए भी अलग से कुछ व्यवस्था की है?



यमराज गुस्साते हुए बोला, धरती पर जिन चोर, उचक्कों और अपराधियों को मुंह काला कर गधे पर बिठाकर शहर भर में घुमाना चाहिए था, उनको तुमने मीडिया में सुर्खियां बना दिया। आज वे टीवी पर किस्मत आजमा रहे हैं और सेलिब्रिटी कहला रहे हैं। धरती पर जब ऐसे लोगों को सम्मान मिलेगा, तो बताओ नरक में कौन आना चाहेगा? हमारी प्रतिष्ठा का सवाल है भैया। हमने भी सोच-समझकर यह ऑफर दिया है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग नरक में आएं और नरक को भी धरती जैसा पाएं। बूढ़े हों या जवान, एक के साथ एक फ्री आ सकते हैं, रूम विद एयरकंडिशन पा सकते हैं। धरती की जेलों जैसा ही रहेगा नरक का वातावरण। मोबाइल-इंटरनेट सभी सुविधाएं हैं यहां। तुम पहले व्यक्ति हो। यदि धरती से और लोगों को भी लाओगे, तो स्पेशल डिस्काउंट के साथ-साथ उच्च पद पाओगे।

आदमी खुशी से झूम उठा। फटाफट फार्म भरके स्पेशल डिस्काउंट पा गया और पूरे परिवार सहित सीधे नरक में आ गया।



सुनीता शानू

Thursday, December 24, 2009

सर्दी में कैसे नहाएं (अमर उजाला के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित...)

सर्दी में कैसे नहाएं



सुनीता शानू

सर्दी के मौसम में रजाई से निकलकर नहाने के लिए जाना भी एक विकट समस्या है। इस मौसम में शर्मा जी खुद को सबसे बदनसीब प्राणी समझते हैं। हर सुबह उस व1त उनका मूड उखड़ जाता है, जब पत्नी न नहाने पर बार-बार उलाहना देती है। आखिरकार बीवी कमांडर बनकर उन्हें बाथरूम की तरफ धकेल ही देती है। वह शहीद बनकर अंदर घुस जाते हैं। ठीक ऐसे ही समय पड़ोस से मिश्रा जी के गाने का स्वर आता है, ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए।

बस बीवी का दिमाग तमतमा जाता है, कब तक आलसी की तरह पड़े रहोगे? मिश्रा जी से कुछ सीखो, जो रोज ठंडे पानी से नहाते हैं। एक तुम हो, जो गरम पानी से नहाते हुए भी रो रहे हो। अब श्रीमती जी को कौन समझाए कि मिश्रा जी सचमुच ठंडे पानी से नहा रहे हैं या गरम पानी से। या नहा भी रहे हैं कि सिर्फ राग अलाप रहे हैं। बहरहाल बेचारे शर्मा जी को उठना ही पड़ा।अब यह कोई एक दिन की बात तो है नहीं। रोज-रोज का नहाना, सचमुच कंपकंपी-सी चढ़ जाती है

नल तेजी से चलाएं और ठिठुरते हुए गाएं, ताकि बीवी को लगे कि आप सचमुच नहा रहे हैं। हां, गीले तौलिये से शरीर पोंछना न भूलें


शर्मा जी पत्नी को समझा-समझाकर थक गए कि सर्दी में नहाना बेवकूफों का काम हैं। एक तो पसीना आता नहीं, दूसरे पानी की बरबादी। खैर ये गूढ़ रहस्य की बातें हैं, पत्नी की मोटी बुद्धि में घुसने वाली नहीं।

अचानक माथे पर चंदन का टीका लगाए मौजीराम को आए देख शर्मा जी थोड़े आश्वस्त हुए। उन्हें लगा, डूबते को तिनके का सहारा मिला। लेकिन बीवी ने मौजीराम के सामने एक बार फिर शर्मा जी के न नहाने का उलाहना दिया। मौजीराम ने आग में घी डालते हुए कहा, अरे भाभी जी, सर्दी में नहाना अति उत्तम है, और वह भी ठंडे पानी से तो समझो कि सो रोगों की दवा।

बेचारे शर्मा जी गुस्से में दांत किटकिटा रहे थे। अब तो सहन करना मुश्किल हो गया। मौजीराम रोज-रोज नहाने वाला बंदा तो है नहीं, कोई न कोई घोटाला अवश्य है। खैर शर्मा जी को विप8िा में देख मौजीराम ने दोस्त होने का फर्ज निभाया और उन्हें शीत स्नान का नुसखा बताया। शीत स्नान यानी ह3ते में बस एक दिन रविवार की छुट्टी के दिन नहाएं। बाकी दिनों बस ठंडे पानी के नल को पूरे वेग से चलाएं और ठिठुरते-ठिठुरते गुनगुनाएं, ताकि पत्नी को लगे आप सचमुच ठंडे पानी से ही नहा रहे हैं। इसके बाद तौलिया भिगोकर सिर व हाथ-पैर पोंछ लें।


कहा भी जाता है कि धोए कान हुआ स्नान, अर्थात शीतकाल में इसे ही संपूर्ण स्नान माना जाएगा। और हां, चेहरे पर क्रीम और सिर में खुशबू वाला तेल लगाना न भूलें। सप्ताह के दिन जैसे-जैसे बीतें, वैसे-वैसे तेल, परफ़्यूम आदि की मात्रा बढ़ा दें। और हां, साबुन और कपड़े गीला करना न भूलें।

मौजीराम जी के नुसखे पर अमल कर शर्मा जी सुखी हैं। रोज शीत स्नान करते हैं और पत्नी से कहते हैं, सचमुच सर्दी में नहाने का मजा ही कुछ और है। लेकिन मिसेज शर्मा यह सोच-सोचकर हैरान हैं कि शर्मा जी आखिर चमेली का तेल क्यों लगाते हैं?

Wednesday, December 9, 2009

दहेज के कारण पुरुषों का भी उत्पीड़न (नई दुनिया में प्रकाशित)







दहेज के कारण पुरुषों का भी उत्पीड़न

देश भर में वर्ष में ७० हजार मामले भारतीय दंड संहिता की धारा "४९८-ए" के अंतर्गत दर्ज किए जाते हैं। प्रतिदिन अनेक निर्दोष आरोपित पुरुष या नाते रिश्तेदारों को सजा हो जाती है, यहां तक की छोटे मासूम बच्चों व घर के बुजुर्गों की जिंदगी भी दांव पर लग जाती है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिवर्ष ५०,००० स्त्रियां परिवार के सदस्यों द्वारा किसी न किसी रूप में प्रताड़ित होती है। लगभग ६००० पुरुषों पर किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि अधिकांश पुरुष अपनी पत्नी को किसी न किसी रूप में शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना देते हैं अब मुद्दा यही उठता है कि पीड़ित महिला क्या करे, कहां जाए। इससे निपटने के लिए ही भारत सरकार ने सन १९८३ में आइपीसी की धारा ४९८ ए के अंतर्गत "पति या उसके रिश्तेदारों के अत्याचारों" को गैर जमानती अपराध करार दिया था, १९८६ में मुस्लिम महिला के तलाक के खिलाफ अधिकार की सुरक्षा अधिनियम के तहत स्पष्ट किया की तलाक देने वाले पति द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता दिया जाएगा, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मशहूर शाहबानो फैसला आया था, १९८७ दिवराल में फिर एक केस हुआ राजस्थान हाईकोर्ट में रूपकवर सती कांड जिसने सबके रौंगटे खड़े कर दिए, हाईकोर्ट ने फिर एक आदेश जारी किया "भारतीय सती रोकथाम अधिनियम १९८७" इसके अंतर्गत सती होना, जबरन सती बनाया जाना, फ़ुसलाना या महिमांडन करना अपराध माना गया। भारतीय दंड संहिता की धारा "४९८-ए" के अनुसार पीड़ित महिला पति या अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ याचिका दायर कर न्याय की गुहार कर सकती है। यदि पति या कोई अन्य रिश्तेदार अपराधी घोषित हो जाता है तो उसे कम से कम एक साल से लेकर तीन साल की सजा हो सकती है। इसके आलावा जुर्माना भी हो सकता है।



जेंडर ह्यूमन राइट्स सोसयटी के अध्यक्ष श्री संदीप भाटिया के अनुसार हर साल "४९८-ए" के तहत ५८ हजार मामले दर्ज किए जाते हैं। एक लाख से भी ज्यादा लोग झूठे मामलों में गिरफ्तार होते हैं। हर चार मिनट में एक पुरुष पर दहेज प्रताड़ना का झूठा आरोप लगाया जाता है। हर २.४ घंटे में एक बुजुर्ग नागरिक को दहेज की मांग के झूठे आरोप में फंसा दिया जाता है। हर रोज एक निर्दोष बच्चा इसी धारा में गिरफ्तार होता है, हर २३ मिनट में एक निर्दोष महिला धारा ४९८ए के तहत गिरफ्तार होती है तो हर पांच मिनट में एक निर्दोष सलाखों के पीछे पहुंचता है। अपनी दुश्मनी निकालने के लिए भी कुछ लोग दहेज के गलत आरोप लगा कर निर्दोष लोगों को फंसा देते हैं, जिस पर जस्टिस अशोक भान और जस्टिस डी.के. जैन ने कहा कि सेक्शन "४९८ ए" को दहेज के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए लागू किया गया था न कि मासूम व निर्दोष लोगों को फांसने के लिए। आईपीसी की धारा "४९८-ए" बनाई तो दहेजलोभियों को सबक सिखाने के लिए ही है लेकिन दुर्भाग्य से इसके दुरुपयोग के मामले भी सामने आने लगे हैं । दहेज निरोधक कानून के तहत दर्ज मामला गैर जमानती और दंडनीय होने के कारण और भी उलझ जाता है। आत्मसम्मान वाले व्यक्ति के लिए यह काफ़ी घातक हो गया है, जब तक अपराध का फ़ैसला होता है जेल में रहते-रहते वह इस तरह खुद को बेइज्जत महसूस करता है कि मर जाना पसंद करता है, जिसके पिछले दिनों में कई किस्से नजर आए थे कि कई पुरुषों ने बदनामी से बचने के लिए आत्महत्या कर ली, आत्मसम्मान वाले आदमी के लिए एक बार गिरफ्तार हो जाना काफी घातक होता है।


कई बार अविवाहित लड़कियों, छोटे बच्चों और बुजुर्गों को आरोपी बना दिया जाता है। अग्रिम जमानत का प्रावधान न होने से उन्हें जेल जाना पड़ता है। इससे लड़कियों के विवाह के अवसर समाप्त हो जाते हैं और बुजुर्गों को जिल्लत झेलनी पड़ती है। एक और सबसे बड़ी समस्या है बेकसूर बच्चे जिन्हें नाहक ही सजा भुगतनी पड़ती है, जो अपने माता-पिता, घर- परिवार से दूर होते जाते हैं व कई बार अपराधी भी बन जाते हैं । इन तमाम बातों को देखते हुए जनता की अपील पर केंद्र सरकार ने निर्देश जारी किए हैं कि दोनों तरफ न्याय बराबर हो, सजा दोषी को ही मिले निर्दोष को नहीं। एवं धारा ४९८-ए के लिए पर्याप्त सबूत मिल जाने पर अन्वेषण के बाद ही दहेज विरोधी मामले दर्ज किए जाएंगे। हो सकता है कानून के इस बदलाव से कानून की बदनामी होने के आसार भी कम हो पाएं किंतु इसके लिए समाज और प्रशासन में भी जरूरी फेरबदल किए जाने चाहिएं। इसी से परिवार का विघटन रुकेगा ।

Monday, November 23, 2009

घूरना मना है (नई दुनिया के संपादकीय पृष्ठ पर)



राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी क्या शुरू हुई कि जिधर देखो उधर उथल-पुथल मच गई।दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। उन दिनों कुछ खास है,जैसे अब कहीं गाय भगाई जा रही है तो कहीं कुत्ता, कहीं एमसीडी वाले बंदर के पीछे उछल रहे हैं तो कहीं सूअर भगा रहे हैं। बाकी सब तो ठीक है मगर मच्छरजी को कैसे भगाया जाए। उन्होंने तो लगता है, राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेने की ठान ली है।


कॉमनवेल्थ गेम्स का एक फायदा तो है हमारी दिल्ली भी साफ-सुथरी, सुंदर हो जाएगी और सड़कें चौड़ी होंगी, फ्लाईऑवर बनेंगे, नई इमारतें, नए स्टेडियम। अरे भैया! हम कोई खयाली पुलाव नहीं पका रहे हैं, बाकायदा कागजी नक्शा तैयार किए हैं। अब तो हमारे देश का पूरी तरह से नवीनीकरण होकर रहेगा। मजाक नहीं है भई, क्या हुआ जो महँगाई ने मुँह खोल रखा है। हम दिल्ली वाले दिल भी तो बड़ा रखते हैं जी। यह और बात है कि देश के सारे भिखारियों को और रिक्शे वालों को दिल्ली से हटा देंगे। आखिर कॉमनवेल्थ गेम्स में कॉमन मैन का क्या काम?

विदेशियों का स्वागत करने में कोई कसर न रह जाए इसलिए तरह-तरह के ट्रेनिंग सेंटर भी खुल गए हैं। रेलवे ने भी अपने स्टेशनों का हुलिया बदलने की ठान ली है। इसके साथ ही रेलवे ट्रेनिंग सेंटर में कुलियों को सिखा रहे हैं कि कैसे अँगरेजी में बात की जाए। अरे उन्हें अँगरेजी ही आती तो वे कुलीगिरी करते ही क्यूँ?

देखा-देखी पुलिस प्रशासन को भी जाने क्या हो गया है। पचास हजार से भी ज्यादा पुलिसकर्मियों को सारा काम-धंधा छोड़कर यही सीखने में लगा रखा है कि किस प्रकार विदेशी मेहमानों से पेश आया जाए। अब विदेशी चाहे जैसी हरकत करें, हमें अपने क्रोध को वश में रखना है। मुझे लगता है, बाबा रामदेव ही उनकी क्लास ले रहे होंगे। रोगों से छुटकारा, तनाव से मुक्ति, क्रोध पर काबू इत्यादि।

सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात तो यह है कि घूरने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अब भला यह भी कोई बात हुई? कोई यह बताए कि घूरना भी कोई अपराध हुआ भला। मेरे खयाल से हमारे देश में कम से कम दस प्रतिशत दस साल के बच्चे, तीस प्रतिशत नौजवान और साठ प्रतिशत बुढ़ऊ नौजवान से हैं, जो घूरा-घूरी में लगे रहते हैं। और नित्यप्रति घूरन प्रक्रिया द्वारा आई टॉनिक लेने का उनका नियम बना हुआ है। अब ये आई टॉनिक पर भी रोक लग गई तो सोचिए देश की आँखों का क्या होगा। और यदि सुरक्षा कर्मचारी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लेंगे यानी कि पर्यटको को घूरेंगे नहीं तो देश की सुरक्षा कैसे होगी? उनमें से किसी के पास बम निकल गया तो क्या होगा? यह अत्यंत गहन चिंतन का विषय है।


सुनीता शानू